दीपावली के संदर्भ में अध्यात्मशास्त्रीय जानकारी

सुरेश मुंजाल
हिन्दू जनजागृति समिति

वसुबारस अर्थात् गोवत्स द्वादशी – 25अकटुबर 2019
वसुबारस अर्थात् गोवत्स द्वादशी, दीपावली के आरंभ में आती है । यह गोमाता का उसके बछडे के साथ पूजन करने का दिन है । शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी गोवत्स द्वादशी के नाम से जानी जाती है । यह दिन एक व्रत के रूप में मनाया जाता है ।

गोवत्सद्वादशी का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
गोवत्सद्वादशी के दिन श्री विष्णु की आपतत्त्वात्मक तरगें सक्रिय होकर ब्रह्मांड में आती हैं । इन तरंगों का विष्णुलोक से ब्रह्मांड तक का वहन विष्णुलोक की एक कामधेनु अविरत करती हैं । उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए कामधेनु के प्रतीकात्मक रूप में इस दिन गौ की पूजन की जाती है ।

गोवत्सद्वादशी को गौपूजन प्रातः अथवा सायंकाल में करने का शास्त्रीय आधार
प्रातः अथवा सायंकाल में श्री विष्णु के प्रकट रूप की तरंगें गाय में अधिक मात्रा में आकृष्ट होती हैं । ये तरंगें श्री विष्णु के अप्रकट रूप की तरंगों को 10 प्रतिशत अधिक मात्रा में गतिमान करती हैं । इसलिए गोवत्सद्वादशी को गौपूजन सामान्यतः प्रातः अथवा सायंकाल में करने के लिए कहा गया है ।
गोवत्सद्वादशी से मिलने वाले लाभ
गोवत्सद्वादशी पर गौपूजन कर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । इससे व्यक्ति में लीनता बढती है । फलस्वरूप कुछ क्षण उसका आध्यात्मिक स्तर बढता है । गौपूजन व्यक्ति को चराचर में ईश्वरीय तत्त्व का दर्शन करने की सीख देता है ।

धनत्रयोदशी – 25 अचतुबर 2019
शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात ‘धनत्रयोदशी’ । इसी को साधारण बोलचाल की भाषा में ‘धनतेरस’ कहते हैं । धनत्रयोदशी देवताओं के वैद्य धन्वंतरि जयंती का दिन है । आयुर्वेद के विद्वान एवं वैद्य मंडली इस दिन भगवान धन्वंतरि का पूजन करते हैं और लोगों की दीर्घ आयु तथा आरोग्यलाभ के लिए मंगलकामना करते हैं ।

धनत्रयोदशी के दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का अर्थात् खरीदने का शास्त्रीय कारण – धनत्रयोदशी के दिन लक्ष्मी तत्त्व कार्यरत रहता है । इस दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने के कृत्य द्वारा श्री लक्ष्मी के धनरूपी स्वरूप का आवाहन किया जाता है और कार्यरत लक्ष्मीतत्त्व को गति प्रदान की जाती है । इससे द्रव्यकोष में धनसंचय होने में सहायता मिलती है । यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि, धनत्रयोदशी के दिन अपनी संपत्ति का लेखा-जोखा कर, शेष संपत्ति ईश्वरीय अर्थात् सत्कार्य के लिए अर्पित करने से धनलक्ष्मी अंत तक रहती है ।

नरक चतुर्दशी – 26अकटुबर 2019
शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरक चतुर्दशी के नाम से पहचानी जाती है । इस तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया । तबसे यह दिन नरक चतुर्दशी के नाम से मनाते हैं । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर को उसके अंत समय पर दिए वर के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती । अभ्यंगस्नान अर्थात सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर किया गया स्नान ।

अभ्यंगस्नान का महत्त्व
दीपावली के दिनों में अभ्यंगस्नान करने से व्यक्ति को अन्य दिनों की तुलना में 6 प्रतिशत सात्त्विकता अधिक प्राप्त होती है । सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर शरीर का मर्दन (मालिश) कर अभ्यंगस्नान करने के कारण व्यक्ति में सात्त्विकता एवं तेज बढता है । नरकचतुर्दशी के दिन अभ्यंगस्नान करने से शक्ति का 2 प्रतिशत, चैतन्य का 3 प्रतिशत, आनंद का 1.25 प्रतिशत एवं ईश्वरीय तत्त्वका 1 प्रतिशत मात्रा में लाभ मिलता है ।

