धूर्त अंग्रेज, धारा 370, द हिन्दू अखबार, JNU और देश के गद्दार कनेक्शन

धूर्त अंग्रेज, धारा 370, द हिन्दू अखबार, JNU और देश के गद्दार कनेक्शन

राजा ए राजगान…
निजाम उल मुल्क…
सिपर ए सल्तनत..
शमशेर बहादुर..
दौलत ए इन्ग्लीशीया…
जी सी आई एस…
के सी वी ओ…
जी सी आई ई…
जी सी वी ओ…

ऐसे ही न जाने कितने फर्जी खिताब और तमगे थे जो अंग्रेज गुलाम भारत में अपने वफादारों को देते थे |
गुलाम भारत के नरेशों में (कुछ वीरों को छोड़कर, जिनकी चर्चा अगले लेख में) इंग्लैंड के सम्राट से यें फर्जी खिताब लेने का ऐसा नशा चढ़ा था कि इनके लिए वो किसी भी हद तक गिरने के लिए तैयार रहते |
अंग्रेजी खिताबों के लिए पागल हुए राजाओं की इस जमात में से एक कपूरथला के नरेश हिज हाइनेस महाराजा जगजीत सिंह के एक स्मृति पत्र की एक नक़ल एक किताब के माध्यम से मुझे प्राप्त हुयी..
पूरा तो इस पत्र को यहाँ नहीं लिख सकता क्योकि महाराजा जगजीत सिंह का चरित्र चित्रण इस लेख का उदेश्य नहीं है…किन्तु यह पत्र आपको अहसास करा सकता है कि कैसे चरित्र के होते थे वो लोग, जिनको धूर्त अंग्रेज खिताबों से नवाजा करते थे…..ऐसा ही एक खिताबी था, धूर्त अंग्रेजों का वो वफादार इंसान, जिसने आर्टिकल 370 रच कर कश्मीर को सदा के लिए भारत से जुदा कर दिया!! इस खिताबी इंसान का नाम भी बताऊंगा, इसके हिमायतियों का नाम भी बताऊंगा, इसका JNU कनेक्शन भी बताऊंगा और फिर इसका द हिन्दू अखबार के साथ लिंक भी उजागर किया जायेगा | पहले महाराजा जगजीत सिह के अंग्रेजों के नाम पत्र से यें झलकियां पढ़ लीजिये –

