भागवत गीता और पुरुष स्तर

अरुण उपाध्याय (धर्म शास्त्र विशेषज्ञ )

 (१) परात्पर पुरुष-यह मूल कारण है, जिसमें भेद नहीं होने के कारण इसका वर्णन नहीं हो सकता है। इसका उल्लेख उपवर्णन कहते हैं-

एवं गजेन्द्रमुपवर्णित निर्विशेषं (गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र के बाद शुकदेव जी का मन्तव्य-श्रीमद् भागवत, ८/३/३०)

अन्य ३ स्तर बोध गम्य हैं-

(२) क्षर पुरुष-जो स्थूल रूप दीखता है वह काल के साथ धीरे धीरे पुराना होकर (क्षय) समाप्त हो जाता है।

(३) अक्षर पुरुष-बाह्य रुप और रचना धीरे धीरे बदलने पर भी उसका कूटस्थ परिचय (नाम, गुण, कर्म) वही रहता है। अतः इसे अक्षर कहते हैं।

(४) अव्यय पुरुष-पूरे समाज या व्यवस्था को देखने पर कहीं कुछ घटता-बढ़ता नहीं है, एक जगह जो कम होता है, वह दूसरे स्थान पर बढ़ जाता है। अतः इसे अव्यय पुरुष कहते है। यह परिवर्तन के क्रम रूप में वृक्ष कहा है, मनुष्य के जन्मों का भी क्रम है।    

क्षर और अक्षर से उत्तम होने के कारण अव्यय को पुरुषोत्तम भी कहते हैं। वर्णनीय रूप में जगन्नाथ अव्यय पुरुष या पुरुषोत्तम हैं। कृष्ण योगेश्वर अवस्था में भगवान् थे, गीता में उनको भगवान् कहा है, अन्य स्थानों में नहीं। उन्होंने जन्म से ही चमत्कार आरम्भ कर दिया था। किन्तु श्री राम सदा पुरुष मर्यादा में रहे, ऐसा कुछ नहीं किया जो पुरुष के लिये असम्भव हो। अतः जगन्नाथ का भगवान् रूप कृष्ण तथा पुरुषोत्तम रूप राम हैं। पुरुषोत्तम रूप में लोक और वेद (दोनों सदा साथ-साथ हैं) में प्रथित होने के कारण एक (१) का विशेषण प्रथम होता है तथा वजन करते समय १ के बदले में राम कहते हैं।

गीता, अध्याय १५-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥

यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥

४ पुरुषों के ४ प्रकार के काल हैं। काल की कई परिभाषा विभिन्न दर्शनों में है। इसे परिवर्तन का आभास कह सकते हैं। क्षर पुरुष में सदा परिवर्तन होता है अतः इसका काल नित्य काल है। जो परिवर्तन हो गया, वह वापस नहीं आयेगा, बूढा होने पर पुनः युवक या बालक नहीं हो सकता है। अतः नित्य काल का अर्थ मृत्यु भी है।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः (गीता, ११/३२)

 कई परिवर्तन चक्रीय क्रम में होते हैं। प्राकृतिक चक्र हैं, दिन-रात्रि, मास, वर्ष। इसी चक्र में मनुष के भी यज्ञ होते हैं, जो अक्षर पुरुष का कार्य है। इसी चक्र के काल से काल की माप होती है। इस चक्र में जनन या यज्ञ द्वारा उत्पादन होता है, अतः इसे जन्य काल कहते हैं।

कालः कलयतामहं (गीता, १०/३०)

 पूरी संस्था देखने पर कोई परिवर्तन नहीं होता, अतः अव्यय पुरुष का अक्षय काल है। अक्षय काल के पुरुष को ग्रन्थ साहब में अकाल पुरुष कहा गया है।

अहमेवाक्षयो कालः धाताऽहं विश्वतोमुखः (गीता, १०/३३)

परात्पर काल का अनुभव नहीं होता। इनका विस्तृत वर्णन भागवत पुराण(३/११) अध्याय में है। 

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