भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य समस्या

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)

व्यक्ति के विकास के लिए इन दो व्यवस्थाओं का महत्त्व है। अंग्रेजी शासन काल में भी जो स्तर था, वह धीरे धीरे समाप्त होता गया है। राजाओं के आश्रय से भारत में विश्व प्रसिद्ध मल्ल (पहलवान) होते रहे हैं। स्वाधीनता के बाद केवल चन्दगीराम ने हनुमान् व्यायामशाला में लोगों को शिक्षा दी। भारत सरकार या राज्य सरकारों के खेल विभागों द्वारा इसकी सुविधा देना बहुत दूर की बात है-जिला, राज्य और देश स्तर पर प्रतियोगितायें भी नहीं आयोजित होती हैं। यदि कोई स्वयं भी अभ्यास करना चाहे तो उसके लिए कहीं अखाड़ा या मैदान उपलब्ध नहीं है। सेना या पुलिस में खिलाड़ियों की भर्ती इसका समाधान नहीं है। भर्ती १८-२० वर्ष के बाद होगी, ५ से २० वर्ष तक व्यक्ति को कब और कहां अभ्यास का अवसर मिलेगा। भारत के अधिकांश नगरों में सामान्य व्यक्ति के टहलने या धीमे दौड़ने के लिए कोई स्थान उपलब्ध नहीं है। अमेरिका के हर विद्यालय में तैरना सीखना तथा खेल में भाग लेना जरूरी है, केवल प्रतियोगिता के लिए नहीं, सामान्य स्वास्थ्य के लिए। भारत में भी विद्यालयों की मान्यता के लिए नियम है कि कम से कम ६ एकड़ का खेल का मैदान होना चाहिए। पर केवल पैसे चढ़ा कर मान्यता दी जाती है, कहीं भी किराये के घर में स्कूल कालेज का व्यवसाय आरम्भ हो जाता है। उनमें किताबी पढ़ाई भी नहीं होती जिसे पूरा करने के लिए कोचिंग संस्थान खुले हुए हैं। इनका उद्देश्य ज्ञान नहीं है, केवल मुख्य प्रश्नों के उत्तर रट कर परीक्षापास करना है। सिलेबस निर्धारण तथा पाठ्य पुस्तक लेखन केवल कोचिंग व्यवसाय को दृष्टि में रख कर होता है।
मैं १९८२ में मधेपुरा जिले में था तो वहां १००० से अधिक व्यक्ति प्रतिदिन ५०० से अधिक दण्ड बैठक करते थे। वहां के ७ व्यक्ति कलकत्ता के मोहन बगान टीम से खेलते थे। पर स्वयं मधेपुरा जिले में केवल ३ फुटबाल के मैदान थे और सभी के गोल पोस्ट चोरी हो चुके थे। कभी कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन नहीं होने के कारण वह भी बन्द हो गया।
स्मार्ट सिटी योजना में केवल ४जी तथा रोड पर नहीं, जन स्वास्थ्य पर भी ध्यान होना चाहिये। प्रति १ लाख जनसंख्या पर ४ खेल के मैदान, १ जिमनाजियम तथा १ स्विमिंग पूल होना चाहिये। पंजाब के हर गांव में किसानों ने अपने खेत के लिए लगाये पम्प द्वारा स्विमिंग पूल बना रखा है। खेल के मैदानों में ४०० मीटर का ट्रैक, हर्डल, फुटबाल, हाकी के अभ्यास की सुविधा होनी चाहिए। भारत में हाकी के विषय में धारणा है कि वनवासी अच्छा खेलते हैं। मूल कारण है कि वन के निकट खेलने की जमीन बची हुई है, बाकी जगह कोई मैदान ही नहीं है जहां कोई अभ्यास कर सके। प्रायः हर जिले के १०-१२ स्कूल कालेजों में खेल प्रशिक्षक नियुक्त हैं, पर खेल के मैदान ही नहीं हैं जहां ये ट्रेनिंग दे सकें। य़े स्वयं भी बिना अभ्यास केवल किताब पढ़ कर खेल शिक्षक बने हैं।
खेल विभाग को जिला, राज्य स्तरों पर प्रतिवर्ष २ बार प्रतियोगिता आयोजित होनी चाहिए।
विषयों की शिक्षा-भारत में हिन्दी या अन्य भाषाओं के विख्यात साहित्यकारों ने इन भाषाओं में एम.ए. नहीं किया था। अब साहित्यकारों को भी भ्रम हो रहा है कि प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के लिये उनकी भाषा में कौन से शब्द थे, या शब्दों का शुद्ध रूप क्या था? स्वयं संस्कृत की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से हो रही है। भारतीय लोक भाषाओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि आरम्भ से संस्कृत की शिक्षा दी जाय, और संस्कृत माध्यम से। यह नहीं कि बी.ए. तक संस्कृत से परिचय नहीं हुआ, पर एम.ए. में अन्य विषय में प्रवेश नहीं मिलने के कारण संस्कृत पढ़ना पड़ा। लोकभाषा को विषय रूप में पढ़ाने की जरूरत नहीं है, किसी भी साहित्यकार को नहीं हुई। संस्कृत पढ़ने पर स्वयं अपनी भाषा का ठीक ज्ञान हो जायेगा।
