दुर्गा प्राकट्य हिंसा और अहिंसा

दुर्गासप्तशती के अनुसार दुर्गा का प्राकट्य घोर हिंसा के लिये ही हुआ था ।देवी करुणा वात्सल्य के लिये प्रकट नहीं हुई थी ,बल्कि दुष्टों के महाविनाश के लिये प्रकट हुई थी ।देवी ने असुरों को केवल मारा ही नहीं उनका भक्षण भी किया था ।अतः शाकाहार के दुराग्रहियों के अनुसार देवी हिंसक होने के कारण अपूज्य होनी चाहिये ????अतः देवी पूजा में जीव बलि मान्य रही । शाक्त मत में हिंसा भी अहिंसा के समतुल्य पवित्र मानी गई है।अवांछित हानिकारक जीवों का वध भी पुण्य है ।
अभी भी यज्ञ में देवी पूजन के लिये उड़द के आटे से बलि के लिये प्रतीकात्मक पिंड बनाया जाता है ।उसे धारदार शस्त्र से काटा भी जाता है।दही में गुड़ घोलकर प्रतीकात्मक मदिरा बनायी जाती है जो देवी को अर्पित की जाती है।
प्रतीकात्मक वस्तुओं पूजा सामग्री की अनुमति उनके लिये है जो मूल पदार्थों का अपने जीवन में उपयोग नहीं करते,जैसे वैष्णवादि।
जो लोग मांस मदिरा का उपयोग करते हैं उन्हें देवी पूजा में वास्तविक पशु और शुद्ध मदिरा का ही उपयोग करना ही होता है ।
सामान्यतः भोजन करने से पूर्व इष्ट को समर्पित करने भोग लगाने की परंपरा हिन्दुओं में रही है।शाकाहारी हों या माँसाहारी सभी अपने इष्ट को भोज्य पदार्थ अर्पित करते हैं ।

दही में गुड़ घोल कर बने द्रव्य को मादक कहा गया है।तथा उसके पीना वैष्णव निषिद्ध मानते हैं।पर यज्ञ में उपयोग करते हैं।

डाकुओं ,बलात्कारियों देश समाज के शत्रुओं का वध आज भी उचित माना ही जाता है ।

अति सर्वत्र वर्जयेत , अतः हिंसा अहिंसा के संबंध में विमर्श करते हुये ,संतुलन बनायें रखें।अति दुराग्रह असंतुलन उत्पन्न करता है जो पतन का कारण बनता है।

मांसाहार ध्यान साधना में बाधा उत्पन्न करता है । यह बात हजारों वर्ष पूर्व ऋषियों ने जान ली थी । अतः आध्यात्मिक साधना के इच्छुक साधकों को मांसाहार से दूर रहने के निर्देश दिये । जो लोग आध्यात्मिक साधना में रुचि नहीं रखते , समाज में कठिन कार्यों का दायित्व सँभाल रहे हों उनका शाकाहारी होना अनिवार्य कभी नहीं रहा । अतः रजोगुणी और तमोगुणी कार्यों में लिप्त लोग मांसाहार करते रहे । समाज में उन्हें श्रेष्ठ भले न माना हो । पर हेय और घृणित भी नहीं माना ।अधिकतर क्षत्रिय ,राजा महाराजा मांसाहार करते रहे ।

मांसाहार से चित्त में उद्वगिता बढ़ती , स्वभाव में हिंसकता बढ़ती है । अतः रक्षा सैन्य कर्म से जुड़े लोगो का मांसाहारी होना बुरा नही माना गया । अहिंसक करुणा वान सैनिक राष्ट्र के लिये घातक सिद्ध होते । अतः भोजन की आचार संहिता व्यक्ति की समाज में भूमिका के अनुसार परिवर्तित होती है ।

वामी कामी गिरोह हिन्दुओं को भीरू और कायर बनाने के लिये गाँधीवादी तरीका अपना रहे हैं। तथा हिन्दू एकता को नष्ट करने के लिये विवादास्पद मुद्दे उठाते रहते हैं। उनके झमेले में अधिकतर युवा फँस जाते हैं।
जैसे ही पता लगा कि हथिनी को मारने में शान्तिदूतों का हाथ है । दुष्टों ने शाकाहार माँसाहार पर विमर्श प्रारंभ कर दिया । अब लड़ते रहो कि सच्चे हिन्दू कौन?? शाकाहारी या माँसाहारी ?
साभार:निसर्गम

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