मंदिरों के सरकारीकरण से एक आहत संत की लेखनी

मंदिरों के सरकारीकरण से आहत श्रद्धेय नमन कृष्ण भागवत किंकर जी लेखनी

टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट उसी समय अवैध हो गया जब राज्य ने अपने को सेकुलर घोषित कर दिया। अब राज्य को विधि सम्मत अधिकार ही नहीं है कि वो मन्दिरों का मैनेजमेंट कर सके।

1951 में जब ये काला कानून बना था तब संविधान द्वारा भारत गणराज्य को सेकुलर अर्थात धर्मनिरपेक्ष घोषित नहीं किया गया था।
1978 में इन्दिरा गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान संविधान में (42 वां) संशोधन करके सेकुलर शब्द जैसे ही घुसेड़ा गया वैसे ही राज्य मन्दिरों पर अपना अधिकार खो बैठा।
सेकुलर संविधान में राज्य अल्पसंख्यक धार्मिक सम्पत्ति यथा, वक्फ बोर्ड की सम्पत्तियों , चर्चों की सम्पत्तियों आदि का प्रबंधन (management) नहीं करता है परन्तु प्रबन्ध (अरेंजमेंट) करता है (यानि कि राज्य अल्पसंख्यकों को स्वयं सम्पत्ति बनाकर देने से लेकर प्रत्येक सुविधाएं देता है। किंतु बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक सम्पत्तियों (मंदिर के धन, जमीन, अन्य प्रॉपर्टी) के लिए संविधान के विपरीत आचरण करता है।
इसीलिए इस अन्यायकारी, टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट की आड़ में राज्यों द्वारा हिंदू धार्मिक सम्पत्ति के प्रति अन्यायपूर्ण पक्षपात के खिलाफ आवाज उठाने की आवश्यकता है।
आइये! साथ मिलकर इसे मुहिम बनाएं।

अगर ये मान भी लिया जाये कि..पहले राज्य सरकारे हिंदूमय थी .इसलिए हिंदू मंदिरो का प्रबंधन अपने हाथ में लिया !
1951 के एक्ट के द्वारा !
प्रबंधन में देव मूर्ति की पूजा आदि की भी व्यवस्था करनी थी !
परंतु जब 1973 के संविधान में संशोधन करके राज्य को सेकुलर घोषित कर दिया तो ..ये मानने का तार्किक कारण है कि राज्य सरकार धार्मिक नहीं है। और जो धार्मिक ही नहीं है तो उसे मंदिर के पूजा आदि के प्रबंधन का अधिकार कैसे हो सकता हैं ???
बिल्कुल नहीं हो सकता हैं !

अब इसी जनमत पर अडिग रहे‌ ! कोई सर्वधर्म समभाव वाली बात नहीं होनी चाहिए !!
क्योंकि कोई सेकुलर व नास्तिक मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाने नहीं जाता हैं !!

जय सनातन।
वंदे मातरम्।।

इस एक्ट के मूल में बर्बर इसाई मिशनरियों का भयंकर षड्यंत्र था। सर्वप्रथम अंग्रेज इसाई मिशनरियों ने गोवा के मंदिरों में अनेक कर लगाकर लूट तंत्र स्थापित किया, जबरन धर्मान्तरण कर गोवा के मन्दिरों को चर्च में तब्दील किया। बाद में टेम्पल रेगुलेशन कोड -1-2 बनाकर मन्दिरों पर टैक्स, दर्शनार्थियों पर टैक्स का प्रावधान किया।
रेगुलेशन एक्ट XIX आफ बंगाल कोड1810 बनाकर बंगाल के मंदिरों को लूटने के लिए अनेक प्रकार के कर लगाकर हिंदुओं को मंदिरों-मठों से दूर किया गया। लार्ड क्लाइव ने टैक्स कलेक्शन (Extraction) का जिम्मा लिया और उसने हर उस क्षेत्र को टटोला, जहाँ से ये लूट संभव थी। इस लूट के बाद मिशनरियों का ध्यान गया कि बंगाल से बाहर पूरे भारत में शिक्षा, संस्कृति और अपार धन के गढ़ तो मंदिर और मठ हैं। भारत पर कब्जा करने के साथ-साथ धर्मान्तरण और मन्दिरों-मठों की सम्पत्तियों पर कब्जा करने के लिए मिशनरियों ने ब्रिटिश हुकूमत से रेगुलेशन एक्ट आफ बंगाल कोड1810 के साथ साथ रेगुलेशन एक्ट आफ मद्रास कोड1817 बनाए।
इन्हीं रेगुलेशन एक्ट्स को आगे चलकर टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट जैसा सोफेस्टीकेटेड नाम दिया गया।।

The Religious Endowments Act, 1863
के अनुसार
1-सरकार को ही मन्दिरों के ट्रस्टी, मैनेजर, सुपरिटेंडेंट बनाने का अधिकार होगा।
2- मन्दिरों की समस्त सम्पत्तियां रेवेन्यू बोर्ड के अधीन होंगी जिस पर सरकारी ट्रस्टियों का अधिकार होगा।

3- मन्दिरों और मठों की सम्पत्ति का केवल सेक्यूलर उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही इस्तेमाल होगा।।

