प्राचीन तंत्र साहित्य

आगम ग्रंथ में साधारणतया चार पाद होते है – ज्ञान, योग, चर्या और क्रिया। इन पादों में इस समय कोई-कोई पाद लुप्त हो गया है, ऐसा प्रतीत होता है और मूल आगम भी सर्वांश में पूर्णतया उपलब्ध नहीं होता, परंतु जितना भी उपलब्ध होता है वही अत्यंत विशाल है, इसमें संदेह नहीं।

प्राचीन आगमों का विभाग इस प्रकार हो सकता है:

शैवागम (संख्या में दस),
रूद्रागम (संख्या में अष्टादश)
ये अष्टाविंशति आगम (१० + ८ = १८) ‘सिद्धांत आगम’ के रूप में विख्यात हैं। ‘भैरव आगम’ संख्या में चौंसठ सभी मूलत: शैवागम हैं। इन ग्रंथों में शाक्त आगम आंशिक रूप में मिले हुए हैं। इनमें द्वैत भाव से लेकर परम अद्वैत भाव तक की चर्चा है।

शैवागम

किरणागम, में लिखा है कि, विश्वसृष्टि के अनंतर परमेश्वर ने सबसे पहले महाज्ञान का संचार करने के लिये दस शिवों का प्रकट करके उनमें से प्रत्येक को उनके अविभक्त महाज्ञान का एक एक अंश प्रदान किया। इस अविभक्त महाज्ञान को ही शैवागम कहा जाता है। वेद जैसे वास्तव में एक है और अखंड महाज्ञान स्वरूप है, परंतु विभक्त होकर तीन अथवा चार रूपों में प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मूल शिवागम भी वस्तुत: एक होने पर भी विभक्त होकर दस आगमों के रूप में प्रसिद्व हुआ है। इन समस्त आगमधाराओं में प्रत्येक की परंपरा है।

दस शिवों में पहले प्रणव शिव हैं। उन्होंने साक्षात् परमेंश्वर से जिस आगम को प्राप्त किया था उसका नाम ‘कामिक’ आगम है। प्रसिद्वि है कि उसकी श्लोकसंख्या एक परार्ध थी। प्रणव शिव से त्रिकाल को और त्रिकाल से हर को क्रमश: यह आगम प्राप्त हुआ। इस कामिक आगम का नामांतर है, कामज, त्रिलोक, की जयरथकृत टीका में कही नाम मिलता है।

द्वितीय शिवागम का नाम है – योग। इसकी श्लोक संख्या एक लक्ष है, ऐसी प्रसिद्वि है। इस आगम के पाँच अवांतर भेद हैं। पहले सुधा नामक शिव ने इसे प्राप्त किया था। उनसे इसका संचार भस्म में; फिर भस्म से प्रभु में हुआ।

तृतीय आगम चित्य है। इसका भी परिमाण एक लक्ष श्लोक था। इसके छ: अवांतर भेद हैं। इसे प्राप्त करनेवाले शिव का नाम है दीप्त। दीप्त से गोपति ने, फिर गोपति से अंबिका ने प्राप्त किया।

चौथा शिवागम कारण है। इसका परिमाण एक कोटि श्लोक हे। इसमें सात भेद हैं। इसे प्राप्त करनेवाले क्रमश: कारण, कारण से शर्व, शर्व से प्रजापति हैं।

पाँचवाँ आगम अजित है। इसका परिमाण एक लक्ष श्लोक है। इसके चार अवांतर भेद हें। इसे प्राप्त करनेवालों के नाम हैं सुशिव, सुशिव से उमेश, उमेश से अच्युत।

षष्ठ आगम का नाम सुदीप्तक (परिमाण में एक लक्ष एवं अवांतर भेद नौ) हैं। इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: ईश, ईश से त्रिमूर्ति, त्रिमूर्ति से हुताशन।

सप्तम आगम का नाम सूक्ष्म (परिमाण में एक पद्म) है। इसके कोई अवांतर भेद नहीं हैं। इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: सूक्ष्म, भव और प्रभंजन हैं।

अष्टम आगम का नाम सहस्र है। अवांतर भेद दस हैं। इसे प्राप्त करनेवालों में काल, भीम और खग हैं।

नवम आगम सुप्रभेद है। इसे पहले धनेश ने प्राप्त किया, धनेश से विघनेश और विघनेश से शशि ने।

