मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी-

झूठार्थ तम भंजनम्-आदि सनातन परम्परा व संस्कृति अनुपालक जो वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, स्मृतियाँ, पुराण व उप—पुराणों को आप्त वाक्य मानते हुये वैदिक सत्य सनातन हिन्दू धर्म को मानता है उन सभी को एक सुखद सूचना देनी थी। परम श्रद्धेय पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र जी ने वि.सं.1851 (इस्वी सन् 1894) में एक अत्यन्त सत्यवादी व सत्य स्वरूप को प्रकट करने वाली पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में विद्वान् पण्डित श्री ज्वाला प्रसाद मिश्र जी ने भारतीय धर्मशास्त्रों का सही व सटीक रूप प्रस्तुत करते हुये स्थापित किया है कि पुराणों का ज्ञान वास्तव मे वेद के ज्ञान का प्रसार ही है। इसीलिये इनके लिखने वाले महर्षि श्री कृष्ण द्वैपायन को वेद व्यास के नाम से अलंकृत किया गया है।
हिन्दी में दो शब्द परस्पर विलोमशब्द के रूप में प्रयुक्त होते हैं। समास एवं व्यास इसमें समास का तात्पर्य है संक्षिप्तीकरण करना एवं व्यास का अर्थ है विस्तृत करना, प्रचरित करना, फैलाना, पल्लवित करना। भगवान् श्री कृष्ण द्वैपायन जो कि ऋषि पराशर के पुत्र थे उन्होंने पहले वेदों का सार संहिताओं एवं शाखाओं में प्रसार किया। एवं इसके बाद वेद के ज्ञान को ब्राह्मण आदि ग्रन्थों के आधार पर पूर्व में स्थापित पुराण का भी प्रचार किया। इसके लिये उन्होनें पुराणों को संक्षिप्त भी किया। उनके इस महत्तर कार्य के लिये उन्हें ही व्यास नाम से सम्बोधित किया जाता है। एवं इन्हीं महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत जैसे विश्वकोषात्मक ग्रन्थ की रचना भी की। यही कारण है कि अद्यावधि पर्यन्त जो भी व्यक्ति भारतीय वैदिक ज्ञान तत्त्व सम्बन्धी चर्चा, प्रवचन अथवा पुराणादि पाठ करने हेतु जिस स्थान पर विराजमान् होता है उसे व्यास पीठ कहा जाता है। पिछले 5000 वर्षों से ये परम्परा अक्षुण्ण रूप से चली आ रही है।
पुराणों के सन्दर्भ में एवं उनके प्रमाण में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। जिनमें पण्डित गिरिधर चतुर्वेदी जी की पुराण परिशीलनम्, पण्डित मोती लाला शास्त्री जी ने तो अपने सारे ग्रन्थों में ही पुराणों के आधार पर सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक, सदाचार, आदि आदर्शों की स्थापना करते हुये पौराणिक प्रसंगों के सामाजिक, वैज्ञानिक, आदि महत्त्व स्थापित किये हैं। इसी प्रकार दो अन्य विद्वान् हुये हैं जिनके नाम हैं पण्डित युधिष्ठिर मीमांसाक एवं पण्डित भगवद्दत्त ये दोनों ही विद्वान् हैं। एवं इन्होंने कुछ पुस्तक लिखी हैं जिनका अध्ययन करके ही मैं इनके सन्दर्भ में लिख रहा हूँ। पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक जी ने संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास लिखी है इन महोदय ने अपने ग्रन्थ में जिन जिन पूर्व वैयाकरणाचार्यों का नामोल्लेख किया है उसके लिये पुराणों को ही आधार बनाया है। द्वितीय विद्वान् हैं पण्डित भगवद्दत्त जी रिसर्च स्कालर इनकी दो पुस्तकें हैं वैदिक वाङ्मय का इतिहास एवं ” भारतवर्ष का बृहत् इतिहास” इन दोनों ही पुस्तकों में जो इन महोदय ने तर्कों की कसौटी पर इतिहास को घसा है उससे कई वैदेशिकों में पुन: प्रत्युत्तर देने की हिम्मत नहीं हुई। इनमें से प्रथम पुस्तक वैदिक वाङ्मय का इतिहास के तीन खण्ड हैं एवं द्वितीय भारतवर्ष का बृहत् इतिहास के दो खण्ड हैं। देानेां ही पुस्तकों में पण्डित भगवद्दत्त जी ने सबसे अधिक प्रमाण लिये हैं तो पुराणों से ही लिये हैं। एवं एक बार नहीं कई कई बार सप्रमाण सिद्ध किया है कि पुराण आज कल की रचना नहीं है ये अत्यधिक प्राचीन ग्रन्थ हैं। एवं इसके लिये सबसे श्रेष्ठ प्रमाण पाणिनि अष्टाध्यायी के चतुर्थ अध्याय का सूत्र पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मण कल्पेषु” है। जिसमें स्पष्टरूप से ब्राह्मण व पुराणों को बराबर बताया है। ये ऐसे अन्यान्य असंख्य प्रमाण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि पुराण ने केवल वेद के ज्ञान का प्रतिपादन करते हैं, स्थापना करते हैं, अपितु पुराणों के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना आत्मा बिना शरीर की कल्पना करना है।
मेरी पुस्तक ”धर्मशास्त्र का बृहद्—इतिहास भाग—1 के पुराण खण्ड में पुराणों की प्राचीनता विषयक चर्चा एवं सन्दर्भ दिये गये हैं। उसका अध्ययन अत्यन्त उपयोगी रहेगा। मुझे आशा है कि ये तथ्य सनातनियों के लिये ऊर्जावान् होगा एवं वेद के नाम पर पाखण्ड करने वालों के लिये हताशा भरा होगा।

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