बुद्धों के काल और कार्य

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-

१. बुद्ध का अर्थ और सूची -मनुष्य के विकास के भी ४ स्तर हैं जिसकी पूर्णता को बुद्ध कहा गया है-
(१) श्रावक-सामान्य मनुष्य जो अपनी उन्नति की इच्छा रखता है।
(२) बोधिसत्व-विकास की उच्च स्थिति।
(३) प्रत्येक बुद्ध-विकसित स्तर, मनुष्य रूप में बुद्ध।
(४) सम्यक् बुद्ध-क्षण मात्र के लिये ज्ञान की उच्चतम अवस्था।
बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार भी सम्यक् बुद्ध उच्चतम स्थिति होने के कारण एक ही हो सकता है। प्रत्येक बुद्ध मनुष्य रूप में दीखता है। ७ लोक, २४ प्रकृति या बुद्धि के २८ अशक्ति के अनुसार ७, २४, या २८ मनुष्य बुद्ध हैं।
स्तूप (थूप) वंश के अनुसार २८ बुद्धों के नाम हैं- (१) तनहंकर, (२) मेधांकर, (३) शरणंकर, (४) दीपंकर, (५) कोण्डन्ना, (६) मंगल, (७) सुमना, (८) रेवत, (९) शोभित, (१०) अनोमदर्शी, (११) पद्म, (१२) नारद, (१३) पद्मोत्तर, (१४) सुमेधा, (१५) सुजाता, (१६) प्रियदर्शी, (१७) अन्तः दर्शी, (१८) धर्मदर्शी, (१९) सिद्धार्थ, (२०) तिष्य, (२१) पुष्य, (२२) विपश्यी, (२३) शिखी, (२४) विश्वभू, (२५) क्रकुच्छन्द, (२६) कनकमुनि, (२७) कश्यप, (२८) गौतम, (२९) मैत्रेय(भविष्य में)।
बोधिसत्त्व-यह बुद्धत्व प्राप्ति के निकट पूर्व की अवस्था है। चीनी, जापानी तथा तिब्बती ग्रन्थों क्के आधार पर इनकी सूची है-
(१) आकाशगर्भ-आनन्द रूप जो सभी की सहायता करते हैं।
(२) अवलोकितेश्वर-कृपामूर्ति, महायान मार्ग के मुख्य बोधिसत्त्व।
(३) क्षितिगर्भ-नारकीय जीवों के लिये, दृढप्रतिज्ञ।
(४) महास्थानप्राप्त-बौद्धिक शक्ति, अमिताभ की बाईं तरफ स्थान।
(५) मैत्रेय-गौतम बुद्ध के बाद करुणामूर्ति के रूप में जन्म।
(६) मञ्जुश्री-प्रज्ञा तथा बुद्धि रूप में।
(७) नागार्जुन-महायान मार्ग की माध्यमक शाखा के संस्थापक।
(८) वज्रपाणि-बुद्ध के अंगरक्षक।
(९) पद्मसम्भव-तिब्बत के रिनपोछे।
(१०) समन्तभद्र-सभी बौद्धों की साधना तथा ध्यान रूप।
(११) संघाराम-बौद्ध मठों के रक्षक।
(१२) शान्तिदेव-बौद्ध विद्वान् जिन्होंने बोधिसत्वों के विषय में लिखा।
(१३) सितातपत्र-श्वेत वस्त्रधारी, अदृश्य विपत्तियों से रक्षा करने वाले।
(१४) स्कन्द-धर्मरक्षक, वज्रपाणि (इन्द्र) के सहायक।
(१५) सुपुष्पचन्द्र-शान्तिदेव की पुस्तक में लिखित।
(१६) सूर्यवैरोचन-भैषज्य गुरु बुद्ध के २ सहायकों में एक।
(१७) तारा-अवलोकितेश्वर का नारी रूप, तिब्बत में कार्यसिद्धि की देवी, चिकित्सा की देवी।
(१८) वज्रपाणि-महायान के प्राचीन बोधिसत्व।
(१९) वसुधर-सम्पत्ति तथा उत्पादन कारक, नेपाल में प्रचलित।
कालक्रम से मुख्य बुद्ध हैं-
(१) कश्यप-यह देवों तथा दैत्यों दोनों के गुरु थे तथा इनको ब्रह्मा भी कहा गया है। इनके काल के बाद १० युगों= ३६०० वर्ष तक दैत्यों का प्रभुत्व रहा जिसके बाद वैवस्वत मनु का काल(१३९०२ ईसा पूर्व) आरम्भ हुआ। अतः इनका काल १७,५०२ ईसा पूर्व है।