विज्ञान नाम से प्रचलित २ विषयों का उपयोग अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ-राजनीति विज्ञान, समाज विज्ञान। कम से कम भारतीय समाज तथा राजनीति से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। इनका उपयोग केवल यही है कि पढ़ कर दूसरों को पढ़ायें तथा नौकरी पायें।
भारतीय इतिहास तथा दर्शन भी भारतीय होना चाहिए, विदेशी आक्रामकों का नहीं। इसके लिए भारत में पर्याप्त साहित्य अभी भी उपलब्ध है, पर ऐसी पुस्तकों को किसी पुस्तकालय में प्रवेश नहीं मिलता। स्कूल में प्रवेश के पहले मैंने मेगास्थनीज की पुस्तक पढ़ी थी जिससे भारत का इतिहास आरम्भ करते हैं। मूल किताब से पता चलता है कि मेगास्थनीज के नाम पर भी कितनी जालसाजी हुई है, भारतीय साहित्य को बिलकुल छोड़ दिया गया है। इतिहास के कालक्रम का आधार पुराण किसी ने नहीं देखा है। इतिहास तथा संस्कृत के अधिकांश लेखक, प्राध्यापक भारत का पञ्चाङ्ग देखना भी नहीं जानते। भारतीय पुराण, प्राचीन साहित्य, मेगास्थनीज आदि विदेशियों की पुस्तकें भी पुस्तकालयों में रहनी चाहिए। सभी भारतीय पुराण कनाडा के मौण्ट्रियल या अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में मिल जाते हैं, भारत के संस्कृत विश्वविद्यालयों में भी नहीं। जो पुस्तक सिलेबस में नहीं, उसे कोई देखना भी नहीं चाहता। प्राध्यापकों ने इसे स्वयं देखा नहीं है, अतः इसे सिलेबस में नहीं आने देते। भारतीय दर्शन के नाम पर केवल शङ्कराचार्य के बारे में विदेशी लेखकों की पुस्तकों को पढ़ कर एमए पीएचडी आदि करते हैं। शङ्कराचार्य की प्रशंसा की जाती है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी होने के कारण एकमात्र अच्छे दार्शनिक थे। प्राध्यापकों को यह पता नहीं है कि भारत में कहीं भी देवताओं, नदियों आदि की भी पूजा होती है, उनमें शङ्कराचार्य के ही स्तोत्र पढ़े जाते हैं, स्वयं रामानुज सम्प्रदाय की दैनिक पूजा का लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्र शङ्कराचार्य का है। इस कारण लेखकों को अद्वैत का अर्थ नहीं समझ आया-जगत् निराकार नहीं है, उसका मूल तत्त्व निराकार है।
हर विद्यालय में संस्कृत अनिवार्य होना चाहिये। भारतीय दर्शन तथा ज्ञान का सार स्तोत्रों में है, गीता में हैं। इनके कुछ अंश सिलेबस में रहने चाहिए। भारतीय पञ्चाङ्ग देखना तथा सूर्योदय सूर्यास्त की गणना विद्यालय के सिलेबस में रहनी चाहिए।
गणित तथा विज्ञान की पुस्तकों का सरकारी उत्पादन बन्द हो। विद्यालय की गणित की पुस्तक यदि १५० व्यक्ति लिखेंगे, तो वह पढ़ने योग्य नहीं होगी। सिलेबस पर वामपन्थी नियन्त्रण के कारण उच्च पदों पर वही बैठे हैं जिन्होंने जीवन भर केवल राजनीति (दलाली) की। जो पुस्तक लिख सकते थे, उनको अवसर नहीं मिला कि छपवा सकें। वरिष्ठ प्राध्यापकों के नाम पर जो पाठ्यपुस्तकें छपी हैं, उसके विषय के बारे में मूल लेखक को भी पता नहीं रहता। वह केवल सिलेबस में लगा कर रायल्टी लेते हैं, असल लेखन जूनियर अध्यापक करते हैं, जिनको सहायक लेखक कहा जाता है। परिणाम यह है कि भौतिक विज्ञान में १० लाख से अधिक पीएचडी होने के बाद भी +२ की पाठ्य पुस्तक अमेरिका से आती है। केवल कोचिंग केन्द्र चलाने के लिए कालेज नहीं चलें। जो वर्तमान सिलेबस है, उसी की पहले ठीक से पढ़ाई हो तथा प्रयोगशाला व्यवस्था हो। बिना किसी सुविधा के केवल वार्षिक घूस द्वारा हजारों मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज चल रहे हैं।

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