भारतीय इतिहास का कालक्रम

अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)
तथाकथित स्वीकृत कालक्रम का की वैज्ञानिक या साहित्यिक आधार नहीं है। यह केवल अंग्रेजों की जालसाजी है, जो उन्होंने जानबूझ कर की थी। पर बिनाकोई भारतीय साहित्य पढ़े उनकी नकल करने वाले भारतीयों को यह पता भी नहीं है कि उनके द्वारा लिखित कालक्रम कहां से आया। किसी भी सामान्य साक्षर बच्चे के लिये यह जालसाजी स्पष्ट है जिसने एक भी भारतीय पुस्तक पढ़ी हो। इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं-
(१) मैं ६ वर्ष की आयु में भारतीय पञ्चाङ्ग देकना जानता था। पर अभी तक किसी भी भारतीय इतिहासकार ने विक्रम संवत् या शालिवाहन शक का नाम नहीं सुना है। कालक्रम को नष्ट करना था अतः जितने लोगों ने अंग्रेजों की इच्छा के विरुद्ध शक या संवत् आरम्भ किया उनको काल्पनिक कह दिया।
(२) भगवान् राम और कृष्ण के बाद सबसे अधिक साहित्य संवत् प्रवर्त्तक विक्रमादित्य (५७ ई.पू.) के विषय में है। वे उज्जैन के परमार वंशीय राजा थे जिनके राज्य में १८० जनपद थे। उनके पौत्र शालिवाहन ने अपना शक आरम्भ किया। उसके पूर्व विक्रमादित्य के समय ६१२ ई.पू. का चाहमान शक चल रहा था जिसका प्रयोग वराहमिहिर (बृहत् संहिता, १३/३) तथ उनके समकालीन जिष्णुगुप्त के पुत्र ब्रह्मगुप्त ने किया है। किन्तु ७८ ई. के शालिवाहन शक को १२९२ ई.पू. के कश्मीर के गोनन्द वंशीय राजा कनिष्क (राजतरङ्गिणी, तरङ्ग, १) का बना दिया तथा उसको भारतीय राजा के बदले शक राजा घोषित कर दिया। अल बरूनि ने प्राचीने देशों के कैलेण्डर नामक पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी शक राजा ने अपना कोई कैलेण्डर नहीं चलाया था, वे ईरान या सुमेरिया का कैलेण्डर व्यवहार करते थे। य्दि मध्य एशिया के शकों ने कुच समय पश्चिमोत्तर भारत में अपना शक चलाया होता तो उसका उसी क्षेत्र में १०० या २०० वर्षों के लिये प्रयोग होता। पर उनका प्रयोग कम्बोडिया तथाफिलीपीन के लुगुना लेख में भी है तथा सभी ज्योतिष पुस्तकों में गणना के लिए उसी शक का प्रयोग होता है। शक तथा संवत् के विषय में अज्ञान के कारण वर्त्तमान भारतीय शासन द्वारा चलाया गया तथाकथित राष्ट्रीय शक संवत् अभी तक नहीं चल पाया है किन्तु राजाओं को काल्पनिक कहते हैं, उनका शक तथा संवत् अभी तक चल रहा है और उसी के अनुसार भारत में सभी पर्व होते हैं।
(३) एक और प्रचार है कि भारतीय लोग तिथि नहीं देते थे। अल बरूनि ने इसके विषय में भी लिखा है कि भारत के अतिरिक्त अन्य कहीं भी क्रमागत तिथि का कैलेण्डर नहीं था। सुमेरिया, मिस्र, ईरान, यूनान में केवल राजाओं के वर्ष की गणना करते थे जिसमें १०० वर्ष में ३-४ वर्ष तक की भूल होती थी। जहां वर्ष-मास-दिन की क्रमागत गणना थी ही नहीं, वहां के लोग तिथि कैसे दे सकते थे? ग्रीस के मेगास्थनीज, एरियन, सोलिनस, प्लिनी आदि ने लिखा है