ध्यान-साधना की कसौटी

ध्यान-साधना की कसौटी

ध्यान अध्यात्म पथ का प्रदीप है। ध्यान की ज्योति जिसमें जितनी प्रखर है, अध्यात्म पथ उसमें उतना ही प्रकाशित हो जाता है। परमहंस श्री रामकृष्ण देव अपने शिष्यों से कहा करते थे कि ध्यान की प्रगाढ़ता अध्यात्म ज्ञान की परिपक्वता का पर्याय है। वह कहते थे- ‘जिसे ध्यान सिद्ध है, समझना चाहिए उसे अध्यात्म सिद्ध है।’ ध्यान की इस महिमा से कम-ज्यादा अंशों में प्रायः सभी आध्यात्म साधक परिचित हैं। साधक समुदाय में हर किसी की यही कोशिश रहती है कि उसका ध्यान प्रगाढ़ हो। परन्तु किसी न किसी कारण से ऐसा नहीं हो पाता। यदि कभी हुआ भी तो उसकी सही परख नहीं हो पाती।

कैसे परखेंगे आप अपने ध्यान को? क्या है ध्यान साधना के सिद्ध होने की कसौटियाँ? ये सवाल इन पंक्तियों को पढ़ रहे प्रत्येक साधक के मन में कभी न कभी पनपते रहते हैं। शायद इन क्षणों में भी कहीं मानस उर्मियों में तरंगित हो रहे हैं। इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा तो बहुत होती है। पर प्रायः सही समाधान नहीं जुट पाता। ध्यान के विषय में जब भी बात उठती है तो उसकी विधि प्रक्रियाएँ ही समझायी जाती हैं। इसकी सिद्धि के मानदण्ड क्या हैं? यह सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है।

ध्यान प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं पर और इसकी सिद्धि के मानदण्डों पर तन्त्र शास्त्रों एवं बौद्ध ग्रन्थों में काफी विस्तार से विचार किया गया है। महात्माओं  के अनुसार प्रायः साधक को प्रकाशपुञ्ज दिखना, विभिन्न रंग दिखना, अंतर्चक्षुओं के सामने अलौकिक दृश्यों का उभरना, आनन्द की अनुभूति होना आदि बातों को ध्यान सिद्धि का लक्षण मान लेते हैं। पर यथार्थता यह नहीं है। ऊपर गिनाए गए ये सभी लक्षण तो इतना भर सूचित करते हैं कि साधक ध्यान प्रक्रिया में गतिशील है। पर ये उसकी ध्यान सिद्धि की सूचना नहीं देते हैं । ध्यान सिद्धि के मानदण्ड तो कुछ और ही हैं। शास्त्रकारों एवं मुनियों ने इनकी संख्या काफी गिनायी है। लेकिन मुख्य तौर पर इन्हें सात तरीके से परखा-जाना जा सकता है।

यदि ध्यान के साधक अपने ध्यान को जांचना चाहे तो निम्न ७ सात मानदण्डों पर अपने ध्यान को जांच सकते हैं :

१ . आहार संयम,

२ . वाणी का संयम,

३ . जागरुकता,

४ . दौर्मनस्य का न होना,

५ . दुःख का अभाव,

६ . श्वास की संख्या में कमी हो जाना और –

७ . संवेदनशीलता।

उपरोक्त ७ सात ऐसे मानदण्ड हैं- जिनके आधार पर कोई भी साधक कभी भी अपने को जाँच सकता है कि उसकी ध्यान साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।