“सन १८७२ में कपूरथला के महाराज की हैसियत से मै अपने पिता के बाद राजगद्दी पर बैठा | तभी से पूरे शासनाधिकार ग्रहण करके मैं ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा, सच्चाई और निष्ठां के साथ करता हूँ….!!……साम्राज्य की जो सेवाएँ मैंने की हैं…..उनके उपलक्ष्य में मुझे जी सी एस आई, जी सी आई, और जी बी इ, के खिताबात से सम्मानित किया गया है |”
…..इसके बाद महाराजा इसी पत्र में एक के बाद एक प्रूफ देकर इंग्लैंड के सम्राट को अलग अलग तरह से गुहार लगाते है कि वो ही अंग्रेजो के सबसे बड़े बड़े सेवक है वफादार और आज्ञाकारी हैं…
इतना सब लिखने के बाद महाराज विनती करते हैं कि.. “हे इंग्लैंड के हिज मेजेस्टी सम्राट, अब मुझे जी सी वी ओ का अलंकरण प्रदान करने की कृपा करें क्योकि यह उच्च सम्मान महारानी विक्टोरिया के यशश्वी नाम से सम्बंधित है, जिसके प्रति मैं, मेरी रियासत, और मेरी प्रजा पूरे तौर से श्रद्धावत और विनीत है….कपूरथला के महाराजा
इस पत्र से आप अंदाज लगा सकते हैं कि किसी मनुष्य को गुलाम भारत में अंग्रेजी खिताब लेने के लिए क्या क्या चाटना पड़ता था….!
ऐसा ही एक अंग्रेजी खिताब knighthood अर्थात “सर” की उपाधि हमारे राष्ट्रगान “जन गन मन” के महान लेखक टैगोर साहब को भी अंग्रेजो ने उनकी सेवाओं से खुश होकर दी थी और जिसको उन्होंने इंग्लैंड की रानी के समक्ष झुक कर सहर्ष स्वीकार भी किया था, इसकी चर्चा फिर कभी….
आज विषय है Diwan Bahadur Sir Narasimha Ayyangar Gopalaswami Ayyangar, CSI, CIE का
दीवान बहादुर, सर, N अय्यंगार, सी एस आई, सी आई ई……कुल सात बड़े अंग्रेजी तमगे थे इनके पास…… इतने तमगो के लिए कितनी वफादारी निभाई होगी इन्होने अंग्रेजों की…आप अंदाज ही लगा सकते हैं अब….इन्ही ‘सर अयंगार साहब’ का नाम आज देश में गौरव के साथ लिया जाता है, पढाया जाता है क्योकि इन्ही अंग्रेजों के खिताब गार अयंगार साहब को नेहरु जी ने स्वतंत्र भारत को चलाने के लिए बन रहे संविधान की Drafting Committee का मेम्बर बनाया था |
यही था वो इंसान सर अयंगर, जिसने नेहरु जी के साथ मिलकर रच डाला था आर्टिकल 370….वही 370 जिसने आदि आर्यों एवं आदि शिव की भूमि कश्मीर को सदैव के लिए नपाक जिहादियों के हाथों में सौंप दिया….और धरती के स्वर्ग, देवभूमि कश्मीर को सदैव के लिए एक रिसता हुआ नासूर बना डाला..!!
यही अंग्रेजों का वफादार सर अयंगर बाद में नेहरु के कहने पर, पटेल की असहमति के बावजूद कश्मीर मुद्दे को लेकर जिनेवा में गया, और सदा के लिए इस मुद्दे में कीड़े पडवा दिए…
इसी अंग्रेजो के वफादार दीवान बहादुर Sir N. Gopalaswami Ayyangar, CSI, CIE को नेहरु ने अपनी सरकार में मंत्री पद दिया….कश्मीर मुद्दे का सलाहकार बनाया, रेल मंत्री बनाया और फिर 1952-1953 में रक्षा मंत्री बना दिया..!! जी हाँ रक्षा मंत्री…..!!
अयंगर और JNU कनेक्शन
इन्ही Diwan Bahadur साहब का एक बेटा हुआ जिसका नाम था “Gopalaswami Parthasarathy” लोग प्यार से इनको ‘GP’ कहते थे |
अपने अंग्रेजी खिताब गार पिता की सत्य प्रतिमुर्ती ही तो होंगे GP साहब …
नेहरु जी की सुपुत्री इंदिरा जी ने इन्ही ‘GP’ साहब को 1969 में JNU का प्रथम वाइस चांसलर बनाया……आगे आप जानते ही हैं…..

अयंगर और The_Hindu कनेक्शन

महान Diwan Bahadur Sir Narasimha Ayyangar Gopalaswami Ayyangar, CSI, CIE के सुपुत्र GP साहब 1947 से पहले से ही The Hindu अखबार से जुड़े रहे और इस अखबार के ‘असिस्टेंट एडिटर’ के पद पर कार्य करते रहे……
लेख पूरा हो गया….लेख में वर्णित सभी तथ्य इतिहास की प्रकाशित किताबों एवं मेरे स्वयं के अध्ययन पर पर आधारित हैं | तथ्यों के साथ कोई छेड़ छाड नही की गयी है
लेख के सभी कनेक्शन शीशे की तरह साफ़ हैं | हाँ एक अंतिम कनेक्शन बचता है देश के गद्दार कनेक्शन जिसकी आप चाहें तो अपनी स्वयं की बुद्धि से विवेचना कर सकते हैं….

डॉ सुनील वर्मा

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