तन्त्र सिद्धान्त

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)
१. आगम-सनातन साहित्य को आगम कहा गया है। आगम का एक अर्थ है आरम्भ से वर्तमान। यह मुख्यतः ३ प्रकार के हैं-पुराण, वेद, तन्त्र। कई बार पुराण को भी वैदिक साहित्य में ही गिना गया है। वर्तमान कल्प (३१००० ई.पू. के जल प्रलय के बाद) ब्रह्मा को समझ में नहीं आया कि सृष्टि कैसे करें। तब उन्होंने पुराणों का स्मरण किया। उससे पता चला कि पिछले कल्प में सृष्टि कैसे हुई। सृष्टि प्रक्रिया से वेद का ज्ञान हुआ और उससे पहले जैसी सृष्टि हुयी। पुराण से वेद समझने की प्रक्रिया तथा उसके अनुसार सृष्टि करना तन्त्र है।
प्रथमं सर्व शास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम्।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥
(वायु पुराण, १/६१, मत्स्य पुराण, ५३/३)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् (ऋक्, १९०/३)
यहां यथापूर्वं जानने के लिए पुराण है।
सर्वेषां तु स नामानि कर्म्माणि च पृथक् पृथक्।
वेद शब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनुस्मृति, १/२१)
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भव्यं भवच्चैव सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति॥ (मनु स्मृति, १२/९७)
शब्दः स्पर्शश्च रूपश्च रसो गन्धश्च पञ्चमः।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूति गुणकर्मतः॥ (मनु स्मृति, १२/९८)
२. श्रुति-स्मृति-रघुवंश (२/२) की एक प्रसिद्ध उक्ति है-श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत्। अर्थात् श्रुति के पीछे स्मृति चलती है। मनुस्मृति (२/६-१५) में भी यही कहा है कि श्रुति के अनुसार ही स्मृति होती है। श्रुति का अर्थ वेद है, स्मृति धर्मशास्त्र है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वेद को सुन कर स्मरण किया आता था। वेद सुनने पर वेद ही नहीं याद होता है, स्मृति अर्थात् धर्मशास्त्र कैसे याद होगा? वेद को श्रुति इसलिए कहते हैं कि यह ५ ज्ञानेन्द्रियों द्वारा श्रुति आदि द्वारा प्राप्त ज्ञान है। धर्मशास्त्र पढ़े या नहीं, यह मान लेते हैं कि समाज में आचरण का नियम सबको पता है। अतः उसे स्मृति कहते हैं। कोई हत्या करने के बाद यह बहाना नहीं बना सकता कि मैंने कानून की डिग्री नहीं ली है अतः मुझे पता नहीं था कि हत्या कोई बुरा काम है।
३. आगम-निगम-पुराण-तीनों परस्पर आश्रित हैं अतः हर शास्त्र उन पर आधारित होता है-
नाना पुराण निगमागमसम्मतं यद्, रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
(रामचरितमानस, मंगलाचरण)
वेद समझने के लिए भागवत लिखा गया जैसे बाद में व्याख्याकारों ने वेदभाष्य भूमिका लिखी। अतः वेद-वृक्ष का फल कहा गया है-
निगम कल्पतरोर्गलितं फलं, शुकमुखादमृतद्रव संयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं, मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
(भागवत पुराण, १/१/३)
