बालक कि प्रथम गुरू माँ हि क्यों ?

“” माँ”” को प्रथम गुरू का दर्जा दिया गया है । हम सब कि प्रथम गुरू जन्मदात्री माँ ही है । लेकिन क्यों ? क्यों दिया गया है माँ को प्रथम गुरू का स्थान ।

मैं आपको बताता हुँ कि माँ को प्रथम गुरू का दर्जा किसलिये प्राप्त है । जिस से हमें कुछ भी सीखने को मिले वो हमारे गुरू समान ही होता है ।  जन्म होने पर शिशु को पिता,दादा-दादी, चाचा,चाची आदि सभी सगे सम्बन्धी कुछ ना कुछ सिखाते है । कोइ प्यार से राधे-राधे बोलना सिखाता है । कोइ प्रणाम करना सिखाता है । सभी अपनी अपनी इच्छा के अनुसार कुछ ना कुछ सिखाते है । लेकिन “” माँ”” कि शिक्षा तो तब ही शुरू होजाती है जब जीव माँ के गर्भ में आजाता है ।
एक माँ अपनी संतान को अभिनेता, क्रिकेटर, संत, ज्ञानी, चोर, आतंकवादी कुछ भी बना सकती है,
लेकिन केसे ? माँ के विचारों का पूरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पडता है । जेसे माँ के विचार होंगे वेसे ही शिशु के संस्कार बनेंगे, हालांकि जीव अपने साथ पहले से भाग्य ओर पूर्व जन्मार्जित संस्कार लेकर गर्भ में आता है, लेकिन एक माँ अपनी तरफ से जीव को कुछ नया दे सकती है । गर्भावस्था के दोरान माँ यदि भगवान कि भक्ति करे, मन्दिर जाये, सत्संग सुने, धार्मिक ग्रन्थ पढे तो होने वाली संतान में यह गुण 100% देखने को मिलेंगे । गर्भावस्था के दोरान माँ यदि लडाई- मारपीट, आतंकवाद कि फिल्में देखे, मन में बुरे विचार रखे । व्यर्थ में झगडा करे । तो यह 100% तय है कि गर्भ से बुरी संतान जन्म लेगी । माँ जेसे अपने विचार रखेगी,जेसा आचरण करेगी, वेसी ही संतान जन्म लेकर आयेगी । इतिहास में एसे कई उदाहरण है जिनमें गर्भ में माँ के विचारो का पूरा प्रभाव शिशु पर पडा ओर आगे चलकर वेसे ही बने । अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदन कि शिक्षा गर्भ में ही प्राप्त कर ली थी ।
हिरण्यकश्यप कि पत्नी कयादु चोरी छिपे विष्णु भगवान कि भक्ति किया करती थी । फलस्वरूप भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ । ऐसा ही  एक प्रसंग वीर शिवाजी के सन्दर्भ में भी आता है । गर्भावस्था के दोरान शिवाजी कि माँ रामचरित मानस का पाठ कर रही थी, तभी अचानक एक सन्यासी भिक्षा माँगने आया, उन्होने खडे होकर भिक्षा सन्यासी को दे दी,सन्यासी ने उन्हे गर्भवती देखकर पूछा, माई तु केसी संतान चाहती है ।
उन्होने कहा, महाराज मुझे एसा पुत्र चाहिये जो शत्रुओं के लिये काल हो, वीर हो, धर्म का रक्षक हो ।
सन्यासी बोला:– माई तु रामचरित मानस के “” लंका काण्ड”” का पाठ प्रतिदिन कर । तुझे एसा ही पुत्र प्राप्त होगा ।

लंका काण्ड में अधर्म पर धर्म कि विजय का वर्णन है, भगवान राम ओर रावण के भीषण युद्ध का वर्णन है । फल स्वरूप उन्हे वीर शिवाजी प्राप्त हुये, जिनका नाम आज भी गर्व से लिया जाता है । इसी कारण से माँ को बालक कि प्रथम गुरू कहा गया है ।
एक माँ अपने बच्चे को जेसा बनाना चाहे,गर्भ में ही बना सकती है । यह शक्ति केवल मात्र माँ को प्राप्त है ।

पण्डित भारत भूषण शर्मा

 

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