भगवान् कृष्ण की महिमा

भगवान् कृष्ण की महिमा

कहीं ऐसा भी होता है कि जिसे अपने ही हाथों पाला हो, जिसे अपने ही हाथों बनाया हो तथा सभी तरह की विकट परिस्थितियों से बचाकर व्रज से द्वारका में बसाकर फिर अपनी ही आँखों के सामने उनका विनाश होते देखकर – मुस्कुराता हुआ – संतुष्ट  होकर इस धरा का परित्याग करें – इसे अच्छी तरह समझने के लिये “आइये हम व्रज की भाव-यात्रा करें” –

व्रज जहां पर भगवान कृष्ण ने जन्म लिया, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था बिताया – ऐसा व्रज जिसके बारे में भगवान स्वयं कहते हैं ‘‘ऊधो ! मोहि व्रज बिसरत नाहिं ।’’ ऐसा व्रज जहाँ सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी भ्रमित हुये, जहाँ ब्रह्मर्षि नारद जी की वीणा की झंकार स्तम्भित हो गयी, इन्द्र का देवराजत्व का अहंकार खण्डित हो गया । आइये इस व्रज भावयात्रा की शुरुआत श्री कृष्ण के रहस्यमयी जन्म की बानगी से करें –

कुहु निशा व्याप्त हो, घटाटोप अंधकार का साम्राज्य फैला हुआ हो, यत्र-तत्र-सर्वत्र जड़ता-ही-जड़ता का प्रवाह हो, तभी –एकाएक तड़ित की कडक के साथ बिजली चमक उठे –सभी की जड़ता टूट जाय और सारा-का-सारा जगत आलोकित हो उठे–बस ऐसे ही, ठीक ऐसे ही, कृष्ण थे ।

भादो की अंधेरी रात, अष्टमी  तिथि, आकाश में रोहिणी नक्षत्र उदित हुआ चाहता है, ठीक आधी रात का समय, अंधेरी कारा, तामसी कंस के दुर्भेद्य दम्भ प्राचीर के भीतर गहन अंधकार में बेड़ियों से जकड़े हुए देवकी और वसुदेव – एक दिन नहीं, दो दिन नहीं बल्कि ग्यारह-ग्यारह वर्षों  तक दिन-रात जिस तारनहार का चिन्तन हो रहा था उनके प्राकट्य  का, उनके अवतरण की भूमिका भी वैसी ही थी ।

यह अवतरण केवल  ‘‘परित्राणाय साधूनां ’ ही नहीं था पर ‘विनाशाय च दुष्कृतां भी था ’ साथ-ही-साथ था ‘तदात्मानम् सृजाम्यहम्  के सृजनात्मक शक्ति के भी अवतरण का दिगदिगन्त व्यापित उद्घोष  । जिसमें केवल अत्याचार से त्रसित माता भूमि की ही नही बल्कि उनके पुत्रों की भी आशायें केन्द्रित थी और पृथ्वी-पुत्रों की आहुति पर आश्रित देवताओं की भी।

उनके अवतरण के साथ ही बादलों की गड़गड़ाहट मधुर हो गई, भयकारी अंधकार की गहनता कम हो गई, शीतल -मंद-सुगंध समीर बहने लगी, नदियों का जल मधुर हो गया, सरोवरों में आधी रात में कुमुदिनी विकसित हो गई, वेदियों में अग्नि स्वतः ही प्रज्वलित हो उठी; तो दूसरी ओर पहरा देने वाले कंस के चैकीदार सो गये, वसुदेव एवं देवकी की बेड़ियाँ शिथिल  हो गईं, कारा के द्वारा खुल गये । समस्त जगत की कालिमा को हरते हुय,  अपने में समेटते हुये ही ‘कृष्ण’ रूप में प्राकट्य हुआ ।