तीनों मिल कर आगम या स्रोत हैं। भेद रूप में वेद निगम है, अर्थात् निसर्ग या प्रकृति से प्राप्त। तन्त्र आगम है, अर्थात् गुरु-परम्परा से प्राप्त। यह व्यावहारिक कर्म है, जो बिना गुरु के प्रत्यक्ष निर्देश के केवल पुस्तक द्वारा नहीं सीख सकते। वेद का सूक्त एक समय किसी ऋषि द्वारा दर्शन या अनुभव है। परिवर्तन देखने के लिए बार बार देखना पड़ता है कि अब क्या स्थिति है। इसके लिए पुराण हैं जिसका अर्थ है पुरा + नवति, अर्थात् पुराना नया कैसे हुआ। सृष्टि का आरम्भ, विकास, क्षय, वंश, मन्वन्तर सभी परिवर्तन के वर्णन पुराण के विषय हैं।
४. विद्या-महाविद्या-निसर्ग से प्राप्त ज्ञान वेद है। विद् धातु के ४ अर्थ हैं, उसके अनुरूप ४ प्रकार के वेद हैं-
तत्त्व वेद विद धातु का अर्थ
मूर्ति ऋक् सत्ता (विद् सत्तायाम्, धातुपाठ, ४/६०)
गति यजु लाभ, प्राप्ति-विद्लृ लाभे (६/१४१)
ज्ञान साम विद् ज्ञाने (२/५७)
आधार अथर्व विद् विचारणे (७/१३),चेतनाख्यान निवासेषु (१०/१७७)
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥
(तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/१२/८/१)
वेद विद्या का रूप है। इसका व्यावहारिक प्रयोग तन्त्र महाविद्या है, उसके लिए सिद्धान्त प्रयोग दोनों जानना पड़ता है। या बाहर से जो ज्ञान लेते हैं, वह विद्या है। भीतर के ज्ञान को बाहर (महर्) के लिए प्रयोग करते हैं, वह महाविद्या है।
५. अपौरुषेयत्व-वेद ४ अर्थों में अपौरुषेय है-
(१) मन्त्र दर्शन की स्थिति में ऋषि अपने व्यक्तिगत अहंकार, ईर्ष्या द्वेष आदि से ऊपर उठ जाता है।
(२) वेद किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, यह भिन्न भिन्न स्थान काल के ऋषियों द्वारा दर्शन किए सूक्तों का संग्रह है। एक परिवार की सम्पत्ति होने पर उसे वंश परम्परा से रटाया जा सकता है। पर भिन्न भिन्न देशों और समय के सूक्तों का संकलन तभी हो सकता है, जब वे लिखित रूप में हों। अतः एक ही मन्त्रों में पाठभेद हैं, जैसे हर वेद के पुरुष सूक्त में।
(३) अतीन्द्रिय ज्ञान-५ ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान ५ प्राणों के माध्यम से होता है। पर ५ सत् प्राणों के अतिरिक्त २ असत् प्राण भी हैं-परोरजा, ऋषि। इनसे प्राप्त ज्ञान अतीन्द्रिय या अपौरुषेय है।
असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति। ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
परोरजा य एष तपति (बृहदारण्यक उपनिषद् ५/१४/३)
सप्तप्राणा प्रभवन्ति तस्मात्, सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त। (मुण्डकोपनिषद् २/१/८)
पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां, पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां, पञ्चाशद् भेदां पञ्चपर्वामधीमः॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् १/५)
(४) वेद में विश्व के ३ स्तरों का समन्वय है-आकाश में आधिदैविक, पृथ्वी पर आधिभौतिक, मनुष्य शरीर के भीतर आध्यात्मिक (गीता, ८/१-३)। तैत्तिरीय उपनिषद् (१/३/१) में ५ अर्थ कहे गये हैं-अधिलोक, अधिज्यौतिष, अधिविद्य, अधिप्रजम्, अध्यात्म। यह शीक्षावल्ली में है, अतः तन्त्र से सम्बन्धित है। ३ तथा ५ भेद मिला कर तन्त्र मन्त्रों के १५ अर्थ होते हैं-
