देवभूमि भारत

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-

अहं राष्ट्री संगमनी, वसूनां चिकितुषी (देव्यथर्व शीर्ष)
भारत वर्ष का मुख्य भारत या कुमारिका खण्ड अधोमुख त्रिकोण के आकार में शक्ति त्रिकोण है। इसका पूर्वोत्तर कोण कामाख्या पीठ महाकाली स्थान है, पश्चिम में वैष्णो देवी से कोलापुर तक महालक्ष्मी स्थान है। सम्पत्ति रूप में लक्ष्मी को ताला (कोला) में बन्द रखते हैं, अतः उनका स्थान कोला या कोल्हापुर है। दक्षिण में शारदा पीठ सरस्वती स्थान है।
कैलास कोण से ऊर्ध्वमुख शिव त्रिकोण है। इसमें कैलास शिव, पुष्कर ब्रह्मा तथा जगन्नाथ पुरी विष्णु का स्थान है। दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय में विष्णु के जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा गया है।
१२ ज्योतिर्लिंगों के रूप में भारत शिवरूप है, ५२ शक्तिपीठ द्वारा शक्ति रूप है। ज्योतिर्लिंग के १२ भेद विष्णु के १२ आदित्य रूप हैं।
गुरु को शिव रूप मानते हैं। देह शिवा वर मोहि इहै, शुभ-कर्म तें कहूं न टरौं (गुरु गोविंद सिंह जी)। अतः शिव की तरह गुरु नानक को भी पूरे भारत का स्वरूप माना गया है। कटक में जहां दातुन किए थे वह दातन साहब है, जहां खाट पर बैठे थे वह मंझी साहब है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह अन्य स्थानों पर खाट पर नहीं बैठे या दातुन नहीं किये। उनके विभिन्न कामों के माध्यम से भारत को उनका रूप कहा गया है। शरीर में गुरु का स्थान आज्ञा चक्र है जो सुधा सिन्धु में स्थित है। उसे भारत के भूगोल मेंअमृतसर कहा गया। उसके नीचे कण्ठ स्थान में जालन्धर बन्ध होता है, वहां जालन्धर है।

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