दशम आगम अंशुमान है जिसके अबांतर भेद 12 हैं। इसे प्राप्त करनेवालों के नाम क्रमश: अंशु अब्र और रवि हैं।

दस अगमों की उपर्युक्त सूची किरणागम के आधार पर है। श्रीकंठी संहिता में दी गई सूची में सुप्रभेद का नाम नहीं है। उसके स्थान में कुकुट या मुकुटागम का उल्लेख है।

रूद्रागम

इन आगमों के नाम और प्रत्येक आगम के पहले और दूसरे श्रोता के नाम दिए जा रहे हैं:

  1. विजय (पहले श्रोता अनादि रूद्र, दूसरे स्रोता परमेश्वर),
  2. नि:श्वास (पहले श्रोता दशार्ण, दूसरे श्रोता शैलजा),
  3. पारमेश्वर (पहले श्रोता रूप, दूसरे श्रोता उशना:),
  4. प्रोद्गीत (पहले श्रोता शूली, दूसरे श्रोता कच),
  5. मुखबिंब (पहले श्रोता प्रशांत, दूसरे श्रोता दघीचि),
  6. सिद्ध (पहले बिंदु, दूसरे श्रोता चंडेश्वर),
  7. संतान (पहले श्रोता शिवलिंग, दूसरे श्रोता हंसवाहन),
  8. नारसिंह (पहले श्रोता सौम्य, दूसरे नृसिंह),
  9. चंद्रांशु या चंद्रहास (पहले श्रोता अनंत दूसरे श्रोता वृहस्पति),
  10. वीरभद्र (पहले श्रोता सर्वात्मा, दूसरे श्रोता वीरभद्र महागण),
  11. स्वायंभुव (पहले श्रोता निधन, दूसरे पद्यजा),
  12. विरक्त (पहले तेज, दूसरे प्रजापति),
  13. कौरव्य (पहले ब्राह्मणेश, दूसरे नंदिकेश्चर),
  14. मामुट या मुकुट (पहले शिवाख्य या ईशान, दूसरे महादेव ध्वजाश्रय),
  15. किरण (पहले देवपिता, दूसरे रूद्रभैरव),
  16. गलित (पहले आलय, दूसरे हुताशन),
  17. अग्नेय (पहले श्रोता व्योम शिव, दूसरे श्रोता ?)
  18. ?

श्रीकंठी संहिता में रूद्रागमों की जो सूची है उसमें रौरव, विमल, विसर और सौरभेद ये चार नाम अधिक हैं। और उसमें विरक्त, कौरव्य, माकुट एवं आग्नेय ये चार नाम नहीं है। कोई-कोई ऐसा अनुमान करते हैं कि ये कौरव्य ही रौरव हैं। बाकी तीन इनसे भिन्न हैं। अष्टादश अगम का नाम कहीं नहीं मिलता। इसमें किरण, पारमेश्वर और रौरव का नाम है।

नेपाल में आठवीं शताब्दी का गुप्त लिपि में लिखा हुआ नि:श्वास तंत्र संहिता नामक ग्रंथ है। इसमें लौकिक धर्म, मूल सूत्र, उत्तर सूत्र, नय सूत्र, गुह्य सूत्र ये पाँच विभाग हैं। लौकिक सूत्र प्राय: उपेक्षित हो गया है। बाकी चारों के भीतर उत्तरसूत्र कहा जाता है। इस उत्तर सूत्र में 18 प्राचीन शिव सूत्रों का नामोल्लेख है। ये सब नाम वास्तव में उसी नाम से प्रसिद्ध शिवागम के ही नाम हैं, यथा

नि:ष्श्वास ज्ञान

स्वायंभुव मुखबिंब

मुकुट या माकुट प्रोद्गीत

वातुल ललित

वीरभद्र सिद्ध

विरस (वीरेश?) संतान

रौरव सर्वोद्गीत

चंद्रहास किरण पारमेश्वर

इसमें 10 शिवतंत्रों के नाम है यथा – कार्मिक, योगज, दिव्य (अथवा चिंत्य), कारण, अजित, दीप्त सूक्ष्म, साहस्र अंशुमान और सुप्रभेद।