अथातः पूर्ण गायत्र्याः प्रतिपाद्योऽर्थ आदिमः। भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भार्थस्तुरीयकः॥५७॥
कौलिकार्थो रहस्यार्थो महातत्वार्थ एव च। नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थो नामैकदेशकः॥५८॥
शाक्तार्थः सामरस्यार्थः समस्त सगुणार्थकौ। महावाक्यार्थ इत्यर्थाः पञ्चदश्याः स्वसम्मिताः॥५९॥
(भास्करराय भारती, वरिवस्या रहस्यम्)
सहस्रधा पञ्चदशानि उक्था यावद् द्यावा पृथिवी तावदित्तत् (ऋक्, १०/११४/८)
यानि पञ्चधा त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति (छान्दोग्य उपनिषद्, २/२२/२)
६. आगम के मुख्य भेद-तन्त्र आगम के ३ मुख्य भेद हैं-
शैव, शाक्त, वैष्णव।
(१) शैव के ३ मुख्य भेद हैं-
शैव आगम १० प्रकार के हैं। महाविद्या भी इतने ही प्रकार की हैं। इनको द्वैत आगम कहते हैं।
रौद्र आगम १८ प्रकार के हैं जो द्वैत-अद्वैत हैं। १८ प्रकार की विद्या भी हैं। यह मस्तिष्क के वाम-दक्षिण भागों के बीच परस्पर सम्बन्ध से होते हैं। दोनों भागों में शिव के २-२ मुख हैं-वामदेव, इ=ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात। इनका केन्द्र के अघोर मुख में १८ प्रकार से लय होता है। मालिनी विजयोत्तर तन्त्र के अनुसार पण्डित गोपीनाथ कविराज की ’तान्त्रिक साधना और साहित्य’ में ये भेद बताये गये हैं। शंकराचार्य नेइनको मस्तिष्क के शिव-पार्वती रूप दो हंसों के वार्त्तालाप से उत्पन्न ज्ञान कहा है।
समुन्मीलत् संवित् कमल मकरन्दैकरसिकम्,
भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम्।
यदालापादष्टादशगुणित विद्या परिणतिः,
यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव॥
(सौन्दर्य लहरी, ३८)
ज्ञान के विकसित कमल के रसिक मानस में विचरने वाले २ हंसों की वन्दना करता हूं, जिनके वार्त्तालाप से १८ प्रकार की विद्या की पूर्णता होती है, तथा वे दोषों से गुण को वैसे ही निकालते हैं, मानों जल से दूध।
इन दो हंसों को द्वासुपर्ण सूक्त में आत्मा-जीव (आदव-ईव) कहा गया है, जिनमें एक फल का उपभोग करता है, अन्य बिना खाये देखभाल करता है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन् अन्यो अभिचाकशीति॥
(ऋक्, १/१६४/२०, अथर्व, ४/१३/२, मुण्डक उपनिषद्, ३/१/१)
भैरव आगम अद्वैत हैं। किन्तु स्वयं भैरव शिव-शक्ति का द्वैत है। इनके ८ अष्टक हैं।
पराशक्ति का तन्त्र इससे भिन्न है-
चतुःषष्ट्या तन्त्रैं सकलमतिसन्धाय भुवनं,
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैक घटना,
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम्॥
(सौन्दर्य लहरी, ३१)
इनके अनुसार ६४ कला हैं, या ब्राह्मी लिपि के ६४ (या ६३) वर्ण हैं।
इसके अतिरिक्त कई प्रकार की साधना पद्धति हैं-कापालिक, कालामुख, अघोर, रसेश्वर दर्शन, लिंगायत, वीरशैव, लकुलीश, पाशुपत, नन्दिकेश्वर।
(२) शाक्त तन्त्र-इसके भी कई भेद हैं-कुल, अकुल, कुलाकुल। इनको वाम, दक्षिण, मिश्र भी कहते हैं।
श्रीविद्या इस मत का मुख्य सिद्धान्त है। मुख्य उपासकों के अनुसार इसके १२ सम्प्रदाय हैं। पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के ३ भागों के अनुसार इसके ३ मत तथा कूट हैं।
