भारतीय मीडिया और अपराध

भारतीय मीडिया और अपराध

वर्तमान में एक सवाल यह पूछा जा रहा है कि मीडिया, विशेषकर सिनेमा, टीवी व वीडियो की हिंसा कहीं वास्तविक जीवन में भी तो हिंसा नहीं बढ़ा रही है। इस संदर्भ में एक चर्चित अध्ययन सीइया मोरिता द्वारा किया गया है। इसमें उन्होंने बताया है कि जापान में जब हिंसक सेक्स की वीडियो की बिक्री ज्यादा हुई तभी यौन अपराध भी ज्यादा बढ़े। इतना ही नहीं, अनेक यौन अपराधियों ने स्वीकार किया कि ऐसे वीडियो देखते समय उनमें इच्छा उत्पन्न हुई कि जैसे वीडियो में दिखाया गया है वैसा ही कुछ वे करें।
कुछ समय पहले पुणे में एक दर्दनाक घटना में तीन कच्ची उम्र के युवाओं ने अपने ही एक दोस्त का अपहरण किया और उसकी हत्या कर दी। पूछताछ से पता चला कि उनका यह अपराध टीवी के एक सीरियल से प्रभावित था जिसे वे बड़े ध्यान से देखते थे। यह घटना दर्दनाक तो बहुत है, पर नई नहीं है। ऐसे कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं।
चेन्नई के एक प्रतिष्ठित स्कूल में एक विद्यार्थी द्वारा अपने अध्यापक की हत्या की हाल की दर्दनाक घटना के बारे में कहा गया है कि यह एक हिंदी फिल्म से प्रभावित थी। अमेरिका के कुख्यात हाईस्कूल हत्याकांड में जिन दो छात्रों ने 12 अन्य छात्रों व एक अध्यापक की हत्या की, उनके बारे में बाद में बताया गया कि उन्हें हिंसक विडियो गेम की लत थी।
कुछ समय पहले कलकत्ता के चंद युवकों ने मिलकर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की हत्या कर दी। यह वारदात कुछ ही दिन पहले टीवी पर दिखाए गए हत्याकांड से प्रभावित थी। इनमें से एक हत्यारे युवक के सामान में से उसके द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग भी मिली। इस चित्र में टीवी में हाल ही में दिखाए गए एक डरावने कार्यक्रम का दृश्य दिखाया गया था। एक हिंदी फिल्म से प्रभावित होकर कुछ समय पहले दिल्ली के एक स्कूली छात्र ने अपने अपहरण का नाटक कर अपने अभिभावकों व पुलिस दोनों के लिए काफी मुसीबत पैदा की।
सैनडियागो में हाईस्कूल के छात्र ने टीवी में एक हत्याकांड देखकर अपने ही परिवार के तीन सदस्यों की हत्या कर दी। इस केस की सुनवाई करने वाले जज ने कहा कि संभवत: इस वीभत्स अपराध में हिंसक वीडियो फिल्म की भी जिम्मेदारी थी। एक अमेरिकी टीवी सीरियल में बम बनाने की प्रक्रिया देखने के बाद फ्रांस के एक युवक ने भी बम बनाने का प्रयास किया, पर इस कारण हुए विस्फोट में स्वयं मारा गया।
इन उदाहरणों के अतिरिक्त अनेक विस्तृत अध्ययन भी यह बता चुके हैं कि सिनेमा/टीवी/विडियो का समाज पर खतरनाक असर पड़ सकता है। ब्रिटेन में प्रो. एलिजाबेथ न्यूसन की अध्यक्षता में 25 बाल मनोवैज्ञानिकों ने कहा है कि टीवी और वीडियो फिल्मों में दिखाई जा रही हिंसा का बच्चों और युवाओं में हिंसक प्रवृत्तियां बढ़ाने की दृष्टि से निश्चित असर पड़ता है। उन्होंने खेद प्रकट किया है कि टीवी और विडियो पर कितनी अधिक और कितनी अनुचित तरह की हिंसा और क्रूरता दिखाई जाती है लेकिन इसके संभावित दुष्परिणामों की ओर मनोवैज्ञानिकों ने आवश्यक ध्यान नहीं दिया है, या उन्हें वास्तविकता से कम आंका है। विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टीवी पर हिंसा व उसके दुष्परिणामों को केवल परिवार के स्तर पर प्रयासों से नहीं रोका जा सकता है, समाज को इसे नियंत्रित करने के लिए कड़े कानून बनाने होंगे।
अमेरिका में प्रो. सेंटरवेल और उनके सहयोगियों ने अनेक वर्षो के अध्ययन के बाद इस विषय पर जो निष्कर्ष निकाले हैं वे तो और भी चौंकाने वाले हैं। अमेरिका और कनाडा में 1950 के दशक में टीवी का प्रसार दूर-दूर तक हुआ। इसके अगले दो दशकों में यहां हत्याओं की दर लगभग दोगुनी हो गई व इसके लिए इस अध्ययन में महत्वपूर्ण रूप से टीवी को दोषी पाया गया है। केवल हत्याएं ही नहीं, अन्य अपराध भी टीवी से बढ़े हैं। सेंटरवेल अध्ययन बताता है कि यदि टीवी (व उस पर दिखाई हिंसा) का प्रसार न हुआ होता तो घायल करने वाले हमलों की संख्या सात लाख प्रतिवर्ष कम होती व बलात्कारों की संख्या 70 हजार प्रतिवर्ष कम होती।
सवाल यह है कि जब इस तरह के महवपूर्ण अध्ययन हमारे सामने हैं तो हम सिनेमा/टीवी/विडियो पर दर्शाई गई हिंसा और अपराध के समाज पर संभावित दुष्परिणामों के बारे में अधिक सचेत क्यों नहीं है? टीवी कार्यक्रमों पर आधारित बड़े अपराध तो कभी-कभी ही चर्चा का विषय बनते हैं, पर दैनिक जीवन में अधिक आक्रामकता का चलन तो आसपास के माहौल में कुछ और स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