ब्रह्मयामल (लिपिकाल 1052 ई0) 39 अध्याय में ये नाम पाए जाते हैं – विजय, नि:श्वास, स्वायंभुव, बाबुल, वीरभद्र, रौरव, मुकुट, वीरेश, चंद्रज्ञान, प्रोद्गीत ललित, सिद्ध संतानक, सर्वोद्गीत, किरण और परमेश्वर (द्रष्टव्य हरप्रसाद शास्त्री द्वारा संपादित नेपाल दरबार का कैटलाग खंड 2, पृ0 60)। कामिक आगम में भी 18 तंत्रो का नामोल्लेख है।

हरप्रसाद शास्त्री ने अष्टादश आगम की प्रति नेपाल में देखी थी जिसका लिपिकाल 624 ई0 में था। बेंडल साहब का कथन है कि केंब्रिज यूनवर्सिटी लायब्रेरी में ‘परमेश्वरफ़ आगम’ नामक एक 895 ई0 की हाथ की लिखी पोथी है। डॉ॰ प्रबोधचंद्र बागची कहते हैं कि पूर्ववर्णित ‘नयोत्तर सूत्र’ का रचनाकाल छठीं से सातवीं ई0 हो सकता है। ‘ब्रह्मयामल’ के अनुसार नि:श्वास आदि तंत्र शिव के मध्य स्रोत से उद्भूत हुए थे और ऊर्ध्व वक्ष से निकले हैं। ब्रह्मयामल के मतानुसार नयोत्तर संमोह अथवा शिरश्छेद वामस्रोत से उद्भूत हैं। जयद्रथयामल में भी है कि शिरच्छेद से नयोत्तर और महासंमोहन – ये तीन तंत्र शिव के बाम स्रोत से उद्भूत हैं।

द्वैत और द्वैताद्वैत शैव आगम अति प्राचीन है, इसमें संदेह नहीं। परंतु जिस सरूप में वे मिलते हैं और मध्य युग में भी जिस प्रकार उनका वर्णन मिलता है, उससे ज्ञात होता है कि उसका यह रूप अति प्राचीन नहीं है। काल भेद से विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण ऐसा परिवर्तन हो गया है। फिर भी ऐसा माना जा सकता है कि मध्य युग में प्रचलित पंचरात्र आगम का अति प्राचीन रूप जैसा महाभारत शांति पर्व में दिखाई देता है उसी प्रकार शैवागम के विषय मे भी संभावित है। महाभारत के मोक्ष पर्व के अनुसार स्वयं श्रीकृष्ण ने द्वैत और द्वैताद्वैत शैवागम का अध्ययन उपमन्यु से किया था।

‘कामिक आगम’ में है कि सदाशिव के पंचमुखों में से पांचरात्र स्रोतों का संबंध है। इसीलिये कुल स्रोत 25 हैं। पाँच मुखों के पाँच स्रोतों के नाम हैं-

  1. लौकिक, 2. वैदिक 3. आध्यात्मिक, 4. अतिमार्ग, 5. मंत्र।

पाँच मुख इस प्रकार हैं-

1 सद्योजात, 2 बामदेव, 3 अघोर 4 तत्पुरूष, 5 ईशान।

‘सोम सिद्धांत’ के अनुसार लौकिक तंत्र पाँच प्रकार के हैं और वैदिक भी पाँच प्रकार के हैं।

इन सब तंत्रों में परस्पर उत्कर्ष या अपकर्ष का विचार पाया जाता है। तदनुसार ऊर्ध्वादि पांच दिशाओं के भेद के कारण तंत्रों के विषय में तारतम्य होता है। इसका तात्पर्य यह है कि ऊध्र्व दिशा से निकले हुए तंत्र सर्वश्रेष्ठ हैं। उसके बाद पूर्व, फिर उत्तर, पश्चिम, फिर दक्षिण। इस क्रम के अनुसार सिद्धांतविद् पंडित लोग कहा करते हैं कि सिद्धांतज्ञान मुक्तिप्रद होने के कारण सर्वश्रेष्ठ है। उसके अनंतर क्रमानुसार सर्पविष नाशक गरूड़ज्ञान, सर्ववशीकरण प्रतिपादक कामज्ञान, भूतों का निवारक फ़ भूततंत्रफ़ और शत्रुदमन के लिये उपयोगी फ़ भैरव तंत्र फ़ का स्थान जानना चाहिए।

