नवरात्रि का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

कु. कृतिका खत्री, सनातन संस्था, दिल्ली

नवरात्रि महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा का त्यौहार है। जिनकी स्तुति कुछ इस प्रकार की गई है,

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।

अर्थ : अर्थात सर्व मंगल वस्तुओं में मंगलरूप, कल्याणदायिनी, सर्व पुरुषार्थ साध्य करानेवाली, शरणागतों का रक्षण करनेवाली हे त्रिनयने, गौरी, नारायणी ! आपको मेरा नमस्कार है ।

‘नवरात्रि’ किसे कहते हैं ?

नव अर्थात प्रत्यक्षत: ईश्वरीय कार्य करनेवाला ब्रह्मांड में विद्यमान आदिशक्तिस्वरूप तत्त्व । स्थूल जगतकी दृष्टि से रात्रि का अर्थ है, प्रत्यक्ष तेजतत्त्वात्मक प्रकाश का अभाव तथा ब्रह्मांड की दृष्टि से रात्रि का अर्थ है, संपूर्ण ब्रह्मांड में ईश्वरीय तेज का प्रक्षेपण करनेवाले मूल पुरुषतत्त्व का अकार्यरत होने की कालावधि । जिस कालावधि में ब्रह्मांड में शिवतत्त्व की मात्रा एवं उस का कार्य घटता है एवं शिवतत्त्व के कार्यकारी स्वरूप की अर्थात शक्ति की मात्रा एवं उसका कार्य अधिक होता है, उस कालावधि को ‘नवरात्रि’ कहते हैं । मातृभाव एवं वात्सल्यभाव की अनुभूति देनेवाली, प्रीति एवं व्यापकता, इन गुणों के सर्वोच्च स्तर के दर्शन करानेवाली जगदोद्धारिणी, जगत का पालन करनेवाली इस शक्ति की उपासना, व्रत एवं उत्सव के रूप में की जाती है ।

नवरात्रि का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

‘जग में जब-जब तामसी, आसुरी एवं क्रूर लोग प्रबल होकर, सात्त्विक, उदारात्मक एवं धर्मनिष्ठ सज्जनों को छलते हैं, तब देवी धर्मसंस्थापना हेतु पुनः-पुनः अवतार धारण करती हैं । उनके निमित्त से यह व्रत है ।
नवरात्रि में देवीतत्त्व अन्य दिनों की तुलना में 1000 गुना अधिक कार्यरत होता है । देवीतत्त्व का अत्यधिक लाभ लेने के लिए नवरात्रि की कालावधि में ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ नामजप अधिकाधिक करना चाहिए ।
नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन बढते क्रम से आदिशक्ति का नया रूप सप्तपाताल से पृथ्वीपर आनेवाली कष्टदायक तरंगों का समूल उच्चाटन अर्थात समूल नाश करता है । नवरात्रि के नौ दिनों में ब्रह्मांड में अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित कष्टदायक तरंगें एवं आदिशक्ति की मारक चैतन्यमय तरंगों में युद्ध होता है । इस समय ब्रह्मांड का वातावरण तप्त होता है । श्री दुर्गादेवी के शस्त्रों के तेज की ज्वालासमान चमक अतिवेग से सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियोंपर आक्रमण करती है । पूरे वर्ष अर्थात इस नवरात्रि के नौवें दिन से अगले वर्ष की नवरात्रि के प्रथम दिनतक देवी का निर्गुण तारक तत्त्व कार्यरत रहता है । अनेक परिवारों में नवरात्रि का व्रत कुलाचार के रूप में किया जाता है । आश्विन की शुक्ल प्रतिपदा से इस व्रत का प्रारंभ होता है ।

कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न आपातकालीन स्थिति में नवरात्रोत्सव कैसे मनाना चाहिए ?