संसार के पाप-ताप की, अभाव की, मजबूरी की जकड़न को ध्वस्त करने की भूमिका के रूप में वसुदेव-देवकी के बेड़ियों के बंधन खुल गये । सारी भूमिकायें ध्वस्त हो गईं, अपने सगे-संबंधी पराये हो गये, पराये अपने हो गये, घर जंगल हो गया, जंगल घर हो गया, सारा ऐश्वर्य  धूल धूसिरित हो गया या वृजरेणु ही ऐश्वर्य हो गया । सभी चकित थे ब्रह्मा भी, नारद भी, तो इंद्र भी । समझा धोखा खा गये । हमनें तो अवतार के लिये प्रार्थना की थी । दुष्टों के  संहार के लिये प्रार्थना की थी । पृथ्वी पर स्वर्ग के अवरोहण की प्रार्थना की थी । पर यहाँ पर तो पृथ्वी का आरोहण हो गया है – पृथ्वी के सामने तो स्वर्ग तिरस्कृत हो गया है – लोक में अलौकिकता लोट रही है – वह अलौकिकता उलूखल में बंधी हुई है ।

ब्रह्मा जी का संचित ज्ञान हतप्रभ है । हो भी क्यों नहीं जिनके स्वरूप के बारे में श्रुतियां भी अपने को असमर्थ पाती हैं – निर्णय करने में कि यही ब्रह्म है । अतः वह निशेधमात्र करती हुई इशारा  भर कर पाती हैं कि वह न स्थूल है न अणु है, न क्षुद्र है, न विशाल  है, न अरूण है, न द्रव है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग है, न रस है, न गंध है, न नेत्र है, न कर्ण है, न वापी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमें न अन्तर है, न बाहर है (बृहदारण्यक उपनिषद 3/8/8 ) – वहीं जब श्रीकृष्ण चन्द्र ने अपनी माया यवनिका हटा दी तो ब्रह्मा जी के  मुख से बरवस निकल पड़ा था
‘अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोप व्रजौकसाम ।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्ण ब्रह्म सनातनम् ।।
(श्रीमद्भागवत 10/14/32)

तभी तो ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की थी –
‘करहु मोहि ब्रज-रेनु देहु बृंदावन बासा ।
माँगौं यहै प्रसाद और मेरौ नहीं आसा ।।

लीला शुक  ने ज्योंहि देखा तो शोर  मचा दिया –
विचिनुत भवनेशु वल्लवीनामुपनिशद्र्थमुलूखले निबद्धम् ।

सुनो ! गोप सुन्दरियों के भवनों में ढूँढो । यह देखों यहाँ उपनिशद् का अर्थ उलूखल में बँधा पड़ा है । इसे ढूँढ़लो, पा लो  । तभी परब्रह्म के अन्वेषण से निराश किसी जिज्ञासु ने इसे सुना, इस ओर आया और उसे परब्रह्म मिल गये । वह आनन्दातिरेक से गा उठा –

निगमतरोः प्रतिशाखं मृगितं मिलितं न तत्परं ब्रह्म ।
मिलितं मिलितमिदानीं गोप वधूटी पटान्चले नद्धम ।।

‘ओह ! कितना परिश्रम किया था, वेदांत वृक्ष की प्रत्येक शाखा ढूँढ ली थी, पर वह परब्रह्म तो नहीं ही मिला । पर देखो ! देखो ! मिल गया । मिल गया । अब मिला है वह रहा, गोपसुंदरी के अंचल से संनद्ध होकर वह परब्रह्म अवस्थित है ।

रसखान भी संकेत कर गये –
टेरत हेरत हारि पन्यो रसखानि, बतायो न लोग लुगायन ।
देखो, दुन्यो वह कुंज -कुटीर में, बैठो पलोटत राधिका पायन ।

सभी हाहाकार कर उठते हैं, सभी पछताते हैं कि हम वृंदावन रेणु क्यों न हुए । हमें तो श्रष्ट  का अहंकार, देवराजत्व का अहंकार, यह देवर्शित्व का अहंकार-वंचित कर गया अपनेपन से । परंतु कृष्ण एक ऐसा खिंचाव है कि वहाँ परायापन तो रहता ही नहीं है – सब कुछ अपना-ही-अपना होता है उनका – वासुदेवः सर्वम् । वास्तव में इषावास्यमिदं सर्वंखल्विदं ब्रह्म के साकार विग्रह का नर्तन हो रहा था नंद यशुदा  के आंगन में – अहा ! कैसा साकार नर्तन होता था उस वेदांत दर्शन का ।

