बुद्ध के आविर्भाव में कुल गोत्र का योग

-भंते विमल तिस-
धम्मपद गाथा-182 में बुद्धो के इस लोक में उत्पन्न होने को लेकर एक गाथा है जो इस प्रकार है:

“किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चान जीवितं।
किच्छं म्मसवणं किच्छो बुद्धानं उप्पादो।।4।।”
– (धम्मपद गाथा-182, बुद्ध वग्ग)
अर्थात-
“मानव जन्म पाना कठिन है, मानव जीवन जीना कठिन है।
सद्धर्म श्रवण (=सुनने) का अवसर मिलना कठिन है और बुद्धों का उतपन्न होना कठिन है।”

इस प्रसंग से यह साक्ष्य मिलता है कि बुध्दत्व अवस्था या बुद्धो का उत्तपन्न होना कोई सामान्य बात नही है। और
आध्यात्मिक रूप से बुद्धों (बुध्दत्व अवस्था) की न कोई जाति होती है न वर्ण और न ही भौतिक लोक में कोई वंश और न ही कोई कुल (परिवार) होता है। चूँकि उन्होंने अपने सभी बन्धनों और आश्रवो (चित्तमलों) को काट दिया है। इसलिये उनका केवल एक ही वंश है और वह है बुद्धवंश। परन्तु चूँकि वे लोककल्याण की भावना से धम्म चक्र प्रवर्तन करने के उद्देश्य से एक भौतिक देह में उत्पन्न हुए हैं इसलिये उनकी इस देह के माता-पिता भी हैं और कुल वंश और गोत्र भी। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अन्य पूर्व बुद्धों के थे। और भविष्य के बुद्धों के भी होंगे।

तुसित लोक/स्वर्ग लोक/ सदगति लोक से च्युत होकर इहलोक आना संसार में अप्रतिम और अद्भुत घटना होती है। बुध्दत्व का हकदार असंख्य जन्मों से कुशल (अच्छे) कर्मों को एकत्रित करने वाले और अकुशल (बुरे) कर्मो को त्यागने वाले बोधिसत्व (बोधि प्राप्ति के लिये प्रयत्न शील व्यक्ति) होते है। ऐसे बोधिसत्व के जन्म (जाति) के देवता साक्षी होते हैं। जो लोक (संसार) मे धम्म का प्रवर्तन कर सम्यक सम्बुद्ध कहलाते हैं।

बुद्ध कोई साधारण महापुरुष नही होते हैं
“बुद्ध की आज्ञा सौ हजार कोटि (करोड़) चक्कवालों में चलती है।”
-यमक प्रातिहार्य (बुध्दचर्या ,राहुल संस्कृतायन)

बुद्ध के शासन(=धम्म) में सभी समान हैं कोई भेद नहीं। क्या ब्राहमण, क्या क्षत्रिय, क्या वैस्य और क्या क्षुद्र। भेद केवल संघ में पहले और बाद में प्रवज्जा(=चित्तमल रहित सन्यास ) का है। अर्थात पहले प्रवज्जित को पहले आसन, पहले भोजन आदि देना। यह संघ में वरिष्ठ का सम्मान है।
दूसरे ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैस्य और क्षुद्र उनके गुणों पर आधारित है। जो व्यक्ति जिस प्रकार के गुणों और कर्मो को धारण किये हुए है वह वही माना जाता है। यह जन्म आधारित नहीं माना जाता है।

बुध्द शासन (धम्म) में ब्राहमण, क्षत्रिय, वैस्य और क्षुद्र:

ब्राह्मण:-
ब्राहमण वह व्यक्ति जो जो शीलवान (सदाचारी), प्रज्ञावन (निर्मलबुद्धि वाला) है या जो व्यक्तिपाप धर्मो (राग,द्वेष मोह) को बहाने/छोड़ने में लगा है वह ब्राह्मण कहा जाता है। (सम्मपूर्ण जानकारी के लिए धम्मपद का ब्राहमण वग्ग पढ़े)

न चाहं ब्राह्मणं ब्रूमि योनिजं मत्तिसम्भवं।
‘भो वादि’ नाम सो होति स चे होति सकिञ्चनो।।
अकिञ्चनं अनादानं तमहं ब्रूमि ब्राह्मणं।। (14)
-धम्मपद,ब्राह्मण वग्ग, 396
माता की योनि से उत्तपन्न होने के कारण किसी को मैं ब्राह्मण नही कहता हूँ। वह तो ‘भो वादी’ अर्थात भोगवादी है। वह तो संग्रही (जिंसमे इकट्ठा करने की आदत होती है) है। मैं ब्राह्मण उसे कहता हूं जो अपरिग्रही अर्थात आवश्यकता से अधिक दान न लेने वाला है।

