पुष्प विधान

भगवान और पुष्प विधान

फूल सुंदरता के प्रतीक हैं, जो जीवन में उत्साह, उल्लास ओर उमंग भरते हैं। फूलों की सुगंध और सौंदर्य से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं ऐसी मान्यता है कि भगवान के प्रिय पुष्प अर्पित करने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनावांछित फल प्रदान करते हैं।यही वजह है कि पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास या विभिन्न पर्वों पर अपने-अपने इष्ट को पुष्प अर्पित करने का विधान है।

भगवान की पूजा-अर्चना में फूल अर्पित करना अति आवश्यक माना गया है। सभी मांगलिक कार्य और पूजन कर्म में फूलों का विशेष स्थान होता है। सभी देवी-देवताओं को अलग-अलग फूल प्रिय हैं। साथ ही कुछ फूल ऐसे है जो नहीं चढ़ाएं जाते। इसी वजह से बड़ी सावधानी से पूजा आदि के लिए फूलों का चयन करना चाहिए।

१. श्रीगणेश – पद्मपुराण, आचार रत्न में लिखा है कि ‘न तुलस्या गणाधिपम्‌’ अर्थात गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं! गणपतिजी को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः सफेद या हरी दूर्वा चढ़ाना चाहिए। दूर्वा की फुनगी में तीन या पाँच पत्ती होना चाहिए। भगवान गणेश को गुड़हल का लाल फूल विशेष रूप से प्रिय होता है। इसके अलावा चाँदनी, चमेली या पारिजात के फूलों की माला बनाकर पहनाने से भी गणेश जी प्रसन्न होते हैं।

२. शंकरजी- भगवान शंकर को धतूरे के पुष्प, हरसिंगार, व नागकेसर के सफेद पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, कुसुम, आक, कुश आदि के पुष्प चढ़ाने का विधान है।शिवजी की पूजा में मालती, कुंद, चमेली, केवड़ा के फूल वर्जित किए गए हैं।भगवान शंकर पर फूल चढ़ाने का बहुत अधिक महत्व है। तप, शील, सर्वगुण संपन्न वेद में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह शिव पर सौ फूल चढ़ा देने से प्राप्त हो जाता है।

जैसे दस स्वर्ण दान का फल एक आक के फूल को चढ़ाने से मिलता है, उसी प्रकार हजार आक के फूलों का फल एक कनेर से और हजार कनेर के बराबर एक बिल्व पत्र से मिलता है। समस्त फूलों में सबसे बढ़कर नीलकमल होता है।

३. सूर्य नारायण- इनकी उपासना कुटज के पुष्पों से की जाती है। इसके अलावा कनेर, कमल, चंपा, पलाश, आक, अशोक आदि के पुष्प भी प्रिय हैं। सूर्य उपासना में अगस्त्य के फूलों का उपयोग नहीं करना चाहिए।

४. भगवती गौरी- शंकर भगवान को चढऩे वाले पुष्प मां भगवती को भी प्रिय हैं। इसके अलावा बेला, सफेद कमल, पलाश, चंपा के फूल भी चढ़ाए जा सकते हैं।

५. श्रीकृष्ण- अपने प्रिय पुष्पों का उल्लेख महाभारत में युधिष्ठिर से करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मुझे कुमुद, करवरी, चणक, मालती, नंदिक, पलाश व वनमाला के फूल प्रिय हैं।

६. लक्ष्मीजी- इनका सबसे अधिक प्रिय पुष्प “कमल” है।पुष्पों में कमल का विशेष स्थान है। कमल का फूल सभी देवी-देवताओं को अतिप्रिय है। कमल की सुंदरता की महिमा इसी बात से सिद्ध होती है कि भगवान के नेत्रों की तुलना कमल के फूल से की जाती है।