सख्यमासीत्परं तेषां देवनामसुरैः सह । युगाख्या दश सम्पूर्णा ह्यासीदव्याहतं जगत्॥६९॥
दैत्य संस्थमिदं सर्वमासीद्दश युगं किल ॥९२॥ अशपत्तु ततः शुक्रो राष्ट्रं दश युगं पुनः ॥९३॥ -ब्रह्माण्ड पुराण (२/३/७२)
इनके समय पुनर्वसु नक्षत्र से वर्ष आरम्भ होता था जिसका देवता अदिति (कश्यप पत्नी है)-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्ति पाठ, ऋक्, १/८९/१०)।
कैस्पियन सागर (झील) का नाम कश्यप जैसा होने से इसके निकट कुछ लोग कश्यप का स्थान मानते हैं। नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर ही पूर्व काल में कश्यप सागर था। फाहियान ने इनका स्थान श्रावस्ती के निकट लिखा है, जो उस समय ज्ञात रहा होगा। इनकी शिक्षा का वर्णन महाभारत, शान्ति पर्व अध्याय १२४ के प्रह्लाद-इन्द्र संवाद में है। कश्यप को आयुर्वेद का भी आचार्य कहा गया है, जिनके नाम पर गद-तन्त्र (विष विज्ञान) है।
चीन में इनको फान या मञ्जुश्री बुद्ध कहते हैं, जिन्होंने हर वस्तु का नाम या चिह्न दिया। यह चीनी लिपि है, जिसमें हर शब्द के लिए अलग अलग चिह्न हैं। वेद में इनको बृहस्पति कहा गया है, जिनको ब्रह्मा ने लिपि बनाने के अधिकृत किया। उनसे इन्द्र ने व्याकरण सीखा।
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत् नामधेयं दधानाः।
यदेषां श्रेष्ठं यदरि प्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः॥ (ऋक् १०/७१/१)
बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यवर्ष सहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच। (पतञ्जलि-व्याकरण महाभाष्य १/१/१)
(२) अमिताभ बुद्ध-यह चीन में थे। इनको भारत में काक-भुशुण्डि कहा गया है। योगवासिष्ठ, निर्वाण खण्ड, भाग १, अध्याय १४-१७ में इनका स्थान मेरु पर्वत(पामीर) के उत्तर पूर्व कहा गया है। इनसे शिक्षा लेने गरुड़ गये थे जिनका भवन इण्डोनेसिया में था (रामायण, किष्किन्धा काण्ड, ४०/३९, में यवद्वीप सहित सप्तद्वीप)।
(३) सुमेधा बुद्ध-यह दुर्गा सप्तशती के सुमेधा ऋषि हैं। रामायण बालकाण्ड के अनुसार धनुष यज्ञ के बाद परशुराम ने शार्ङ्ग धनुष राम को दे दिया तथा उसके बाद वे तपस्या के लिये महेन्द्र पर्वत पर गये। ओडिशा के राजाओं को महेन्द्र राज कहा जाता था तथा यहां का सबसे ऊंचा पर्वत महेन्द्र गिरि (कन्धमाल जिला) है। यहां सुमेधा ने परशुराम को दीक्षा तथा उपदेश दिया था जिसका विस्तृत वर्णन त्रिपुरा रहस्य है जिसके २ विशाल खण्ड ज्ञान तथा माहात्म्य प्रायः ४००० पृष्ठों में उपलब्ध हैं। परशुराम के निधन पर ६१७७ ईसा पूर्व में कलम्ब (कोल्लम्) सम्वत् आरम्भ हुआ, जो केरल में अभी भी चल रहा है। सुमेधा ने शक्ति के रूपों की १० महाविद्या के रूप में व्याख्या की, जिनको बौद्ध ग्रन्थों में १० प्रज्ञा-पारमिता कहा गया है। महाविद्या या प्रज्ञा-पारमिता-दोनों का अर्थ है विद्या की सीमा। इनका स्थान आज भी बौध कहा जाता है(एक जिला)।
