प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान - आधुनिक युग के लिए उपयुक्तता शोध पर महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय को प्रमाणपत्र

प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान – आधुनिक युग के लिए उपयुक्तता शोध पर महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय को प्रमाणपत्र

नर्ई देहली – ‘संस्कृत और प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान, जे.एन.यू’ और ‘इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र’, नई देहली के संयुक्त तत्त्वाधान में ‘भारत मंथन’ नामक राष्ट्रीय परिषद आयोजित की गई थी । यह परिषद 30 मार्च को जे.एन.यू के सभागृह में संपन्न हुई । इस परिषद में महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के श्री. संजीव कुमार ने‘प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान – आधुनिक युग के लिए उपयुक्तता’ इस विषय पर शोधनिबंध प्रस्तुत किया । उन्होंने प्रतिपादित किया कि सामान्य भारतीय व्यक्ति के पूर्वजों में जो सूक्ष्म जानने की क्षमता थी वह वर्तमान कलियुग में लुप्त हो गई है । रज-तम स्पंदनों के निरंतर प्रभाव के कारण व्यक्ति पर शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर अनिष्ट परिणाम होता है । यदि मानव सूक्ष्म स्पंदन पहचान पाता, तो जीवन की ओर देखने का उसका दृष्टिकोण अधिक सम्यक होता । नित्य साधना करने से मानव में सूक्ष्म स्पंदन जानने की क्षमता जागृत होती है । इससे वह आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक अच्छे निर्णंय ले पाता है । नियमित साधना करने से व्यक्ति की प्रकृति में परिवर्तन होता है तथा वह अधिक सात्त्विक बनता है । इसका लाभ समाज, वातावरण और संसार को होता है । इस शोधनिबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी तथा सहलेखक श्री. शॉन क्लार्क हैं ।
श्री. संजीव कुमार आगे बोले कि, प्राचीन काल से भारत ज्ञान की समृद्धि के लिए संसार में प्रसिद्ध है । यह समृद्धि केवल वेद, उपनिषद तक सीमित न होकर वैज्ञानिक विषयों में भी है, उदा. गुरुत्वाकर्षण, शून्य का सिद्धांत, प्रकाश की गति आदि सिद्धांतों का प्रतिपादन हजारों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषिमुनियों ने ही किया था । वैज्ञानिक ज्ञान और सिद्धांत के अतिरिक्त भारतीय धार्मिक ग्रंथों में कुंडलिनी और उसके चक्र आदि अनेक सूक्ष्म अवधारणाओं का भी तर्क दिखाई देता है । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय का शोध विभाग वर्तमान में ‘डी.डी.एफ.ए.ओ.’ (Computer-Aided Screening and Functional Diagnosis) और ‘GDV camera Bio-Well’ जैसे कुछ आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा मानव की सूक्ष्म प्रणालियों का शोध कर रहा है ।
धार्मिक विधियों में घी के दीपक के उपयोग का महत्त्व आधुनिक यंत्र द्वारा सिद्ध !
महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय ने मोमबत्ती और घी के दीपक मे संदर्भ में एक और शोध किया है । संसार भर में ‘पैराफिन वैक्स’ से बनी मोमबत्तियों का विविध धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में नियमित उपयोग किया जाता है । भारत में प्राचीन काल से विविध त्योहार और धार्मिक विधियों में घी के दीपक का उपयोग किया जाता है तथा उसके पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारण भी है । इस संदर्भ में महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय ने ‘जली हुई मोमबत्ती और ‘प्रज्वलित घी के दीपक’ से वातावरण में प्रक्षेपित होनेवाले सूक्ष्म स्पंदनों का अध्ययन किया । इस वैज्ञानिक प्रयोग के संबंध में श्री. संजीव कुमार ने विस्तृत जानकारी दी । वे बोले ‘‘इस प्रयोग के लिए ‘पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी (पिप)’ नामक ऊर्जा और आभामंडल मापक प्रणाली का उपयोग किया गया । इस प्रणाली द्वारा किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति से वातावरण में प्रक्षेपित होनेवाले सकारात्मक और नकारात्मक स्पंदन रंगों द्वारा दर्शाए जाते हैं । जलती हुई मोमबत्ती के ‘पिप’ छायाचित्र में बडी मात्रा में नकारात्मक स्पंदन थे । इसके विपरीत प्रज्वलित घी के दीपक के ‘पिप’ छायाचित्र में बडी मात्रा में सकारात्मक स्पंदन दिखाई दिए ।’’
‘‘इस प्रयोग से यद्यपि यह दिखाई दिया है, तब भी सूक्ष्म स्पंदनों का सत्य विश्‍लेषण केवल सूक्ष्म-परीक्षण द्वारा ही हो सकता है । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के आध्यात्मिक शोध गुट में सूक्ष्म-स्पंदन समझ सकने वाले व्यक्ति हैं । वे वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रक्षेपित होनेवाले सूक्ष्म स्पंदनों का अवलोकन कर सकते हैं । उनके द्वारा बनाए गए इन स्पंदनों के चित्र आध्यात्मिक क्ष-किरणों मे समान (X-ray) कार्य करते हैं । जलती हुई मोमबत्ती के सूक्ष्म चित्र में अधिक मात्रा में नकारात्मक स्पंदन तथा प्रज्वलित घी के दीपक से अधिक मात्रा में सकारात्मक स्पंदन दिखाई दिए । इसलिए भारतीय संस्कृति में मोमबत्ती को स्थान नहीं है; परंतु सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाले घी के दीपक का समर्थन किया है ।’’, ऐसा भी श्री. कुमार बोले ।
सुन्दर कुमार ( प्रधान सम्पादक )

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