ज्योतिष में देश काल की माप

श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)
१. सभ्यता का आधार वेद-वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं, यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम्॥ (ऋक् ज्योतिष, ३६, याजुष ज्योतिष, ३)
= यज्ञ के लिए वेद है, यज्ञ काल के अनुसार होते हैं, अतः काल-विधान के लिए यह ज्योतिष शास्त्र है। जो ज्योतिष जानता है, वही वेद समझता है।
मनुष्य के लिए उपयोगी वस्तु का उत्पादन यज्ञ है, जिससे सभ्यता चल रही है (गीता, ३/१०)। इस दृष्टि से यजुर्वेद मूल है, विश्व की रचना और वर्णन ऋक् है, महिमा या प्रभाव साम है, तथा सबका आधार अथर्व या ब्रह्म वेद है। विश्व वर्णन के लिए लोकों की माप होती है, गति या क्रिया के लिए काल की माप है जिसके अनुसार कृषि आदि यज्ञ होते हैं। महिमा या प्रभाव के लिए दिशा की माप है।
२. त्रिप्रश्न-तीनों की माप सिद्धान्त ज्योतिष का त्रिप्रश्नाधिकार है-देश, काल, दिक्। साहित्य वर्णन के लिए देश-काल-पात्र कहते हैं।
पृथ्वी पर स्थान की माप के लिए अक्षांश, देशान्तर मापते हैं। ये पृथ्वी केन्द्र से दो तलों में कोणीय माप हैं, अर्थात् पृथ्वी के गोल आकार के अनुसार ही इनकी परिभाषा तथा माप है।
अक्षांश तथा दिशा के लिए शङ्कु का प्रयोग किया जाता है। यह एक स्तम्भ है, जिसे सीधा खड़ा करने के लिए वृत्ताकार आधार का शंकु ल्रेते हैं। ऊपरी भाग ठीक उस विन्दु पर है जहां की माप करनी है, वह शंकु आधार का केन्द्र है। जिस दिन सूर्य विषुव रेखा पर होता है, उस दिन दिन रात बराबर होते हैं। उस दिन सूर्य मध्याह्न के समय विषुव के किसी सतह पर लम्ब होगा तथा छाया शून्य होगी। अन्य स्थान जितना अंश उत्तर या दक्षिण है, उतना सूर्य विपरीत दिशा में झुका रहेगा। उस दिन मध्याह्न सूर्य की छाया या पलभा उस स्थान के अक्षांश की माप होगी कि वह विषुव से कितना अंश उत्तर या दक्षिण है। छाया की दूरी को पलभा कहते हैं। शंकु स्तम्भ कितना भी ऊंचा हो उसे १२ अंगुल मानते हैं तथा उसके अनुसार छाया की दूरी मापते हैं। इसे १२ अंगुल का शिवलिंग भी कहा गया है, शिव के काल रूप के लिए।
अक्षांश θ की माप – Tan θ = शंकु की उंचाई/छाया की लम्बाई
लिङ्गं पीठं चरेत्वेकं लिङ्गं बाण कृतं विना। लिङ्ग प्रमाणं कर्तॄणां द्वादशाङ्गुलमुत्तमम्॥
(शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता, १/८)
अक्षांश मालूम हो तो सौर-मास दिन निकाल सकते हैं।
तन्मध्ये स्थापयेच्छङुं कल्पितद्वादशाङ्गुलम् (सूर्य सिद्धान्त, ३/२)
द्वादश प्रधययश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत।
तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलासः॥ (ऋक्, १/१६४/४८)
(१२ परिधि = १२ राशि, ३ नाभि = पृथ्वी कक्षा का १ केन्द्र +२ नाभि, ३६० अंश। शङ्कु को अर्पित कर गणना)
मध्याह्न समय की छाया उत्तर दिशा में होती है, पर ठीक उस समय की छाया देखना कठिन है। अतः मध्याह्न की अनुमानित छाया से थोड़ा छोटा वृत्त बनाने पर उससे समान समय पहले तथा बाद में छाया शीर्ष वृत्त को छुएगा। दोनों के बीच की दिशा उत्तर-दक्षिण दिशा होता है। इसे आधुनिक सर्वेक्षण में ट्रावर्सिंग(Traversing) कहते हैं। इंजीनियरिंग के एम.टेक पुस्तक में भी यही विधि दी है, पर वटेश्वर सिद्धान्त में इसमें एक सूक्ष्म संशोधन दिया है। मध्याह्न समय के पूर्व और बाद की २ छाया के समय सूर्य की उत्तर दक्षिण दिशा में कुछ अन्तर हो जायेगा जिसके लिए शुद्धि दी गयी है।
देशान्तर के लिए समय निकालने की आवश्यकता होती है, कि पूर्व पश्चिम के २ स्थानों में स्थानीय समय का क्या अन्तर है। सूर्य सिद्धान्त (१/६३-६५) में कहा है कि उन स्थानों पर चन्द्र ग्रहण के समय स्थानीय समय का अन्तर देखना चाहिए। चन्द्र ग्रहण में चन्द्र वास्तव में छाया से ढंक जाता है अतः हर स्थान पर एक साथ होता है, अतः उससे अन्तर देखना सम्भव है। सूर्य का ग्रहण नहीं होता, चन्द्र छाया से पृथ्वी का एक अंश ढंकता है, यह छाया गति के अनुसार भिन्न भिन्न समय पर होता है। उषा सूक्त (ऋक्, १/१२३/८) में १/२ अंश देशान्तर को १ धाम कहा है तथा उषा काल के अनुसार इसकी माप है। फाहियान भारत से जहाज में लौटा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ था कि भारत के जहाज किनारे किनारे नहीं चलते, बल्कि उनके पास ठीक नक्शा है और समुद्र में अपनी स्थिति जानते हैं। अक्षांश निकालना सरल है, पर देशान्तर की विधि पहली बार यूरोप ने भारत से तुर्की के माध्यम से सीखी। उनको एक नक्शा भी मिला जिसमें अण्टार्कटिक के २ भूखण्डों का सही आकार दिया था (पिरी-रीस नक्शा)