हादि विद्या- (ह से आरम्भ)- हसकहलह्रीं
कादि विद्या-कएइलह्रीं
सादिविद्या-सकलह्रीं।
त्रिकूट-वाग्भव, कामराज, शक्ति।
इसके विषय में सैकड़ों प्राचीन पुस्तकें तथा उनकी टीका उपलब्ध हैं। गायत्री तन्त्र, सौर तन्त्र आदि इसी से सम्बद्ध हैं।
मुख्य रूप से ३ प्रकार की साधना और पूजा होती हैं-
श्रीयन्त्र पूजा-श्रीयन्त्र समतल कागज पर भी बनता है जिसके ९ आवरण होते हैं। ये आवरण मेरु आकार में भी बनते हैं। जैन तन्त्र के मेरु प्रायः इसी प्रकार के हैं। यह विश्व की निर्माण प्रक्रिया का स्वरूप है। इसके ४३ त्रिभुजों का सम्बन्ध माहेश्वर सूत्र के ४३ अक्षरों से है जो वाक् (भाषा) तथा अर्थ (विश्व, पृथ्वी) की उत्पत्ति प्रक्रिया के प्रतीक हैं। ३ नगरों का निर्माण भी श्री-यन्त्र जैसा हुआ था जिनको श्रीविद्या नगर (विजय नगर) या श्रीनगर (गढ़वाल, कश्मीर में) कहते थे।
१० महाविद्या पूजा (इनको बौद्ध लोग १० प्रज्ञा पारमिता कहते हैं)।
कुल-मार्ग में कुण्डलिनी के उत्थान की साधना (यह पातञ्जल योग की धारणा, ध्यान समाधि का एक अन्य प्रकार है)।
(३) वैष्णव तन्त्र-इसमें ६४ प्रकार के पाञ्चरात्र आगम हैं जिनमें प्रायः २० प्रकार के उपलब्ध हैं। अन्य वैखानस शास्त्र भी उपलब्ध हैं। पाञ्चरात्र को एकायन वेद भी कहते थे जिनसे वेद शाखायें निकलीं। पाञ्चरात्र आगमों में वास्तुशास्त्र, मूर्ति निर्माण तथा कई प्रकार की पूजा साधना आदि का वर्णन है।
७. महाविद्या-(क) शक्ति के १० रूप-यह शक्ति की पूजा है। विश्व का मूल स्रोत एक ही है पर वह निर्माण के लिये २ रूपों में बंट जाता है, चेतन तत्त्व पुरुष है, पदार्थ रूप श्री या शक्ति है। शक्ति माता है अतः पदार्थ को मातृ (matter) कहते हैं।
वेद में १० आयाम के विश्व का वर्णन है अतः दश, दशा, दिशा-ये समान शब्द हैं। १० आयाम कई प्रकार से हैं-
(१) ५ तन्मात्रा = भौतिक विज्ञान में माप की ५ मूल इकाइयां। इनके सीमित और अनन्त रूप ५-५ प्रकार के हैं।
(२) आकाश के ३ आयाम, पदार्थ, काल, चेतना या चिति, ऋषि (रस्सी-दो पदार्थों में सम्बन्ध), वृत्र या नाग (गोल आवरण), रन्ध्र (घनत्व में कमी-बेशी, आनन्द या रस।
(३) ३ गुणों (सत्व, रज, तम) के १० प्रकार के समन्वय-क, ख, ग,कख, खक, कग, गक, खग, गख, कखग।
(ख) महाविद्या-१० आयाम की तरह १० महा-विद्या हैं, जो ५ जोड़े हैं-
(१) काली-काला रंग, तारा-श्वेत।
(२) त्रिपुरा के २ रूप-सुन्दरी, भैरवी (शान्त, उग्र)।
(३) कमला-विष्णु-पत्नी, स्थायी सम्पत्ति, युवती, सुन्दर, रोहिणी नक्षत्र, इन्द्र-लक्ष्मी-कुबेर
धूमावती-विधवा, चञ्चल-दुष्ट, वृद्धा, कुरूप, ज्येष्ठा नक्षत्र, वरुण-अलक्ष्मी-यम।
(४) भुवनेश्वरी भुवन का निर्माण करती है, छिन्नमस्ता काटती है।
(५) मातङ्गी वाणी को निकालती है, बगलामुखी (वल्गा = लगाम) रोकती है।
१० महाविद्या के आयाम हैं-
(१) तारा-शून्य विन्दु, इसकी दिशा रेखा रूप में प्रथम आयाम।
(२) भैरवी-उग्र रूप-सतह रूप में दूसरा आयाम।
(३) त्रिपुरा-३ आयाम।
(४) भुवनेश्वरी-भुवन का निर्माण-४ मुख के ब्रह्मा की तरह।
(५) काली-काल रूप में ५वां आयाम। परिवर्तन का आभास काल है।
(६) कमला-विष्णु चेतना रूप में ६ठा आयाम, उनकी पत्नी।