भगवत प्रेरित माया से ही वसुदेव जी मथुरा से गोकुल गये और वहाँ पर यशुदा-नंद के घर में आनंद का स्त्रोत फूट पड़ा ।यशोदा  का नंदलाला व्रज का उजाला हो गया । जन्म के साथ ही व्रजण-मथुरा से गोकुल व्रजण । यह व्रजण साधारण व्रजण नहीं था । यह व्रजण एक शुरुआत थी -भविश्य का आगाज़ था – साधारण भोले-भाले ग्रामीण लोगों के बीच रहकर कदम-कदम पर जीवन संघर्श के पाठ को सीखना था – राजनीति की दृढ़ संस्थापना-जन के तंत्र की स्थापना- तथा जीवन-दर्शन का प्रवर्तन भी करना था । उसे तो चरवाहों के संग संग, वनवासियों के संग-संग, भोले-भाले ग्रामीणों के संग-संग धरती से जुड़कर – उसका सहज रस लेकर कृषि प्रधान भारतवर्श की कृषि-संस्कृति और गोपाल-संस्कृति की सहज कर्म-परायणता की दार्शनिक  पृश्ठभूमि में ही धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध के लिये संनद्ध उन्मत्त योद्धाओं, अपने ही प्रिय सगे-सम्बन्धियों के विरूद्ध धर्मसंस्थापनार्थाय गाण्डीव उठाने के लिए ही ‘क्लैब्यं मा स्म गमःपार्थ नैतत्वययुपधते, क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्तवोतिश्ठ परंतपः’ की घोषणा  करते हुये निष्काम  कर्म की व्याख्या प्रस्फुटित करनी थी ।

निष्कामकर्मयोग तलवार की धार पर चलने के समान कठिन प्रतीत होता है परन्तु कृष्ण ने जिस भीषण  स्थिति में इसकी व्याख्या प्रस्तुत की वहीं पर इसकी तार्किक परिणति हो जाती है ।

श्रीकृष्ण को छलिया कहा गया है और है भी । शत्रु को तो छला ही, मित्र को भी छला, पिता, पुत्र, पत्नी, प्रिया, सभी सगे-सम्बन्धियों, सभी जीवों को छला । जीवन संग्राम के पग-पग पर साथ रहने वाले अर्जुन को भी छला, जिसने भी, जहाँ भी और जब भी उसे अपना समझा सभी छले गये । जयदेव के ‘गीतगोविन्द’ में राधा जब कहती है कृष्ण तुम बाहर से ही नहीं भीतर से भी काले हों – तुम छली हो – गोपियां भी जब यशोदा से कहती है कि कृष्ण तो छलिया है – काला है- तो यशोदा कहती है

‘‘कारो-कारो जनि कहु ग्वारिन, मेरो जग उजियारो……………..
यशोदा का नंदलाला वृज का उजाला है ।
मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए ।।

गीतगोविन्द के दशावतार स्तुति में महाकवि श्री जयदेव ने तभी तो कहा है –

‘छलयसि विक्रमणे बलिमदभुतवामन।
पदनखनीर जनितजन  पावन ।।
केशवधृत वामन रूप जय जगदीश हरे ।।