(४) दीपंकर बुद्ध-इन्होंने राजा सुचन्द्र को वज्र-योग का उपदेश दिया था। यह मार्ग वज्रयान कहा जाता है जिसमें उच्च कोटि की योग साधना की जाती है। इनके बुद्ध-तन्त्र का प्रचार हेवज्र ने किया तथा उस परम्परा में पद्म (सरोरुह) , वज्र, आनन्द-वज्र, अनङ्ग-वज्र हुये। अनङ्ग-वज्र का शिष्य ओडिशा का राजा इन्द्रभूति था जिसकी बहन लक्ष्मीङ्करा ने उनकी शिक्षा को गीतों के रूप में प्रचलित किया जिनको बंगाल में बाउल गीत कहा जाता है। इन्द्रभूति के पुत्र पद्मसम्भव ने तिब्बत में लामा परम्परा का आरम्भ किया। जो अ से ल तक(संस्कृत में अलम्) का ज्ञान रखता है, उसे लामा कहते हैं। लामा लोगों का प्रधान दलई-लामा है। दलई या दलवाइ ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्णाटक में प्रचलित है।
(५) शाक्यसिंह बुद्ध-यह महाभारत काल में नेपाल के किरात राजा जितेदस्ती के काल में गये थे(कोटा वेङ्कटाचलम की नेपाल वंशावली)। यह राजा महाभारत युद्ध में मारा गया था। इसके पिता हुमति के काल में पाण्डव अर्जुन नेपाल गये थे जिनके साथ किरात युद्ध तथा बाद में मित्रता की कहानी महाभारत, वन पर्व के कैरात पर्व, अध्याय ३८-४४ में वर्णित है तथा इस पर दण्डी का किरातार्जुनीयम् महाकाव्य है। सिद्धार्थ को भी शाक्यमुनि इसलिये कहते थे क्योंकि उनका वंश साल (शक = सखुआ) वन के क्षेत्र में राज्य करता था। शाक्यसिंह भी इसी या निकटवर्त्ती अन्य शाक्यवंश के होंगे। इनकी शिक्षा महाभारत, शान्ति पर्व अध्याय ३०७-३०८ में है।
(६) सिद्धार्थ बुद्ध-महाभारत युद्ध में मारे गये सूर्यवंशी राजा बृहद्बल की २४ पीढ़ी बाद सिद्धार्थ का जन्म शुद्धोदन के पुत्र के रूप में हुआ। इनका उल्लेख सभी पुराणों में है। इनके जन्म की सभी मुख्य घटनायें वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा) को हुयीं-
जन्म ३१-३-१८८६ ईसा पूर्व, शुक्रवार, वैशाख शुक्ल १५ (पूर्णिमा), ५९-२४ घटी तक। कपिलवस्तु के लिये प्रस्थान २९-५-१८५९ ईसा पूर्व, रविवार, आषाढ़ शुक्ल १५। बुद्धत्व प्राप्ति ३-४-१८५१ ईसा पूर्व, वैशाख पूर्णिमा सूर्योदय से ११ घटी पूर्व तक। शुद्धोदन का देहान्त २५-६-१८४८ ईसा पूर्व, शनिवार, श्रावण पूर्णिमा। बुद्ध निर्वाण २७-३-१८०७ ईसा पूर्व, मंगलवार, वैशाख पूर्णिमा, सूर्योदय से कुछ पूर्व। इनकी जन्म कुण्डली-लग्न ३-१अंश-२’, सूर्य ०-४ अं-५४’, चन्द्र ६-२८अं-६’, मंगल ११-२८अं-२४’, बुध ११-१०अं-३०’, गुरु ५-८अं-१२’, शुक्र ०-२३अं-२४’, शनि १-१६अं-४८’, राहु २-१५अं-३८’, केतु ८-१५अं-३८’। ये सभी तिथि-नक्षत्र-वार बुद्ध की जीवनी से हैं।
