भारतीय संस्कृति और मानव अधिकार

भारतीय संस्कृति और मानव अधिकार

मानव अधिकार की भावना केवल भारतीय संस्कृति में है। यहां देव संस्कृति का उद्देश्य है अपने लिये उत्पादन करो और सन्तुष्ट रहो। इस के विपरीतअसुर संस्कृति का उद्देश्य रहा है कि बल पूर्वक लूट लो। असुर संस्कृति सदा से मानवाधिकार के विरुद्ध रही है। पूरे विश्व का यथासम्भव विनाश करने के बाद अब वे भारत तथा हिन्दू धर्म की सभी चीजों में दोष दिखा रहे हैं तथा मानव अधिकारों का उपदेश दे रहे हैं।

बाइबिल और कुरान में कहा है कि सभी पदार्थ और जीव मनुष्य के उपभोग के लिये हैं, या स्त्री भगवान् की कृति नहीं है, वह मनुष्य की जांघ की हड्डी से बनी है। स्त्री को निर्जीव सम्पत्ति के रूप में मानना असुर परम्परा रही है जिसका उल्लेख दुर्गा सप्तशती में है-(शुम्भ सन्देश) रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥१११॥

स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्। सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥११२॥

किन्तु भारत में स्त्री पुरुष को बराबरी का मानते थे-

(दुर्गा) यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥१२०॥

बाइबिल में-Genesis (1/27-28)-God created man in his [own] image, — (28) And God blessed them, and God said unto them, Be fruitful, and multiply, and replenish the earth, and subdue it: and have dominion over the fish of the sea, and over the fowl of the air, and over every living thing that moveth upon the earth.

Genesis (2:22) And the rib, which the LORD God had taken from man, made he a woman, and brought her unto the man.

(१) देव-असुर-चक्रीय क्रम में उपयोगी वस्तु का उत्पादन यज्ञ है। मनुष्य सभ्यता सदा चलती रहे इसके लिये यज्ञ चक्र सदा चलना चाहिये, केवल उसका बचा भाग उपभोग करना चाहिये।

गीता, अध्याय ३-सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरो वाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥१०॥

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ॥१३॥

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥१६॥

मूल यज्ञ कृषि है जिसके अन्न से मनुष्य का जीवन चल रहा है-गीता, अध्याय ३-

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४॥

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥१५॥

एक यज्ञ से बाकी सभी यज्ञों में सहायता मिलती रहे तो साध्य लोग उन्नति के शिखर पर पहुंच कर देव बन जाते हैं-

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (पुरुष-सूक्त, यजुर्वेद ३१/१६)

इसके विपरीत असुर का अर्थ है जो केवल असु (= बल) के द्वारा दूसरों की सम्पत्ति पर कब्जा करते हैं। वे भी यज्ञ करते थे पर अन्य यज्ञों में सहायता के लिये नहीं, बल्कि दूसरों के नाश के लिये।

मेगास्थनीज ने भी लिखा है कि भारत के लोग अन्न तथा सभी चीजों का पर्याप्त उत्पादन करते थे, अतः भारत को अन्य देशों पर आक्रमण की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसके कहने का अर्थ है कि सिकन्दर से लेकर अंग्रेजों ने केवल लूटने के लिये भारत पर आक्रमण किया था, भारत के उद्धार के लिये नहीं।

Megasthenes: Indika

http://projectsouthasia.sdstate.edu/docs/history/primarydocs/Foreign_Views/GreekRoman/Megasthenes-Indika.htm

(37) The inhabitants, in like manner, having abundant means of subsistence, exceed in consequence the ordinary stature, and are distinguished by their proud bearing. ,… Owing to this, their country has never been conquered by any foreign king:

(38) It is said that India, being of enormous size when taken as a whole, is peopled by races both numerous and diverse, of which not even one was originally of foreign descent, but all were evidently indigenous; and moreover that India neither received a colony from abroad, nor sent out a colony to any other nation.

(२) अदिति-दिति-अदिति की सन्तान आदित्य या देव हैं। दिति की सन्तान दैत्य हैं। दिति का अर्थ है काटना। आकाश में चन्द्र कक्षा के मार्ग को २७ नक्षत्रों में काटा गया है जिनको चन्द्र की पत्नी कहा है-वह भी दिति है। यह दक्ष विभाग भी कहते हैं, अतः दिति को दक्ष की पुत्री कहा है। (विष्णु पुराण, १/१५/७८ आदि)। दिति के वंशजों ने विश्व को कई भाग में बांट रखा है-

उनके पैगम्बर को मानने वाले अच्छे हैं, बाकी सभी काफिर हैं, जिनकी हत्या होनी चाहिये।