३. बड़े माप-इसी प्रकार समकोण त्रिभुज के द्वारा इससे बड़े माप होते हैं, जिनको आधुनिक सर्वे में त्रिकोणीकरण कहते हैं-(१) पृथ्वी का आकार, (२) उसकी तुलना में चन्द्र की दूरी, (३) चन्द्र कक्षा की तुलना में सूर्य दूरी या पृथ्वी कक्षा, (४) पृथ्वी कक्षा की तुलना में अन्य ग्रहों की कक्षा तथा सौरमण्डल, (५) पृथ्वी कक्षा को व्यास मान कर निकट के ताराओं की दूरी।
इसके बाद आधुनिक ज्योतिष में निकटवर्ती ताराओं की दूरी तथा उनके तेज-वर्ग के अनुसार प्रकाश का सम्बन्ध बनाते हैं। इसके आधार पर दूर के ताराओं की दूरी निकालते हैं। इसमें यह ज्ञात नहीं होता कि बीच में कितनी धूल है और उससे तारा कितना मन्द हो रहा है। यही तर्क सूर्य सिद्धान्त (१२/९०) में दिया है कि जितनी दूरी पर सूर्य विन्दु मात्र दीखेगा, वह ब्रह्माण्ड का आकार होगा। सम्भवतः अन्य विधिं भी रही होंगी जिनको वेद में तुरीय यन्त्र (४ स्तर) कहा है ।
आकाश कक्षा सा ज्ञेया कर व्याप्तिस्तथा रवेः॥८१॥
ब्रह्माण्ड सम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥९०॥ (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १२)
सूर्य किरण की सीमा को ब्रह्माण्ड को वेद में परम पद कहा गया है।
तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः (ऋक्, १/२२/२०)
गूळ्हं सूर्यं तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मनाविन्ददत्रिः (ऋक्, ५/४०/६)
सूर्य से हमारे सम्बन्ध प्रकाश की गति से है जो १ मुहूर्त्त में ३ बार जा कर लौट आता है (ऋक्, ३/५३/८)। इस पर ग्रहों के प्रभाव से उस सूत्र की दिशा, रंग आदि बदल जाते हैं, जो आधुनिक विज्ञान में कई प्रकार के मोडुलेशन कहे जाते हैं। इनका वर्णन वाज. यजु (१५/१५-१९, १७/५८, १८/४०), कूर्म पुराण (४१/२-८), मत्स्य पुराण (१२८/२९-३३), वायु पुराण (५३/४४-५०), लिंग पुराण (१/६०/२३), ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२४/६५-७२) आदि में है, पर इनका अर्थ या विधि स्पष्ट नहीं है।
शंकु रूपी स्तम्भ या मापदण्ड से दूरी निकालते हैं। शंकु के तल छेद द्वारा वृत्त, दीर्घवृत्त, परवलय आदि आकार बनते हैं जो गुरुत्वाकर्षण के कारण ग्रह या तारा कक्षा हैं। इससे सूर्य की गति का अनुमान कर तारा संख्या का अनुमान हुआ १९८५ में हुआ। १०० अरब संख्या का यही अनुमान शतपथ ब्राह्मण (१२/३/२/५, १०/४/४/२) में है। अतः कहा है कि शंकु द्वारा ही विश्व का धारण हुआ है (शांकव कक्षा में पिण्ड बने हुए हैं)।
शङ्कुभवत्यह्नो धृत्यै यद्वा अधृतं शङ्कुना तद्दाधार॥११॥
तद् (शङ्कु साम) उसीदन्ति इयमित्यमाहुः॥१२॥ (ताण्ड्य महाब्राह्मण,११/१०)
४. मापों का समय-महाभारत के बाद अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि दूर स्थानों से सम्पर्क टूट गया। अतः शौनक आश्रम में पुराण संस्करण करने वालों को ७ द्वीपों का पता नहीं था और अनुमान से वर्णन किया। पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह कक्षाओं से जो वृत्त या वलय आकार के क्षेत्र बनते हैं उनको भी उन्हीं द्वीपों का नाम दिया गया है जो पृथ्वी के द्वीपों के हैं। पृथ्वी का कोई द्वीप वलयाकार नहीं है, न १६ करोड़ योजन मोटे वलय का पुष्कर द्वीप १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर हो सकता है। आर्यभट न भारत के बाहर के किसी द्वीप पर गये थे, न ध्रुव प्रदेश। आर्यभटीय या सूर्य सिद्धान्त में यह कैसे लिख सकते हैं कि लंका या उज्जैन से ९० अंश पूर्व यमकोटिपत्तन, १८० अंश पूर्व सिद्धपुर, ९० अंश पश्चिम रोमकपत्तन था? आर्यभट तथा लल्ल ने लिखा है कि उत्तरी ध्रुव जल में तथा दक्षिणी ध्रुव स्थल में है। १९०९ में उत्तरी ध्रुव का तथा १९३१ में दक्षिणी ध्रुव पर कोई गया। १९८५ में पहली बार पता चला कि दक्षिणी ध्रुव स्थल भाग पर है। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी अक्ष का झुकाव तथा कक्षा की च्युति (मन्द फल) तथा दिनमान (सौर वर्ष के अंश रूप में)-सभी प्रायः ९००० ई.पू. के हैं। मयासुर ने सत्ययुग में अल्प (१२१) वर्ष बाकी रहने पर सूर्य सिद्धान्त में संशोधन किया था। वैवस्वत मनु से १२,००० वर्ष के ऐतिहासिक युग की गणना के अनुसार ३१०२ ई.पू. में कलि आरम्भ हुआ था। उससे २४०० वर्ष का द्वापर, ३६०० वर्ष का त्रेता तथा १२१ वर्ष सत्ययुग पहले ९२२३ ईपू. में वर्तमान मान निर्धारित हुए थे। उससे पूर्व बहुत समय तक जल प्रलय के कारण गणना में भूल हो गयी। ब्रह्म-स्फुट सिद्धान्त (मध्यमाधिकार, ६१) तथा सिद्धान्त शिरोमणि (भूपरिधि, ७-८) में १२,००० वर्ष के चक्र में ही बीज संस्कार लिखा है जो आगम से चला आ रहा था। आर्यभट ने लिखा है कि उन्होंने स्वायम्भुव मनु (पितामह, २९,००० ईपू) के सिद्धान्त का संशोधन किया है,अतः इसे आर्य सिद्धान्त कहा गया (आर्य = पितामह)। सूर्य सिद्धान्त विवस्वान् या सूर्य से आरम्भ हुआ जिनके पुत्र वैवस्वत मनु (१३९०० ईपू) थे।
इससे भी पूर्व देव युग में इन्द्र आदि देवों के अन्य सन्दर्भ नगर पुराणों में दिये हुए हैं-इन्द्र की अमरावती (गभस्तिमान् द्वीप पर) से ९० अंश पूर्व वरुण की सुखा नगरी (हवाई या माइक्रोनेसिया), १८० अंश पूर्व सोम की विभावरी (न्यूयार्क या सूरीनाम), तथा ९० अंश पश्चिम यम की संयमनी (अम्मान, मृत सागर) थी। उस काल में ६-६ अंश पर समय क्षेत्र थे जिनके ३० स्थान आज भी उपलब्ध हैं। रामायण किष्किन्धा काण्ड (४०/६४) में लिखा है कि पूर्व दिशा के अन्त का चिह्न देने के लिए एक द्वार बनाया था। उज्जैन से ठीक १८० अंश पश्चिम एक पिरामिड है जिसे प्रथम देव (ब्रह्मा) का कहा जाता है। वेद में भी ज्योतिष जैसे ही ब्रह्म तथा आदित्य सम्प्रदायों का शाखा विभाजन है।
बिना पृथ्वी की माप हुए ग्रहों की दूरी मापना असम्भव है। यदि पटना में आर्यभट को चन्द्र की दूरी निकालनी होती तो पटना तथा भारत में सबसे दूर कन्याकुमारी से एक समय चन्द्र को देखना पड़ता जिसमें १/८ अंश से कम का अन्तर होगा। यदि समय मिलाने में १ सेकण्ड की भूल हो तथा अक्षांश आदि कोण माप में भी १ सेकण्ड तक की भूल हो तो चन्द्र दूरी मापने में २५% भूल होगी। यह करने का भी कोई साधन उनके पास नहीं था। पुराने ज्ञान को सञ्चय कर उसे चला सके इसका कारण था कि भारत के सबसे शक्तिशाली बार्हद्रथ वंश के आश्रय में थे (३६० कलि में)। ३६० को ३६०० करने से ४९९ ई समय होगा जब मगध में कोई स्वतन्त्र राज्य नहीं था जहां केरल से आर्यभट आते।
पृथ्वी व्यास का १००० भाग योजन लेने पर ब्रह्माण्ड का व्यास १८ अंक की संख्या होगी। उससे अधिक की जरूरत नहीं होती, अतः परम गुहा ब्रह्माण्ड की माप को परा या परार्ध कहा गया (कठोपनिषद्, ३/१/१, ऋक्, १/१६४/१२) आर्यभट तथा माया ज्योतिष में भी १८ अंकों की संख्या का ही प्रयोग है।
५. माप की इकाइयां-माप की जो विधि या साधन हैं उनके अनुसार माप की इकाई होती है। पहले मनुष्य के पैर की माप को फुट (पैर) कहा गया। उसके बाद पेरिस की देशान्तर रेखा पर विषुव से उत्तर ध्रुव की दूरी के १ कोटि भाग (परिधि का ४ कोटि भाग) को मीटर कहा गया। यही माप पुरुष सूक्त के प्रथम श्लोक के अनुसार होगी। उसके अनुसार पृथ्वी परिधि ४ कोटि दण्ड होगी। भू पृथ्वी है (प्रकृति के २४ तत्त्व, भ = २४)। वायुमण्डल मिला कर भूमि २५ है। अतः भू परिधि = २४/२५ x१००० सिर x२००० आंख x २००० पैर = ४ कोटि दण्ड (१ दण्ड = ९६ अंगुल)।
बाद में पता चला कि इस माप में भूल है तो जो पुराना पाप हुआ था उसी के बराबर दूरी पर पेरिस की छड़ में चिह्न दिये गये, जिसे १ मीटर मान लिया। १९६५ में जब प्रकाश तरंगों की लबाई की शुद्ध माप होने लगी कि मीटर की परिभाषा हुई- क्रिप्टन ८६ भार के परमाणु से निकले एक प्रकाश तरंग की लम्बाई का १६,५०,७६३.७३ गुणा १ मीटर है। १९९० में प्रकाश गति की माप भी शुद्धता से होने लगी तो इसकी परिभाषा हुई-१ सेकण्ड में प्रकाश द्वारा तरय की गयी दूरी का २९,९४,९२,४५६ भाग। प्रकाश गति आधारित माप का प्रयोग भी ज्योतिष ग्रन्थों, पुराण तथा वेद में हुआ है।
