तान्त्रिक सम्प्रदायों का मार्मिक साम्य

तान्त्रिक -संस्कृति में मूलतः साम्य रहने पर भी देश -काल और क्षेत्र -भेद से उसमें विभिन्न सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ है । इस प्रकार का भेद साधकों के प्रकृति -गत भेद के अनुरोध से स्वभावतः ही होता हैं । भावी पीढी के ऐतिहासिक विद्वान् ‍ जब भिन्न तान्त्रिक साम्प्रदायों के इतिहास का संकलन करेंगे और गहराई से उसका विश्लेषण करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुँच सकेंगे कि यद्यपि भिन्न -भिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों में आपाततः वैषम्य प्रतिभासित हो रहा है किन्तु उनमें निगूढ रुप से मार्मिक साम्य है ।

संख्या में तान्त्रिक सम्प्रदाय कितने आविर्भूत हुए और पश्चात् ‍-काल में कितने विलुप्त हुए यह कहना कठिन है । उपास्य -भेद के कारण उपासना -प्रक्रियाओं में भेद तथा आचारादि -भेद होते है , साधारनतया पार्थक्य का यही कारण हैं। १ .शैव , २ . शाक्त , ३ . गाणपत्य ये तो सर्वत्र ही प्रसिद्ध हैं । इन सम्प्रदायों के भी अनेकानेक अवान्तर भेद हैं । शैव तथा शैव -शाक्त -मिश्र सम्प्रदायों में कुछ के निम्नलिखित उल्लेखनीय नाम हैं -सिद्धान्त शैव , वीरशैव , अथवा जंगम शैव , रौद्र , पाशुपत , कापालिक अथवा सोम , वाम , भैरव आदि। अद्वैतदृष्टि से शैवसम्प्रदाय में त्रिक अथवा प्रत्यभिज्ञा , स्पन्द प्रभृति विभाग हैं । अद्वैत -मत में भी शक्ति की प्रधानता मानने पर स्पन्द , महार्थ , क्रम इत्यादि भेद अनुभूत होते हैं । दश शिवागम और अष्टादश रुद्रागम तो सर्वप्रसिद्ध ही हैं । इनमें भी परस्पर किंचित् ‌-किंचित् ‍ भेद नहीं है यह नहीं कहा जा सकता । द्वैत -मत में कोई कट्टर द्वैत , कोई द्वैतद्वैत और कोई शुद्धाद्वैतवादी है । इनमें किसी सम्प्रदाय को भेदवादी , किसी को शिव -साम्यवादी और किसी को शिखा -संक्रान्तिवादी कहते हैं । काश्मीर का त्रिक या शिवद्वैतवाद अद्वैतस्वरुप से आविष्ट से आविष्ट है । शाक्तों में उत्तरकौल प्रभृति भी ऐसे ही हैं ।

किसी समय भारतवर्ष में पाशुपत संस्कृति का व्यापक विस्तार हुआ था । न्यानवर्तिककार उद्योतकर संभवतः पाशुपत रहे और न्यायभूषणकार भासर्वज्ञ तो पाशुपत थे ही । इनकी बनाई गण -कारिका आकार में यद्यपि छोटी है किन्तु पाशुपतदर्शन के विशिष्ट ग्रन्थों में इसकी गणना है ।
लकुलीश पाशुपत की भी बात सुनने में आती है । यह पाशुपतदर्शन पञ्चार्थवाद -दर्शन तथा पञ्चार्थलाकुलाम्नाय नाम से विख्यात था । प्राचीन पाशुपत सूत्रों पर राशीकर का भाष्य था , वर्तमान समय में दक्षिण से इस पर कौण्डिन्य -भाष्य का प्रकाशन हुआ है । लाकुल -मत वास्तव में अत्युन्त प्राचीन है , सुप्रभेद और स्वयम्भू आगमों में लाकुलागमों का उल्लेख दिखाई देता है ।
महाव्रत -सम्प्रदाय कापालिक -सम्प्रदाय का ही नामान्तर प्रतीत होता है । यामुन मुनि के आगम प्रामाण्य , शिवपुराण तथा आगमपुराण में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के भेद दिखाय गये हैं । वाचस्पति मिश्र ने चार माहेश्वर सम्प्रदायों के नाम लिये हैं । यह प्रतीत होता है कि श्रीहर्ष ने नैषध (१० ,८८ ) में समसिद्धान्त नाम से जिसका उल्लिखित है , वह कापालिक सम्प्रदाय ही है ।

कपालिक नाम के उदय का कारण नर -कपाल धारण करना बताय जाता है । वस्तुतः यह भी बहिरंग मत ही है । इसका अन्तरंग रहस्य प्रबोध -चन्द्रोदय की प्रकाश नाम की टीका में प्रकट किया गया है । तदनुसार इस सम्प्रदाय के साधक कपालस्थ अर्थात् ‍ ब्रह्मारन्ध्र उपलक्षित नरकपालस्थ अमृत या चान्द्रीपान करते थे । इस प्रकार के नामकरण का यही रहस्य है । इन लोगों की धारणा के अनुसार यह अमृतपान है , इसी से लोग महाव्रत की समाप्ति करते थे , यही व्रतपारणा थी ।