पैगम्बर से पहले कुछ नहीं था, उसके बाद ही समाज व्यवस्था हुई।

उनके भगवान ही एकमात्र भगवान् हैं, बाकी भगवान् को माननेवाले पापी हैं।

अपने भगवान् या दूत की मूर्त्ति लगाना या गले में लटकाना अच्छा है। अपने तीर्थों काबा, मदीना आदि का फोटो रखना चाहिये। बाकी सभी मूर्त्ति पूजक और पापी हैं।

जो उनके मत को मानने वाले नहीं हैं, उनके जीवन और सम्पत्ति पर इनका अधिकार है।

इस प्रकार धर्म या अधर्म की व्याख्या के कारण इसाइयों ने ३ महादेशों उत्तर और दक्षिण अमेरिका की पूरी आबादी की हत्या कर दी तथा अफ्रीका की आधी आबादी को गुलामों के रूप में बेच डाला। आज भी खनिज साधनों पर कब्जा तथा व्यापार में असन्तुलन द्वारा लूट जारी है। अकबर के इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार इस्लाम ने भी भारत में ही ८ करोड़ लोगों की हत्या  की है तथा सभी विद्यालयों, मन्दिरों आदि को नष्ट कर दिया जिस पर वे गौरव करते हैं।

इसके विपरीत अदिति का अर्थ है, सृष्टि का अनन्त चक्र-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (ऋक् १/१८९/१०, अथर्व ७/६/१, वा. यजु. २५/२३ आदि)।

देव सभ्यता में यह कामना नहीं है कि बाकी मत वाले लोगों का नाश हो, बल्कि सबकी उन्नति की कामना करते हैं-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग् भवेत्॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु॥

भारत तथा हिन्दुओं की हर परम्परा की निन्दा की जाती है जिससे हम सभी आदर्श छोड़ दें। सबसे अधिक निन्दा वर्णाश्रम तथा मूर्ति पूजा की की जाती है। भारत में मूर्ति पूजा का अर्थ यह नहीं है कि हम केवल ईसा और मेरी की मूर्ति बनायें तथा क्रास लटकायें, बाकी को मार दें। यहां हर मन्दिर में मुख्य देव के साथ बाकी सभी की मूर्ति होती है। दुर्गा पूजा करने वाला शिव मन्दिर को नहीं तोड़ता है।

विश्व के हर भाग में आरम्भ से समाज व्यवसाय तथा सामाजित राजनैतिक अधिकार के अनुसार कई भागों में बंटा हुआ है। पर केवल भारत में कहते हैं कि जाति प्रथा के कारण भारत नष्ट हो गया। क्या राम के समय जाति प्रथा नहीं थी जब उन्होंने बिना किसी सेनाके ससामान्य लोगों को जुटा कर विश्वविजयी रावण को पराजित कर उसका अत्याचार बन्द किया था? क्या शिवाजी और राणा प्रताप के समय जाति प्रथा नहीं थी जब उन लोगों ने अपने से १० गुनी बड़ी सेनाओं को बार बार पराजित किया। बल्कि उनकी अपनी जाति के लोग भी स्वार्थ के कारण आक्रमणकारियों का साथ दे रहे थे। समाज में दलित भी इस लिये हुये क्योंकि राजनैतिक पराधीनता के कारण कई जातियों का व्यवसाय नष्ट हो गया। आज भी भारत के समाज की कमजोरी यह है कि हमने हर जाति के विकास का काम नहीं किया। जाति के विकास तथा गौरव को नष्ट कर भारत की ९७% लोगों को पिछड़ा घोषित कर दिया जो अपने को पिछड़ा रकने के लिये ही संघर्ष करते हैं, उन्नति केवल उनके १-२ नेताओं की होती है। जो लोग मनुस्मृति की ४ जातियों की निन्दा करते हैं, उन लोगों ने भारत को १०,००० से अधिक जातियों में बांट रखा है। अपने को पिछड़ा मान कर लोग अपनी जातियों का काम छोड़ना चाहते हैं। आजादी के बाद पिछड़ा बनने की चेष्टा के कारण हमारे समाज में कई जरूरी काम करने वाले लोग नहीं रह गये हैं। खेती, बगान में काम करने वाले या भवन-मार्ग बनाने वाले कारीगर नहीं रहने के कारण बाहर के लोग काम के लिया आजाते हैं। व्यक्तिगत रूप से उनका स्वागत होता है कि हमारा काम करने वाले लोग मिल गये। पर जब वे अपना प्रभुत्व बनाना चाहते हैं तब हम बंगलादेशी का विरोध आरम्भ करते हैं।

