ब्रह्माण्ड विज्ञान : नासदीय सूक्त (Cosmology)

हमारे सम्मुख दो प्रकार के जगत् हैं– सूक्ष्म ब्रह्माण्ड और बृहत ब्रह्माण्ड; जिसे हम अन्तर्जगत (Microcosm)और बाह्य-जगत् (Macrocosm) कहते हैं।  हम अनभूति के द्वारा ही दोनों से सत्य प्राप्त करते हैं। जो सत्य हमें आन्तरिक अनुभव के द्वारा प्राप्त होते हैं, उन्हें मनोविज्ञान (साइकालजी Psychology) या आत्मतत्वज्ञान (Metaphysics) और धर्म कहा जाता है। बाह्य अनुभव से भौतिक विज्ञान (शरीरविज्ञान या फिजियोलॉजी) प्राप्त होते हैं। अतः किसी पूर्ण सत्य का इन दोनों जगतों के अनुभव के साथ अविरोध (harmony) होना चाहिये। सूक्ष्म ब्रह्माण्ड बृहत ब्रह्माण्ड का साक्ष्य (testimony) प्रदान करेगा, बृहत ब्रह्माण्ड सूक्ष्म ब्रह्माण्ड का।

भौतिक सत्य का प्रतिरूप (counterpart) अन्तर्जगत में, और अन्तर्जगत के सत्य का प्रमाण भी बहिर्जगत में मिलना चाहिये। तथापि इन सब सत्यों का अधिकांश सर्वदा परस्पर विरोधी पाया जाता है। विश्व-इतिहास के एक काल में ‘अन्तर्वादी’ प्रधान हो उठे; और उन्होंने ‘बहिर्वादियों’ के साथ विवाद आरम्भ किया। वर्त्तमान काल में ‘बहिर्वादी’ अर्थात भौतिक वैज्ञानिकों ने प्रधानता प्राप्त की है, और उन्होंने मनोवैज्ञानिकों और दार्शनिकों के अनेक सिद्धांतों को उड़ा दिया है।

जहाँ तक मेरा ज्ञान है, मुझे मनोविज्ञान (या आध्यात्मिक विज्ञान) के सच्चे सार-तत्व के साथ आधुनिक भौतिक विज्ञान के सार-तत्व का पूर्ण सामंजस्य लगता है। एक ही व्यक्ति सब विषयों में महान नहीं हो सकता; इसी प्रकार एक ही जाति, समान रूप से सभी प्रकार के ज्ञान का अनुसन्धान करने में समर्थ नहीं हो सकती। आधुनिक यूरोपीय राष्ट्र बाह्य भौतिक ज्ञान के अनुसन्धान में सुदक्ष हैं, किन्तु वे मनुष्य की अन्तःप्रकृति के अनुसन्धान में उतने पटु नहीं हैं।  दूसरी ओर प्राच्य लोग बाह्य भौतिक जगत के अनुसन्धान में उतने दक्ष नहीं थे, किन्तु अन्तस्तत्व की गवेषणा में उन्होंने विशेष दक्षता का परिचय दिया है।  इसी लिये हम देखते हैं कि प्राच्य भौतिक तथा अन्य विज्ञानपाश्चात्य विज्ञानों से नहीं मिलते, और न पाश्चात्य मनोविज्ञान प्राच्य मनोविज्ञान से। पाश्चत्य वैज्ञानिकों ने प्राच्य भौतिक वैज्ञानिकों को विध्वस्त कर दिया है। फिर भी दोनों ही सत्य की भित्ति पर प्रतिष्ठित होने का दावा करते हैं, और हम जैसा पहले ही कह चुके हैं, किसी भी क्षेत्र के सत्य-ज्ञान में कभी परस्पर विरोध नहीं हो सकता; ‘the truths internal are in harmony with the truths external.’ आभ्यन्तर सत्य के साथ बाह्य सत्य का सामंजस्य है।

यहाँ हम ब्रह्माण्डविज्ञान और उससे सम्बन्धित तथ्यों के विषय में प्राच्य मनोवैज्ञानिक धारणाओं का सिंहावलोकन करना चाहते हैं ।   तब हम देखेगें कि आधुनिक विज्ञान की नवीनतम खोजों के साथ उनका कितना आश्चर्यप्रद सम्बन्ध है, और यदि सामंजस्य में कहीं कोई कमी रह भी जाती है, तो यह आधुनिक विज्ञान की कमी है, उनकी नहीं। हम सब अंग्रेजी के शब्द ‘नेचर’ (Nature) का व्यवहार करते हैं।  प्राच्य सांख्य दार्शनिक उसके लिये दो भिन्न नामों का प्रयोग करते हैं-पहला है, ‘प्रकृति‘ जो अंग्रेजी के ‘नेचर’ शब्द का प्रायः समानार्थक है, और दूसरा उसकी अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक नाम‘अव्यक्त’ (undifferentiated) है। अव्यक्त का अर्थ है, जो अभी प्रकाशित या भेदात्मक नहीं है—उससे ही सब पदार्थ उत्पन्न हुए हैं, उससे अणु-परमाणु, भूत, शक्ति, मन, बुद्धि, सब प्रसूत हुए हैं।

