प्राचीन समय में उन्नत था वर्तमान से आधुनिक विमान निर्माण

जन सामान्य में हमारे प्राचीन ऋषियों-मुनियों के सम्बन्ध में ऐसी धारणा जड़ जमाकर बैठी हुई है, कि वे जंगलों में रहते थे, जटाजूटधारी थे, कोपीन और वल्कल वस्त्र पहनते थे, झोपडिय़ों में रहते हुए दिन-रात ब्रह्म-चिन्तन में निमग्न रहते थे, सांसारिकता से उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं रहता था। इस एकांगी अवधारणा का एक बहुत बड़ा अनर्थकारी परिणाम यह है कि हम अपने महान पूर्वजों के जीवन के उस पक्ष को एकदम भुला बैठे, जो उनके महान वैज्ञानिक होने को न केवल उजागर करता है वरन सप्रमाण पुष्ट भी करता है।
भारद्वाज आंगिरस गोत्र में उत्पन्न एक वैदिक ऋषि हैं। ये गोत्र प्रवर्तक तथा वैवस्वत मन्वन्तर के सप्त ऋषियों (कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज) में से एक हैं। महर्षि भारद्वाज विलक्षण ज्ञान विज्ञान के जनक थे।

* विलक्षण विमानों का निर्माण –
महर्षि भारद्वाज एक महान आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री भी थे। वेदों में विमान संबंधी उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलते हैं। ऋषि देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेख ऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है। ऋषिओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उडऩे वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी शास्त्रों में पाया जाता है।
पुष्पक विमान – वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं। लगभग छह दशक पूर्व सुविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डॉ. वामनराव काटेकर ने अपने एक शोध-प्रबंध में पुष्पक विमान को अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित बतलाया था, जिसका आधार अगस्त्य संहिता की एक प्राचीन पाण्डुलिपि थी। अगस्त्य के अग्नियान ग्रंथ के भी सन्दर्भ अन्यत्र भी मिले हैं। इनमें विमान में प्रयुक्त विद्युत-ऊर्जा के लिए मित्रावरुण तेज का उल्लेख मिलता है। महर्षि भारद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत ज्ञान को विकसित किया, तब उसकी संज्ञा विद्युत, सौदामिनी, हलालिनी आदि वर्गीकृत नामों से की जाने लगी।

* पाण्डुलिपियों में खोज –
अन्तरराष्ट्रीय संस्कृत शोध मंडल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किए। फलस्वरूप जो ग्रंथ मिले, उनके आधार पर भारद्वाज का विमान-प्रकरण प्रकाश में आया।
महर्षि भारद्वाज रचित यंत्र-सर्वस्वं के विमान-प्रकरण की यती बोधायनकृत वृत्ति (व्याख्या) सहित पाण्डुलिपि मिली, उसमें प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चमत्कारिक तथ्य उद्घाटित हुए। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा इस विमान-प्रकरण का स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक की हिन्दी टीका सहित सुसम्पादित संस्करण वृहत विमान शास्त्र के नाम से 1958 ई. में प्रकाशित हुआ। यह दो अंशों में प्राप्त हुआ। कुछ अंश पहले बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में मिले, जिसे वैदिक शोध-छात्र प्रियरत्न आर्य ने विमान-शास्त्रं नाम से वेदानुसंधान सदन, हरिद्वार से प्रकाशित कराया। बाद में कुछ और महत्वपूर्ण अंश मैसूर राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में प्राप्त हुए। इस ग्रंथ के प्रकाशन से भारत के प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्यों का पता चला।
महर्षि भारद्वाज प्रणीत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ तत्कालीन प्रचलित सूत्र शैली में लिखा गया है। इसके वृत्तिकार यती बोधायन ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि- महर्षि भारद्वाज ने वेदरूपी समुद्र का निर्मन्थन कर सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद यंत्रसर्वस्व ग्रंथरूप नवनीत (मक्खन) को निकालकर दिया।’यंत्रसर्वस्व में लिखा है विमान बनाने और उड़ाने की कला स्पष्ट है कि ‘यन्त्रसर्वस्व ग्रंथ और उसके अन्तर्गत वैमानिक-प्रकरण की रचना वेदमंत्रों के आधार पर ही की गई है। विमान की तत्कालीन प्रचलित परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए भारद्वाज ने बतलाया है कि वेगसाम्याद् विमानोण्डजजानामितिं अर्थात् आकाश में पक्षियों के वेग सी जिसकी क्षमता हो, वह विमान कहा गया है। वैमानिक प्रकरण में आठ अध्याय हैं, जो एक सौ अधिकरणों में विभक्तऔर पांच सौ सूत्रों में निबद्ध हैं। इस प्रकरण में बतलाया गया है कि विमान के रहस्यों का ज्ञाता ही उसे चलाने का अधिकारी है। इन रहस्यों की संख्या बत्तीस है। यथा-विमान बनाना, उसे आकाश में ले जाना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना, वेग को कम या अधिक करना, लंघन (लांघना), सर्पगमन, चपल परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण, शब्दप्रसारण, दिक्प्रदर्शन इत्यादि। ये तो हुए विमानों के सामान्य रहस्य हैं। विभिन्न प्रकार के विमानों में चालकों को उनके विशिष्ट रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता था। रहस्य लहरी नामक ग्रंथ में विमानों के इन रहस्यों का विस्तृत वर्णन है।