बौद्ध आचार्य हरिवर्मा और असंग के समय में भी कापालिकों के सम्प्रदाय विद्यमान थे । सरबरतन्त्र में १२ कापालिक गुरुओं और उनके १२ शिष्यों के नाम सहित वर्णन मिलते हैं । गुरुओं के नाम हैं — आदिनाथ , अनादि , काल , अमिताभ , कराल , विकराल आदि । शिष्यों के नाम हैं –नागार्जुन , जडभरत , हरिश्चन्द्र , चर्पट आदि। ये सब शिष्य तन्त्र के प्रवर्तक रहे हैं । पुराणादि में कापालिक मत के प्रवर्तक धनद या कुबेर का उल्लेख है ।

कालामुख तथा भट्ट नाम से भी सम्प्रदाय मिलते हैं , किन्तु इनका
किन्तु इनका विशेष विवरण उपलब्ध नहीं है । प्राचीन काल में शाक्तों में भी समयाचार और कौलाचार का भेद विद्यमान था । कुछ लोग समझते हैं कि समयाचार वैदिक मार्ग का सहवर्ती था और गौडपाद , शंकर प्रभृति समयाचार के ही उपासक थे ।

कौलाचारसंप्रद्राय में कौलों के भीतर भी पूर्व कौल और उत्तर कौल का भेद विद्यमान था । पूर्व कौल मत शिव एवं शक्ति , आनन्द -भैरव और आनन्द -भैरवी से परिचित है । इस मत में दोनों के मध्य शेष -शेषिभाव माना जाता था , किन्तु उत्तर कौल के अनुसार शेष -शेषिभाव नहीं हैं । इस मत में सदा शक्ति का ही प्राधान्य स्वीकृत है , शक्ति कभी शेष होती है , शिव तत्त्व रुप में परिणत हो जाते हैम और शक्ति तत्त्वातीत ही रहती है । रुद्रयामल के उत्तरतन्त्र ’ होने का यही रहस्य हैं – पूर्व कौल शिव और शक्ति के मध्य शेष -शेषिभाव मानते हैं । अतः पूर्व कौल के मत में शेष -शेषिभाव पूर्वतन्त्र का परिचायक होना चाहिए । जब शक्ति कार्यात्मक समग्र प्रपञ्च को अपने में आरोपित करती है तो उसका नाम होता है – कारण , और उसका पारिभाषिक नाम आधार कुण्डलिनी है । कुण्डलिनी के जागरण से शक्ति शेष नहीं रहती । तत्त्व रुप में सदाशिव परिणत हो जाते हैं और शक्ति तत्त्वातीत ही रहती है । यही उत्तरतन्त्र का उत्तरत्व है ।

कौल मत की आलोचना

प्राचीन समय से ही कौल -मत की आलोचना हो रही है । कौल मत में ही मानवीय चरम उत्कर्ष की अवधि स्वीकृत होती है । इन लोगों का कहना है कि तपस्या , मन्त्र -साधना प्रभृति से चित्तशुद्धि होने पर ही कौल -ज्ञान धारण करने की मनुष्य में योग्यता आता है । योगिनीह्रदय की सेतुबन्धटीका (पृ०२५ ) में कहा है —

पुराकृततपोदानयज्ञतीर्थजपव्रतैः ।

शुद्धचित्तस्य शान्तस्य धर्मिणो गुरुसेविनः ॥
अतिगुप्तस्य भक्तस्य कौलज्ञानं प्रकाशते ।

विज्ञान -भैरव की टीका में क्षेमराज ने कहा है —

वेदादिभ्यः परं शैवं शैवात् ‍ वामं तु दक्षिणम् ‌ ।

दक्षिणात् ‍ परतः कौलं कौलात् ‍ परतरं नहि ॥

किन्तु शुभागमपञ्चक के अन्तर्गत सनत्कुमारसंहिता में कौल -ज्ञान की निन्दा की गयी है । १ . कौलक , २ . क्षपणक , ३ . दिगम्बर , ४ . वामक आदि के सम्प्रदाय बराबर माने गये हैं ।

शक्तिसंगमतन्त्र के विभिन्न खण्डों में विभिन्न तान्त्रिक सम्प्रदायों के यत्किञ्चित् ‍ विवरण मिलते हैं । बौद्ध तथा तन्त्रों के विषय में भी बहुत कुछ कहना था , किन्तु यहाँ संभव नहीं होगा और रुद्रयामल के प्रसंग में असंगत भी है । यद्यपि बुद्ध की चर्चा रुद्रयामल के १७ वें अध्याय में आयी है ।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी  प्रबन्ध संपादक 

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