भारत की बौद्धिक दासता

-श्री अरुण उपाध्याय-बौद्धिक दासता कई अर्थों में यह बाकी विश्व में भी है और भारत से अधिक है। इसाइयों को ईसा मसीह की भेड़ कहा जाता है। इसलाम का अर्थ ही है पैगम्बर मुहम्मद को एकमात्र अधिकारी मानना और बाकी को समाप्त करना। इनके प्रभाव से भारत में भी कई प्रकार की बौद्धिक दासता आ गयी है। अंग्रेजों ने अपने शासन को न्यायी दिखाने के लिए कुछ लोगों को संन्यासी वेष में खड़ा किया जिससे लोग उनकी बात मान कर ब्रिटिश राज्य का समर्थन करें। इसका इतना प्रचार हुआ कि रामपाल या रामरहीम जैसे ब्रह्मचर्य का प्रयोग करने वालों को भी लोग सन्त मान कर उनकी भक्ति करने लगे। कांग्रेस में १९२० से पार्टी फण्ड एक ही परिवार के हाथ रहा है। भीष्म पितामह ने युद्ध आरम्भ में युधिष्ठिर को अपनी लाचारी बतायी थी कि धन किसी का दास नहीं होता, पर मनुष्य धन का दास होता है (भीष्म पर्व, ४३/४१)। उनके कहने का अर्थ थाकि उनको कौरव शासन से वेतन मिलता है, अतः उनकी आज्ञा-पालन के लिए बाध्य हैं। कांग्रेस स्वामी का परिवार ही शासन द्वारा लूटे गये धन से बाकी लोगों को चुनाव खर्च देता है, अतः उसकी दासता मानने के लिए लोग बाध्य हैं। उनके अनुकरण पर अन्य लोग भी अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं पर केवल उस परिवार के तात्कालिक उत्तराधिकारी की भक्ति करते हैं। एक बुद्धिजीवी तो पिछले १४०० वर्ष से भारत की हिंसाओं का उत्तरदायी भाजपा को कह रहे थे, उनके सम्पर्क से मुझे दूर होना पड़ा। एक सीमा तक भाजपा समर्थक भी भक्ति में भाजपा के दोष भूल जाते हैं, पर उनमें किसी परिवार की दासता नहीं है। एक अन्य विख्यात प्राध्यापक और लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भक्ति में इतना डूब गये कि कहा कि उनके अतिरिक्त अन्य किसी ने विश्वविद्यालय नहीं बनवाया है। मैंने उदाहरण के लिए कहा कि मालवीय जी का नाम सम्भवतः उन्होंने नहीं सुना है। तो मुझे बहुत सी गाली दे कर कहा कि वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ कर वहां प्राध्यापक भी रहे हैं।
भीष्म पितामह ने मनुष्य को धन का दास कहा था, अभी भारत के विद्वान् अंग्रेजी सिलेबस के दास हैं। उसके अनुसार वे मानते हैं कि सभी मूल निवासी विदेशी हैं तथा जो खनन में सहायता के लिए बाहर से आये थे वे ही मूल निवासी हैं, जबकि आज भी उनकी उपाधि खनिजों के ग्रीक नामों पर आधारित है। अब तो अंग्रेज भक्त और भी आगे बढ़ गये हैं-वे रावण और महिषासुर की कीर्ति गा रहे हैं, पर उसके समर्थन में कोई उल्लेख उन्होंने आज तक नहीं देखा। अब वे कहते हैं कि केवल ब्राह्मण बाहर से आये या भारत के रक्षक राजपूत शक-हूणों के वंशज हैं (कर्नल टाड ने इसी उद्देश्य से राजस्थान का इतिहास लिखा था, जिसका प्रचार गौरिशंकर हीराचन्द जोशी के विस्तृत इतिहास तुलना में अधिक किया जाता है)। बिना किसी चिन्तन या उल्लेख के यह मान लेते हैं कि केवल एक वर्ण द्वारा समाज चल सकता है। उनको आज तक पता नहीं चला कि भारत के अतिरिक्त किस देश में वर्ण व्यवस्था थी। शकद्वीपी ब्राह्मणों को भी विदेशी मानने की धारणा भी इसी मनोवृत्ति का परिणाम है। महाराष्ट्र के कुछ चितपावन ब्राह्मण भी अपने को यहूदियों का वंशज कहने लगे हैं। यहूदियों में कब और कहां ब्राह्मण होते हैं यह पूछते ही वे गाली देने लगते हैं। हैदराबाद के उस्मानिया के एक प्राध्यापक आन्ध्र गौरव के लिए मेगास्थनीज द्वारा आन्ध्र राजाओं की सेना का वर्णन उद्धृत करते थे। विदेशी प्रमाण पत्र भारत में महत्त्वपूर्ण मानते हैं। अतः मैंने विष्णु सहस्रनाम के एक नाम का उदाहरण दिया-चाणूरान्ध्र निषूदनः-तो वे क्रुद्ध हो गये। पर वही प्राध्यापक इतिहास की वेबसाइट पर लिखते हैं कि मेगास्थनीज के समय मौर्य शासन था्। यह नहीं सोचा कि वह हजार वर्ष बाद के आन्ध्र राजाओं का वर्णन कैसे कर रहा था?