कि भारत की गणना के एनुसार सिकन्दर के आक्रमण से भारतीय राजाओं की १५४ पीढ़ी पूर्व या ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व बाक्कस का आक्रमण हुआ था। इतना पुराना कैलेण्डर भारत के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं था अतः उस समय उपलब्ध भारतीय साहित्य के अनुसार यह कलक्रम दिया गया। उसके अतिरिक्त यह भी लिखा था कि भारत सभी चीजों में स्वावलम्बी था, अतः पिछले १५,००० वर्ष से भारत ने किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया। यह समय भी महाभारत, उद्योग पर्व (२०३/८-१०) में दिया है कि कार्त्तिकेय ने नया कैलेण्डर तब आरम्भ किया जब उत्तरी ध्रुव अभिजित से दूर हट रहा था तथा धनिष्ठा से वर्षा आरम्भ होती थी (१५८०० ई.पू.)। कार्त्तिकेय ने ही क्रौञ्च द्वीप पर आक्रमण किया था जो सिकन्दर आक्रमण से १५,४०० वर्ष पूर्व है। इसे ग्रीक लेखकों ने १५,००० वर्ष लिखा है। इसमें से एक शून्य हटा कर मैक्समूलर ने १५०० ई.पू. में वैदिक सभ्यता का आरम्भ कर दिया और ऋग्वेद से सामवेद तक हर वेद को २-२०० वर्ष का कोटा दे दिया। उसके बाद मैकक्रिण्डल ने १९२७ में मेगास्थनीज की इण्डिका का नया संस्करण लिखा जिसमें १५००० वर्ष पूर्व उल्लेख को हटाया गया। उसके अनुसार ८२४ ई.पू. में असीरिया के राजा नबोनासर के आक्रमन के बाद ७५६ ई. में रानी सेमीरामी ने उत्तर अफ्रीका तथा मध्य एशिया के सभी राजाओं की ३५ लाख की संयुक्तसेना के साथ आक्रमण किया, जिसे रोकने के लिये मालव गण बना था तथा इनमें एक भी जीवित नहीं लौट पाया था। पर लिखा गया कि इसके १५० वर्ष बाद भारत में १६ महाजनपद हुए। बिना राजा या राज्य के ३५ लाख की सेना को किसने मारा? १७७६ में विलियम जोन्स तथा पार्जिटर ने विक्रम संवत् तथा अन्य संवतों की गणना की थी तथा राबर्ट सीवेल ने भारतीय कालक्रम पर विशाल पुस्तक भी शंकर बालकृष्ण दीक्षित की सहायता से लिखी। पर भारत का वैदिक इतिहास १५०० .पू. के बाद का करने के लिये ३२६ई.पू. में गुप्त काल का आरम्भ होने के बदले मौर्य काल को १३०० वर्ष पीछे हटा कर उसे सिकन्दर के आक्रमण के समय कर दिया। इसके लिये मालव गण का पूरा इतिहास ही उड़ा दिया जिसके राजाओं ने विक्रमादित्य से पृथ्वीराज चौहान तथा परमार भोज तक शासन किया था। मालव गण का स्पष्ट उल्लेख मेगास्थनीज आदि ने किया है कि बाक्कस तथा सिकन्दर के बीच में दो बार भारत में गणराज्य थे-पहले १२० वर्ष का, बाद में ३०० वर्ष का। १२० वर्ष का गणराज्य परशुराम के समय के २१ गणतन्त्र थे जो ६१७७ ई.पू. में उनकी मृत्यु तक थे। उस समय से अब तक केरल में कलम्ब (कोल्लम) संवत् चल रहा है। दूसरा मालव गण था जो शूद्रक शक (७५६ ई.पू.) से श्रीहर्ष शक (४५६ ई.