(७) मैत्रेय बुद्ध-फाहियान के अनुसार यह बुद्ध निर्वाण के १५० वर्ष बाद (१६५७ ई.पू.) में धान्यकटक में हुए थे। यह प्राचीन सातवाहन राज्य की राजधानी थी, जिसके अवशेष आन्ध्र प्रदेश के गुण्टूर जिले के अमरावती मण्डल में है। अभी इसे आन्ध्र राजधानी क्षेत्र में रखा गया है। ओड़िशा में भी कटक को धान्य कटक कहते थे जिसके निकट धानमण्डल, साले (शालि) पुर, चाउलियागंज आदि हैं। दोनों क्षेत्र प्राचीन कलिंग में थे तथा धान उत्पादन के केन्द्र थे।
(८) लोकधातु बुद्ध-राजतरंगिणी के अनुसार यह गोनन्द वंश के ४८ वें राजा अशोक (१४४८-१४०० ईसा पूर्व) के समय थे। इनके द्वारा बौद्ध मत के प्रचार के कारण मध्य एसिआ बौद्ध घुस गये तथा उन्होंने कश्मीर का राज्य नष्ट कर दिया। राजतरंगिणी के इस श्लोक (१/१०१-१०२) के आधार पर मद्रास के अभिलेख अधिकारी हुल्ज ने कहानी गढ़ी कि मौर्य अशोक (कश्मीर अशोक नहीं) के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कारण राज्य नष्ट हो गया। ५१वें गोनन्द राजा कनिष्क (१२६४-१२३४ ईसा पूर्व) के काल में भी एक लोकधातु बुद्ध थे।
(९) गौतम बुद्ध-सामान्यतः ४८३ ईसा पूर्व में जिस बुद्ध का निर्वाण कहा जाता है, वह यही बुद्ध हैं जिनका काल कलि की २७ वीं शताब्दी (५०० ईसा पूर्व से आरम्भ) है। इन्होंने गौतम के न्याय दर्शन के तर्क द्वारा अन्य मतों का खण्डन किया तथा वैदिक मार्ग के उन्मूलन के लिये तीर्थों में यन्त्र स्थापित किये। गौतम मार्ग के कारण इनको गौतम बुद्ध कहा गया, जो इनका मूल नाम भी हो सकता है। स्वयं सिद्धार्थ बुद्ध ने कहा था कि उनका मार्ग १००० वर्षों तक चलेगा पर मठों में स्त्रियों के प्रवेश के बाद कहा कि यह ५०० वर्षों तक ही चलेगा। आज की धार्मिक संस्थाओं जैसा भ्रष्टाचार उनकी नजर में था। गौतम बुद्ध के काल में मुख्य धारा से द्वेष के कारण तथा सिद्धार्थ द्वारा दृष्ट दुराचारों के कारण इसका प्रचार शंकराचार्य(५०९-४७६ ईसा पूर्व) में कम हो गया। चीन में भी इसी काल में कन्फ्युशस तथा लाओत्से ने सुधार किये।
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व ४, अध्याय २१-
सप्तविंशच्छते भूमौ कलौ सम्वत्सरे गते॥२९॥ शाक्यसिंह गुरुर्गेयो बहु माया प्रवर्तकः॥३०॥
स नाम्ना गौतमाचार्यो दैत्य पक्षविवर्धकः। सर्वतीर्थेषु तेनैव यन्त्राणि स्थापितानि वै॥ ३१॥
(१०) मैत्रेय बुद्ध-एक अन्य मैत्रेय बुद्ध अभी होने वाले हैं, जिनके बारे में थियोसोफिकल सोसाइटी ने बहुत लिखा है। ये लोग आशा कर रहे थे कि जिद्दू कृष्णमूर्ति ही मैत्रेय बुद्ध होंगे, पर वह चूक गये। पता नहीं उनकी साधना में कमी थी या सत्ता का सहयोग नहीं मिला।