सभी जातियां समाज के आवश्यक अंग हैं, इस अर्थ में पूरे समाज को मनुष्य मान कर जातियों को मनुष्य शरीर का अंग माना गया है। इसका अर्थ किसी का बड़ा छोटा होना नहीं है। हर अंग मनुष्य के लिये उतना ही जरूरी है। प्रचार होता है कि शूद्रों को पद कह कर अपमानित किया जाता है। पर क्या पद के बिना मनुष्य चल सकता है? पृथ्वी को भी पद कहा है, इस पर पद रखते हैं, अतः इसे पद्म भी कहते हैं।

पुरुष सूक्त (वा. यजु. अध्याय ३१)- ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।

उरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥११॥

पद्भ्यां भूमिः दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान् अकल्पयन्॥१३॥

सभी जाति समाज की रक्षा के लिये हैं, यह उनकी सामान्य उपाधि से स्पष्ट है।समाज की ४ प्रकार रक्षा-४ वर्णों की उपाधि ४ प्रकार की है-शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास।
शर्मा देवश्च विप्रश्च वर्मा त्राता च भूभुजः। भूतिर्दत्तश्च वैश्यस्य दास शूद्रस्य कारयेत्॥
ये सभी समाज की रक्षा और पालन के लिये हैं।

(१) शर्मा-आन्तरिक रक्षा-आत्मबल, ज्ञान और संयम आदि से होता है। शरीर की रक्षा के लिये आवरण है चर्म। इसी से शर्म हुआ है। सभी पशुओं के शरीर की रक्षा के लिये चर्म का आवरण रहता है। चर्म से ही शर्म हुआ है। जिसके पास शास्त्र रूपी आवरण (चर्म = शर्म) है, वह शर्मा है। शास्त्र और नियम जानने वाला ही अपनी भूल के लिये लज्जित होता है। अतः लज्जा को भी फारसी में शर्म कहते हैं। यद्यपि उपाधि रूप में शर्मा ब्राह्मणों के लिये ही प्रयुक्त होता है, लेकिन विष्णु पुराण में कहा है कि कोई भी शास्त्र हीन व्यक्ति शर्म आवरण नहीं होने से नग्न है। इसे लोकभाषा में नंगा (भोजपुरी आदि में लंगा) कहते हैं। केवल सामाजिक नियम नहीं, बल्कि अपनी और समाज की रक्षा के लिये भी शास्त्र का आवरण जरूरी है। नग्न अर्थात् ज्ञान हीन असंयमित व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है। यही वास्तविक कवच है। समाज सुरक्षित और सुचारु रूप से चलने के लिये जरूरी है कि सभी वर्ण अपने कर्तव्य का पालन करें। सभी व्यक्ति चारो आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास का पालन करें तो समाज में पूर्णता आती है और वह प्रगति करता है। ऋग्वेद तथा ऐतरेय ब्राह्मण में वाक् (ज्ञान) को शर्म कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में इस शब्द की व्युत्पत्ति चर्म से कही गयी है। विष्णु पुराण, खण्ड ३, अध्याय १७ में इसका विस्तार से वर्णन है जिसके कुछ उद्धरण नीचे दिये गये हैं।
चर्म वा एतत् कृष्णस्य (मृगस्य) तन्मानुषं शर्म देवत्रा। (शतपथ ब्राह्मण, ३/२/१/८)
वाग् वै शर्म। अग्निर्वै शर्माण्यन्नाद्यानि यच्छति। (ऐतरेय ब्राह्मण २/४०-४१)
ऋक् (३/१३/४)-स नः शर्माणि वीतये ऽग्निर्यच्छतु शन्तमा।
विष्णु पुराण (३/१७)-श्री मैत्रेय उवाच-
को नग्नः किं समाचारो नग्न संज्ञा नरो लभेत्। नग्न स्वरूपमिच्छामि यथावत् कथितं त्वया॥४॥
श्री पराशर उवाच-ऋग्यजुस्सामसंज्ञेयं त्रयी वर्णावृतिर्द्विज। एतामुज्झति यो मोहात् स नग्न पातकी द्विजः॥५॥
त्रयी समस्त वर्णानां द्विज संवरणं यतः। नग्नो भवत्युज्झितायामतस्तस्यां न संशयः॥६॥
हताश्च तेऽसुरा देवैः सन्मार्गपरिपन्थिनः॥३४॥
स्वधर्म कवचं तेषामभुद्यत् प्रथमं द्विज। तेन रक्षाभवत् पूर्वं नेशुर्नष्टे च तत्र ते॥३५॥
तत्र मैत्रेय तन्मार्ग वर्तिनो येऽभवञ्जनाः। नग्नास्ते तैर्यतस्त्यक्तं त्रयी संवरणं तथा॥३६॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथाश्रमी। परिव्राड् वा चतुर्थोऽत्र पञ्चमो नोपपद्यते॥३७॥
यस्तु सन्त्यज्य गार्हस्थ्यं वानप्रस्थो न जायते। परिव्राट् सापि मैत्रेय स नग्नः पापकृन्नरः॥३८॥
ब्राह्मणाद्यास्तु ये वर्णास्स्वधर्मादन्यतो मुखाः। यान्ति ते नग्न संज्ञां तु हीनकर्मस्ववस्थिताः॥४८॥