“जो व्यक्ति अपने पापों (राग आदि) को बहाने (छोड़ने) के लिये एकान्तवास या वन में कुटी बनाकर रहा करते थे उन्हें बहामन (ब्राह्मण) कहा जाता था।”
-अग्गञ्ज-सुत्त, दीघनिकाय (3,4)

खत्तीय:

वह सदाचारी और धन संपत्ति सम्पन्न व्यक्ति जो रक्षा ,प्रबंधन और रंजन करता है।

“वह व्यक्ति जो फसल के भंडार गृह की रक्षा कर , सुरक्षा , सुव्यवस्था , न्याय, पाप(चोरी,झूट आदि) करने वाले को विधि द्वारा दंड दे अर्थात जो व्यक्ति सुरक्षा , सुव्यवस्था , न्याय करने वाले और जिसका खेतों(क्षत्रों) पर आधिपत्य हो हो वह व्यक्ति खत्तीय कहा जाता था। खत्तीय को लोक सम्मत्ति से चुना जाता था इसलिये इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा जाता था। वह रञ्जन(पालन) का कार्य किया करता था इसलिये राजा कहलाता था।(संक्षेप में)”
..-अग्गञ्ज-सुत्त, दीघनिकाय (3,4)

वैस्य (वैश्य):
काम भोगों में रत व्यक्ति

“वासेट्ठ ! उन्हीं प्राणियों में से कितने ही मैथुन कर्म करके नाना कर्मों में लग गए । वासेट्ठ ! मैथुन कर्म करके नाना कर्मों के वशीभूत , वश में पड़ जाने से वेस्स वेस्स (वैश्य वैश्य ) करके वैश्य नाम पड़ा । इस तरह इस वैश्य मण्डल का पुराने अक्षर से नाम पड़ा । वासेट्ठ ! धर्म ही मनुष्य में श्रेष्ठ है ….०।’
….-अग्गञ्ज-सुत्त, दीघनिकाय (3,4)

क्षुद्द (शुद्र):
वे व्यक्ति जो अनैतिक कार्यो जैसे चोरी-चकारी आदि के कारण बहिष्कृत जीवन जीते हैं।

“वासेट्ठ ! उन्हीं प्राणियों में जो बचे छुद्द ( क्षुद्र ) आचार अर्थात बड़े अनैतिक आचार वाले जो प्राणी थे , उन्हें छुद्दा छुद्दा करके यह क्षुद्र =शूद्र नाम पड़ा । उन्ही प्राणियों का दूसरों का नहीं । वासेट्ठ ! मनुष्यों में धर्म ही श्रेष्ठ है इस जन्म में भी और परजन्म में भी ।”
………-अग्गञ्ज-सुत्त, दीघनिकाय (3,4)

बोधिसत्वों का जन्म भिन्न भिन्न जन्मों में भिन्न भिन्न कुलों (विशेष व्यक्ति के परिवार) में होता है। यहां कुल का अर्थ वर्तमान जातिव्यवस्था से नहीं है। गुणवाचक है जो कर्म और गुण उन्होंने धारण किया हुआ है। परन्तु अंतिम जन्म (अर्थात जिस जन्म के बाद वे भव/संसार में उतपन्न नही होते) में धम्म चक्क प्रवर्तन के बाद निर्वाण प्राप्त करते है। उस अन्तिम जन्म में वे खत्तीय या ब्राहमण कुल (परिवार) में उतपन्न होते है।

नोट: यहां उतपन्न से अर्थ अवतारवाद से नहीं है। दूसरे और ब्राह्मण अर्थ गुणवाचक और कर्मवाचक है जाति व्यवस्था घोतक नहीं।
खत्तीय कुल का अर्थ सदाचारी सम्पत्ति समृद्ध सम्मन बड़े रक्षा, प्रबंधन और रंजन करने वाले परिवार से है। यहां गुण सदाचार और कर्म रक्षा, प्रबंधन और रंजन है।
शोषक, भक्षक, भ्रष्ट और आतंकी/दबंग और अमानवीय कानून लागू करने वाले वर्ग को खत्तीय नहीं कहा जाता।

धम्म के अनुसार व्यक्ति अविद्द्या कारण से भव/संसार में आता है। अविद्द्या अर्थात सत्य को न जानना। मिथ्या दृष्टि (गलत धारणा जैसे आत्मावाद, परमात्मा-वाद आदि) अविद्द्या को दूर करने में बाधक है।
अविद्द्या: चार आर्य सत्यों का ज्ञान न होना अविद्द्या है।
चार अर्थ सत्य:
1) दुख है ,
2) दुख का कारण है,
3) दुख का निवारण है, (भगवान में इस पद(निर्वाण) को प्राप्त किया
4) दुख का निवारण दुख-निरोध-गामिनी-प्रतिपद है।) है।

