दीपावली और धनतेरस महात्म्य

अरुण उपाध्याय (धर्म शास्त्र विशेषज्ञ)

दीपावली का महत्त्व-दीपावली के बाद कार्त्तिक शुक्ल पक्ष से कार्त्तिकादि विक्रम सम्वत् आरम्भ होता है जिसका आरम्भ उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य ने ५७ ई.पू. में सोमनाथ में किया था। उसके ७ मास पूर्व नेपाल के पशुपतिनाथ में चैत्रादि सम्वत् का आरम्भ किया था जब वहां अवन्तिवर्मन् (१०३-३३ ई.पू.) का शासन था। अवन्तिवर्मन् ने व्याकरण की पुस्तक लिखी थी। उनका पुत्र जिष्णुगुप्त कुछ काल के लिये राजा था, बाद में ज्योतिष अध्येता के रूप में उसके समकालीन वराहमिहिर (९५-५ ई.पू.) ने उनका उल्लेख किया है। उसका पुत्र ब्रह्मगुप्त विख्यात ज्योतिषी थे जिनकी पुस्तक ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त का अरबी अनुवाद अल-जबर-उल-मुकाबला (अलजब्रा शब्द का मूल) के रूप में हुआ।
कृत्तिका का अर्थ कैंची होता है। ज्योतिष गणना में आकाश के दो वृत्तों का प्रयोग होता है-विषुव और क्रान्ति-वृत्त। इन दोनों का एक मिलन विन्दु कृत्तिका है जहां से कैंची की तरह दो शाखायें निकलती हैं। उससे १८० अंश दूर दोनों शाखायें जहां मिलतीं हैं वह द्वि-शाखा = विशाखा नक्षत्र है। आकाश में पृथ्वी का घूर्णन अक्ष २६००० वर्ष में क्रान्ति-वृत्त के उत्तरी ध्रुव नाक-स्वर्ग की परिक्रमा करता है जिसका मार्ग शिशुमार चक्र है। यह परिक्रमा भी जिस विन्दु से आरम्भ होती है उसे कृत्तिका कहा गया है।
तन्नोदेवासोअनुजानन्तुकामम् …. दूरमस्मच्छत्रवोयन्तुभीताः।
तदिन्द्राग्नी कृणुतां तद्विशाखे, तन्नो देवा अनुमदन्तु यज्ञम्।
नक्षत्राणां अधिपत्नी विशाखे, श्रेष्ठाविन्द्राग्नी भुवनस्य गोपौ॥११॥
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तात्, उन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय।
तस्यां देवा अधिसंवसन्तः, उत्तमे नाक इह मादयन्ताम्॥१२॥ (तैत्तिरीयब्राह्मण३/१/१)
= देव कामना पूर्ण करते हैं, इन्द्राग्नि (कृत्तिका) से विशाखा (नक्षत्रों की पत्नी) तक बढ़ते हैं। तम वे पूर्ण होते हैं, जो पूर्णमासी है। तब विपरीत गति आरम्भ होती है। यह गति नाक कॆ चारो तरफ है।
इसे ब्रह्माण्ड पुराण में मन्वन्तर काल कहा है, जो इतिहास का मन्वन्तर है।
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/९)-स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३६॥ तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥३७॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९)-त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु। वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥१९॥
पृथ्वी पर भी वार्षिक रास कार्त्तिक पूर्णिमा से आरम्भ होता है। यह ऋतु चक्र का वह समय है जब सभी समुद्री तूफान शान्त हो जाते हैं और समुद्री यात्रा आरम्भ हो सकती है। अतः सोमनाथ के समुद्र तट पर कार्त्तिकादि विक्रम सम्वत् का आरम्भ हुआ था। गणित के अनुसार कार्त्तिक कृष्ण पक्ष आश्विन मास में होगा उसके बाद शुक्ल पक्ष से कार्त्तिक मास और कार्त्तिकादि वर्ष आरम्भ होगा। वर्ष और मास सन्धि पर दीपावली होती है।
इस सम्वत्सर चक्र की सन्धि पर जब नया वर्ष आरम्भ होता है दीपावली में ३ सन्धियां होती हैं-
असतोमासद्गमय, तमसोमाज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतंगमय .. बृहदारण्यकउपनिषद् (१/३/२८)
स्वयं दीपावली अन्धकार से प्रकाश की तरफ गति है जिसके लिये दीप जलाते हैं-तमसो मा ज्योतिर्गमय।
दीपावली के १ दिन पूर्व यम-चतुर्दशी होती है। १४ भुवन अर्थात् जीव सर्ग है, उनकी परिणति यम है, अतः कृष्ण चतुर्दशी को यम-चतुर्दशी कहते हैं, रात्रि तिथि के अनुसार यह शिवरात्रि भी होती है। दीपावली के एक दिन बाद अन्न-कूट होता है जो इन्द्र की पूजा थी (भागवत पुराण)। भगवान् कृष्ण ने इसके बदले गोवर्धन पूजा की थी। गोकुल में इस नाम का पर्वत है। गो-वर्धन का अर्थ गोवंश की वृद्धि है जो हमारे यज्ञों का आधार है। शरीर की इन्द्रियां भी गो हैं, जिनकी वृद्धि रात्रि में होती है जब हम सोते हैं। आत्ः १ दिन पूर्व से १ दिन बाद का पर्व मृत्यु से अमृत की गति है-मृत्योर्मा अमृतं गमय।
दीपावली से २ दिन पूर्व निर्ऋति (दरिद्रता) होती है जिसे दूर किया जाता है। इसके लिये धन-तेरस पर कुछ बर्तन या सोना खरीदा जाता है। दीपावली के २ दिन बाद यम-द्वितीया है। यहां यम का अर्थ मृत्यु नहीं, यमल = युग्म या जोड़ा है। इसका अर्थ भाई-बहन का जोड़ा यम-यमी है। अतः इस दिन को भ्रातृ-द्वितीया कहते हैं जब बहन भाई की पूजा करती है। यह असत् (अव्यक्त, अस्तित्व हीन) से सत् (सत्ता, व्यक्त) की गति है-असतो मा सद् गमय।
श्रीसूक्त में निर्ऋति या अलक्ष्मी दूर करने का वर्णन है-
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।८।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्य पुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्।९।
अभूति, निर्णुद = यम, मृत्यु। अलक्ष्मी, असमृद्धि, क्षुत्-पिपासा = दरिद्रता, धनहीनता, भूख।
अन्न, लोक और गो की वृद्धि-
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।१०।
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्।११।
श्री-सूक्त पाठ का फल वही है जो दीपावली का फल है-
अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने। धनं मे जुषतां देवि सर्व कामांश्च देहि मे।१८।
पद्मानने पद्म विपद्म पत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि। विश्वप्रिये विश्वमनोनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि संनिधत्स्व।१९।
पुत्र-पौत्रं-धनं-धान्यं-हस्त्यश्वादि गवे रथम्। प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।२०।
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः। धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमस्तुते।२०।
श्री को चन्द्र के समान प्रकाशित, हिरण्य जैसा तेज और प्रभासा (चमकदार) है, जो दीपावली का दीप-दान है-
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह।1।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलंतीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्। तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।५।

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