मंत्रोच्चार के बाद क्यों होता हैं ॐ शांति

आदित्य नारायण झा-हिन्दू धर्म में किसी भी पवित्र मंत्रोच्चार के बाद, ऊं शांति शब्द को तीन बार दोहराया जाता है।
मंत्रोच्चारण के अंत तीन बार क्यों कहते हैं, ॐ शांति, शांति, शांति…?????
ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरंगैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिः।व्यशेम देवहितम् यदायुः।स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मंत्रोच्चारण के अंत तीन बार क्यों कहते हैं, ॐ शांति, शांति, शांति…?????
शान्ति मन्त्र वेदों व वैदिक साहित्य में अन्यत्र भी हैं जिनमें से कुछ अत्यन्त प्रसिद्ध हैं।
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति:पृथिवी शान्तिराप:शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:सर्वं शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
यजुर्वेद के इस शांति पाठ मंत्र में सृष्टि के समस्त तत्वों व कारकों से शांति बनाये रखने की प्रार्थना करता है। इसमें यह गया है कि द्युलोक में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हों, जल में शांति हो, औषध में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो, विश्व में शांति हो, सभी देवतागणों में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, सब में शांति हो, चारों और शांति हो, शांति हो, शांति हो, शांति हो।
वैसे तो इस मंत्र के जरिये कुल मिलाकर जगत के समस्त जीवों, वनस्पतियों और प्रकृति में शांति बनी रहे इसकी प्रार्थना की गई है, परंतु विशेषकर हिंदू संप्रदाय के लोग अपने किसी भी प्रकार के धार्मिक कृत्य, संस्कार, यज्ञ आदि के आरंभ और अंत में इस शांति पाठ के मंत्रों का मंत्रोच्चारण करते हैं।
ऐसे ही बृहदारण्यकोपनिषद् में मंत्र है, जिसे पवमान मन्त्र या पवमान अभयारोह मन्त्र कहा जाता है।
ॐ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्माऽमृतं गमय।ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28।
इसका अर्थ है, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥
यह मन्त्र मूलतः सोम यज्ञ की स्तुति में यजमान द्वारा गाया जाता था। आज यह सर्वाधिक लोकप्रिय मंत्रों में है, जिसे प्रार्थना की तरह दुहराया जाता है।
हिन्दू धर्म में किसी भी पवित्र मंत्रोच्चार के बाद, ऊं शांति शब्द को तीन बार दोहराया जाता है। शांति का आवाहन करने के लिए हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना से शोक और दुःख समाप्त होते हैं। ऐसी सब प्रार्थनाएं तीन बार शांति कह कर समाप्त की जाती है।
लेकिन आखिर तीन बार ही क्यों…
हिन्दू धर्म की प्रत्येक मान्यता एवं परपंरा के पीछे कोई कारण छुपा होता है, और इसका भी एक कारण है कि मंत्रोच्चार के बाद शांति शब्द को तीन बार क्यों दोहराया जाता है। इसके पीछे सबसे बड़ा और गहन कारण है, त्रिवरम सत्यमं।
ऐसी मान्यता है कि “त्रिवरम सत्यमं ” अर्थात तीन बार कहने से कोई बात सत्य हो जाती हैं। शायद यही कारण है कि हम अपनी बात पर बल देने के लिए भी उसे तीन बार दोहराते हैं।
हमारी सभी बाधाएं, समस्याएं और व्यथाएं तीन स्त्रोतों से उत्पन्न होती है :-
इसके बारे में कहा जा रहा है प्राचीन काल में लोग मानते थे कि जिस बात को तीन बार कहा जाए तो वह सच हो जाती है। यानी ‘त्रिवरम् सत्यमं’।
ऊं शांति…ऊं शांति..ऊ शांति बोलने के पीछे दूसरा कारण को लेकर कहा गया है कि ऐसा करने से तीन प्रकार से उत्पन्न बाधाओं में शांति मिलती है।
दैविक- दैवीय आपदा जैसे बाढ़, भूकंप, तूफान आदि की शांति के लिए ऊं शांति बोलते हैं जिससे माना जाता है कि शांति मिलती है।आधिदैविक – उन अदृश्य , दैवी शक्तिओ के कारण जिन पर हमारा बहुत कम और बिल्कुल नियंत्रण नहीं होता। जैसे भूकंप , बाढ़ , ज्वालामुखी इत्यादि।
भौतिक- भौतिक समस्याओं जैसे दुर्घटना, अपराध, मानवीय संपर्क आदि बाधाओं के लिए ऊं शांति बोलते हैं जिससे माना जाता है कि शांति मिलती है।
हमारे आस – पास के कुछ ज्ञात कारणों से जैसे दुर्घटना , मानवीय संपर्क , प्रदूषण , अपराध इत्यादि शांत होते हैं।
आध्यात्मिक बाधाएं- ऐसी बाधाओं में क्रोध, निराशा, भय आदि के लिए ऊं शांति बोलते हैं जिससे शांति मिलती है।हमारी शारीरिक और मानसिक समस्याएं जैसे रोग , क्रोध , निराशा आदि का निवारण होता है।
जब हम मंत्रोच्चार कर किसी शब्द को तीन बार बोलते हैं, तो हम ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं कि कम से कम किसी विशेष कार्य के उत्तरदायित्व निभाते वक़्त या हमारे रोजमर्रा के काम काज में यह तीन तरीके की बाधाएं उत्पन्न न हो।
अतः तीन बार शांति का उच्चारण किया जाता हैं। पहली बार उच्च स्वर में दैवीय शक्ति को संबोधित किया जाता है। दूसरी बार कुछ धीमे स्वर में अपने आस-पास के वातावरण और व्यक्तियों को संबोधित किया जाता है और तीसरी बार बिलकुल धीमे स्वर में अपने आपको संबोधित किया जाता है।

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