पहली कसौटी जान लीजिए , आहार संयम की है। ध्यान साधक में यदि आहार संयम सध रहा है तो समझना चाहिए उसका ध्यान भी सध रहा है। यह आहार संयम है क्या? तो इसके उत्तर में महान् योगी आचार्य शंकर कहते हैं- साधक को आहार कुछ इस तरह से लेना चाहिए जैसे कि औषधि ली जाती है। यानि की आहार वही हो और उतना ही हो जितना कि देह के पोषण के लिए पर्याप्त है। भगवद्गीता सात्त्विक आहार को परिभाषित करते हुए ध्यान साधक को ‘लघ्वाशी’ यानि कि कम खाने का निर्देश देती है। संक्षेप में ज्यों-ज्यों ध्यान प्रगाढ़ होता है साधक की स्वाद में रुचि समाप्त होती जाती है। ध्यान द्वारा मिलने वाली ऊर्जा बढ़ने के कारण उसका आहार भी बहुत न्यून हो जाता है।

दूसरी कसौटी  जान लीजिए – वाणी संयम। वाणी संयम का अर्थ प्रायः लोग मौन होना समझ लेते हैं। लेकिन ऐसा उसी तरह से नहीं है जिस तरह से आहार संयम का अर्थ उपवास करना नहीं है। इसका अर्थ इतना भर है कि ध्यान साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।

ध्यान की तीसरी कसौटी- जागरुकता है। जागरुकता का अर्थ है- बाह्य जागृति के साथ अन्तः जागृति एक साथ। ध्यान सध रहा है, तो जागरुकता भी अपने आप ही सध जाती है। ध्यान साधक की प्रगाढ़ता में साधक के अन्दर एक गहरी समझ पैदा होती है। वह बाह्य जीवन को भी अच्छी तरह से समझता है और आन्तरिक जीवन को भी। उसे अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का भली प्रकार बोध हो जाता है। वह जिन्दगी की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को यहाँ तक कि आसानी से नजर अन्दाज कर दी जाने वाली बातों को न केवल समझता है, बल्कि उनका समुचित उपयोग भी कर लेता है। उसे आन्तरिक एवं सूक्ष्म प्रकृति के संकेतों की भी बहुत गहरी समझ होती है। ध्यान की प्रगाढ़ता साधक में जिस क्रम में बढ़ती है, त्यों-त्यों वह मानवीय चेतना के सभी आयामों में जागरुक एवं सक्रिय हो जाता है।

 

ध्यान की चौथी कसौटी- दौर्मनस्य का समाप्त हो जाना है। सामान्य क्रम में देखा यही जाता है कि मन में एक के बाद एक नयी-नयी इच्छाएँ अंकुरित होती रहती हैं। इनमें से सभी का पूरी हो पाना प्रायः असम्भव होता है। इच्छा पूरी न होने की स्थिति में मनुष्य या तो स्थिति को उसका दोषी मानता है अथवा फिर किसी सम्बद्ध व्यक्ति को। और मन ही मन उससे बैर ठान लेता है। यही दौर्मनस्य की भावदशा है। ध्यान साधना करने वाले व्यक्ति के मन में इच्छाओं की बाढ़ नहीं आया करती है। उसके अन्तःकरण में निरन्तर जलने वाली ज्योति उसके सामने इस सत्य को प्रकाशित करती रहती है कि यहाँ अथवा किसी अन्य लोक में कुछ भी पाने योग्य नहीं है। इसके अलावा उसे इस महासत्य का हमेशा बोध होता है कि सृष्टि में सब कुछ भगवान् महाकाल की इच्छानुसार हो रहा है, फिर भला दोष किसका? जब दोष ही नहीं तब द्वेष क्यों? ये भावनाएँ उसे हमेशा दौर्मनस्य से बचाए रखती है।

ध्यान की पांचवीं कसौटी जान लीजिए – दुःख का अभाव। ध्यान साधक की चेतना में स्थिरता और नीरवता का इतना अभेद्य कवच चढ़ा रहता है कि उसे दुःख स्पर्श ही नहीं कर पाते। महर्षि पतंजलि ने दुःख को चित्त की चंचलता का परिणाम कहा है। जिसका चित्त जितना ज्यादा चंचल है, वह दुःखी भी उतना ही ज्यादा होता है। जहाँ चंचलता ही नहीं वहाँ दुःख कैसा? चंचल चित्त वाले व्यक्ति एक छोटी सी घटना से भी भारी दुःखी हो जाते हैं। किन्तु जिनका चित्त स्थिर है, उन्हें भारी से भारी दुःख भी विचलित नहीं कर पाते। श्रीमद्भगवद्गीता की भाषा में ‘न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।’