इस प्रसंग में और भी एक बात जानना आवश्यक है कि वैदिक दृष्टि से जैसे स्थूलत: ज्ञान के दो प्रकार दिखाई देते हैं- प्रथम ‘बोध रूप’ और द्वितीय ‘शब्द रूप’। उसी प्रकार तंत्र साहित्य में भी ज्ञान के दो रूप पाए जाते हैं। यह कहना अनावश्यक है कि बोधात्मक ज्ञान शब्दात्मक ज्ञान से श्रेष्ठ है, इस बोध रूप ज्ञान के विभिन्न प्रकार हैं क्योंकि प्रतिपाद्य विषय के भेद के अनुसार ज्ञान का भेदाभेद होता है। जो ज्ञान शिव का प्रतिपादक है उससे पशु और माया का प्रतिपादक ज्ञान निकृष्ट है। इसी लिये शुद्ध मार्ग, अशुद्ध मार्ग, मिश्र मार्ग आदि भेदों से ज्ञान भेदों की कल्पना की गई है। शब्दात्मक ज्ञान को फ़ शास्त्र फ़ कहते हैं। इसमें भी परापर भेद हैं। सिद्धांतियों के मतानुसार वेदादिक ज्ञान से सिद्धांत ज्ञान विशुद्ध है, इसलिये श्रेष्ठ है परंतु सिद्धांत ज्ञान में भी परापर भेद हैं। इसी प्रकार दीक्षारूप ज्ञान के भी कई अवांतर भेद पाए जाते हैं- नैष्ठिक, भौतिक, निर्बीज, सबीज, लौकिक इत्यादि। इससे प्रतीत होता है कि मूल में ज्ञान एक होने पर भी प्रतिपाद्य विषय के कारण परापर भेद रूपों में प्रकट होता है।

‘स्वायंभुव आगम’ में कहा गया है-

तदेकमप्यनेकम्त्वं शिव वक्ताम्बु जोम्हवंल।

परापरेणा भेदेन गच्त्यर्थ प्रतिश्रयात्।

‘कामिक आगम’ में भी हैं कि परापर भेद से ज्ञान केअधिकारी भेद होते हैं। इसमें प्रतिपाय विषय के अनुसार मतिज्ञान परज्ञान और पशुज्ञान अथवा अपर ज्ञान हैं। शिव प्रकाशन ज्ञान श्रेष्ठ हैं। पशुपाशादि अर्थ प्रकाशन अपर ज्ञान हैं। इसी प्रकार विविध कल्पनाएँ हैं परंतु शिव और रूद्र दोनों सिद्धांत ज्ञाप हैं।

पाशुपत संप्रदाय के आचार्य अष्टादश रूद्रागमों का प्रामाणाश्य मानते थे, परंतु दश शिव ज्ञान का प्रामाणाय नहीं मानते थे। इसका कारणा यह है कि रूद्रागम में द्वैत दष्टि और अद्वत दष्टि का मिश्रण पाया जाता हैं। परंतु शिवागम में अद्वैत दृष्टि मानी जाती इसलिये आचार्य अभिनय गुप्त ने कहा है कि पाशुपत दर्शन सर्वथा हेय नहीं हैं। किसी किसी ग्रंथ में स्पष्ट रूप से दिखया गया है कि शिव के किन मुखों से किन आगमों का निर्गम हुआ हैं। उससे यह प्रतित होता हैं कि कामिक, योगज, चित्य, कारणा और अजित ये पाँच शिवागम शिव के सधोजात मुख से निर्गत हुए थे। दीत्प, सूक्ष्म, सहरूत्र, अंशुमत या अंशमान संप्रभेद ये पाँच शिवागम शिव के बामदेव नामक मुख से निर्गत हुए हैं। विजय, नि:श्वास, स्वाभुव, आग्नेय और वीर ये पाँच रूद्रागम शिव के अघोर मुख से निर्गत हुए थे। रौरव, मुकुट, विमल ज्ञान, चंद्रकांत और बिब, ये पाँच रूद्रागम शिव के ईशान मुख से निसृत हुए थे। प्रोद्गीत, ललित, सिद्ध, संतान, वातुल, किरणा, सर्वोच्च और परमेश्वर ये आठ रूद्रागम शिव के तत्पुरूष मुख से निर्गत हुए थे। इस प्रकार अष्टाविंशति आगम के 198 विभागों में आगमों की चर्चा दिखाई देती हैं।

– डॉ.दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध संपादक )

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