यह अत्यन्त विस्मयजनक है कि भारतीय दार्शनिकों और तत्वमीमांसकों (philosophers and meta-physicians) ने अनेक युग पहले ही कहा था कि मन जड़ या भौतिक है। हमारे आधुनिक जड़वादियों ने इसके अतिरिक्त और अधिक क्या दिखाने का प्रयत्न किया है कि मन भी देह की तरह प्रकृति से उत्पन्न है ? विचार के सम्बन्ध में भी यही बात है, और और क्रमशः हम देखेंगे कि बुद्धि भी उसी एक अव्यक्त नामक प्रकृति से उत्पन्न हुई है।

सांख्यों ने इस अव्यक्त को तीन शक्तियों (गुणों) की की ‘साम्यावस्था’ (equilibrium of three forces) कहकर परिभाषित किया है।  उनमें से एक का नाम सत्व, दूसरी का रजस और तीसरी का तमस है। तमस निम्नतम शक्ति है-आकर्षणस्वरुप;रजस उसकी अपेक्षा किंचित उच्चतर है—विकर्षणस्वरुप; तथा जो सर्वोच्च शक्ति इन दोनों कासन्तुलनस्वरुप है, सत्व है। अतएव जब आकर्षण और विकर्षण की शक्तियाँ सत्व के द्वारा पूर्णतः संयत होती है अथवा पूर्ण साम्यावस्था में रहती है, तब सृष्टि का अस्तित्व नहीं रहता, किन्तु ज्यों ही यह साम्यावस्था नष्ट होती है, त्योंही उनका सन्तुलन भंग हो जाता है और उनमें से एक शक्ति दूसरी शक्तियों की अपेक्षा प्रबलतर हो उठती है, त्यों ही गति का आरम्भ होता है और सृष्टि होने लगती है।

यह व्यापर चक्राकार (cyclically) काल के कल्पों (periodically) में चला करता है। अर्थात साम्यावस्था भंग होने का एक समय होता है, तब शक्तियों का संघात और पुनस्ंघात होने लगता है और वस्तुयें प्रक्षिप्त होती हैं। साथ ही हर वस्तुओं में उसी मौलिक साम्यावस्था में फिर से लौटने की प्रवृत्ति होती है, और ऐसा समय आता है, जब जो कुछ व्यक्त भावापन्न है, उन सबका सम्पूर्ण विनाश हो जाता है। फिर कुछ समय बाद यह अवस्था नष्ट हो जाती है, सम्पूर्ण वस्तुएँ प्रक्षिप्त होती हैं और धीरे धीरे तरंग के समान फिर तिरोभूत हो जाती हैं।  जगत् की सारी गति को, इस विश्व की प्रत्येक वस्तु को तरंग के सदृश माना जा सकता है, जिसमें क्रमशः एक बार उत्थान, फिर पतन होता रहता है।  इन दार्शनिकों में से कुछ का मत यह है कि समग्र ब्रह्माण्ड ही कुछ दिनों के लिये लयप्राप्त होता है। कुछ का मत है कि कुछ मण्डलों में ही लय का व्यापार घटित होता है। अर्थात, यदि हमारा यह सौर मण्डल लयप्राप्त होकर अव्यक्त अवस्था में चला जाय, तो भी उसी समय अन्य कोटिशः सौर-मण्डलों में उसके ठीक विपरीत व्यापार होगा, और उनमेंसृष्टि चलती रहेगी।

मैं इस दूसरे मत के –-अर्थात प्रलय एक साथ समस्त ब्रह्माण्ड में घटित नहीं होता, विभिन्न ब्रह्माण्डों में विभिन्न व्यापार चलते रहते हैं — के ही पक्ष में अधिक हूँ। किन्तु मूल बात एक ही रहती है, अर्थात जो कुछ हम देख रहे हैं, यह समग्र प्रकृति ही, क्रमागत उत्थान-पतन के नियम से अग्रसर हो रही है। इस भंग होने, सन्तुलन पुनः प्राप्त करने, पूर्ण सामंजस्य की अवस्था को प्रलय, एक कल्प का अन्त कहते हैं। विश्व के प्रलय और एवं प्रक्षेप की तुलना भारत के ईश्वरवादियों ने ईश्वर के निःश्वास-प्रश्वास के साथ की है। मानो ईश्वर के प्रश्वास से यह जगत बहिर्गत होता है, और वह उनमें फिर लौट जाता है।