पू.) तक था। मूढ़ता की पराकाष्ठा यह है कि भारतीय विद्वत् परिषद् के अध्यक्षों में एक एन पी जोशी ने पुणे के भण्डारकर प्राच्य संस्थान से शूद्रक पर पीएचडी किया तथा कनाडा-अमेरिका में ३५ वर्ष तक शूद्रक का मृच्छकटिकम् पढ़ाते रहे, पर उनको भारतीय साहित्य में शूद्रक का उल्लेख नहीं मिला। रमेश चन्द्र मजूमदार ने भी भारतीय इतिहास की जो प्रथम पुस्तक लिखी थी उसमें पिलिनी के अनुसार आन्ध्रवंशी राजाओं की सेना कावर्णन किया था, जो मेगास्थनीज पर आधारित था। इससे स्पष्ट है कि आन्ध्र वंश के अन्त में सिकन्दर आया था जब गुप्त वंश का आरम्ब हुआ था। गुप्त वंश के प्रथम राजा चन्द्रगुप्त के पिता घटोत्कच गुप्त आन्ध्र राजाओं के सेनापति थे जिनको ग्रीक लेखकों ने नाई लिखा है। घटोत्कच का शाब्दिक अर्थ है जिसके घट या सिर पर बाल नहीं हो, इसका अर्थ लगाया कि वह बाल काटने वाला था। उसके बाद के भी ३ राजाओं का नाम भी लिखा है-घटोत्कच (नाई-barber), Agramasa (Xandramasa) = चन्द्रबीज (चन्द्रश्री, आन्ध्रवंश का ३१ वां राजा, जिसका घटोत्कच सेनापति था। बाद के २ बच्चों को नाम के लिये राजा बनाया था।, Sandrocottusa = चन्द्रगुप्त-१, Sandrocryptus = समुद्रगुप्त, Amitrochades = अमित्रोच्छेदस (चन्द्रगुप्त द्वितीय ने दिग्विजय किया था, अतः उसे अमित्रों का उच्छेद करने वाला कहते थे)| मजूमदार को मेगास्थनीज के अनुसार आन्ध्रवंश का वर्णन करने के लिये डांट पड़ी (प्राचीन भारत का इतिहास, पृष्ठ, १३५), तो उनकी सहायता के लिए कालीकिंकर दत्त तथा हेमचन्द्र रायचौधरी ने उनके साथ एक नयी पुस्तक लिखी जिसे सिलेबस में लगाया गया। इसी प्रकार भण्डारकर प्राच्य संस्था की पत्रिका के सम्पादक देवसहाय त्रिवेद ने पत्रिका में भारतीय इतिहास का सही कालक्रम पुराणों के अनुसार लिखा तो उनको नौकरी से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने ही मत के खण्डन के लिये एक पुस्तक लिखी प्राङ्मौर्य बिहार जिसे भण्डारकर संस्था ने नहीं छापा, अतः बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से छपी। किन्तु उनकी सहायता के लिए कालीकिंकर दत्त या रायचौधरी जैसे अंग्रेज भक्त नहीं मिले, अतः पुनः उनको नौकरी नहीं मिल पायी। उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक ने इतिहास के लिये लिखा कि सिकन्दर आक्रमण के समय मौर्य वंश था, पर वही लेखक आन्ध्र गौरव के वर्णन के लिए मेगास्थनीज द्वारा आन्ध्र राजाओं का वर्णन लिखे थे। तिरुपति में मेरे व्याख्यान में उन्होंने भारतीय कालक्रम का विरोध किया तो नेट पर खोजने पर उन्हीं के २ प्रकार के विरोधी वर्णन मिले। पर नौकरी बचाने के लिए झूठा लिखना बहुत जरूरी है।
(४) पुराणों ही भारतीय कालक्रम का एकमात्र आधार है। जो लोग समझते हैं कि केवल शिलालेख से राजाओं का काल पता चला तो वे अपनी मृत्यु तथा अपने वंशजों की मृत्यु का कालक्रम लिख कर दिखा दें। मौर्य अशोक के २४ शिलालेख हैं, किन्तु वह कैसे लिख सकता था कि मैं ३६ वर्ष राज्य करने के बाद मर गया तथा उसके बाद १० वंशजों ने इतने वर्ष राज्य किया?