कमल कीचड़ में उगता है और उससे ही पोषण लेता है, लेकिन हमेशा कीचड़ से अलग ही रहता है। कमल का फूल पूर्ण विकास दर्शाता है. सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन किस प्रकार जिया जाए. संसाररूपी कीचड़ में रहते हुए भी हमें किस तरह रहना चाहिए यह शिक्षा हम कमल से ले सकते हैं।

कमल की आठ पंखुडिय़ां मनुष्य के अलग-अलग 8 गुणों की प्रतीक हैं, ये गुण हैं दया, शांति, पवित्रता, मंगल, निस्पृहता, सरलता, ईर्ष्या का अभाव और उदारता। इसका आशय यही है कि मनुष्य जब इन गुणों को अपना लेता है तब वह भी ईश्वर को कमल के फूल के समान प्रिय हो जाता है।

७. विष्णुजी- इन्हें कमल, मौलसिरी, जूही, कदम्ब, केवड़ा, चमेली, अशोक, मालती, वासंती, चंपा, वैजयंती के पुष्प विशेष प्रिय हैं। प्रात: काल स्नानादि के बाद भी देवताओं पर चढ़ाने के लिए पुष्प तोड़ें या चयन करें। ऐसा करने पर भगवान प्रसन्न होते हैं।

 

भगवान को कौन से पुष्प नहीं चढ़ाये

विष्णु और भगवान शिव को केवल केतकी (केवड़े) का निषेध है ।  सूर्य और श्रीगणेश के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं को बिल्व पत्र चढ़ाएं जा सकते हैं । सूर्य और श्री गणेश को बिल्व पत्र न चढ़ाएं । ‘गणेश तुलसी पत्र दुर्गा नैव तु दूर्वाया’ अर्थात गणेशजी की तुलसी पत्र और दुर्गाजी की दूर्वा से पूजा न करें ।

 

किस तरह के फूल पूजा में नहीं चढाने चाहिये?

* कीड़े लगे फूल, बासी फूल भगवान को न चढ़ाएं।

* बिखरे या पेड़ से जमीन पर गिरे फूल भी देव पूजा में ना चढ़ाएं।

* कली या अधखिले फूल भी अर्पित न करें।

* भगवान पर चढ़ा, उल्टे हाथ में रखा, धोती के पल्ले में बांधकर लाया और पानी से धोया फूल भी न चढ़ाएं ।

* पौधे पर जिस स्थिति में फूल खिलता है,उसी स्थिति में सीधे हाथ से भगवान को चढ़ाएं।

* फूलों को किसी टोकरी में तोड़कर लाएं ।

* सूखे फूल न चढ़ाएं ।

* बिना नहाए पूजा के लिए फूल कभी ना तोड़े । किसी भी देवता के पूजन में केतकी के पुष्प नहीं चढ़ाए जाते ।

एक अन्य बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है और वह यह कि कमल और कुमुद के पुष्प ग्यारह से पंद्रह दिन तक भी बासी नहीं होते । चंपा की कली के अलावा किसी भी पुष्प की कली देवताओं को अर्पित नहीं की जाती। केतकी के पुष्प किसी भी पूजन में अर्पित नहीं किए जाते । कुशा से मूर्ति पर जल न छिड़के ।

सार सबसे महत्व की बात यह है हम जो भी चढ़ाये उसमे भाव हो, बिना भाव के कोई भी चीज करना बेकार है । “पत्रं पुष्पं फलं , तोयं यो में  भक्त्या प्रयच्छति तदहं ………. अश्नामि प्रयतात्मनः ”

जो भी मुझे प्रेम से फूल, फल, जल अर्पित करता है मैं उसे स्वीकारता हूँ । और हमारा सुन्दर मन ही सुमन अर्थात पुष्प है । इसी सुन्दर मन को हम बड़े भाव से परमात्मा को अर्पित करे । भगवान इस सुमन से सबसे ज्यादा प्रसन्न होते है ।

चक्रपाणि त्रिपाठी ( धर्म शास्त्र विशेषज्ञ )

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