भारत के सभी छात्र ऐसा ही सिलेबस पढ़ कर एमए, पीएचडी आदि की डिग्रियां ले रहे हैं। हिन्दी, मराठी, बंगला, ओड़िया आदि विषयों के सिलेबस में पढ़ते हैं कि लोक-भाषाओं का साहित्य गोरखनाथ के समय ८वीं सदी में आरम्भ हुआ, जब उन्होंने मुस्लिम आक्रमण रोकने के लिए ४ पीठ बनाये और लोकभाषा में प्रचार आरम्भ किया। ओड़िया, बंगला दोनों में विवाद होता है कि गोरखनाथ के काल में ही दोनों में किसका साहित्य प्राचीन है। पर वे सभी छात्र इतिहास में पढ़ते हैं कि उसी ८वीं सदी में शंकराचार्य हुए जो इस्लाम द्वारा आक्रमण होने पर बौद्धों का विरोध संस्कृत शास्त्रार्थ से कर रहे थे तथा उन्होंने भी ४ पीठ स्थापित किये। दो बिलकुल विपरीत चीजें रट कर भारत में करोड़ों विद्वान् बैठे हुए हैं।
श्रीशैलम के २००१ के वैदिक सम्मेलन में एक व्यक्ति ने महाभारत के प्राक्-पाणिनीय शब्दों के उदाहरण दिये। पाणिनि ने नयी भाषा नहीं बनायी थी, उन्होंने १९ पूर्ववर्ती व्याकरणों का उल्लेख किया है। यदि वे महाभारत के बाद के थे, तो उसके प्रयोगों के आधार पर ही सूत्र लिखते। यदि महाभारत के शब्द नहीं सुने थे, उसका अर्थ है कि महाभारत उनके बाद हुआ जिसे वह नहीं जानते थे। चर्चा में उन्होंने कहा कि आन्ध्र में वैदिक सभ्यता उत्तर के आर्यों ने थोप दी थी। किन्तु प्रमाण में ऋग्वेद का एक मन्त्र कहा जिसके २ शब्दों का प्रयोग केवल तेलुगू में है। यदि आर्यों द्वारा वेद थोपा जाता तो वे शब्द पंजाब, उत्तर प्रदेश में भी प्रचलित होते। वही व्यक्ति अगले वर्ष बंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्था के सेमिनार में ज्योतिष के विशेषज्ञ बन गये और कहा कि ६० वर्षों का गुरु वर्ष चक्र भारत में सुमेरिया से आया। मैंने विष्णुधर्मोत्तर पुराण का उदाहरण दिया तो तो कहने लगे कि यह सुमेरिया की नकल पर लिखा गया है। सुमेरिया के मूल लेख और प्रचलन का उदाहरण पूछा तो वे तथा आयोजक क्रुद्ध हो गये। भारत में कोण या समय की माप का ६०-६० में विभाजन सुमेरिया सहित पूरे विश्व में प्रचलित हुआ जिसे अंग्रेजों ने सुमेरिया की ६० अंक पद्धति कहा है। वहां ६० वर्ष का चक्र कभी नहीं था। चीन में प्राचीन काल से अब तक ६० वर्ष का चक्र चल रहा है-जिस पर विवाद हो सकता है कि वहां पहले था या भारत में।
युधिष्ठिर शक के विषय में वराहमिहिर को प्रायः सभी ने उद्धृत किया है, पर आज तक किसी ने यह शब्द ही नहीं पढ़ा-युधिष्ठिर शक। सभी अंग्रेजी आदेश से मान रहे हैं कि शक का अर्थ शक राजाओं की वर्ष गणना है, जब कि किसी शक राजा ने आज तक न कोई पञ्चांङ्ग आरम्भ किया है न उनके देश में कभी प्रचलित हुआ। वराह मिहिर ने लिखा कि उनके समय प्रचलित शक में २५२६ जोड़ने से युधिष्ठिर शक होता है।
यथाह वृद्ध गर्गः-आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्-द्विक-पञ्च-द्वि (२५२६) युतं शक-कालस्तस्य राज्ञस्य (बृहत् संहिता, १३/३)
युधिष्ठिर शक जाति के नहीं थे, न शकारि विक्रमादित्य के काल में शक राजा के वर्ष का प्रयोग उनका कोई नवरत्न कर सकता था। पर वराहमिहिर द्वारा प्रयुक्त शक को लोगों ने आंख मून्द कर मान लिया कि वह उनकी मृत्यु के ८३ वर्ष बाद प्रचलित शालिवाहन शक था और वह शक भी शालिवाहन ने नहीं, बल्कि उनसे १३०० वर्ष पूर्व कश्मीर के गोनन्द वंशी राजा कनिष्क ने आरम्भ किया। इसके लिए कनिष्क को भी शक जाति का बनाया और उसी के अनुसार शिलालेखों को पढ़ने लगे।
विदेशी उद्धरण के बिना कोई शोध पत्र प्रामाणिक नहीं मानते हैं। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में २००३ के सेमिनार में भारतीय परम्परा की पुस्तक खोज रहा था जो बहुत कठिन है। अधिकांश संस्कृत पुस्तकें भी विदेशी विचारों का अनुवाद मात्र है। मेरी सहायता के लिए एक प्राध्यापक ने एक पुस्तक दिखायी-कालिदास, एक भारतीय दृष्टि। कालिदास स्पष्ट रूप से भारतीय थे, उनकी भारतीयता खोजना मुझे समझ में नहीं आया। खोल कर देखा तो हर पृष्ठ पर केवल विदेशी लेखकों के उद्धरण थे। अभी तो वेद-पुराण की हर बात के समर्थन में नासा की काल्पनिक शोध को उद्धृत किया जा रहा है।

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