(२) वर्मा-वर्म बाहरी आवरण या कवच है। युद्ध में शस्त्र से बचने के लिये लगाया जाता है। आजकल प्रदूषण से बचने के लिये भी मास्क लगाते हैं। क्षत्रिय पहले अपने शरीर की रक्षा करता है, उसके बाद ही वह समाज की रक्षा करने में समर्थ होगा।
वर्मेव स्यूतं परिपासि विश्वतः (ऋक् १/३१/१५) = जैसे दृढ़ता से सिला हुआ कवच युद्ध में मनुष्य की रक्षा करता है, उसी प्रकार तू रक्षा करता है।
इन्द्रस्य वर्मासि (अथर्व ५/६/१३)
स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु (ऋक् ६/७५/१, वाज. यजु २९/३८, तैत्तिरीय संहिता ४/६/६/१, मैत्रायणी संहिता ३/१६/३)
वर्मण्वन्तो न योधाः शिमीवन्तः (ऋक् १०/७८/३) = योद्धा कवच लगा कर ही शौर्य दिखा सकते हैं।
क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः शब्दस्य अर्थः भुवनेषु रूढ़ः (रघुवंश २/५३)-क्षत से समाज का त्राण करने वाले को ही क्षत्रिय कहा गया है।

(३) गुप्त-मनुष्य या समाज की रक्षा, रहस्य की रक्षा।
गुप्तं ददृशुरात्मानं सर्वा स्वप्नेषु वामनै (रघुवंश १०/६०)
जो गो अर्थात् कृषि, वाणिज्य (द्रव्य यज्ञ) आदि गो रूपी यज्ञों द्वारा समाज की रक्षा करता है वह वैश्य है (विश = समाज)
राजा को भी रक्षक रूप में गोप्ता कहा गया है, जैसे मालविकाग्निमित्र में भरतवाक्य है-
आशास्यमीति विगम प्रभृति प्रजानां, सम्पत्स्यते न खलु गोप्तरि नाग्निमित्रे॥
=आशा करें कि अग्निमित्र जैसा गोप्ता नहीं रहने पर भी प्रजा की ईति, विगम आदि आपत्तियों से रक्षा होती रहेगी।

(४) दास-जो शीघ्रता या दक्षता से कार्य करता है वह शूद्र है-आशु + द्रवति = शूद्र (इस प्रकार निरुक्त में शुतुद्रि की व्युत्पत्ति दी गयी है)
सभी इंजीनियर इसी प्रकार के हैं। दिया गया कार्य जल्द समाप्त कर उसका पैसा लेना उद्देश्य है। समाज के सभी विशिष्ट काम इसी पर निर्भर हैं।
दास का अर्थ दास प्रथा या गुलामी कहते हैं। वामपन्थी प्रचार है कि ब्राह्मणों ने वेद लिखा तथा शूद्रों को दास बनाया। वे कोई पुस्तक नहीं पढ़ते न समाज की वास्तविक स्थिति देखते हैं। ऋग्वेद का ब्राह्मण (व्याख्या) ग्रन्थ ऐतरेय महिदास का लिखा हुआ है अतः उसे ऐतरेय ब्राह्मण कहते हैं, ऐतरेय शूद्र नहीं।
आजकल २ प्रकार के दास प्रचलित हैं। सभी सरकारी अधिकारी तथा नेता जनता के दास (जनसेवक, public servant) कहे जाते हैं। पर वे सबसे बड़े मालिक हैं और सबसे अधिक अत्याचार वे ही करते हैं।
दूसरे दास भगवान् के भक्त हैं, जैसे तुलसीदास, समर्थ रामदास आदि। जो भगवान् का दास हो गया वह हमारा स्वामी है अतः हम सन्तों को स्वामी कहते हैं, पर वे अपने को दास कहते हैं।

अरुण कुमार उपाध्याय ( धर्म शास्त्र विशेषज्ञ ) भुवनेश्वर

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