* तीन प्रकार के विमान –
वैमानिक प्रकरणं के अनुसार विमान मुख्यत: तीन प्रकार के होते थे-
1. मान्त्रिक (मंत्रचालित दिव्य विमान), 2. तांत्रिक-औषधियों तथा शक्तिमय वस्तुओं से संचालित तथा 3. कृतक-यन्त्रों द्वारा संचालित।

* 56 प्रकार के विमानों की गणना –
पुष्पक मांत्रिक विमान था। यह विमान मंत्रों के आधार पर चलता था। कह सकते हैं कि यह रिमोट पद्धति से चलता था। मांत्रिक विमानों का प्रयोग त्रेता युग तक रहा और तांत्रिक विमानों का द्वापर तक। इस श्रेणी में छप्पन प्रकार के विमानों की गणना की गई है। तृतीय श्रेणी कृतक के विमान कलियुग में प्रचलित रहे। ये विमान पच्चीस प्रकार के गिनाए गए हैं। इनमें शकुन अर्थात पक्षी के आकार का पंख-पूंछ सहित, सुन्दर अर्थात धुएं के आधार पर चलने वाला-यथा आज का जेट विमान,रुक्म अर्थात खनिज पदार्थों के योग से सोने जैसी आभायुक्त लोहे से बना विमान, त्रिपुर अर्थात् जल, स्थल और आकाश तीनों में चलने, उडऩे में समर्थ विमान आदि का उल्लेख मिलता है। इन विमानों की गति अत्याधुनिक विमानों की गति से कहीं अधिक होती थी। विमानों और उनमें प्रयुक्त होने वाले यंत्रों को बनाने के काम में लाया जाने वाला लोहा भी कई प्रकार को होता था।

* विचित्र विमान का निर्माण –
भारद्वाज ने जिन विमानों तथा यंत्रों का उल्लेख अपने यंत्र-सर्वस्वं ग्रंथ में किया है, उनमें से अनेक तो ऐसे हैं, जिन्हें आज के समुन्नत वैज्ञानिक युग में भी नहीं बनाया जा सका है। शकुन, सुन्दर और रुक्म के अतिरिक्त एक ऐसे भी विमान का वर्णन उक्त ग्रंथ में है, जिसे न तो खंडित किया जा सके, न जलाया जा सके और न ही काटा जा सके। ऐसे विमानों का उल्लेख भी है, जिनमें यात्रा करने पर मनुष्य का शरीर जरा भी न हिले, शत्रु के विमान की सभी बातें सुनी जा सकें और यह भी ज्ञात किया जा सके कि शत्रु-विमान कहां तक कितने समय में पहुंचेगा। विमान को हवा में स्थिर रखने (जैसे हेलीकॉप्टर) और कार की तरह बिना मुड़े ही पीछे जाने का उल्लेख है। हमने हवा में स्थिर रह सकने वाला हेलीकॉटर तो बना लिया गया है, परन्तु कार की तरह बिना मुड़े पीछे की ओर गति कर सकने वाला विमान अभी तक नहीं बनाया जा सका है।

* आठ प्रकार के विमान –
महर्षि भारद्वाजकृत यंत्र-सर्वस्व ग्रंथ के अतिरिक्त उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक अंशुबोधिनीं में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं। इसमें प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है। महर्षि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए यती बोधायन ने आठ प्रकार के विमान बतलाए हैं-
1. शक्तियुद्गम – बिजली से चलने वाला। 2. भूतवाह – अग्नि, जल और वायु से चलने वाला। 3. धूमयान – गैस से चलने वाला। 4. शिखोद्गम – तेल से चलने वाला। 5. अंशुवाह – सूर्यरश्मियों से चलने वाला। 6. तारामुख – चुम्बक से चलने वाला। 7. मणिवाह – चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला। 8. मरुत्सखा – केवल वायु से चलने वाला।

* पहले विमान निर्माता नहीं हैं राइट ब्रदर्स –
महर्षि भारद्वाज द्वारा वर्णित विमानों में से एक मरुत्सखा विमान का निर्माण 1895 ई. में मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान वैदिक विद्वान थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की विदुषी थीं) की सहायता से विमान का एक मॉडल (नमूना) तैयार किया। फिर प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित विवरणों के आधार पर एक मरुत्सखा प्रकार के विमान का निर्माण किया। यह विमान एक चालक रहित विमान था। इसकी उड़ान का प्रदर्शन तलपड़े ने मुंबई चौपाटी पर तत्कालीन बड़ौदा नरेश सर सयाजी राव गायकवाड़ और बम्बई के प्रमुख नागरिक लालजी नारायण के सामने किया था। विमान 1500 फुट की ऊंचाई तक उड़ा और फिर अपने आप नीचे उतर आया। महादेव गोविन्द रानडे को भी दिखलाया था।
राइट ब्रदर्स के काफी पहले वायुयान निर्माण कर उसे उड़ाकर दिखा देने वाले तलपड़े महोदय को आधुनिक विश्व का प्रथम विमान निर्माता होने की मान्यता देश के स्वाधीन हो जाने के इतने वर्षों बाद भी नहीं दिलाई जा सकी, यह निश्चय ही अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे भी कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पाठ्य-पुस्तकों में शिवकर बापूजी तलपड़े के बजाय राइट ब्रदर्स (राइट बन्धुओं) को ही अब भी प्रथम विमान निर्माता होने का श्रेय दिया जा रहा है, जो नितान्त असत्य है।

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