दीपावली की कालावधि में उबटन लगाने का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
दीपावली के कालावधि में उबटन के उपयोग हेतु अधिक पोषक है । उबटन का उपयोग करने से पूर्व उसमें सुगंधित तेल मिलाया जाता है । दीपावली की कालावधि में ब्रह्मांड से आप, तेज एवं वायु युक्त चैतन्य प्रवाहों का पृथ्वी पर आगमन अधिक मात्रा में होता है । इसलिए वातावरण में देवताओं के तत्त्व की मात्रा भी अधिक होती है । इस कालावधि में देह पर उबटन लगाकर उसके घटकों द्वारा देह की चैतन्य ग्रहण करने की संवेदनशीलता बढाई जाती है । इसलिए देवताओं के तत्त्व के चैतन्य प्रवाह व्यक्ति के देह में संक्रमित होते हैं, जिससे व्यक्ति को अधिकाधिक मात्रा में चैतन्य की प्राप्ति होती है ।

यमतर्पण
श्री यमराज धर्म के श्रेष्ठ ज्ञाता एवं मृत्यु के देवता हैं । प्रत्येक व्यक्ति की मृत्यु अटल है । प्रत्येक व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार करता है; परंतु अकाल मृत्यु किसी को भी स्वीकृत नहीं होती । असामयिक मृत्यु के निवारण हेतु यमतर्पण की विधि बताई गई है । दीपावली के काल में यमलोक से सूक्ष्म यमतरंगें भूलोक की ओर अधिक मात्रा में आकृष्ट होती हैं । इसलिए इस काल में यह विधि विशेषरूप से करने का विधान है ।

नरक चतुर्दशी के दिन विविध स्थानों पर दीप जलाने का कारण

नरक चतुर्दशी की पूर्वरात्रि से ही वातावरण दूषित तरंगों से युक्त बनने लगता है । पाताल की अनिष्ट शक्तियां इसका लाभ उठाती हैं । वे पाताल से कष्टदायक नादयुक्त तरंगें प्रक्षेपित करती हैं । दीपों से प्रक्षेपित तेजतत्त्वात्मक तरंगें वायुमंडल के कष्टदायक रज-तम कणों का विघटन करती हैं । इस प्रक्रिया के कारण अनिष्ट शक्तियों का सुरक्षाकवच नष्ट होने में सहायता मिलती है ।

दीपावली में आनेवाली अमावस्या का महत्त्व

सामान्यतः अमावस्या को अशुभ मानते हैं; परंतु दीपावली काल की अमावस्या शरद पूर्णिमा अर्थात् कोजागिरी पूर्णिमा के समान ही कल्याणकारी एवं समृद्धिदर्शक है ।

श्री लक्ष्मीपूजन
दीपावली के इस दिन धन -संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी श्री महालक्ष्मी जी के पूजन करने का विधान है । दीपावली की अमावस्या को सभी के घर अर्धरात्रि के समय श्रीलक्ष्मी जी का आगमन होता है । घर को पूर्णतः स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित कर दीपावली मनाने से देवी श्री लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और वहां स्थायी रूप से निवास करती हैं । इसीलिए इस दिन श्री लक्ष्मी जी का पूजन करते हैं और दीप जलाते हैं । यथासंभव श्री लक्ष्मी पूजन की विधि करते हैं ।

लक्ष्मी पूजनके लाभ
भक्तिभाव बढना : श्री लक्ष्मी पूजन के दिन ब्रह्मांड में श्री लक्ष्मी देवी एवं कुबेर देवता का तत्त्व अन्य दिनों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होता है । इस दिन इन देवताओं का पूजन करने से व्यक्ति का भक्तिभाव बढता है और 3 घंटों तक बना रहता है ।

अनिष्ट शक्तियोंका नाश होना : श्री लक्ष्मी पूजन के दिन अमावस्या का काल होने से श्री लक्ष्मी जी का मारकतत्त्व कार्यरत रहता है । पूजक के भाव के कारण पूजन करते समय श्री लक्ष्मी जी के मारक तत्त्व की तरंगें कार्यरत होती हैं । इन तरंगों के कारण वायुमंडल में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों का नाश होता है । इसके अतिरिक्त दीपावली के दिन श्री लक्ष्मी पूजन करने से पूजक को शक्ति का 2 %, चैतन्य का 2 %, आनंद का 1.25 % एवं ईश्वरीय तत्त्व का 1% लाभ मिलता है । इन लाभों से श्री लक्ष्मी पूजन करने का महत्त्व समझ में आता है ।

अलक्ष्मी निःसारण
अलक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता, दैन्य और आपदा । निःसारण करने का अर्थ है बाहर निकालना । लक्ष्मी पूजन के दिन नई झाडू खरीदी जाती है । उसे ‘लक्ष्मी’ मानकर मध्यरात्रि में उसका पूजन करते हैं । उसकी सहायता से घर का कूडा निकालते हैं । कूडा सूप में भरते हैं, कूडा अलक्ष्मी का प्रतीक है । उसे बाहर फेंका जाता हैं । अन्य किसी भी दिन मध्यरात्रि में कूडा नहीं निकालते है । कूडा बाहर फेंकने के उपरांत घर के कोने–कोने में जाकर सूप अर्थात् छाज बजाते हैं।

संदर्भ-सनातन का ग्रंथ -त्योहार,धार्मिक उत्सव एवं व्रत

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