केशव ने छला अहंकार को भी, वो भी सात्त्विक अहंकार को भी जो दानवराज बलि में यज्ञ करने के क्रम में हुआ था । अपना सब चीज दान करने के क्रम में आया था । तभी तो उस विशाल अहंकार को दूर करने के लिए क्षुद्र याचना – मात्र तीन डग भूमि के द्वारा दूर करना था । वास्तव में अहंकार तो अहंकार ही होता है – सात्विक क्या ?असात्त्विक क्या ?  इसका क्षरण होना ही चाहिये था । ऐसे छलिया का छलना भी कितना मोहक होता है – हजारों-हजार वर्षों से सभी छले जा रहे हं उनके छल से – सब कुछ जानते हुए भी संसार के सभी जीव उनके मोहक छल में छले जा रहे हैं – श्रीकृष्ण छल करते है तो दुःख होता है और छल नहीं करते हं तो और भी ज्यादा दुख होता है । ठीक इसी तरह उनकी चोरी भी, उनका झूठ बोलना भी सभी मोहक है  -गोपियों की मटकी फोड़ते हैं – माखन चोरी करते हैं – तो वो उलाहना देती है उनकी माता यशोदा को – और अगर नहीं चोरी करते हैं तो भी आशा देखती है कि आज लाला चोरी करने नहीं आयो । कैसा अद्भुत फंसाव है – कैसा विचित्र खींचाव है – उसके एक-एक कृत्य में, एक-एक भाव-भंगिमा में – सदियों से लोग खींचे चले आ रहे हैं खींचे चले आयेंगे – पर वह खींचाव का ऐसा खजाना है कि कभी  खत्म ही नहीं होता । सभी पागल हो रहे हैं – सिर्फ गोपियाँ ही नही, बाबा नंद और यषोदा ही नहीं, अक्रुर, उद्वव जैसे ज्ञानी ही नहीं – कंस, चाणूर जैसे दुश्ट ही नहीं, मीरा, जयदेव, विद्यापति, चंडीदास, सूर और रसखान जैसे भक्त कवि ही नहीं बल्कि परम विरक्त परमहंस जैसे संत श्री शुक देव जी, श्री रामकृष्ण परमहंस जी भी । पिछले पांच हजार सालों से सभी को आकृष्ट करता आ रहा अपने व्यक्तित्व के विभिन्न मनमोहक आयामों के द्वारा – आगे भी करता रहेगा ।

ऐसा लगता है कि अगर कृष्ण की बाल सुलभ चेष्टा को हटा दिया जाये तो सूर के साहित्य में बचेगा ही क्या ? इसके बांकपन को हटा दिया जाये तो चित्रकला में बचेगा ही क्या ? गीता के अनासक्ति योग, निश्काम कर्म योग को छोड़ दिया जाय तो दर्शन के अधूरेपन को भरेगा कौन – वहाँ पर खालीपन के सिवा और मिलेगा ही क्या ? बेदर्दी कृष्ण  के बेदर्दीपन को हटाये तो नृत्य मात्र अंग संचालन का उपक्रम ही होगा – और संगीत-संगीत तो जैसे प्राणहीन ही हो जायेगा । रसों की बातें करें तो श्री। श्री कृष्ण    रस ही हैं और इसका छलकाव ही रास है – सारी सृष्टि रसहीन हो जायेगी कृष्ण के   बिना ।

श्रीकृष्ण भारत-भाव-प्रवण-मानस का मूर्तिमान विग्रह है – हमारे जीवन के हरेक पहलू में-जीवन के हरेक व्यापार में-जीवन की हरेक अवस्था-बालसुलभ चापल्यता, वात्सल्य भाव की प्रखरता, गर्भधारण के दुःख से लेकर प्रौढावस्था की स्थितप्रज्ञता, जीवन संग्राम की भीशणतम स्थिति को सरलतम रूप देने की क्षमता, महाभारत भूमि में द्रष्टव्य रणकुशलता, रणनीतिज्ञता, वीरता-धीरता, विषमता एवं विपन्नावस्था में भी सम्पन्नता, समता स्थापित करने की क्षमता यह सब-के-सब श्रीकृष्ण विग्रह से ही विग्रहवान हो उठते हैं और दूर हट जाने से वे स्थितियाँ दुर्निवार हो जाती हैं।

जीवन को निःसंग-भाव से देखने की प्रवृत्ति का सूत्रपात तो उनके जन्म काल से ही हो गया था । जन्म लेते ही माता-पिता से अलग हुये, उनकी ममता छोड़ी, नन्द यशोदा के घर रहते हुए गोप-गोपियों को अपने स्नेह बंधन का आस्वादन कराते हुए भी अपने को स्नेह से ऊपर रखा, जिनके साथ खेले-कूदे, जिनकी रक्षा की, उन्हीं को छोड़कर वे मथुरा चले गये । मथुरा को भी छोड़कर द्वारिका तथा द्वारिका में रहकर भी यदुकूल में आसक्त नहीं रहे – पांडवों के साथ रहे – सड़ी-गली संस्कृति को खत्म कर-विनष्ट   कर-एक नई प्राणवान संस्कृति की स्थापना कर – पृथ्वी को भी छोडकर चुपचाप एक निर्मोही की तरह चले गये ।