बोधिसत्व से सम्यक समबुध्द बने महापुरुष लोक में धम्म चक्क प्रवर्तन करते हैं और दुख-निरोध-गामिनी- प्रतिपद निर्वाण (निब्बान) मार्ग की दुंदुधि बजाते हैं। जो दुख निरोध, संखार (चित्त की गति/क्रिया)अंत, तण्हा/तृष्णा क्षय, परमशान्ति और परम् सुख का राजमार्ग है। और निर्वाण तक ले जाता है। इसका साक्षात्कार पुद्गल(व्यक्ति) जीवित अवस्था मे करता है।
धम्म की खोज और उसका प्रवर्तन साधारण पुद्गल(व्यक्ति) नही कहते यह जन्मों जन्म का फल और संकल्प होता है इसलिये बोधिसत्व से बुध्द होने वाले महापुरुष के शारीरिक लक्षण महा-पुरुषीय होते हैं उनका जन्म लेना उनकी ही इच्छा पर निर्भर होता है कब जन्म लेना है। कहाँ जन्म लेना है। किस कुल और माता के गर्भ से जन्म लेना है।

जन्म के बाद सम्यक बुद्ध पूर्व बुद्धों की भांति ही धम्म चक्क प्रवर्तन करते हैं और आदि कार्य करते हैं। इन सभी के धम्म सेनापति आदि भी होते है।

बोधिसत्व से सम्यक समबुध्द बने महापुरुष के जन्म से लेकर निर्वाण तक कि सभी घटनाएं समान होती हैं। जैसे बोधि व्रक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति ,धम्म चक्क प्रवर्तन, धम्म सेनापति होना , स्वर्ग में माता को धम्म उपदेश, प्रातिहार्य (चमत्कार) करना आदि।

सम्यक समबुद्ध कोई साधारण महापुरुष नही होते “उनकी आज्ञा सौ-हजार-कोटि(करोड़) चक्कवालों में चलती है।”
– (यमक प्रातिहार्य), बुध्दचर्या, राहुल संस्कृतायन

सम्यक समबुध्द में निम्न लिखित समानतायें होती हैं

(१) वे लोकमान्य खत्तीय कुल या ब्राहमण (पापधर्मो को बहाने में लगा व्यक्ति) कुल में जन्म लेते हैं।

२) प्राकृतिक रूप से शीलवती माता के गर्भ में आने के लक्षण समान होते हैं, उसके बाद वह माता किसी और अन्य शिशु को जन्म नही देती …आदि। शिशु के प्रसव के लक्षण समान होते हैं…। लगभग सप्ताह बाद के वह मृत्यु के उपरांत सदगति (स्वर्ग) को प्राप्त होती है।

(३) बत्तीस शरीर-लक्षण समान होते हैं। जो उनके चक्रवर्ती राजा या बुध्द होने की पुष्टि करते हैं। इसलिये गौतम बुध्द के परिनिब्बान के उपरान्त उनकी अस्थियों पर चक्रवर्ती राजा की भांति स्तूप निर्माण किया जाता है।

(४) गृहत्याग के चार पूर्व-लक्षण समान होते हैं जैसे—
वृद्ध, रोगी, मृत और संन्यासी का देखना;

(५) उनका गृहत्याग और सन्यास पूर्व निश्चित होता है,

महा-पदान सुत्त में विपस्सी सम्यक समबुद्ध का वर्णन कुछ इसी प्रकार मिलता है।
नोट:- कोई भी बोधिसत्व अंतिम जन्म में मजबूरी के कारण सन्यासी नही होता।

बुध्द खत्तीय या ब्राह्मण कुल में ही क्यों जन्म लेते हैं:-

सम्यक समबुध्द ‘लोकमान्य खत्तीय’ या ब्राहमण कुल में ही जन्म इसलिये लेते हैं ताकि उद्देश्य प्राप्ति में किसी भी प्रकार का व्यावधान उत्तपन्न न हो। दूसरे जन्म से ही प्राकृतिक रूप से शीलवती माता सदाचारी पिता के संस्कार (जन्मजात गुण) जो माता पिता से प्राप्त होते ही । समाधि आदि में सहायक होते हैं। विमुक्ति में सहायक विरक्ति/वैराग्य/अनासक्ति भाव के कारण उनका महाभिनिष्क्रमण बुद्धत्व में सहायक होता है।

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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