नाथसिद्ध अमृतनाथ जी महाराज

सिद्ध अमृतनाथ जी महाराज नाथपंन्थ में दीक्षित योग सिद्ध पुरुष थे उन्होने राजस्थान प्रदेश के बीकानेर, फतेहपुर, शेखावाटी क्षेत्र के जनमानस को नाथयोग से कृतार्थ किया था। 1700 विक्रमी सम्वत में माननाथीचंचलनाथजी ने झुंझुनू आश्रम बनाया था उनके शिष्य थे- मोतीनाथजी, क्षमानाथजी और गणेशनाथजी क्षमानाथजी ने लोहारू राज्य में बारावास गांव में आश्रम बनाया, क्षमानाथजी के शिष्य थे । चम्पानाथजी गणेशनाथजी ने बिसाऊ में आश्रम बनाया ।उनके कोई शिष्य नहीं था इसलिए चम्पा नाथजी महाराज उन्ही के आश्रम में रहते थे इनके शिष्य अवधूत अमृतनाथजी थे ।
अमृतनाथजी महाराज का उपदेश था :-
कम कमाओ,कम खावो,कम सोवो,कम व्यवहार करो । अधिक समय आत्मचिंतन करो चित्तवृत्तियों का निरोध ममता त्याग कर समता क्षमता को अपनाओ । राजस्थान में बिसाऊ नगर के निकट पिलानी गांव में एक किसान चेतनराम जाट के घर पुत्र रूप में चेत्र शुक्ला प्रतिपदा को सम्वत 1909 वी.में अमृतनाथ जी महाराज का जन्म हुआ । जन्म के समय गर्भ से बाहर होते समय पहले सिर बाहर न आकर पैर पहले आये । वे एक वर्ष के बालक की तरह हष्ट पुष्ट थे । मुख में दांत थे । मुस्करा रहे थे ज्योतिषियों ने इनका नाम यशराम रखा। यशराम ने जन्म से पांच दिन तक मा का दूध नहीं पिया। पांच दिन के बाद माता का दूध पिया।
यशराम जब तीन वर्ष के थे अन्य बालकों के साथ खेल रहे थे । दरवाजे पर एक साधु आया उसने कहा-
सुन तू बेटा जाट।
तेरे खुल गए ह्रदय के कपाट।
साधु तत्कासल अदृश्य हो गया। बालक का हृदय कपाट उसी समय खुल गया। उसका जीवन दिव्य और अलौकिक हो गया। चेतनराम ने अपने पूर्व गांव बऊ (सीकर) में बसने का मन बनाया। सामान आदि ऊंटों और गाड़ियों में लाद कर चल पड़े। यशराम अदृश्य योग सक्ती के सहारे पैदल ही तीन साल की अवस्था में सत्तर किलो मीटर दूर बऊ पहुंच गए। वे दैवीय पुरुष अथवा सिद्ध पुरुष माने जाने लगे। दूर दूर से लोग उनके दर्शन करने आने लगे। अमृतनाथ जी महाराज के जीवन में घटित अनेक असाधारण घटनाए उनकी अपार योग शक्ति का रहषयोद्घाटन करती है ।
उनकी एक बहिन न्योजाबाई तरुण अवस्था में विधवा हो गई थी। उस पर ऋण था। उसे अपने घर ले आये। उसके लिए धान की खेती की ,अनुमान था कि 9-10 मन धान होगा। पर उनकी योग शक्ति से 70 मन धान हुआ। इस प्रकार बहिन को ऋण मुक्त कर दिया। एक बार महाराज ने प्रतिज्ञा की कि वर्षा से खेत में पानी पूरा न भर जाएगा तो मैं शरीर त्याग दूंगा। उनकी योग शक्ति से रात में इतनी वर्षा हुई कि खेत ही नहीं सारे तालाब पोखर और जलाशय पानी से भर गए। सब को लाभ हो गया। अमृतनाथ जी महाराज को यह पता चला कि मेरा विवाह होने वाला है, तब उन्होंने कठिन प्रतिज्ञा की कि-मैं आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य वृत का पालन करूँगा। सम्बत 1945 वीं में माता का देहांत हो गया। अमृत नाथ जी ने घर का त्याग कर 37 वर्ष की आयु में वैराग्य ले लिया। उस समय के एक महान संत चम्पानाथ जी ने अमृतनाथ जी को अपना शिष्य बनाने का निश्चय किया। इस तरह 1945 विक्रमी के ग्रीष्म काल में यशराम को चम्पानाथ जी ने मंत्र दीक्षा दी और अमृतनाथ नाम प्रदान किया। 39 वर्ष की आयु में अमृतनाथ जी के करण छेदन-कर्म सम्पन्न किया…