यह उस विराट पुरुष  की निःसंगता की कहानी है । उनका ये व्रजन निरंतर होता रहा है । बार-बार होता रहा है – ये कैसा है व्रजन ?  घटनाक्रम 5000 वर्ष  पहले ही हो चुका है परंतु उसकी आस, प्रतीक्षा, चाहत आज भी बनी हुई है – कैसा है वो बंधन – आज भी एक अदृश्य आकर्षण   से, सम्पूर्ण भारतवर्ष से ही नहीं, बल्कि सभी देशों  से भी जो एक बार आता – वहीं का हो जाता है – कोई तन से तो कोई और नही तो मन से ही । आज हम सभी एक होने की बात केवल कर रहे हैं – पर उसके ताने-बाने को तार-तार करने की कोई-कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं – जब भाई-भाई एक नहीं हो पा रहा है तो सम्पूर्ण भारतवर्श की एकता की बातें कैसे हो ? हम विशिष्ट  बनने के चक्कर में अपना सामान्य धर्म भूल बैठे हैं । हमारा जीवन बनावटी हो गया है, रिश्ते  बनावटी हो गये हैं, तो एकता कैसे सहज होगी, सरल होगी और सच होगी । वो कौन सा भाव  है – वे कौन सी बात है – वो कौन सा भाव है – जो खण्ड खण्ड भारत को अखण्ड रखता है – वह भाव है जयदेव की – वह भाव है सूर एवं मीरा की, रसखान की, गुलबदन बेगम की, चैतन्य महाप्रभु की तथा श्री वल्लभाचार्य जी की । जिन्होंने उस भाव स्पंदन को, देश के प्राणो के स्पंदन को ब्रजभूमि में ही पाया था । कावेरी के तट पर उपजी हुई भक्ति जब जड़ हो गई तो व्रजभूमि की यमुना जल में आकर ही वह फिर नवयुवती हुई – उसकी जड़ता टूट गई  । इसका अभिप्राय यह है कि इस व्रजभूमि में ही वह भाव है – वह जबरदस्त भाव-प्रभा है जो जड़ता को छिन्न भिन्न कर डालती है, चैतन्य को अनावृत कर डालता है । भारतवर्ष ने इस व्रजभूमि में जो चैतन्यता पाई वह उसी व्रजभाव के कारण जिन्होंने युगों-युगों से संचित जड़ता, मोह, द्वेष को तोड़ा । इसी ने पहचान कराई सच्चिदानंद के गौरव को, इसी ने पहचान कराई सामान्य होने के गौरव को, इसी ने पहचान कराई वन के पांखी के पाँखों से बने मुकुट को, वन फूलों से निर्मित आभूषण को ।

आज हमें टेर लगानी होगी – उसे पुकारनी होगी – जो महाराजाधिराज बनकर द्वारकाधीश बनकर-मोर मुकुट छोड़कर, मुरली छोड़कर, दो हाथ छोड़कर, पता नहीं अपनी चार भुजाओं में क्या-क्या धारण कर रखा है । ईंशा अल्ला खाँ के शब्दों में –

‘‘जब छाँडि करीर की कुंजन को वहाँ द्वारका में हरि जाय छये ।
कलघौत के धाम बनाये घने महाराजनके महाराज भये ।।
तज मोर के पंख औ कांमरिया कछु और हि नाते हैं जोड़लये ।
धरि रूप न ये किये नेह नये अब गइयाँ चराइबो भूलगये ।।’’

टेर लगानी होगी उस द्वारकाधीश से कि अपना शंख, चक्र, गदा और पद्म छोड़कर हमारे बीच आओ, हम आम जनों के बीच आओ, भारत के जन-गण-मन  के बीच आओ क्योंकि आज –

‘‘तुम बिनु कोई नहीं है मोहन भारत का रखवाला रे ।

अपने हाथ में धारण किये हुए पांचजन्य शंख से महाभारत में कौरवों की सेना के हृदय में भय का संचार करने वाले द्वारकाधीश- आज फिर से पांचजन्य अर्थात् पांच जनों या पंचों का शासन लाने का शंखनाद करें – पूरे देश में फैले छद्म पंचों के प्रपंचों को तोड़कर जन-गण समर्पित एवं समर्थित पंचों को लाने के लिए पांचजन्य का फिर से उद्घोश करें । जिससे दिक्दिगन्त निनादित हो उठे ।

