मूल निवासी और निराधार कहानियाँ ….

अरुण उपाध्याय
मूल निवासी, आर्य, द्रविड़, ब्राह्मण-ये निराधार कहानियां भारत को हर प्रकार से खण्डित करने के लिये २०० वर्षों में अंग्रेजों तथा उनके भक्तों ने रची हैं। इसकी सबसे अच्छी व्याख्या उच्च विद्यालय में मेरे विज्ञान शिक्षक श्री दीपनारायण सिंह जी ने की थी। ताम्बे का एक अयस्क है जिसे चालकोपाईराईट लिखते हैं। मैंने वैसा पढ़ा तो मुझे टोक दिया कि चालको नहीं, खालको पढ़ा जाता है। मैंने उत्तर दिया कि खालको झारखण्ड के वनवासियों की उपाधि है, तो उन्होंने डांटा कि यह कौन सी बड़ी बात है, जहां खनिज होगा वहीं खनिज सम्बन्धी नाम होंगे। यह बोध किसी इतिहासकार, पुराण पढ़ने वालों को अभी तक भारत में नहीं हुआ है। वे समुद्र से सम्बन्धित शब्द उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा में खोजते हैं, खनिज वाले शब्द कृषिक्षेत्र मिथिला में खोजेंगे तथा पूर्व के लोकपाल इन्द्र वाले शब्द पश्चिम में। किन्तु झारखण्ड में एक समस्या है। खनिज नाम सम्बन्धित शब्द भारतीय भाषाओं में नहीं, ग्रीक में क्यों हैं? इसका एकमात्र अर्थ हो सकता है कि वे ग्रीस से आये होंगे। मध्य या पश्चिमी एसिया के किसी भी अन्य स्थान से आने पर ग्रीक भाषा के नाम नहीं हो सकते हैं। पर ग्रीक इतिहास में ऐसा कुछ नहीं लिखा है जहां के हेरोडोटस का इतिहास के पिता रूप में प्रचार किया जाता है। भारतीय शास्त्र देखने से इस रहस्य का पता चलत है। समुद्र मन्थन (खनिज निष्कासन) के लिए असुरों तथा देवों ने सहयोग किया था। भारत में उनका मुख्य केन्द्र झारखण्ड (तथा निकटवर्त्ती भाग) था जिसके खनिज क्षेत्र का आकार नक्शे में कूर्म जैसा है। उसके उत्तर में मथानी जैसा पर्वत गंगा नदी तक चला गया है जहां भागलपुर के निकट वासुकिनाथ तीर्थ है। वासुकि नाग को मन्दराचल की मथानी कहा गया है जिससे समुद्र-मन्थन हुआ था। ब्रहाण्ड पुराण (१/२/२०) अध्याय के अनुसार वासुकि नाग रसातल या पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिका) के थे। खनिज खोदने के लिये उत्तर अफ्रीका के बलि राजा के क्षेत्र से असुर भी आये थे। बलि राज्य भारत की पश्चिमी सीमा पर था जहां अरब में यवन लोग रहते थे। आज भी अरबी चिकित्सा को ही यूनानी चिकित्सा कहते हैं, ग्रीस की चिकित्सा को नहीं। समुद्र मन्थन राजा बलि के समय हुआ था जिनके समय कार्त्तिकेय का भी युद्ध हुआ था। महाभारत, वन पर्व (२३०/८-१०) के अनुसार कार्तिकेय के समय उत्तरीध्रुव अभिजित से दूर हट रहा था तथा वर्ष का आरम्भ धनिष्ठा नक्षत्र से होता था। यह १५,८०० ई.पू. में था। उसके बाद ६७७७ ई.पू. में बाक्कस आक्रमण में राजा बाहु की मृत्यु हो गयी (मेगास्थनीज के अनुसार बाक्कस आक्रमण काल, यवन आक्रमण में बाहु की मृत्यु तथा सगर द्वारा प्रतिकार कई पुराणों में है)। उसके प्रायः १५ वर्ष बाद बाहु के पुत्र सगर ने पश्चिम से यवनों को भारत की सीमा से भगा दिया। हेरोडोटस ने भी लिखा है कि यवन लोगों के वहां जाने के बाद ग्रीस का नाम इयोनिया (यूनान) हो गया। जहां से असुर आये थे, वहीं के लोग ग्रीस गये। अतः झारखण्ड निवासियों के बहुत से नाम खनिज सम्बन्धी ग्रीक शब्दों के आधार पर हैं। वासुकि-बस्के उपाधि। खालको