(७) बगलामुखी-वल्गा, रस्सी, एक रोकता है, दूसरा जोड़ता है।
(८) मातङ्गी=हाथी, वृत्र घेरकर कता है, हाथी को रोकना (वारण) कठिन है।
(९) छिन्नमस्ता-काटना रन्ध्र बनाता है।
(१०) धूमावती-१०वां आयाम अस्पष्ट है, धूम जैसा।
विश्व के रचना स्तरों के अनुसार इनके रूप हैं-
(१) काली-पूर्ण विश्व, जिसमें १ खर्व ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं।
(२) तारा-ब्रह्माण्ड के तारा।
(३) त्रिपुरा (षोड़शी)-सूर्य के तेज से यज्ञ हो रहा है, यह १६ कला का पुरुष है, क्रिया षोड़शी है।
(४) भुवनेश्वरी-क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड) तथा रोदसी (सौर मण्डल) के बीच में सूर्य।
(५) छिन्नमस्ता-सूर्य से निकला तेज।
(६) भैरवी-निर्माण में लगी शक्ति।
(७) धूमावती-बिखरी शक्ति जिसका प्रयोग नहीं हुआ।
(८) बगलामुखी-पृथ्वी द्वारा रोकी या शोषित शक्ति।
(९) मातङ्गी-सूर्य के विपरीत दिशा में पृथ्वी का रात्रि भाग।
(१०) कमला-पृथ्वी पर की सृष्टि।
आध्यात्मिक रूप-शरीर के चक्रों में इनका स्थान है-
(१) काली-यह मूलाधार में सोयी हुई कुण्डलिनी शक्ति है।
(२) तारा-स्वाधिष्ठान चक्र का समुद्र और चन्द्रमा है। पश्यन्ती वाक् के रूप में यह तारा है। इसका देवता राकिनी है जो तारक मन्त्र रं (राम) है।
(३) त्रिपुर सुन्दरी-यह सहस्रार में १६ कला के चन्द्र जैसा विहार करती है। वहां सुधा-सिन्धु है (भौतिक रूप में मस्तिष्क का द्रव)।
(४) भुवनेश्वरी-बीज मन्त्र ह्रीं है जिसका अर्थ हृदय है। यह हृदय के अनाहत चक्र के नीचे चिन्तामणि पीठ पर विराजमान है।
(५) त्रिपुरा भैरवी-मूलाधार में कुण्डलिनी का जाग्रत रूप।
(६) छिन्नमस्ता-आज्ञा चक्र में ३ नाड़ियों का मिलन-इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना।
(७) धूमावती-मूलाधार के धूम्र रूप स्वयम्भू लिङ्ग को घेरे हुये।
(८) बगलामुखी-कण्ठ में वाणी तथा प्राण का नियन्त्रण-जालन्धर बन्ध द्वारा।
(९) मातङ्गी-यह कण्ठ के ऊपरी भाग में है, जहां से वाणी निकलती है।
(१०) कमला-यह नाभि का मणिपूर चक्र है जिसे मणि-पद्म कहते हैं।
८. कुण्डलिनी तन्त्र-कुण्डलिनी मूलाधार में सुप्त शक्ति है। इसके साढ़े ३ चक्र हैं। इनको वेद में सप्तार्धगर्भा कहा गया है जिसकी नियान तथा उद्यान कहा गया है-मूलाधार से ऊपर सहस्रार तक उत्थान, तथा वापस लौटना। नीचे लौटना नियान है। यह सूर्य की उत्तर दक्षिण गति भी है, जिसके अर्धभाग में १-१ मास के अन्तर पर ७ वीथी हैं (विषुव रेखा, उसके उत्तर-दक्षिण १२, १०, २४ अंशों के अक्षांश वृत्त)। इस गति से वर्षा का गर्भ धारण तथा वर्षा होना मन्त्र ४७ में है।
सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि।
ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परिभवति विश्वतः॥ (ऋक् १/१६४/३६)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति।
त आववृत्रन् त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी व्युद्यते॥ (ऋक् १/१६४/४७)