अमेरिकी बच्चों के बारे में कहा गया है कि 16 वर्ष की आयु होने तक औसतन वे टीवी पर 33 हजार हत्याएं व दो लाख हिंसक घटनाएं देख चुके होते हैं। इस कारण दैनिक जीवन में आक्रामकता बढ़ने के साथ-साथ हिंसा और उसके दुष्परिणामों के प्रति उनके मन में स्वाभाविक विरोध कम हो जाता है और वे उन्हें अधिक आसानी से स्वीकार करने लगते हैं। यह समस्या अब केवल पश्चिमी देशों की नहीं है। अब किसी भी समय अपने यहां के टीवी चैनलों की सर्फिग कर देख लीजिए, उसमें आपको कोई हिंसा की ऐसी वारदात नजर आ ही जाएगी।
संभावित दुष्परिणामों के प्रति सचेत न होने के कारण कई बार इस ओर ध्यान ही नहीं जाता कि विभिन्न फिल्मों या सीरियलों से किस तरह के चिंताजनक परिणाम आ सकते है। टीवी व फिल्मों से अपराध बढ़ने की संभावना तब अधिक होती है जब टीवी या फिल्मों में अपराध व हिंसा को बहुत आकषर्क ढंग से दिखाया जाए या अपराध के तौर-तरीकों को बहुत विस्तार से दिखाया जाए।
आज जब टीवी व विडियो हमारे दैनिक जीवन का जरूरी हिस्सा बनते जा रहे हैं व इसके साथ ही प्रतिदिन दर्जनों फिल्मों का प्रवेश किसी भी घर-परिवार में हो रहा है, तो हमें इस बारे में अधिक सचेत होने की जरूरत है कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली इस तरह की हिंसा व अपराध समाज के लिए अधिक खतरनाक हो सकते हैं, ताकि इस पर कुछ जरूरी नियंत्रण व सीमा लग सके।
मीडिया की आजादी बहुत जरूरी है, पर इसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। इन दोनों में तालमेल बिठाने से ही उचित संतुलन बन सकेगा। दर्शक व अभिभावक के रूप में हमें स्वयं भी अधिक जागरूक बनना पड़ेगा कि हमारे लिए व हमारे बच्चों के लिए कौन से कार्यक्रम खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं।
इंटरपोल की मोनाको में हुई आमसभा की 100वीं बैठक में सोशल मीडिया की गूंज हो रही है। इंटरपोल का सदस्य कोई भी देश ऐसा नहीं है, आज जिसका फोकस सोशल मीडिया पर नहीं है और जो इंटरनेट युग के साइबर अपराध से न घबराया हुआ हो। दुनिया में जहां कुछ लोग सोशल मीडिया की तुलना एक ‘छुट्टे सांड’ से कर रहे हैं, वहीं अधिकांश देशों का सोचना है कि दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वछंद क्रांति आ गई है, जोकि सत्ता और व्यवस्था के लिए परिर्वतनकारी है और जिसे केवल कानून से ही नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इंटरपोल के सदस्य देशों की राय है कि सोशल मीडिया के शक्तिशाली होने से जनसामान्य के बीच टीवी चैनलों या प्रिंट मीडिया की अब ज्यादा चल नहीं पाएगी, शासनतंत्र को भी सच्चाई के साथ खड़ा होना होगा, किसी बात को दबाने के लिए बीच का रास्ता अपनाने के दिन अब लद गए हैं।
इंटरपोल की आमसभा में कई सदस्य देशों ने अपनी-अपनी बारी पर कहा कि सभी प्रकार की जागरूकता से पहले ही इंटरनेट ने घर-घर में कदम रख दिया है। जिन देशों ने इंटरनेट या सोशल मीडिया को उसी अंदाज में निपटने की कोशिश की है, उसका खामियाजा कुछ एशियाई देशों में देखने को मिला है, जहां उसपर प्रतिबंध के असर ने और ज्यादा विध्वंस किया है। कुछ देशों ने जागरूकता स्वरूप सोशल मीडिया और इंटरनेट को प्रारंभिक शिक्षा से ही जोड़ने की वकालत की है। इंटरपोल के सदस्यों की धारणा है कि टीवी चैनलों या प्रिंट मीडिया का प्रभाव गिर रहा है, क्योंकि वे किसी न किसी घरानों या औद्योगिक समूहों से नियंत्रित हैं, जबकि सोशल मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है और युवा पीढ़ी के हाथ में एक हथियार की तरह है, इसकी कोई भौगोलिक सीमा भी नहीं है।
भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मोनाको में इंटरपोल की आमसभा की 100वीं बैठक में भाग लिया था और ‘समकालीन आपराधिक प्रवृत्तियां और पुलिस सहयोग के समक्ष नई चुनौतियां’ विषय पर कहा था कि भारतीय दर्शनशास्त्र की नीति ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का अर्थ है पूरा विश्व एक परिवार है। राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत सिर्फ अपने कल्याण में नहीं, बल्कि पूरे विश्व के कल्याण में विश्वास रखता है। उन्होंने दोहराया कि भारत अपराध और विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध से निपटने के लिए कानूनी सहयोग की दिशा में मजबूत अंतर्राष्ट्रीय संबंध का पक्षधर है। उन्होंने महान भारतीय आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद के कथन को उद्धत किया ‘समाज का पतन आपराधिक गतिविधियों से नहीं, बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता से होता है।’
डॉ. निशांत सिंह ( लेखक )

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