(५) पुराणों में मुख्य राजाओं का ही वर्णन है, जिनका संस्करण उज्जैन में विक्रमादित्य के काल में हुआ, अतः उनके समय तक के ही राजाओं का वर्णन है। उसके आधार पर कलियुग राजवृत्तान्त नामक पुस्तक में सभी राजाओं का विस्तार से वर्णन हुआ। इसे भविष्योत्तर पुराण भी कहते हैं।
(६) भारतीय कालक्रम के अनुसार पण्डित भगवद्दत्त ने १९४५ में लाहौर से भारत वर्ष का बृहत् इतिहास २ खण्ड में लिखा तथा भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास १ खण्ड में लिखा। विभाजन के समय शान्तिदूतों ने उनका पूरा पूरा संग्रह जला दिया जैसा आरम्भ से नालन्दा विश्वविद्यालय आदि जला कर करते रहे हैं। बाद में उनके वंशजों ने दिल्ली के पंजाबी बाग के प्रणव प्रकाशन से उनको पुनः प्रकाशित किया। उसके बाद विजयवाड़ा के पण्डित कोटा वेंकटाचलम ने कई पुस्तकें लिखी-Chronology of Ancient Hindu History (2 volumes), The Plot in Indian Chronology, Chronology of Nepal, Chronology of Kashmir-Reconstructed, Age of Mahabharata War, Age of Buddha, Milinda, Antiyok-Yugapurana, Historicity of Vikramaditya and Shalivahana| उसके बाद १९८५-९३ तक पुणे के श्रीपाद कुलकर्णी ने थाणे के पंचपखाड़ी के अपने घर में Shri Bhagavan Vedavyasa Itihasa Samsodhana Mandira (Bhishma) संस्था स्थापित कर १८ खण्डों में भारतीय इतिहास का सम्पादन किया जिसमें उनके कई सहायक भी थे-आन्ध्र प्रदेश के पूर्व आईएएस (स्व.) ई. वेदव्यास (हैदराबाद में वेदव्यास भारती के संस्थापक), इंजीनियर आर. पी. कुलकर्णी। भारत वर्णन के घोर अपराध के कारण इसे भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में रखा गया है, किन्तु Google Books द्वारा खरीदने के लिये उपलब्ध हैं। मैंने कुलकर्णी जी को शंकराचार्य काल के विषय में मन्तव्य के लिये पत्र लिखा था जो उनके देहान्त के २ दिन बाद मिला। उनके पौत्र ने श्राद्ध के बाद सभी १८ खण्ड मुझे भेज दिये तथा कहा कि यदि मेरी इच्छा हो तो उनको ६५०० रुपये लागत खर्च दे दूं, जो मैंने बाद में भेजा। भारत के अन्य इतिहास संशोधन करने वाले भी इन पुस्तकों का नाम लेना नहीं चाहते। इन्होंने बिना कोई भारतीय इतिहास पढ़े केवल अंग्रेज जालसाजी की नकल की है। सेवानिवृत्ति के बाद शासन का रूख देख कर अचानक राष्ट्रवादी बन गये हैं तथा केवल अपने नाम से शोध करना चाहते हैं, भगवद्दत्त या कुलकर्णी का कोई नाम भी इनके सामने नहीं ले सकता। २०१० में कृपालु जी महाराज के शिष्य स्वामी प्रकाशानन्द (भौतिक विज्ञान के छात्र) ने True-History-and-Religion-of-India नामक पुस्तक लिखी जो मैकमिलन से प्रकाशित हुयी। यह वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। इस अपराध के लिये ८४ वर्ष की आयु में उनके विरुद्ध बहुत से बलात्कार के केस हुए, पुस्तक लिखने तक वे सच्चरित्र थे। सौभाग्य से कुछ समय बाद उनकी स्वाभाविक मृत्यु हो गयी नहीं तो सभी मानवाधिकार नेता तथा न्यायालय उनको जेल में ही रखते।

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