‘इस वर्ष 17 अक्टूबर से 24 अक्टूबर की अवधि में नवरात्रोत्सव मनाया जाएगा । कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि पर लागू की गई यातायात बंदी, साथ ही अन्य प्रतिबंधों के कारण कुछ स्थानों पर सामान्य की भांति नवरात्रोत्सव मनाने पर मर्यादाएं आनेवाली हैं । ऐसे समय में अनेक लोगों के मन में ‘नवरात्रोत्सव किस प्रकार मनाना चाहिए ?’, यह प्रश्न उठ रहा है । इस परिप्रेक्ष्य में हम यहां कुछ उपयुक्त सूत्र और उचित दृष्टिकोण दे रहे हैं –
(टीप : जहां नवरात्रोत्सव मनाने पर प्रतिबंध अथवा मर्यादाएं हैं, ये सूत्र इसी संदर्भ में हैं । जहां प्रशासन के सभी नियमों का पालन कर सामान्य की भांति उत्सव मनाना संभव है, ऐसे स्थानों पर सामान्य की भांति कुलाचार करें ।)

प्रश्न : नवरात्रोत्सव में देवी के मंदिर में जाकर गोद भरना संभव नहीं हो, तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर : नवरात्रोत्सव में देवी के मंदिर में जाकर देवी की गोद भरना संभव न हो, तो घर पर पूजाघर में स्थित कुलदेवी की ही गोद भरें । गोद के रूप में देवी को अर्पित साडी का उपयोग प्रसाद के रूप में किया जा सकता है ।

प्रश्न : अनाज, फूल अथवा पूजासामग्री की अनुपलब्धता के कारण, साथ ही मालाबंधन जैसे धार्मिक कृत्य करना संभव न हो, तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर : घटस्थापना हेतु उपयोग किए जानेवाले अनाज अथवा नवरात्रोत्सव में किए जानेवाले धार्मिक कृत्यों में प्रांतों के आधार पर भेद है । नवरात्रोत्सव तो कुलपरंपरा अथवा कुलाचार का भाग है । आपातकालीन मर्यादाआें के कारण घटस्थापना अथवा मालाबंधन जैसे धार्मिक कृत्य सामान्य की भांति करना संभव नहीं हों, तो उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर जितना करना संभव है, उतना करें । शेष सभी विधियां मन से (मानस उपचार) करें ।

प्रश्न : कुमारिकापूजन कैसे करना चाहिए ?
उत्तर : घर में कोई कुमारिका हो, तो उसका पूजन करें ! प्रतिबंधों के कारण कुमारिकाआें को घर बुलाकर पूजन करना संभव न हो, तो उसकी अपेक्षा अर्पण का सदुपयोग हो, ऐसे स्थानों पर अथवा धार्मिक कार्य करनेवाली संस्थाआें को कुछ धनराशि अर्पण करें ।
नवरात्रोत्सव की जानकारी सनातन के ग्रंथ ‘शक्ति’, ‘शक्ति की उपासना’ में दी गई है । ये ग्रंथ www.sanatanshop.com संकेतस्थल पर ‘ऑनलाइन’ बिक्री हेतु उपलब्ध हैं, साथ ही संकेतस्थल पर नवरात्रोत्सव के संबंध में जानकारी उपलब्ध है ।

दृष्टिकोण :

1. कर्मकांड की साधना के अनुसार आपातकाल के कारण किसी वर्ष कुलाचार के अनुसर कोई व्रत, उत्सव अथवा धार्मिक कृत्य पूरा करना संभव नहीं हुआ अथवा उस कर्म में कोई अभाव रहा, तो अगले वर्ष अथवा आनेवाले काल में जब संभव हो, तब यह व्रत, उत्सव अथवा धार्मिक कृत्य अधिक उत्साह के साथ करें ।

2. कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि पर आपातकाल का आरंभ हो चुका है । द्रष्टा संत एवं भविष्यवेत्ताआें के बताए अनुसार आगामी 2-3 वर्षों तक यह आपातकाल चलता ही रहेगा । इस काल में सामान्य की भांति सभी धार्मिक कृत्य करना संभव होगा ही, ऐसा नहीं है । ऐसे समय में कर्मकांड के स्थान पर अधिकाधिक नामस्मरण करें । कोई भी धार्मिक कृत्य, उत्सव अथवा व्रत का उद्देश्य भगवान का स्मरण कर स्वयं में सात्त्विकता को बढाना होता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं में सात्त्विकता बढाने हेतु काल के अनुसार साधना करने का प्रयास करना चाहिए । काल के अनुसार आवश्यक साधना के संर्भ में सनातन के आध्यात्मिक। ग्रंथों में विस्तृत जानकारी दी गई है, साथ ही वह सनातन संस्था के www.sanatan.org संकेतस्थल पर उपलब्ध है ।’

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