सूर्य रूपी विष्णु के ३ पद सौर मण्डल में हैं, स्वयं सूर्य इस मण्डल का केन्द्र तथा अर्ध पद है। सौर मण्डल ब्रह्माण्ड की सर्पाकार भुजा में है जिसके साढ़े ३ चक्र हैं। यह वेद का अहिर्बुध्न्य है, या पुराण का शेषनाग। अव्यक्त मूल से सृष्टि का निर्माण ३ गुणों से होता है तथा एक उनका समन्वय रूप है। ये ॐ की साढ़े ३ मात्रा हैं-अ, उ, म, अनुस्वार। या चण्डी पाठ के अनुसार, अव्यक्त पराशक्ति (देवी अथर्वशीर्ष में वर्णित) के ३ भेद हैं-महाकाली, महालक्ष्मी, महा सरस्वती।
शरीर के भीतर मेरुदण्ड के ५ चक्र नीचे से आरम्भ कर भूमि, जल, तेज, वायु और आकाश तत्त्वों के स्वरूप है। विश्व के ५ पर्व भी इन्हीं के स्वरूप है। विश्व पर्वों के संकेत माहेश्वर सूत्र के ५ स्वर हैं-अइउण्। ऋलृक्। उनकी प्रतिमा रूप सुषुम्ना के ५ चक्र के बीज मन्त्र इनके सवर्ण अन्तःस्थ वर्ण हैं-हयवरट्। लण्।
मेरुदण्ड के ऊपर आज्ञा चक्र भ्रूमध्य के पीछे है जिसमें शिव-शक्ति का समन्वय है-अर्द्धनारीश्वर रूप। इसका आकाश में प्रतीक कह सकते हैं पदार्थ-ऊर्जा का मिश्र रूप। यह विस्तार ब्रह्माण्ड के आवरण रूपी कूर्म तक है। उसके बाहर अनन्त आकाश की प्रतिमा सिर के ऊपर सहस्रार चक्र है।
आकाश के पर्व चिह्न तत्त्व शरीर के चक्र चिह्न
१. अव्यक्त अनन्त एक ॐ अव्यक्त सहस्रार एक ॐ
२. हिरण्यगर्भ विभक्त ॐ पदार्थ-ऊर्जा आज्ञा विभक्त ॐ
३. स्वयम्भू मण्डल अ आकाश विशुद्धि ह
४. ब्रह्माण्ड इ वायु अनाहत य
५. सौरमण्डल उ तेज स्वाधिष्ठान व
६. चान्द्र मण्डल ऋ अप् मणिपूर र
७. भूमण्डल लृ भूमि मूलाधार ल
यहां स्वाधिष्ठान-मणिपूर का क्रम सृष्टि क्रम में है। साधना नीचे से ऊपर होती है, अन्नमय कोष से परमात्मामय कोष तक, उसमें मूलाधार के बाद मेरुमूल में स्वाधिष्ठान तब नाभि के पीछे मणिपूर चक्र होता है।
अन्नमय कोष से उत्थान का वर्णन पुरुष सूक्त में है-उतामृतत्वस्येशानो तदन्नेनातिरोहति (वाज. सं. ३१/२)
सृष्टि क्रम से चक्र तथा तत्त्वों का वर्णन शंकराचार्य ने किया है-
महीं मूलाधारे, कमपि मणिपूरे हुतवहं,
स्थितं स्वाधिष्ठाने, हृदि मरुतमाकाशमुपरि।
मनोऽपि भ्रूमध्ये, सकलमपि भित्वा कुलपथं,
सहस्रारे पद्मे, सह रहसि पत्या विहरसि॥
(सौन्दर्य लहरी, ९)
बांस, सन्तान परम्परा तथा मेरुदण्ड के केन्द्र में सुषुम्ना मार्ग-तीनों को वंश या कुल कहते हैं। बांस से बने सूप को ओड़िया में कूला कहते हैं। भूमि से उठ कर सहस्रार तक पहुंचने पर मोक्ष होता है। कुल-पथ के ७ चक्र ही ७ गांठ का बांस है, जिसे धुन्धकारी के उद्धार के लिए गोकर्ण मुनि ने रखा था (भागवत माहात्म्य)। कुण्डलिनी शक्ति क्रमशः ६ चक्रों का भेद कर सहस्रार में पहुंचती है तो वह विन्दु चक्र से निकले अमृत का पान करती है। अतः अथर्व वेद में विन्दु को ८वां चक्र कहा गया है। पीकर तृप्त होने के बाद भूमि (मूलाधार) पर वापस आती है। बार-बार ऐसा करने पर मोक्ष होता है।
पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले।
उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते।। (कुलार्णव तन्त्र ७/१००)
अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गोज्योतिषावृतः॥ (अथर्व, १०/२/३१)
अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा। (अथर्व, ११/४/२२)