२. विष्णु अवतार बुद्ध- यह २००० कलि के कुछ बाद मगध (कीकट) में अजिन ब्राह्मण के पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। दैत्यों का विनाश इन्होंने ही किया, सिद्धार्थ तथा गौतम मुख्यतः वेद मार्ग के विनाश में तत्पर थे। इसका मुख्य कारण था प्रायः ८०० ईसा पूर्व में असीरिया में असुर बनिपाल के नेतृत्व में असुर शक्ति का उदय। उसके प्रतिकार के लिये आबू पर्वत पर यज्ञ कर ४ शक्तिशाली राजाओं का संघ बना। ये राजा देश-रक्षा में अग्रणी या अग्री होने के कारण अग्निवंशी कहे गये-प्रमर(परमार-सामवेदी ब्राह्मण), प्रतिहार (परिहार), चाहमान(चौहान), चालुक्य (शुक्ल यजुर्वेदी, सोलंकी, सालुंखे)। इस संघ के नेता होने के कारण ब्राह्मण इन्द्राणीगुप्त को सम्मान के लिये शूद्रक ( ४ वर्णों या राआओं का समन्वय) कहा गया तथा इस समय आरम्भ मालव-गण-सम्वत् (७५६ ईसा पूर्व) को कृत-सम्वत् कहा गया। ६१२ ईसा पूर्व में इस संघ के चाहमान ने असीरिया की राजधानी निनेवे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, जिसका उल्लेख बाइबिल में कई स्थानों पर है।http://bible.tmtm.com/wiki/NINEVEH_%28Jewish_Encyclopedia%29
http://www.biblewiki.be/wiki/Medes
चाहमान को मध्यदेश(मेडेस) का राजा कहा गया है। विन्ध्य तथा हिमालय के बीच का भाग अभी भी मधेस कहा जाता है-नेपाल में मैदानी भाग के लोगों को मधेस कहते हैं। रघुवंश (२/४२) में भी अयोध्या के राजा दिलीप को मध्यम-लोक-पाल कहा गया है। इस दिन चाहमान या शाकम्भरी शक आरम्भ हुआ, जिसका प्रयोग वराहमिहिर (बृहत् संहिता १३/३) तथा ब्रह्मगुप्त ने किया है।
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व (१/६)-
एतस्मिन्नेवकाले तु कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः। अर्बुदं शिखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्॥४५॥
वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वारि क्षत्रियाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहानिर्यजुर्विदः॥४६॥
त्रिवेदी च तथा शुक्लोऽथर्वा स परिहारकः॥४७॥ अवन्ते प्रमरो भूपश्चतुर्योजन विस्तृता।।४९॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, ४/३-
व्यतीते द्विसहस्राब्दे किञ्चिज्जाते भृगूत्तम॥१९॥ अग्निद्वारेण प्रययौ स शुक्लोऽर्बुद पर्वते।
जित्वा बौद्धान् द्विजैः सार्धं त्रिभिरन्यैश्च बन्धुभिः॥२०॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, (४/१२)-
बौद्धरूपः स्वयं जातः कलौ प्राप्ते भयानके। अजिनस्य द्विजस्यैव सुतो भूत्वा जनार्दनः॥२७॥
वेद धर्म परान् विप्रान् मोहयामास वीर्यवान्।॥२८॥
षोडषे च कलौ प्राप्ते बभूवुर्यज्ञवर्जिताः॥२९॥
भागवत पुराण १/३/२४-
ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्। बुद्धो नाम्नाजिनसुतः कीकटेषु भविष्यति॥
वराहमिहिर-बृहत् संहिता (१३/३)-
आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्-द्विक-पञ्च-द्वि(२५२६) युतः शककालस्तस्य राज्ञस्य॥

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