पाईराईट-खालको उपाधि। किस्कू-ताप की इकाई, लोहा के लिये धमन भट्टी (कियोस्क आकार का), किस्कू उपाधि, एक्का या कच्छप-खान के भीतर कच्छप खोल की तरह सुरक्षा दीवाल और छत (इसमें ग्रीक एक्का का भारतीय नाम कच्छप है), टोप्पो-टोपाज, सिंकू (श्तैनस (टिन), हेम्ब्रम (पारद का अयस्क), लोहा-मुण्डा, सोना (ओराम, ग्रीक औरम), करकटा (खान नकशे के लिये परकार), मिन्ज (मीन = मछली, खनिज धुलाई), कण्डूलना (चींटी, हेरोडोटस ने २ अध्याय भारत की चींटियों के बारे में लिखा है, जो जमीन से सोना निकालती थीं। बालू या पत्थर की बड़ी डेरी से सोने का कण निकालना चींटी द्वारा बालू से चीनी का कण निकालने जैसा है)। एक अन्य वर्ग चाक्षुष मन्वन्तर (१४००० ई.पू. से पहले) राजा सुरथ के समय आया था जिनको कोला विध्वंसी कहा गया है (दुर्गा सप्तशती, अध्याय १-काली चरित्र)। कोला मूलतः आस्ट्रेलिया के थे। उनके नाम पर ऋष्यमूक पर्वत नाम पड़ा। इनकी सेना ने रावण के साथ युद्ध में भगवान् राम की सहायता की थी। आज भी जब काली-क्षेत्र कलिकाता पर कोला-विध्वंसी (कम्यूनिस्ट) शासन था तो उसका नाम कालीकट से कोलकाता हो गया।
शबर लोग वराह अवतार के समय से थे। ये बहुत पहले भारत आये थे, पर मूल निवासी इनसे कम से कम १५,००० वर्ष पूर्व के (३१००० ई.पू. जल प्रलय के बाद की सभ्यता के बाद) हैं।
पश्चिमोत्तर के आर्य तथा वेद-अभी तक उस क्षेत्र का पता नहीं चला है जो तथाकथित आर्यों का मूल निवास था। पर अंग्रेजों का आदेश है कि आर्य भले ही मंगल ग्रह से आये हों, भारत के बिलकुल नहीं हो सकते। आर्यों के मुख्य देवता को इन्द्र कहा गया है। किन्तु वे पूर्व दिशा के लोकपाल थे। रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४० में स्पष्ट रूप से लिखा है कि इन्द्र तथा गरुड़ के भवन यवद्वीप के सप्तद्वीप राज्य (इण्डोनेसिया) में हैं। आज भी इन्द्र से सम्बन्धित प्रायः ४० वैदिक शब्दों का प्रयोग केवल ओड़िशा से इण्डोनेसिया तक ही है।
एक और कहानी बनी है कि उत्तर से आर्यों ने दक्षिण के द्रविड़ों पर वैदिक सभ्यता थोप दी। २००१ में श्रीशैलम के वैदिक सम्मेलन में मैंने वेद-पुराण में लोकों की माप पर अपना पत्र पढ़ा था। भूल से आरम्भ में मुंह से निकल गया कि भारत वेद भूमि है। इस पर सभी अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत पढ़े प्राध्यापक एक साथ लड़ गये कि केवल उत्तर भारत वेद भूमि है, दक्षिण भारत पर बाद में आर्यों ने थोप दिया था। मैं इन निराधार चर्चा में कभी नहीं पड़ता, अतः चुप रहा। पर द्रविड़ विवाद आधा घण्टा चलता रहा। अचानक एक मानद प्राध्यापक ने द्रविड़ पक्ष में एक वेद मन्त्र उद्धृत किया जिसके २ शब्द केवल तेलुगू में हैं-नौ सेनापति को सुपर्ण या सुवन्ना नायक, कृषक को रेड्डी कहते हैं-एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे ।
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं, माता रेऴ्हि स उ रेऴ्हि मातरम् ॥ (ऋग् वेद १०/११४/४)
उनसे पूछा कि इस मन्त्र का अर्थ मालूम है, तो अपने शोध आदि के बारे में कहने लगे अपर अन्त तक अपने द्वारा उद्धृत मन्त्र का अर्थ नहीं कह पाये। द्रविड़ क्षेत्र में उनको वेद प्रचार के बारे में कैसे ज्ञान हो सकता है?