जब प्रलय होता है, तब जगत की क्या अवस्था होती है ? वह उस समय भी विद्यमान रहता है, तथापि सूक्ष्म रूप में; अथवा जैसा सांख्य दर्शन कहता (नाशः कारण लयः) है, कारणावस्था में रहता है।देश-काल-निमित्त (time-space-causation) से वह मुक्त नहीं होता, किन्तु वे अत्यन्त सूक्ष्म और लघु रूप में रहते हैं। मान लो, विश्व संकुचित होने लगता है, और हम सब एक अणु के बराबर रह जाते हैं। किन्तु तो भी हम इस परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पायेंगे, क्योंकि हमसे सम्बद्ध प्रत्येक वस्तु का संकोच भी साथ ही साथ होगा।
सारी वस्तु विलीन हो जाती है और फिर व्यक्त हो जाती है, ‘ the cause brings out the effect ‘ कारण कार्य उत्पन्न करता है, और यही क्रम चलता रहता है। आजकल हम जिसे जड़ कहते हैं, प्राचीन हिन्दू उसी को ‘भूत’ बाह्य तत्व (external elements अर्थात जो वस्तु चिरकाल से अतीत (भूत) है ) कहते थे। उनके मतानुसार एक तत्व ऐसा है जो शाश्वत है; शेष सभी तत्व इसी एक से उत्पन्न हुए हैं। उस मूल तत्व को तत्वमीमांसाक लोग ‘आकाश’ कहते हैं। आजकल ‘ईथर’ शब्द से जो भाव व्यक्त होता है, यह बहुत कुछ उसके सदृश है, यद्दपि पूर्णतः नहीं। इस तत्व के साथ ‘प्राण’ नाम की प्रारंभिक या आद्य ऊर्जा (primal energy) रहती है। प्राण और आकाश संघटित और पुनःसंघटित होकर शेष तत्वों का निर्माण करते हैं। फिर कल्प के अन्त में सब कुछ प्रलयगत होकर बाह्य मूल तत्व आकाश (matter) और आद्य ऊर्जा (energy) में परिवर्तित हो जाता है।

विश्व की प्राचीनतम मानवीय रचना ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (ऋग्वेद – १० – १२९) में सृष्टि का वर्णन करते हुए एक अत्यन्त सुन्दर और परम काव्यमय पद मिलता है —” जब सत् भी नहीं था, असत् भी नहीं था, तम के द्वारा तम ढँका हुआ था, तब क्या था ? और इसका उत्तर दिया गया है, ” It then existed without vibration”. ‘ तब वह निस्पन्द अवस्था में था।’ इस प्राण की सत्ता तब भी थी, किन्तु उसमें कोई गति न थी; ‘आनीदवातम्’ का अर्थ है, ‘अर्थात  जब हवा भी नहीं था, वह ब्रह्म अकेला अपने ही दम पर सांसे ले रहा था, वह अस्तित्ववान था ! ‘स्पन्दन का विराम हो जाने पर भी ‘वह’ था ! तब एक बहुत लम्बे विराम के उपरान्त जब कल्प का आरम्भ होता है, तब आनीदवातम् (unvibrating atom: निस्पन्द परमाणु)स्पन्दन आरम्भ कर देता है।

और प्राण आकाश को आघात पर आघात प्रदान करता है। परमाणु घनीभूत होते हैं, और उनके संगठन की इस प्रक्रिया में विभिन्न तत्व बन जाते हैं। (अनुवादक का कार्य बहुत दायित्वपूर्ण होता है): हम साधारणतः देखते हैं, लोग इन सब बातों का अत्यन्त अदभुत अंग्रेजी (या हिन्दी ) अनुवाद किया करते हैं। लोग अनुवाद के लिये दार्शनिकों और भाष्यकारों की सहायता नहीं लेते, ‘and have not the brains to understand them themselves.’  और उनमें इतनी बुद्धि भी नहीं होती कि वे स्वयं इनके गूढ़ रहस्यों को समझ सकें। कोई मूर्ख संस्कृत के तीन अक्षर पढ़ता है, और उसीसे एक पूरी पुस्तक का अनुवाद कर डालता है ! (They translate the elements as air, fire, and so on) वे भूत-समूह (तत्व) का वायु, अग्नि आदि के रूप में अनुवाद किया करते हैं। यदि वे भाष्यकारों के भाष्यों पर गम्भीरता से चिन्तन करते, तो वे देख पाते कि उनका मतलब वायु या अन्य किसी से नहीं है।
डॉ. मदन मोहन पाठक 

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