अमृतनाथ जी महाराज भृमण काल में छः मास तक आधा किलो नीम की पत्तियां नित्य सेवन करते और कठोर मौन वृत रखते थे। 1947 विक्रम संवत में राजपुरा बीकानेर श्मशान में निवास किया।उस समय आप की सेवा में संतोषनाथ जी और हीरानाथ जी दो साधु तत्पर थे। महाराज ने सिंगीमोहरा और हिंगलू ( विषों ) का सेवन किया। कुछ दिनों बाद अर्क का आधा किलो दूध नित्य लेना आरम्भ किया यह देख लोग सन्न रह गए। अमृतनाथ जी राजस्थान मेँ लक्ष्मनगढ़, रामगढ़, फतेहपुर, नवलगढ़ आदि में भृमण कर लोगों को सत्संग से लाभान्वित करने लगे। वे बाजरे की दो रोटी और करील का साग खाकर चलते थे और 24 घण्टे में 156 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर लौट आते। यह यात्राक्रम छ मास तक चलता रहा। एक बार उन्होंने दो किलो संखिया खा लिया पर शरीर और मन पर कोई असर नहीं हुआ। महाराज से एक व्यक्ति मिलने आया, उसने कहा महाराज कोई चमत्कार दिखाओ। योगिराज ने उसे कहा-” साल आ गई छपन्न की। कर तयारी कफन की ” उस व्यक्ति के घर पहुंचते ही उसका देहावसान हो गया। एक बार फतेहपुर पुलिस थाने के सामने से महाराज जा रहे थे। थानादार ने उन्हें बिना पहचाने ही बेंत मार दी, अमृतनाथ जी ने कहा-शाबास। यह कहते ही थानेदार पांगल हो गया। लोग क्षमा मांगने आये तो कहा इसके दिमाग में गर्मी चढ़ गई है, इसे छाछ पिलाओ। छाछ पीते ही थानेदार ठीक हो गया। एक कोढ़ी को महाराज ने कहा नीम के पत्ते चबाओ। उसने नीम के पत्ते चबाए उसका कोढ़ ठीक हो गया। अमृतनाथजी बऊ गांव के निकट जंगल में एक टीले पर स्तिथ एक नीम के पेड़ के नीचे तप कर रहे थे। गांव के चौधरी ने पेड़ कटवा दिया तो महाराज ने कहा-नीम का नहीं साधू का सिर काटा गया।कुछ घण्टों के बाद ही चौधरी की मौत हो गई। एक बार फतेहपुर के निकट एक दिन एक वृक्ष के नीचे एक मोर मरा हुआ पड़ा देखा महाराज ने मोर को हाथ में उठाया और जोर से आसमान की ओर फेक दिया। वह पीको पीको करते हुए आसमान में उड़ा और एक पेड़ पर जा बैठा। एक बार एक अंधा व्यक्ति उनके पास आया और उसने कहा मुझे कुछ नहीं दिखता है । आप कृपा कर ज्योति प्रदान करें। महाराज ने कहा ठंडा पानी पीओ। उसने ठंडा पानी पिया तो आंखों में ज्योति आगई। महाराज छाछ के सेवन पर बड़ा जोर देते थे।उन्होने छाछ का सेवन करा कर अनेक रोगियों को स्वस्थ कर दिया।
एक बार छाछ को जमाकर दही बना दिया। एक बार भृमण के दौरान जंगल में एक कुए पर पानी पीने पहुंचे वहां एक व्यक्ति था उसको कहा पानी पिलाओ। उसने कहा पानी खारा है। घर चलिए मीठा पानी पिलाऊंगा। महाराज ने उसी कुएं का पानी पीकर कहा कि यह तो मीठा पानी है। कुए का पानी सदा के लिए मीठा हो गया। गांव वालों का संकट मिट गया। वे प्रकृति के बस में नहीं थे। वे प्रकृति के स्वामी थे। एक बार रामगढ़ के समीप भृमण करते हुए महाराज एक खेत में पहुंच गए। महाराज ने किसान से कुछ खाने को मांगा तो किसान ने गाजर के खेत की और इशारा किया। सबके देखते देखते महाराज ने तीन क्यारियों की गाजर खाली। माली ने क्षमा मांगी और कहा कि मैं आपकी महिमा को नहीं जान सका। एक बार सेवक नारायण गिरी को हिंगलाज माई के साक्षत दर्शन करवाये। संवत 1970 विक्रमी में सीकर नरेश माधव सिंह जी ने अमृत नाथजी की आज्ञा लेकर आश्रम के निकट 25 बीघा भूमि का पट्टा दिया। उसे महाराज ने स्वीकार किया। वह जगह नाथ जी की बनी के नाम से जानी जाती है…

अमृतनाथ जी महाराज ने 1970 विक्रमी में दस मास तक प्रतिमाह एक एक किलो शहद का सेवन किया था। दो मास तक प्रति दिन एक एक किलो नीबू का रस लेते थे। चार मास तक प्रति घण्टा एक एक किलो दूध लेते थे। महाराज का सम्पूर्ण जीवन चरित्र नाथ सम्प्रदाय के सिद्धांतों के सांचे में ढला हुआ था। वह सर्व व्यापक ,सर्वज्ञ, पूर्ण प्रकाश स्वरूप है। जगत उनका रूप है। माया उनकी छाया है। जीव उनका अभिन्न अंग है। महाराज अमृतनाथ जी असाधारण आत्म तत्वज्ञ थे। उंन्होने बताया कि – जो मनुष्य सूर्य देव में अपनी वृति एकाग्र करता है वह त्रिकालज्ञ होता है और तीनों लोकों का कौतुक देखता है । उनकी दृष्टि दिव्य हो जाती है। योगिराज अमृतनाथजी ने सुरती को ही कुण्डलनी कहा । कुंडलिनी का अर्थ है बहिर्मुखी वृतियां बहिर्मुखी वृतियों को अंतर्मुखी करना ही कुंडलिनी जागरण है…
इस जीवन के अंतिम समय में योगीराज अवधूत अमृतनाथ जी ने अपने वृहदहस्त के संकेत से शिष्य ज्योतिनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। सन 1973 विक्रमी को आशिवन पूर्णिमा को अमृतनाथजी ने शरीर त्याग दिया। सम्बत 1974विक्रमी में फतहपुर शेखावाटी में महाराज के भव्य समाधि मंदिर निर्माण हुआ। जो शास्वत जीवन का दिव्य भौम प्रतीक है। अमृतनाथजी महाराज जनमानस मे आज भी पूजनीय संकटहर्ता और अमर है…

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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