मुक्तस्यकिम्लक्षणं ? निर्भयं।

त्रिभुवन सिंह (लेखक)
मुक्ति भारतीय संस्कृति की अमूल्य पहचान है। मुक्ति की कामना, बन्धनों से मुक्ति अभूतपूर्व दर्शन है।लेकिन इस पर फिर कभी बात करेंगे।
पूरे संसार ने फ्रीडम और लिबर्टी को सभ्यता का सर्वोत्तम केंद्रबिंदु और अवधारणा माना है – फ्रीडम ऑफ स्पीच जैसी बकवास अवधारणाएं उसकी देन हैं।
पश्चिम और ईसाइयत वाले समाज ने बोलने की स्वतंत्रता को बहुत बड़ा मूल्यवान उप्लाब्धि माना। उसका कारण था। कोई भी कार्य बिना किसी कारण के नहीं होता। यही साइंस है। उसका कारण था, उनके धर्मग्रंथ द्वारा मानव मष्तिष्क पर पूर्ण नियंत्रण हेतु,बनाये गए क्रूर नियम और उनका अक्षरशः पालन करना। क्योंकि न जाने कितने सत्य बोलने वालों वैज्ञानिकों को मौत के घाट उतार दिया गया, या आजीवन गृह कारावास दिया गया। ब्रूनो और गैलीलियो उसके उदाहरण हैं। उन्हीं की संततियों ने कालांतर में उन्हें शहीद का दर्जा दिया।
जहां धर्म अपनी अवधारणाओं के विरुद्ध बोलने की स्वतंत्रता ही न छीने, अपितु बोलेने वाले का जीवन ही छीन ले, वहां फ्रीडम ऑफ स्पीच बड़ी उपलब्द्धि हैं मानवता की।
#इस_लाम आज भी इस मध्यकालीन जड़ता और जाहिलियत से बाहर नहीं निकल पाया।
हमने तो कर्म और पुनर्जन्म के मूल सनातन सिद्धांत को नकारने वाले चार्वाक को भी ऋषि का दर्जा दिया है।
इसलिए फ्रीडम ऑफ स्पीच को जब कोई भारत के संदर्भ में उपलब्धि बताता है तो उसकी मूर्खता पर सिवाय हंसने के क्या किया जा सकता है।
बात तो मुक्ति और निर्भयता में अटूट सम्बन्ध की हो रही थी। परंतु भटक गए।
मनुष्य निर्भय क्यों नहीं होता? इसका उत्तर देना ठीक वैसे ही है जैसे यह पूंछना कि सूर्य शीतल क्यों नहीं होता? दोनों प्रश्नों के एक ही उत्तर है कि यह उसका स्वभाव है।
वैसे ही भय मनुष्य के मन या माइंड का अभिन्न हिस्सा है।
वृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार मन या माइंड के दस गुण होते हैं – काम (कामना – सेक्स मनी एंड पावर), संकल्प, विचिकित्सा ( संशय Scepticism) धृति अधृति ( धैर्य अधैर्य), श्रद्धा अश्रद्धा, हीं ( लज्जा शर्म ), भीं (भय) धी ( बुद्धि Intellect).
बच्चा निर्भय होता है – वह सांप और अग्नि दोनों को पकड़ सकता है। क्योंकि वह अबोध है निश्छल है। अभी उसका माइंड विकसित नहीं हुआ है। वह जैसे जैसे बड़ा होगा – दूसरों का अनुकरण करके, शिक्षा और संस्कार सीखकर, या फिर अपने अनुभव से, उसके माइंड में उपरोक्त वर्णित सारे गुण विकसित होंगे।
भय मनुष्य के मन का अभिन्न हिस्सा है। व्यक्ति अजनबियों से इतना भयभीत क्यों रहता है? अजनबी चाहे व्यक्ति हो, स्थान हो, या परिस्थिति हो, इनसे व्यक्ति भयभीत होता है। यह प्राकृतिक स्वभाव है माइंड का।
व्यक्ति बार बार सिर्फ वही कार्य करता है जो वह करता आया है। इसी को वृत्ति या आदत कहते हैं। व्यक्ति आदत का गुलाम होता है। उसी जाने पहचाने मार्ग पर वह चलना चाहता है, जिस पर वह चलता आया है।
आर्मी जॉइन करने वाला हर नवयुवक गोली बारूद से उतना ही भयभीत होता है जैसे कि कोई आम आदमी। फिर उसे ट्रेनिंग दी जाती है । धीरे धीरे वह पर्याप्त निर्भय हो जाता है।
लेकिन मुक्ति के मार्ग का अनुसरण करने वाले के लिये क्या उपाय है? मन तो बार बार उन्हीं गली कूंचों में जाना चाहता है जिससे वह परिचित है। अपरिचित मार्ग पर जाना उसे भयभीत करता है। मन हमारे सिस्टम का सबसे शक्तिशाली यंत्र है। लेकिन यह यंत्र हमारा नियंत्रण करता है। हम यदि इस पर नियंत्रण पाना चाहेगे तो यह उत्पात करेगा, उपद्रव करेगा। इतना उपद्रव कर सकता है कि हम भयभीत हो सकते हैं।
इसीलिए ध्यान के प्रति लोगों के अंदर इतना भय है। ध्यान का अर्थ है मन की पकड़ से बाहर होना। Transcending the mind.
लेकिन इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। जैसे बच्चा धीरे धीरे मन की पकड़ में आता जाता है। वैसे ही मुक्तिमार्गी भी धीरे धीरे मन की पकड़ाई से बाहर आता है – निर्भयता के मार्ग का पथिक बन जाता है।
पानी को 99 डिग्री तक उबालो, उस डिग्री तक वाष्पित न होगा। लेकिन उसके वाष्पित होने की परिस्थिति अवश्य निर्मित होती है। 100 डिग्री पर वह स्वतः वाष्पित होने लगता है।
इसमें किसी क्यों और कैसे का कोई स्थान नहीं है। मंजिल पर पहुंचने के लिए पथ पर चलना ही होगा। यही नियम है। अन्य कोई उपाय नहीं है।
निर्भयं – अर्थात जो मन की पकड़ाई से पूर्णतः मुक्त हो गया। Transcending the mind completely.
Sanskrit Scriptures are #ManualOfMind.

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