कुलमार्ग पर ३ ग्रन्थि या बाधा हैं-जिनको ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि कहते हैं। इनका भेदन चण्डी पाठ के ३ चरित्रों से है जिनके देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं-महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती। इनका वर्णन मुण्डकोपनिषद् के ३ मुण्डकों में है-
मणिपूर का सूर्य द्वार भेदने की विधि-
तपः श्रद्धे ये ह्युअवसन्त्यरण्ये, शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति, यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा॥
(मुण्डक उप. १/२/११)
हृदय ग्रन्थि (अनाहत भेद)-
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्यकर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
(मुण्डक उप, २/२/८)
तृतीय मुण्डक का प्रथम खण्ड आज्ञा चक्र के २ सुपर्णों को पार करने का वर्णन कर रहा है (पारा ६ में उद्धृत)। उसके बाद गुहा-ग्रन्थि का भेद गुरु की कृपा से होता है जिसका वर्णन द्वितीय खण्ड में है-
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्या ब्रह्मवित् कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहा ग्रन्थिभ्यो विमुक्तो अमृतो भवति॥ (मुण्डक उप, ३/२/९)
मूलाधार से विशुद्धि के कमल दल धाम रूप में ब्रह्माण्ड तक की मात हैं। आज्ञा चक्र के २ दल मिला कर ५० दल हैं जो ब्रह्माण्ड के तेज-मण्डल (कूर्म या गोलोक, Nutrino Corona) तक की माप हैं।
पृथ्वी के भीतर ३ धाम हैं। उसके बाद के धाम क्रमशः २-२ गुणा बड़े होते गये हैं (बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/३/२)
मूलाधार कमल के ४ दल-वशषस। ४ धाम तक पृथ्वी तथा वायु आवरण है।
स्वाधिष्ठान के ६ दल-बभमयरल। ४+६ = १० धाम तक चन्द्र कक्षा का आवरण है।
मणिपूर के १० दल-डढणतथदधनपफ। १०+१० = २० धाम तक शनि कक्षा है जिसको पुरुष सूक्त १ में सहस्राक्ष कहा गया है। सूर्य = अक्ष (धुरी या आंख), १००० व्यास दूरी के भीतर शनि है, जहां तक का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है।
अनाहत के १२ दल-कखगघङचछजझञटठ। २० + १२ = ३२ धाम तक सौर मण्डल है। उसके बाद ३३वें धाम पर सीमा है। इन ३३ धामों के प्राण ३३ देवता हैं जिनका चिह्न रूप में प्रतीक क से ह तक ३३ व्यञ्जन हैं।
विशुद्धि के १६ दल-१६ स्वर वर्ण। इनको मिलाकर ४८ धाम तक ब्रह्माण्ड की माप है। अतः ४९ अक्षर को जगती कहते हैं। ४९वां धाम ब्रह्माण्ड की सीमा है जिसके भीतर ४९ प्रकार की गति ४९ मरुत् हैं।
आज्ञा चक्र के २ दल (हंक्षं) मिला कर ५० दल होते हैं, जो ब्रह्माण्ड का आभा मण्डल है।
उसके बाद सहस्रार के १००० दल अनन्त विश्व की माप हैं (१००० प्रकार से सृष्टि की शाखा या बल्शा)।
मूलाधार के भूमि तत्त्व का बीज मन्त्र है-लण्। अतः अंग्रेजी में भूमि को Land कहते हैं। इसमें कुण्डलिनी रूप पराशक्ति का वास है, अतः व से स तक अक्षर हैं।
स्वाधिष्ठान में ब से ल तक अक्षर हैं, अतः मेरुदण्ड का मूल ही बल का केन्द्र है। बीज मन्त्र वं है, अतः इस क्षेत्र का मुख्य अंग वं (womb) है।