फुट, ४ प्रकार के मीटर के अतिरिक्त ज्योतिष के लिए अन्य ३ माप हैं-नौटिकल मील (६०८० फीट), प्रकाश वर्ष (१वर्ष में प्रकाश द्वारा तय की गयी दूरी, प्रायः १० घात १६ मीटर), परसेक (पृथ्वी कक्षा के व्यास से जितनी दूरी पर १ सेकण्ड का कोण बनता है-३.२६ प्रकाश वर्ष।
एक ही लेखक भास्कराचार्य ने २ उद्देश्यों के लिए २ प्रकार के योजन का व्यवहार किया है। ज्योतिषीय माप के लिए सिद्धान्त शिरोमणि में पृथ्वी परिधि के अंश को ८ किमी का योजन माना है। सतह पर भूमि माप के लिए लीलावती में १६ किमी का योजन व्यवहार किया है, जो मनुष्य हाथ का ३२००० गुणा है।
आधुनिक विज्ञान की ८ माप के बदले प्राचीन काल में कितने माप थे? भागवत पुराण (१०/१४/११) में ब्रह्मा ने कृष्ण की स्तुति में कहा है कि उनका शरीर मात्र ७ वितस्ति है। मनुष्य शरीर की माप के लिए हर वितस्ति बराबर है, जो मनुष्य की हथेली का विस्तार है। लोकों की माप के लिये हर लोक का विस्तार १-१ वितस्ति है। अतः ७ वितस्ति होगी, या आकाश मापके लिए ७ प्रकार के योजन होंगे। यही ऋग्वेद में कहा है कि ७ प्रकार के योजन तथा ७ प्रकार के युग होंगे।
अष्टौ व्यख्यत् ककुभः पृथिवास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून् (ऋक्, १/३५/८)
अमीमेद् वत्सो अनुगामपश्यद् विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु। (ऋक्, १/१६४/९)
दोनों स्थानों पर ३ धामों के सन्दर्भ में ३ योजन लिखे हैं। उन धामों की पृथ्वी आकाश माता-पिता हैं, अन्तरिक्ष वत्स है। ३ धामों के ३-३ योजन होने पर बीच की सन्धियों के योजन समान होंगे, अतः ७ योजन होंगे।
अथर्व वेद के काल सूक्तों में काल को सप्त-अश्व कहा है, जिसका अर्थ ७ युग हैं। सूर्य सिद्धान्त (१४/१) में ९ प्रकार के कालमान हैं जो सृष्टि के ९ सर्गों के निर्माण चक्र हैं।
सप्त युञ्जन्ति रथमेक चक्रो एको अश्वो वहति सप्तनामा (ऋक्, १/१६४/२)
युज् धातु से योजन तथा युग हुए हैं तथा दोनों ७-७ हैं।
कालो अश्वो वहति सप्त रश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः॥१॥
सप्त चक्रान् (युग) वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः॥२॥ (अथर्व, १९/५३)
९ काल मानों के परस्पर संयोग से ७ प्रकार के युग हैं।
६. नर योजन-मनुष्य माप से खेत, जमीन आदि की माप की जाती है। भास्कर-२ की लीलावती (१/५-६) के अनुसार-
८ यव = १ अंगुल, २४ अंगुल = १ हस्त, ४ हस्त = १ दण्ड, २००० दण्ड = १ क्रोश, ४ क्रोश = १ योजन।
१ हस्त को १/२ मीटर मानने पर, १ योजन = १/२ ४ २००० ४ मीटर = १६,००० मीटर या १६ किलोमीटर।
वराहमिहिर की बृहत् संहिता (५८/१-२) के अनुसार-
८ परमाणु = १ रज, ८ रज = १ बालाग्र, ८ बालाग्र = लिक्षा, ८ लिक्षा = १ यूक, ८ यूक = १ यव, ८ यव = १ अंगुल
अंगुल = ५० सेमी/२४ = २. ०८ सेमी.। बालाग्र = २/ (८ घात ४) = ४.५ माइक्रोन।
यहां परमाणु का अर्थ सूर्य प्रकाश में दीखने वाले कण हैं, पदार्थ का परमाणु नहीं।
श्वेताश्वतर उपनिषद् (४/५) में बालाग्र के १०,००० भाग को जीव (परमाणु) कहा है जो कल्प (निर्माण, रासायनिक क्रिया) में नष्ट नहीं होता।
७. भू योजन-आधुनिक नॉटिकल मील विषुवत् परिधि का १ मिनट अर्थात् २१६०० भाग है। उसी प्रकार ज्योतिष ग्नथों में पृथ्वी की माप पर योजन आधारित है। उस माप को ठीक मान कर उसके अनुसार योजन की गणना करते हैं।
सूर्य सिद्धान्त (१/५९) व्यास = १६०० योजन
पञ्च सिद्धान्तिका (१/१८)-परिधि = ३२०० योजन
आर्यभटीय (१/१०) तथा लल्ल (२/४३)-व्यास – १०५० योजन
सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय, भुवनकोष, ५२-व्यास = १५८१ १/२४ योजन, परिधि = ४९६७ योजन।