जिसने ऋग्वेद का प्रथम पृष्ठ भी भूल से देख लिया, उसको दो ऐसे शब्द दीखने चाहिये थे जिनका प्रयोग केवल द्रविड़ भाषाओं में होता है। दोषा-वस्ता = रात दिन। दोषा समय का भोजन दोषा, पुराना तेलुगू गीत-रमैया वस्ता वैया (वस्ता = दिनकर सूर्य)। इसमें कोई विद्वत्ता नहीं है, लोग आंख के सामने की चीज भी नहीं देखते, उतना ही पर्याप्त था-पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदरनिमित्तं बहुकृत शोकः (शंकराचार्य, मोह मुद्गर)
इसी प्रकार शिव से सम्बन्धित ५० वैदिक शब्द केवल काशी क्षेत्र में हैं। हिन्दी सीखते समय मुझे बताया गया कि बाटे (वर्तते) का प्रयोग केवल काशी क्षेत्र में होता, बाकी भारत में अस्ति का जो पूर्व में अछि, पश्चिम में आहे-है हो जाता है। मेरे मुंह से अचानक प्रश्न निकला कि फिर आर्य पश्चिम से कैसे आये? कुछ दिन बाद काशी क्षेत्र का एक और शब्द खोजा-सम्मान के लिये रवा। रवा वह है जिसमें यज्ञ रूपी वृषभ रव कर रहा है अर्थात् उपयोगी व्यक्ति हैं नहीं तो अन-रवा = अनेरिया या बेकार है। बाद में शिव से सम्बन्धित प्रायः ५० शब्द ऐसे खोजे जो केवल काशी क्षेत्र में ही प्रचलित है। विशेष कर कुन्त्याप सूक्त के बारे में सायण ने लिखा था कि इनका अर्थ सम्भव नहीं है, क्योंकि इसके शब्दों का प्रयोग संस्कृत में कहीं नहीं है। किन्तु पतञ्जलि ने महाभाष्य के आरम्भ में कहा है पृथ्वी बहुत बड़ी है, ७ द्वीपों में खोजना चाहिये कि इनका प्रयोग कहां हुआ है। अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं है, काशी क्षेत्र के शब्दों में ही इस सूक्त के सभी अर्थ मिल जायेंगे।
यदि आर्य पश्चिम से आये होते, तो इन शव्दों का प्रयोग प्रयाग से पश्चिम भी होता।
इसी प्रकार मराठी में वरुण सम्बन्धी शब्द विशेष प्रचलित हैं।
हर बार भागवत माहात्म्य में कहा जाता है कि भक्ति की सन्तानों ज्ञान-वैराग्य का जन्म द्रविड़ में हुआ, विस्तार कर्णाटक में हुआ तथा कहीं कहीं महाराष्ट्र में फैल गया। गुजरात पहुंचते पहुंचते उसका अन्त हो गया।
अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(पद्म पुराण उत्तर खण्ड श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