ब्रिटिश सरकार ने रिलीजियश एंडाउमेंट एक्ट बनाकर प्रायः सभी बड़े मन्दिरों में अपने अधिकारियों को ट्रस्टी बनाकर बैठा दिया था। अब ब्रिटिश सरकार की नजर मंदिरों-मठों के अधिग्रहण पर आ गई। 1926 में ब्रिटिश सरकार को मंदिरों के अधिग्रहण का सही अवसर मिला। इसके लिए मद्रास हिंदू रिलीजियश एंडाउमेंट एक्ट, 1926 (एक्ट-॥ आफ 1927) को निर्मित किया। इस एक्ट के तहत सरकार सिर्फ एक नोटिफिकेशन देकर मन्दिर, मन्दिर की सम्पत्तियों एवं भूमि को अधिग्रहित कर सकती थी।
इस काले एक्ट की सबसे बड़ी दुर्भावना यह थी कि पूर्व के एक्ट्स में जहाँ मस्जिदों पर कुछ मामूली शर्तों के साथ सरकार एवं मिशनरियों का हस्तक्षेप था, वो भी समाप्त कर केवल हिंदुओं के मन्दिरों को ही टारगेट किया गया था। सिर्फ़ एक नोटिफिकेशन से मन्दिर एवं मन्दिरों की सम्पत्तियों को मिशनरियों के कब्जे में दे दिया गया।।

टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट-1951 के कुछ हिस्सों को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अंधे एक्ट के एक हिस्से पर कमेंट करते हुए यहाँ तक कहा कि वो “beyond the competence of madras lagislature” है जो कि अनैतिकतापूर्ण है।

टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट-1951 के कुछ हिस्सों को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अंधे एक्ट के एक हिस्से पर कमेंट करते हुए यहाँ तक कहा कि वो “beyond the competence of madras lagislature” है जो कि अनैतिकतापूर्ण है।

सन् 1956 में दक्षिण भारत के राज्यों का पुनर्निर्धारण हुआ और हर राज्य ने हिंदुओं के मंदिर-मठों पर नियंत्रण के अपने अलग-अलग कानून बना दिए हैं।

मेरी बुद्धि के अनुसार सभी राज्यों के टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट को अलग-अलग चुनौती देना बहुत कठिन कार्य है, केन्द्र सरकार ही संविधान संशोधन कर आर्टिकल 25 से आर्टिकल30 की पुनर्समीक्षा करे।
इसके लिए केंद्र पर दबाव बनाया जाय।।

मोदी सरकार के एक एमपी सत्यपाल सिंह जी ने 2017 में टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट के खिलाफ, मन्दिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए एक बिल लोकसभा के पटल पर रखा था जो मोदीजी की सरकार द्वारा लटकाया ही रहा। पुनः 22 नवंबर 2019 को मोदी सरकार के एमपी सत्यपाल सिंह जी ने पुनः इस बिल को लोकसभा के पटल पर रखा, जो अब तक एक बार भी चर्चा किए बगैर लंबित है।।

कोरोना-कोविड19 से राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए तेलंगाना सरकार ने “The Telangana Charitable and Hindu Religious Institutions and Endowments Amendment Act 2007” की फाइल को पुनः बंद डिब्बे से बाहर निकाला और मात्र एक मंदिर का उदाहरण देखिए श्री सीतारामचन्द्र स्वामी मन्दिर से साढ़े चौदह करोड़ रू इस एक्ट की आड़ में जबरन हड़प लिए। ऐसे ही कितने मन्दिरों का धन हड़पा गया है।।

ये काला कानून इतना खतरनाक है कि इस कानून की एक धारा ही पूरे मन्दिर को निगलने के लिए पर्याप्त है।
टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट-1959 की धारा 64(5)A का प्रयोग कर साधारण सा ब्यूरोक्रेट डिप्टी कमिश्नर ‘-ex parte’ आदेश जारी कर पूरे मन्दिर को कब्जे में ले लेता है।
इसी ex parte आदेश से भारत के अधिकांश मंदिर सरकारी कब्जे में हैं।।

1954 में टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट-1951 इस एक्ट के एक हिस्से को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया। किंतु
तमिलनाडु की सिक्यूलर के. कामराज की सरकार ने Tamilnadu Hindu religious and Charitable Endowment act-1959 बनाया और 1954 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किए गए 1951 के एक्ट के सेक्शन 63 से 69 को दोबारा से 1959 एक्ट में डाल दिया।
कर्नाटक ने टेम्पल एंडाउमेंट एक्ट- 1951 को सन् 1997 तक सुप्रीम कोर्ट के 1954 में निरस्त करने के बावजूद जारी रखा। ये सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और संविधान के उल्लंघन का मामला था। किंतु2006 तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। 8 सितम्बर 2006 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस एक्ट को अवैधानिक करार देकर निरस्त कर दिया।
इसके बाद कर्नाटक की भाजपा येदियुरप्पा सरकार The Karnataka Act-2011 लेकर आई जो हिंदू पुजारियों, वैदिक, कर्मकांडों के जानकार हिंदुओं को मंदिरों की देखभाल के लिए नियुक्ति की स्वतंत्रता देती है।
अन्य सभी राज्यों की अपेक्षा कर्नाटक का 2011 एक्ट संवैधानिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता हिंदुओं को देता है पर पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देता जैसे कि वक्फ बोर्ड और मिशनरी चर्चों को मिली हुई है।

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