यहां परिधि के अनुसार गणना है। पर परिधि के ५००० भाग के बदले ४९६७ भाग को योजन क्यों कहा? निश्चित रूप से भास्कराचार्य ने या उस काल की सरकार ने विषुव या ध्रुवीय परिधि नहीं मापी थी। यहां की २ संख्यायें विषुव तथा ध्रुव परिधि के मान हैं जो परम्परा से ज्ञात थे। १२,००० वर्ष के बीज संस्कार को भी आगम प्राप्त कहा है। आधुनिक गणना के अनुसार विषुव त्रिज्या ६३७८.१ किमी तथा ध्रुवीय त्रिज्या ६३५६.८ किमी है। इनका अनुपात १.०३३५ है। भास्कराचार्य की परिधि का अनुपात होगा १.००६६। प्राचीन काल में दोनों मापों का अनुमान था जो हर्ष संवत् के समय बने कुतुब मीनार से लगता है। इसकी मध्य रेखा समय की कर्क रेखा पर लम्ब थी। मध्य रेखा तथा सतह के बीच का कोण उतना ही है जितना दिल्ली में मध्य तथा स्पष्ट अक्षांश का अन्तर।
पुराणों में ग्रह कक्षा से बने द्वीपों की माप के लिए विषुव व्यास का १००० भाग को योजन कहा गया है (प्रायः आर्यभट योजन, १२.९ किमी)। इस माप से ग्रह-कक्षा द्वीपों की गणना की जाय तो ग्रह कक्षाओं का मान १/३ से २% तक शुद्धि के साथ ज्ञात होता है। १७७२ में इसी को बोड नियम कहा गया। सूर्य दूरी के १/१० को इकाई मानने पर ग्रह कक्षाओं का दीर्घ अक्ष अ = ४ + क, जहां क = ०, ३, ६, १२, २४, ४८, ९६ है। इसमें मंगल के बाद एक ग्रह की स्थिति नहीं दी है जिसके टुकड़े मंगल-बृहस्पति के बीच घूम रहे हैं। भागवत पुराण में इस ग्रह की भी ठीक दूरी दी गयी है।
८. भ योजन-पृथ्वी के ही आकर्षण केन्द्र में ही चन्द्र है, अतः चन्द्र कक्षा तक की माप भू-योजन में मानना उचित है। किन्तु सौर परिधि की माप के लिये सौर व्यास और दूरी की वर्तमान मापों से तुलना की जानी चाहिये जैसे भू योजन के लिये करते हैं। सूर्य व्यास = १३,९२,००० कि.मी. = ६५०० योजन (सूर्य सिद्धान्त ४/१)
इस योजन का मान = १३,९२,०००/६५०० = २१४.१५३८ कि.मी.
यह सूर्य सिद्धान्त के भू योजन से २६.८६ या प्रायः २७ गुणा बड़ा है, अतः इसे भ-योजन कहा गया है।
भू = पृथ्वी = १, भ = नक्षत्र = २७। सूर्य कक्षा = ४३,३१,५०० योजन (सूर्य सिद्धान्त १२/८६) परिधि
त्रिज्या = १.४७ x १० घात ८ कि.मी. (आधुनिक मान १.५० x १० घात ८ कि.मी.)
नक्षत्र कक्षा = सूर्य कक्षा x ६० ( सूर्य सिद्धान्त १२/८०)
सभी ग्रहों की कक्षा इसके भीतर ही है। आधुनिक ज्योतिष के अनुसार नेपचून सूर्य से ३० गुणा दूरी पर है तथा प्लूटो ३९ गुणा। प्लूटो चन्द्र से भी बहुत छोटा है। ३६-४४ गुणा दूरी पर १०० कि.मी. से बड़े आकार के प्रायः ७०,००० पिण्ड सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं। पहली बार १९९२ में इनका पता चला। यह भागवत पुराण का १०० कोटि योजन व्यास का अलोक भाग है (स्कन्ध ५) । सूर्य कक्षा का ६० गुणा = १.५ x १० घात ८ कि.मी. ६० त्रिज्या,
व्यास = १.८ x १० घात ९ कि.मी. = १५० कोटि योजन।
ब्रह्माण्ड कक्षा की परिधि = १.८७ x १० घात १६ योजन (सूर्य सिद्धान्त १२/९०)
व्यास = १.८७ x १० घात १६ x २१४.१५३८/ (π = ३.१४१५९) कि.मी. = १.२७ x १० घात १८ कि.मी. = १.३ x १० घात ५ प्रकाश वर्ष। आधुनिक अनुमान १० घात ५ प्रकाश वर्ष का है।
तारा ग्रहों की गणना के लिये शीघ्र परिधि का मान दिया है। बुध शुक्र की छोटी कक्षायें होने के कारण इनकी परिधि को शीघ्र परिधि कहा गया है। मंगल, गुरु, शनि के लिये सूर्य कक्षा ही शीघ्र परिधि है। उनके लिये, ग्रह कक्षा/ सूर्य कक्षा = ३६०/शीघ्र परिधि।
९. धाम योजन-धाम २ प्रकार के हैं-क्षर धाम तथा अक्षर धाम। इनके अनुसार सूर्य के ३० धामों की २ प्रकार से व्याख्या है-सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम।
अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परियन्ति सद्यः॥ (ऋक् १/१२३/८)
= जैसा आज है वैसे ही कल भी क्रतु (सूर्य का तेज, क्रिया का स्रोत = क्रतु) दूर तक वरुण दिशा में (पृथ्वी सतह पर पश्चिम दिशा, आकाश में सूर्य से बाहर ब्रह्माण्ड = वरुण का अप् क्षेत्र की तरफ) एक के बाद एक ३० धाम योजन तक चलते हैं
(क) क्षर धाम-सूर्योदय के ३० धाम पश्चिम (वरुण की दिशा में) तक उषा-काल रहता है। भारत में सन्ध्या (उषा) काल दिन-मान का १२वां भाग (कलि आदि युगों का भी १२वां भाग) अर्थात् पृथ्वी की १५० दैनिक गति मानते हैं। अतः पृथ्वी की सतह पर १५० पूर्वापर दिशा में ३० धाम हुये। इनका रैखिक मान विषुव से उत्तर या दक्षिण दूर जाने पर घटता जाता है। विषुव रेखा पर इसका मान धाम योजन है जो स्थिर है। विषुव परिधि को सावन वर्ष के ७२० अहोरात्रों में बांटने पर १ विषुव-धाम या धाम योजन होता है।