आकाश में अप् (द्रव) से सृष्टि हुयी। अतः ज्ञान रूपी द्रव की जहां उत्पत्ति हुयी वह द्रविड़ हुआ। वेद का अर्थ है, कर्ण आदि ५ ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान। अतः शब्द के अर्थों का जहां विस्तार हुआ, वह कर्ण+आटक हुआ। आज भी कर्णाटक में ही वेद पर सबसे अधिक शोध हो रहा है (इसका शोध पत्रों या सरकारी अनुदान से कोई सम्बन्ध नहीं है)। शब्द मुख्यतः भौतिक पदार्थों के नाम थे जो ब्रह्मा द्वारा दिये गये थे (मनुस्मृति, १/२३)। शब्दों के आधिदैविक, आध्यात्मिक अर्थों का विस्तार ही भागवत माहात्म्य में बृद्धि कहा है। जहां तक प्रभाव क्षेत्र होता है उसे महर् कहते हैं जिससे महल हुआ है (मनुष्य का निवास)। अतः जहां तक वेद का विस्तार हुआ, वह महाराष्ट्र हुआ। नहीं तो वह राष्ट्र तथा भारत महाराष्ट्र होता।
बाद में उत्तर भारत में भी इसकी उन्नति हुयी।
अतः पुराने शब्द जैसे नगर के लिये उरु, रात्रि के लिये दोषा आदि का प्रयोग दक्षिण में ही। स्वायम्भुव मनु के समय का पितामह सिद्धान्त या उसका नया संस्करण आर्यभटीय दक्षिण भारत में ही प्रचलित है। उत्तर भारत में बाद के वैवस्वत मनु के पिता विवस्वान् का सूर्य सिद्धान्त ही प्रचलित है।
ब्राह्मण वेद पुराण अर्थों पर अधिक ध्यान देते थे, अतः उनको विदेशी बनाने का अभियान अभी तक चल रहा है। यह ऐसा मूर्खतापूर्ण तर्क है जिसका उत्तर देना जरूरी नहीं है। पहली बात भारत के बाहर ब्राह्मण नामक जाति या वर्ग विश्व के किसी भाग में कहीं नहीं था। दूसरी बात, ४ वर्ण समाज रूपी पुरुष के अङ्ग हैं (जैसे पुरुष सूक्त), किसी एक वर्ण के द्वारा समाज १ दिन भी नहीं चलेगा।
भाषाओं के भिन्न होने का कारण है भिन्न लिपि। ६ प्रकार के दर्शन की तरह ६ दर्श-वाक् (लिपि) हुयी, जिनके वर्णों की संख्या दर्शन के तत्त्वों के अनुसार थीं। लिपि के कारण ९ मुख्य भाषायें थीं। हनुमान् जी को भगवान् राम ने ९ व्याकरणों (भाषाओं) का विद्वान् कहा है। भिन्न भिन्न उद्देश्यों केलिये भिन्न लिपि हैं। मुख्य लिपि थी ब्राह्मी जिसमें ६३ या ६४ वर्ण थे। वर्णों के उच्चारण स्थान के अनुसार वर्गी करण इन्द्र तथा मरुत् ने किया उसे देवनागरी कहा गया। ४९ वर्ण ४९ मरुत् के चिह्न तथा क से ह तक ३३ वर्ण ३३ देवों के चिह्न हैं। चिह्न रूप में देवों का नगर होने से यह देवनागरी है। ब्राह्मी लिपि के अन्य वर्ण इस व्यवस्था में ठीक नहीं बैठते, वे अयोगवाह हैं। जिस क्षेत्र में जो प्रचलन आरम्भ हुआ, वही अब तक चल रहा है। कोई क्षेत्र अपनी परम्परा नहीं छोड़ता।

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