भोजन के उपरान्त योग नही 

पारंपरिक भारतीय चिकित्सा में, चाहे वह आयुर्वेद हो या सिद्धचिकित्सा पद्धति, आपको कोई भी समस्या हो, सबसे पहले वे आपका पेट साफ करते हैं। अगर आप स्वस्थ होना चाहते हैं, तो आपका पेट साफ होना बहुत जरूरी है। कुछ खास तरह का भोजन करने वाले लोगों का और उन लोगों का जिनको बीच-बीच में खाने की आदत होती है,का पेट कभी साफ नहीं रह सकता। खासकर दुग्ध उत्पाद और मांसाहारी भोजन मलाशय में ज्यादा समय तक रहते हैं।

अगर आप अपनी ऊर्जा को बढ़ाना चाहते हैं, तो जो भी चीज असल में आपके शरीर का हिस्सा नहीं है, उसे आपके शरीर से बाहर होना चाहिए। योगाभ्यास कोई कसरत नहीं है – वह तो आपके शरीर को नया रूप देने का तरीका है। एक तरह से आप अपने शरीर को नए सांचे में, जैसा आप उसे बनाना चाहते हैं, ढालते हुए उसे नया रूप देने की कोशिश करते हैं। इसे करने के लिए आपके शरीर के भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए। अगर आप कुछ ले सकते हैं तो बस पानी ले सकते हैं।

योग का अभ्यास करने का मतलब है, स्रष्टा के साथ भागीदारी करना। आप यह पूरी तरह खुद नहीं कर सकते, मगर आप स्रष्टा के लिए जरूरी माहौल तैयार कर सकते हैं। आप सृष्टि के स्रोत को अपना सहर्ष भागीदार बनाना चाहते हैं। जब आप पैदा हुए, तो आपके बस में कुछ नहीं था। आपके माता-पिता और आपके पूर्वजों ने तय किया कि आपका शरीर कैसा होगा और कैसे काम करेगा। इसी कारण इस संस्कृति में ज्ञानी जनों को ‘द्विज’ यानी दो बार जन्मा हुआ कहा जाता था। पहली बार जब अपनी मां के गर्भ से आप जन्मे थे, उस समय आपका कोई बस नहीं था। मगर अब आप धीरे-धीरे खुद को फिर से खोज रहे हैं, फिर से खुद की रचना कर रहे हैं, वैसा, जैसा आप खुद को

जीवन का आपका अनुभव तभी बदलेगा जब ऊर्जा के स्तर पर आपके शरीर के काम करने के तरीके, उसके सोचने, महसूस करने, आस-पास की दुनिया के प्रति प्रतिक्रिया करने के तरीके को बदला जाएगा। अगर आपने अपनी नाक का आकार-प्रकार बदल लिया या कोई और सौंदर्य उपचार कराया, तो लोगों की नजर में बदलाव आ सकता है। वह देखने वाले के अनुभव को बदल सकता है, आपके अनुभव को नहीं। आपके शरीर का सृष्टि के स्रोत के साथ कितना तालमेल है, सिर्फ उसी पर आपके अनुभव में बदलाव निर्भर करता है।

यह शरीर सृष्टि के स्रोत की रचना है। आपने उसमें जो भोजन डाला है, वह शरीर का हिस्सा नहीं है और जो मल आपने उत्पन्न किया है, वह भी शरीर का हिस्सा नहीं है।

इसलिए, आपका पेट और मलाशय खाली होना चाहिए। लेकिन अगर आप लगातार चार, पांच घंटे तक योग कर रहे हैं, तो पानी में एक छोटा चम्मच शहद डालकर पी सकते हैं। पानी गुनगुना हो तो अच्छा है क्योंकि अगर आप ठंडा पानी पिएंगे तो शरीर को उसे गरम करना होगा, जिसमें ऊर्जा का नुकसान होता है। अगर जो पानी आप पीते हैं, वह शरीर के सामान्य तापमान से तीन डिग्री ऊपर या नीचे है, तो शरीर उसे अपना ही एक हिस्सा समझता है।

गुनगुना पानी और शहद ही दो ऐसे पदार्थ हैं, जिन्हें आप अपने पेट में जाने दे सकते हैं, और कुछ भी नहीं। आपके पास सिर्फ शरीर होना चाहिए, कोई अड़चन नहीं। वरना, स्रष्टा का आपसे संपर्क नहीं हो पाएगा। सृजन का स्रोत, जो बुद्धि आपके अंदर सक्रिय है, वह किसी भी दूसरी चीज को एक बाहरी पदार्थ मानती है और वह आपके आसन में हिस्सा नहीं लेगी। स्रष्टा या सृष्टि के स्रोत को आपके आसन में सक्रिय होना चाहिए और हिस्सा लेना चाहिए – तभी कोई आसन योगासन बन सकता है। वरना, वह बस एक मुद्रा बन कर रह जाएगा।

महामंडलेश्वर स्वामी सहजानंद गिरी 

डू मेडिटेशन 

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