१ धाम योजन = परिधि / ७२० = ४०,७५०.३६ / ७२० = ५५.६६ कि.मी.।
इस योजन मान से सौर मण्डल का विस्तार वेदों में ७२,००० योजन है (ब्रह्मविद्या उपनिषद्, पैप्पलाद संहिता) । उसके प्रतिरूप मानव शरीर में ७२,००० नाड़ी होती हैं। विषुव वृत्त को भी नाड़ी-वृत्त कहते हैं। ब्रह्माण्ड की परिधि को परार्द्ध कहा गया है, क्योंकि यह परा (१० घात १७) योजन का आधा है।
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १/३/१)
आधुनिक मान से परम गुहा या आकाश गंगा का व्यास = १० घात ५ प्रकाश वर्ष। अतः परिधि =
१०घात ५x ३.१४१५९ x ९.४६०५ x १० घात १२ कि.मी. / ५५.६६ कि.मी. = ०.५३४ x १० घात १७ धाम योजन।
इसी माप से दो निकट ताराओं की दूरी है-त्रिशंकु = ३×१०घात १३ = २०० प्रकाश वर्ष
अगस्त्य (Canopus) ने समुद्र अर्थात् १०घात१४ योजन पार किया था। धाम योजन से यह ६५० प्रकाश वर्ष है।
(ख) अक्षर धाम- यह पृथ्वी को मापदण्ड मानकर आकाश के सभी क्षेत्रों की माप है। इसका हर धाम पूर्व धाम से २ गुणा होता है। अक्षरों के परिमाण से जैसे शब्द-छन्द की माप होती है, उसी प्रकार शब्द गुण वाले आकाश की भी इन छन्दों से माप होती है। आकाश में सूर्य का प्रभामण्डल ३० धाम तक है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी को ३० बार २ गुणा करने पर सूर्य मण्डल का आकार होगा।
त्रिंशद् धाम वि राजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तोरहद्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
= ३० धाम तक अधिक (वि) प्रकाशित (राजति) क्षेत्र (वाक्) पतङ्ग (सूर्य) की समझी जाती है। प्रति वस्ति (बस्ती, क्षेत्र) की माप अहः द्वारा आकाश (द्यु) में होती है।
…द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्न्यन्ययं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति….. (बृहदारण्यक उपनिषद् ३/३/२) = देवरथ का विस्तार ३२ अहः तक है, उसके २ गुणे विस्तार की पृथिवी (सौर मण्डल) है, उसका भी २ गुणा समुद्र उसे घेरे हुये है।
सौर मण्डल का व्यास = पृथ्वी व्यास x २ घात ३०
= ६३७८.१४ किमी. त्रिज्या x २ x २ घात ३० = १.४४८ प्रकाश वर्ष (आधुनिक मान १-२ प्रकाश वर्ष)
धाम संख्या को अहर्गण कहा गया है। पृथ्वी के भीतर ३ धाम हैं। अतः, क अहर्गण की त्रिज्या = त x २ घात (क-३)। इसी मापदण्ड से वेद में आकाश की माप है।
(१) सौर मण्डल में ३३ अहर्गण (३ पृथ्वी के भीतर) हैं जिनके प्राण ३३ देवता हैं। इनमें मूल से आरम्भ कर ८ वसु, १ अश्विन, ११ रुद्र, १ अश्विन, १२ आदित्य हैं। इसे ६ ऋतु की तरह ६ वषट्कार में भी विभाजित किया गया है-३ अहर्गण तक पृथ्वी, ९ तक चन्द्रमण्डल, १५ तक भू वराह क्षेत्र, २१ तक शनि कक्षा, १७ तक गुरुत्व क्षेत्र, तथा ३३ तक सूर्य तेज है। उसके बाद सूर्य तेज मृत अण्ड जैसा मार्तण्ड है।
(२) त्रिष्टुप् छन्द की माप के अनुसार सूर्य केन्द्र से ११ अहर्गण तक ताप (सूर्य का वायुमण्डल), २२ अहर्गण तक वायु (यूरेनस कक्षा तक) तथा ३३ अहर्गण तक सौरमण्डल का तेज है। उसके बाद ४४ अहर्गण तक महर्लोक है। श्रीयन्त्र के ४३ त्रिकोण तथा माहेश्वर सूत्र के ४३ अक्षरों के अनुसार ४३ अहर्गण लेने पर महर्लोक का व्यास = पृथ्वी व्यास x २ घात ४० = १४८२.५ प्रकाश वर्ष। यह ब्रह्माण्ड के सर्पाकार भुजा की मोटाई है जिसमें सूर्य है। इतने व्यास के गोले में १००० तारा हैं जिनको शेषनाग का सिर कहा है। (वेद में अहिर्बुध्न्य)।
(४) जगती छन्द ब्रह्माण्ड की माप है। इसमें ४८ अक्षर हैं, पर ४९ मरुत् के अनुसार ४९ अहर्गण के अनुसार ब्रह्माण्ड का व्यास = पृथ्वी व्यास x २ घात ४६ = ९४,८८३ प्रकाश वर्ष। २००८ में नासा का अनुमान ९५००० प्रकाश वर्ष था।
सप्त सप्त हि मारुता गणाः (७x ७ = ४९, यजु. १७/८०-८५, ३९/७, शतपथ ब्राह्मण ९/३/१/२५)
गायत्रमयनं (२४) भवति ब्रह्मवर्चसकामस्य, त्रैष्टुभमयनं(४४) भवति ओजस्कामस्य, जागतमयनं भवति पशुकामस्य (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १४/४/१०)