श्वास की संख्या का कम होना, ध्यान साधना की छठी कसौटी है। इस सत्य को हम सभी ने कई बार अनुभव किया होगा कि आवेग-आवेश में श्वास की संख्या बढ़ जाती है। इसी तरह शारीरिक असामान्यता में भी श्वास की गति बढ़ जाती है। ध्यान साधक की न केवल अन्तश्चेतना में स्थिरता और आवेग शून्यता आती है, बल्कि उसके शरीर में धातु साम्यता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में स्वभावतः श्वास की गति कम हो जाती है। कभी-कभी तो श्वास की गति बड़ी आश्चर्यजनक ढंग से कम हो जाती है। ध्यान सिद्धि की इस कसौटी पर कोई भी साधक स्वयं को परख सकता है।

इस क्रम में एक चमत्कारी स्थिति और उत्पन्न होती है। वह यह है कि ध्यान साधक के सामने स्वरोदय शास्त्र स्वयं ही प्रकट हो जाता है। अनुभवी जन जानते हैं कि स्वरोदय शास्त्र का समग्र विकास श्वास की गति के आधार पर हुआ है। जो श्वास की गति को समझ जाता है, वह ऐसी चमत्कारी भविष्यवाणियाँ कर देता है, जिसकी सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकते।  पर श्वास की गति का सूक्ष्म ज्ञान और इसका कम होना ध्यान सिद्धि की एक ऐसी कसौटी है- जिस पर स्वयं को साधक गण जाँच-परख कर सकते हैं।

ध्यान साधना की सातवीं और श्रेष्ठतम कसौटी है- संवेदनशीलता यानि कि भाव संवेदना का जागरण।जिसका ध्यान जितना प्रगाढ़ होगा उसमें भाव संवेदना भी उतनी ही सघन होगी। उसकी करुणा भी उतनी ही तीव्र होगी। करुणा जागी है तो जानना चाहिए कि ध्यान सध रहा है। यदि अपनी संवेदनशीलता में पहले की तुलना में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो समझना चाहिए कि अभी अपनी ध्यान की प्रगति भी शून्य है। ध्यान सध रहा है- तो परिवार के प्रति, पड़ोसी के प्रति, मिलने-जुलने वालों के प्रति व्यवहार अपने आप ही करुणापूर्ण हो जायेगा। स्वार्थ और अहं में भारी कमी और करुणा का निरन्तर विस्तार ध्यान सिद्धि की श्रेष्ठतम कसौटी है।

उपर्युक्त वर्णित इन सभी कसौटियों का एक ही मर्म है कि ध्यान- मानव चेतना के रूपांतरण का सबसे समर्थ प्रयोग है। ध्यान ठीक से हो रहा है, तो रूपांतरण भी होगा। यदि पाँच-दस साल ध्यान करने के बाद भी जीवन चेतना में रूपांतरण की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो समझना चाहिए कि हमने ध्यान किया ही नहीं। हमने केवल ध्यान के स्थान पर धर्म की रूढ़ि भर निभायी। जबकि ध्यान किसी भी तरह से रूढ़ि नहीं है। यह तो एक बहुत ही गहन वैज्ञानिक ऋषि प्रयोग है, जिसे ऊपर बतायी गयी सात कसौटियों के आधार पर कभी भी परखा जा सकता है। यदि आप ध्यान साधक हैं तो आज और अभी इस बात की जाँच कीजिए कि आप की ध्यान साधना सिद्धि के किस सोपान तक पहुँच सकी है। जाँच का यह क्रम एक नियमित अन्तराल में हमेशा बना रहे- इसकी सावधानी हममें से हर एक ध्यान साधक को रखनी चाहिए। इति शुभम् ।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध सम्पादक )

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