मणिपूर क्षेत्र से ध्वनि निकलती है, अतः इसके अक्षरों डफ को वाद्य कहते हैं। बीज मन्त्र रं भेड़ा की तरह धक्का देता है, अतः रं (Ram) = भेड़ा। यह सूर्य क्षेत्र है अतः यहां के स्नायु गांठ को Solar plexus कहते हैं। मूलाधार से मणिपूर तक लंवंरं क्षेत्र हुआ अतः इसे Lumber region कहते हैं।
हृदय का बीजमन्त्र यं है। अतः हृदय की प्रिय चीज Yummy है। यहां विष्णु ग्रन्थि है, अतः यहां का वस्त्र Vest है। यहां क से ठ तक वर्ण है, अतः इसका द्वार कण्ठ है।
९. अन्य तन्त्र-श्रीविद्या वर्णन एक लेख में सम्भव नहीं है। श्रीविद्या के ९ आवरण सृष्टि के ९ सर्ग हैं। इनका शरीर के चक्रों से सम्बन्ध दिखाया जा चुका है।
जितनी भी व्यवस्था हैं या उनका रचनात्मक समन्वय है, वह तन्त्र है-जैसे नाड़ी तन्त्र, अगद तन्त्र, राजतन्त्र, न्याय तन्त्र, शिक्षा तन्त्र आदि। देश की उन्नति के लिए यज्ञों से यज्ञ का सम्पादन आवश्यक है। मूल यज्ञ कृषि है जिसके विषय में गीता (३/११-१५) में कहा है कि यज्ञ से पर्जन्य तथा पर्जन्य से अन्न होता है। कृषि से सचमुच अन्न होता है। अन्य यज्ञों से जो भी दृश्य या अदृश्य उत्पादन होता है वह भी अन्न है। पर्जन्य का अर्थ है उत्पादक परिवेष (Infra structure), कृषि प्रसंग में इसका मुख्य अर्थ है वर्षा। प्राचीन काल में यज्ञों के व्यापक समन्वय से साध्य लोग उन्नति के शिखर पर पहुंचे और उनको देव कहा गया।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष सूक्त, १६)
असुर भी यज्ञ करते थे, पर उनका यज्ञ अन्य यज्ञों में बाधा देता था। सभी के व्यक्तिगत यज्ञ अन्य यज्ञों में सहायता करें तभी देश उन्नति के शिखर पर पहुंचेगा।
वर्तमान काल के राजनीति सिद्धान्त्तों के असफल होने का मुख्य कारण उनकी अपूर्णता तथा गलत धारणायें हैं। पिछले ५००० वर्षों में जितने भी राज्य बने हैं वे धर्म के आधार पर। विश्व में सभी देश ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध या यहूदी है। भारत का विभाजन इसके हिन्दू देश होने के आधार पर ही हुआ था। पर इस सत्य को अस्वीकार करने के कारण पूंजीवाद या साम्यवाद- सभी असफल हैं।
अन्य कारण है कि अपूर्ण तत्त्वों के आधार पर व्याख्या। आधुनिक शास्त्रों में राज्य के ४ तत्त्व माने जाते हैं-भूमि, प्रजा, शासन, सम्प्रभुता। पर ७ लोकों के अनुसार ७ तत्त्व होने चाहिए। कोष, पुरोहित, दुर्ग।
कोष के बिना शासन नहीं चलता। कोष लेना तथा उसके देश के लिए प्रयोग राजसूय यज्ञ है (रघुवंश का आरम्भ)। पर भारत में राजनैतिक दलों के लिए कोष का कोई साधन नहीं लिखा है जो भ्रष्टाचार बढ़ाने का एकमात्र कारण है।
पुरोहित का अर्थ पूजा कराना नहीं है। पाण्डवों के वनवास काल में उनके पुरोहित धौम्य की उनसे कभी भेंट नहीं हुयी, पूजा कराने का प्रश्न ही नहीं था। वह पाण्डवों के प्रतिनिधि के रूप में उनका पक्ष कौरव सभा में रखते थे जैसे भारत का प्रतिनिधि संयुक्त राष्ट्रसंघ में है। वे निर्वासित सरकार के प्रतिनिधि थे। पुरोहित तत्त्व का अर्थ है, संविधान, कानून तथा उसके व्य्वस्थापक।
दुर्ग का अर्थ प्राकृतिक तथा कृत्रिम-९ प्रकार के दुर्ग हैं, जितनी दुर्गा हैं। प्राकृतिक दुर्ग तिब्बतदान करने तथा सेना की उपेक्षा का फल स्पष्ट दीख रहा है।

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