तद्यच्छन्दोभिर्निर्मिताः तस्मात् छन्दोमाः। (कौषीतकि ब्राह्मण, २६/७)
यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद् वा त्रैष्टुभं निरतक्षत।
यद् वा जगत् जगत्याहितं पदं य इत् तद् विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥२३॥
गायत्रेण प्रतिमिमीते अर्कम्, अर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्। वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाऽक्षरेण मिमते सप्तवाणीः॥२४॥
(ऋक्, १/१६४/२३-२४, अथर्व, ९/१०/१-२)
(५) अतिजगती ब्रह्माण्ड का न्युट्रिनो कोरोना है जिसको वेद में कूर्म तथा ब्रह्माण्ड पुराण में गोलोक कहा है।
(६) उसके बाद अन्धकार है अतः इसकी माप को शक्वरी छन्द कहते हैं।
(७) अन्धकार के बाद ब्रह्माण्डों का स्थानीय समूह है जिसकी माप अति शक्वरी छन्द में है = ९.७ कोटि प्रकाश वर्ष।
(८) अति शक्वरी के बाद ब्रह्माण्डों का बड़ा समूह अष्टि (१६x ४) है।
(९) अत्यष्टि (१७x ४) की त्रिज्या = पृथ्वी त्रिज्या x २ घात (६५) = २५ अरब प्रकाश वर्ष। इसके आधा से थोड़ा छोटा भाग तपः लोक है जहां तक ब्रह्मा के दिन रात (८६४ कोटि वर्ष) में प्रकाश जा सकता है।
(१०) धृति (१८ x ४) अनन्त सत्यलोक या स्वयम्भू मण्डल की कल्पित माप है।
१०. सौर योजन -सौर मण्डल की माप के लिये सौर व्यास १३,९२,००० कि.मी. को ही योजन माना गया है। सौ व्यास की दूरी पर वराह है, जिसके १० योजन मोटे शरीर में १/१०९ योजन की पृथ्वी है (वायु पुराण, ६/१२)। यहां रुद्र तेज शान्त हो जाता है, अतः इसे शतरुद्रिय (शान्त = शत = १००) कहा जाता है। १०० योजन तक ताप तथा १००० योजन तक रश्मि क्षेत्र है। यहां शनि के पास सूर्य ताम्र-अरुण रंग का दीखता है। इन्द्र को सहस्राक्ष कहा गया है, तथा सूर्य अक्ष है-
चक्षोः सूर्यो अजायात (पुरुष सूक्त १३)। अक्ष का अर्थ चक्षु (आंख) तथा धुरी (Axis) दोनों होता है।
ताप क्षेत्र-१०० योजन तक- तद्यदेतं शतशीर्षाणं रुद्रमेतेनाशमयंस्तस्माच्छतशीर्षरुद्र शमनीयं शत शीर्षरुद्र शमनीयं ह वै तच्छतरुद्रियमित्याचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण ९/१/१/७)
शतयोजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति। (कौषीतकि ब्राह्मण ८/३)
स एष (आदित्यः) एकशतविधस्तस्य रश्मयः शतं विधा एष एवैकशततमो य एष तपति। (शतपथ ब्राह्मण १०/२/४/३)
रश्मि क्षेत्र-१००० योजन तक- सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः। (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण १/४४/५)
सहस्र योजन की दूरी पर शनि का तेज ताम्र अरुण रंग का है-
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः।
ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षुश्रिताः सहस्रोऽवैषां हेड ईमहे। (वाजसनेयि संहिता १६/६)
प्रकाश क्षेत्र-सूर्य का रथ १५७ लाख योजन है। उसका चक्र ९००० योजन अर्थात् त्रिज्या १५०० योजन है। ईषादण्ड १८००० योजन का है, अर्थात् त्रिज्या = ३००० योजन।
योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव। ईषादण्डस्तथैवास्य द्विगुणो मुनिसत्तम॥२॥
सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि वै। योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्र प्रतिष्ठितम्॥३॥ (विष्णु पुराण २/८/२-३)
भूमेर्योजन लक्षे तु सौरं मैत्रेय मण्डलम्। (विष्णु पुराण २/७/५)
यजुर्वेद प्रथम श्लोक के अनुसार सौर मण्डल में ऊर्जा की वायु (किरण प्रवाह) ही ईषा है-
ईषे त्वा ऊर्जे त्वा वायवस्थः। (वाजसनेयि संहिता १/१)
यह बालखिल्य नक्षत्रों की सीमा है, जो सूर्य से प्रायः ६० गुणा दूरी पर हैं। इनका आकार अंगुष्ठ मात्र है। आकाश माप के लिये पृथ्वी ही पुरुष है। पुरुष ९६ अंगुल का होता है। अतः अंगुष्ठ = १ अंगुल = पृथ्वी व्यास /९६ = १२, ७५६.२८ /९६ = १३२.८८ कि.मी.। अतः प्रायः ६० इकाई (AU = astronomical unit) दूरी पर ६०,०० बालखिल्य सूर्य की परिक्रमा करते हैं जिनका आकार १३३ कि.मी. से अधिक है। २००७ में यूरेनस तक नासा का कासिनी यान गया था। उसके चित्रों द्वारा अनुमान हुआ कि ४५-६५ दूरी पर १०० कि.मी. से बड़े ७०,००० पिण्ड हैं जिनको ‘प्लूटोनिक पिण्ड’ (Plutonic bodies) कहा जाता है। इसके बाद प्लूटो को ग्रह सूची से निकाल दिया गया।