अपने हाथ में धारण किये हुए चक्र के द्वारा हमारे अभाव, अज्ञान, भय, सर्वत्र व्याप्त भ्रश्टाचार, प्रदूशण – वायु, जल, आकाष, पृथ्वी, मन, बुद्धि के प्रदूशण पर प्रचंडता से प्रहार करने की प्रतीक्षा है ।

गदा – कौमोदकी गदा -निर्बलों की सुरक्षा का प्रण, सबलों द्वारा निर्बलों के ऊपर किये गये अत्याचार के प्रतिकार के रूप् में इसके प्रहार करने की टेर लगानी है – बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके बृजबाला

पद्म अर्थात् कमल प्रतीक होता है प्रफुल्लता का । द्वारकाधीश के एक हाथ में कमल हैं । वैसे तो भगवान के मुख भी कमल, चरण भी कमल हैं, नाभि कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई है तथा वे कमल की ही माला धारण करते हैं । सृश्टि की उत्पत्ति भी कमल से हुई है तभी तो कुन्ती भी स्तुति करती है –
‘‘नमः पंकजनाभाय, नमः पंकजमालिने ।
नमः पंकज नेत्राय नमस्ते पंकजाड्.घ्रये ।।’’

तभी भारतवर्ष का जन-गण-मन पद्मवत् प्रफुल्लित होगा – यही टेर लगाने के लिए हाथ में बासुरी धारण करनी होगी और अपनी अधरों पर रखकर टेर लगानी होगी – उस बासुरी की खोज तो गोपियां भी कर रही हैं – वह बांसुरी जो द्वारका में खो गई है – वह बांसुरी जो कभी गोपियों की प्रतिस्पर्धिनी थी तभी तो गोपियों ने कसम खाई थी –
‘मैं मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी, अधरा न धरौंगी’ – वही बांसुरी जो गोपियों के हृदय में एक हुक पैदा करती थी – वृदांवन के वन प्रांतर में सभी जीव-जगत-जड़ तथा चेतन को मुखरता प्रदान करती थी जिससे बांसुरी-सा सीधा सरल भारतवासी- के पाप-ताप का विनाश हो सके । आज सम्पूर्ण भारतवासी अपने हृदय – मन-प्राण की सम्पूर्ण शक्ति से, सम्पूर्ण भक्ति से पुकार रहा है – बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके वृजबाला ।

श्रीकृष्ण एक इतिहास नहीं है, एक कालखण्ड का नायक नहीं, यह हमारा वर्तमान भी है तथा भविश्य भी, ये त्रिकालावाधित स्वयं काल ही हैं – गीता का दर्शन किसी खास धर्म का दर्शन नहीं है । यह तो सम्पूर्ण मानव जाति की अखण्ड चेतना का अनन्तिम पड़ाव है  – *आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी*  है – हम कामना करते हैं कि अज्ञान की अंधरी कारा से, मोह की घनघोर निशा से, अन्याय, अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार, भय एवं भूख की बेडियों से जकड़ी हुई मानवता को मुक्ति दिलाने के लिये आज और अभी जन्म लो जिससे एक ऐसे संसार का निर्माण हो सके:-

‘‘जहाँ हृदय में निर्भयता हो और मस्तक अन्याय के सामने नहीं झुकता ;
जहां ज्ञान का मूल्य नहीं लगता ;
जहां संसार घरों की संकीर्ण दीवारों में खण्डित और विभक्त नहीं हुआ ;
जहां शब्दों का उद्भव केवल सत्य के गहरे स्त्रोत से होता है ;
जहां अनर्थक उद्यम पूर्णता के आलिंगन के लिए ही भुजाऐं पसारता है;
जहां विवेक की निर्मल जलधारा पुरातन रूढ़ियों के मरूस्थल में सूखकर लुप्त नहीं हो गई ;…………
प्रभु उस दिव्य स्वतंत्रता के प्रकाश में, मेरा देश जागृत हो ।
(गीतांजली)

श्रीकृष्ण ! तुम अब देर न करो

जय माणिक्य शास्त्री 

( धर्म शास्त्र विशेज्ञ )

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