देव और प्रेतावेश का भेद

” गाँव-शहर या कई जगह देवी-देवताओं या अन्य दैवीय या पैशाचिक शक्तियों के आने की घटनाऐं देखी-सुनी जाती हैं …. उनके पीछे का तंत्रोक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण निम्नवत् है …                     देवी-देवताओं का तेज यदि सूर्य के प्रकाश के समान होता है तो उनके गण इतने भी साधारण नहीं होते कि एक सामान्य मनुष्य उनके गणों के स्वयं के शरीर में प्रवेश को सहन कर जाऐ … सो न तो देवी-देवता किसी प्राणी के शरीर में प्रवेश करते हैं न ही उनके गण … हाँ वो सम्पर्क जरूर करते हैं आपके योग्य और सुपात्र होने पर … वस्तुत: होता ये है कि जब कोई अपने इष्ट में रच-बस जाता है तो उसके अन्दर उस इष्ट से सम्बन्धित गुणों का खिचाव होने लगता है वो उन्हीं गुणों से प्रेरित होकर कृत्य करने लगता है,उन्ही गुणों का स्वरूप होने लगता है …  साथ ही उसके सूक्ष्म शरीर में स्थित चक्रों में जो चक्र उसके इष्ट से सम्बन्धित होंगे,उनमें विचलन भी होने लगता है …  फिर जब कभी, उस इष्ट से सम्बन्धित कहीं भी कोई भजन-कीर्तन या कुछ भी विशेष होता है तो उसका वो चक्र जो उसके इष्ट ये सम्बन्धित है वो तेजी से सक्रिय होने लगता है और बाहरी ऊर्जा यानी बाहर चलते भजन- कीर्तन उस चक्र की ऊर्जा को तीव्रतम् करते चले जाते हैं …  फिर कुछ क्षण पश्चात होता ये है कि हमारी सामान्य बाह्य चेतना की ऊर्जा,जिसे बाह्यमन भी कहा जा सकता है, उससे अधिक ऊर्जा उस चक्र और सम्बन्धित ईष्ट की हो जाती है,जिसकी वजह से हमारा बाह्य मन निर्बल होकर सुप्त सा या पूर्णतया सुप्त हो जाता है … और ब्रह्मांड में हर तरफ से हमारे ईष्ट से सम्बन्धित वो ऊर्जा हमारी ओर खिचनें लगती है … जिसे हमारे सूक्ष्म शरीर में सक्रिय चक्र खींचता भी है और कन्ट्रोल भी करता है …  तत्पश्चात् होता ये है कि हम अपने ईष्ट से उसी प्रकार जुड़ जाते हैं जैसे वृक्ष से पत्ता …. हालॉकि हम सभी परमात्मा से उसी प्रकार जुड़े भी हैं जैसे वृक्ष से उसके पत्ते , किन्तु अज्ञानतावश हम स्वयं को अलग मानते हैं …  अपने इष्ट से जुड़ने के पश्चात हमारा शरीर उसके यंत्र की भॉति कार्य करता है …  और व्यक्ति उस समय देवी-देवता ही होता है या उनका अँश ही कहें … हाँ,इतना अवश्य है कि उस समय ये बाह्य मन सुुप्त सा हो जाता है,इतनी ऊर्जा न सम्भाल पाने के कारण … इसे उदाहरण से समझते हैं … जैसा कि किसी को काली जी आती हैं तो इसका वास्तविक तंत्रोक्त विश्लेषण ये है कि वो व्यक्ति जो भी होगा,काली जी उसके प्राणों में बसी होंगी … वो उनके प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा रखता होगा …. काली जी के नाम और फोटे या मंत्र या उनसे सम्बन्धित किसी भी क्रिया से उसे एक आन्तरिक लगाव होगा …  साथ ही ऐसे लोग बहुत संवेदनशील भी होते हैं,तभी ऐसा सम्भव होता है,क्योंकि हर अच्छे भक्त को देवी-देवता नहीं आते,उनका आना न आनी भी सूक्ष्म शरीर और भावना के स्तर पर निर्भर करता है … आगे बढ़ते हैं …  फिर जब उस भक्त को या काली प्रेमी को कहीं भी उनके भजन-कीर्तन या सम्बन्धित कृत्य होने लगते हैं तो वो उनमें डूबने लगता है और जब वो पूर्णतया उसमें मग्न सा हो जाता है तो खुद को भूल चुका होता है …  दूसरी भाषा में अन्तर्मन में प्रवेश … किन्तु मात्र अन्तर्मन में प्रवेश ही नहीं उसके बाद भी कुछ होता है … ठीक उसी समय सूक्ष्म शरीर में काली से सम्बन्धित चक्र मूलाधार में विचलन शुरू हो जाता है …  और वो विचलन बाहर के भजन-कीर्तन और मंत्रों से और अधिक तेजी सक्रिय होने लगता है … तत्पश्चात् पूरे ब्रह्मांड में और आस-पास की काली जी से सम्बन्धित सभी ऊर्जाऐं उस व्यक्ति(चेतना विशेष) की ओर खिचनें लगती हैं … और उसे पूर्ण तृप्त कर कालीमय कर देती हैं …  हालॉकि उसे पूर्ण काली देवी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस देवी से सम्बन्धित उतनी ही ऊर्जा वो सम्भाल पायेगा,जितना उसकी चेतना में सामर्थ्य होगा …  किन्तु फिर भी वो काली का अँश हो जाता/जाती है …  और जब तक उसकी चेतना और चक्र काली जी से सम्बन्धित ऊर्जा सम्भाले रखते हैं वो शरीर देवी के कार्य को करता और उनके वचनों को कहता रहता है …  दूसरे शब्दों में कहे तो वो कुछ समय के लिऐ देवी-देवता का अँश-स्वरूप होकर स्वयं उनके गण/गणिकाओं के तुल्य या समान हो जाता है … ये पूर्ण प्रक्रिया है देवी-देवता आने की … बिल्कुल यही प्रक्रिया पैशाचिक शक्तियों के बारे में भी घटित होती है … हालाँकि इसमें अभी और भी बहुत कुछ लिखा और स्पष्ट किया जा सकता है, … समयाभाव है सो इतना ही … साथ ही गुह्य ज्ञान मात्र सुपात्रों के लिऐ ही सुरक्षित रहना चाहिऐ … हाँ,कुछ मानसिक रोगी भी होते हैं … उन्हे इलाज की आवश्यकता है किन्तु कुछ पर कृपा भी होती है … और जिन पर देवी-देवताओं की कृपा है उन्हे इलाज नहीं बल्कि ढ़ंग से सहीमार्गदर्शन के साथ साधना की आवश्यकता है …

ताकि वो अपने साथ-साथ मानवता का भी कल्याण कर सकें …

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी 

प्रबन्ध संपादक 

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