क्रतोश्च सन्तति-र्भार्या बालखिल्या-नसूयत। षष्टिपुत्र सहस्राणि मुनीना-मूर्ध्वरेतसाम्॥
अङ्गुष्ठ पर्व मात्राणां ज्वलद् भास्कर तेजसाम्। (विष्णु पुराण १/१०/१०)
११. प्रकाश योजन-आकाश में पृथ्वी को ही सहस्रदल कमल माना गया है। इसके १ दल अर्थात् व्यास के १००० भाग को प्रकाश जितने समय में पार करता है, उस समय को त्रुटि कहा गया है-
कमलदलन तुल्यः काल उक्तः त्रुटिस्तत्, शतमिह लव संज्ञस्तच्छतं स्यान्निमेषः। (वटेश्वर सिद्धान्त, मध्यमाधिकार, ७)
योक्ष्णोर्निमेषस्य खराम भागः स तत्परस्तच्छत भाग उक्ता। त्रुटिर्निमेषैर्धृतिभिश्च काष्ठा तत् त्रिंशता सद्गणकैः कलोक्ता॥
(सिद्धान्त शिरोमणि, मध्यमाधिकार, २६)
जालार्क रश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात्। त्रसरेणु त्रिकं भुङ्क्ते यः कालः स त्रुटिः स्मृतः॥ (भागवत पुराण ३/११/५)
पृथ्वी की परिधि प्रायः ३००० त्रुटि होगी जो निमेष के बराबर है। ब्रह्मा की सृष्टि का आधार या पाद (पद्म) पृथ्वी है, इसे मर्त्य ब्रह्मा कहते हैं। यही सूर्य रूपी विष्णु का नाभि कमल है। विष्णु के १ निमेष में ब्रह्मा की २ परार्द्ध आयु पूरी होती है।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्॥१॥ पद्भ्यां भूमिः … ॥१३॥ (पुरुष सूक्त)
कालोऽयं द्विपरार्द्धाख्यो निमेषो उपचर्यते। अव्याकृतस्यानन्तस्य अनादेर्जगतात्मनः॥ (भागवत पुराण ३/११/३७)
त्रुटि सेकण्ड का ३३,७५० भाग है। १ सेकण्ड में प्रकाश २,९९,७९२.४५६ कि.मी. दूरी पार करता है। अतः प्रकाश योजन = २,९९,७९२.४५६/३३७५० = ८.८८२७४ कि.मी.।
१२. प्रमाण योजन-पुराण (विष्णु २/७, ब्रह्माण्ड ३/६, ७, भागवत, स्कन्ध ५, वायु, ब्रह्म आदि) में लोकों की माप इस प्रकार है-भूलोक -सहस्र योजन, भुवः लोक- १ लाख योजन
स्वः लोक = सूर्य रथ १५७ लाख योजन, सूर्य ध्रुव दूरी १४ लाख योजन।
महर्लोक- १ कोटि योजन त्रिज्या। जनः लोक-२ कोटि योजन त्रिज्या
तपः लोक-८ कोटि योजन त्रिज्या, सत्य लोक-१२ कोटि योजन त्रिज्या
श्री सज्जन सिंह लिश्क की पुस्तक जैन ऐस्ट्रोनौमी, पृष्ठ २८-२९ के अनुसार
१ प्रमाण योजन = ५०० आत्मा योजन = १००० उत्सेध योजन।
यहां सूर्य पिण्ड को आत्मा मानना चाहिये-सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च। (वा.यजु. ७/४२)
उसके बाद का अन्तरिक्ष प्रमा है, जिसकी माप प्रमाण योजन में होगी। इसी प्रकार प्रत्येक लोक एक आत्मा है, माप के लिये अगला लोक अन्तरिक्ष होगा, जिसकी माप ५०० गुणा बड़े प्रमाण योजन होगी। उत्सेध योजन आत्मा के १००० खण्ड हैं, जैसे पृथ्वी व्यास का १००० भाग उत्सेध योजन होगा। कुछ प्रसंगों में सूर्य पिण्ड का १००० भाग भी उत्सेध योजन माना जा सकता है।
यहां ३ पृथ्वी हैं जो सूर्य चन्द्र से प्रकाशित हैं-१, सूर्य-चन्द्र दोनों से प्रकाशित पृथ्वी ग्रह। २. सूर्य से प्रकाशित भाग सौर मण्डल। ३. सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा ब्रह्माण्ड। हर पृथ्वी का आकाश उससे उतना ही बड़ा होता है, जितना मनुष्य से पृथ्वी ग्रह। विष्णु पुराण (२/७)-
रविचन्द्रमसोर्यावन् मयूखैरवभास्यते। स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता॥३॥
यावत् प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात्। नभस्तावत् प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज॥४॥
प्रमाण योजनों की सारणी-
१. पृथ्वी, आकर्षण क्षेत्र चन्द्र, या सूर्य की ग्रह कक्षा तक की माप- पृथ्वी व्यास का १००० भाग = उत्सेध योजन।
२. सौर मण्डल-सूर्य व्यास= आत्मा योजन।
३. प्रमाण योजन के प्रकार-(क) महर्लोक-५०० सूर्य व्यास, (ख) जनः लोक-५०० घात २ सूर्य व्यास, (ग) तपः लोक-५०० घात ३ सूर्य व्यास, (घ) सत्य लोक-५०० घात ४ सूर्य व्यास।
हर लोक का आकार ६ प्रकार से दिया है जो परस्पर समान हैं तथा आधुनिक मापों से अधिक सूक्ष्म हैं।

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