मैक्समूलर ने वेदों में क्या विकृत किया ?

मैक्समूलर ने वेदों में क्या विकृत किया ?

निःसन्देह मैक्समूलर ने वेदों के विभिन्न विषयों पर ब्रिटिा सरकार ओर ईसाईयत के हितों की पूर्ति के लिए व्यापक साहित्य लिखा। इसमें वेदों का रचनाकाल, एवं रचनाकार, वेदों में मानव इतिहास, वैदिक देवतावाद, बहुदेवतावाद, वैदिक कर्मकाण्ड, भाषा का इतिहास, विकासवाद एवं धर्म के विभिन्न विषयों पर अपनी प्रतिक्रिा व्यक्त की तथा अनेक मनघड़न्त नवीन अवधारणाओं को जन्म दियाजो कि परम्परागत वैदिक मान्यताओं के पूर्णतया विरुद्ध हैं।

इसीलिए हम यहाँ पहले वेदों के मुखय विषयों पर भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करेंगे और फिर इस की समीक्षा करेंगे कि मैक्समूलर ने क्या और किस तरह वेदों को विकृत किया जिसे कि ब्रिटिश सरकार ने व्यापक रूप से भारत तथा अन्य देशों में प्रचारित किया।

हिन्दू संस्कृति में वेदों का महत्त्व

वेद का अर्थ है ज्ञान, या वह विद्या जिससे सभी सांसारिक, अधिभौतिक ओर आध्यात्मिक विद्याओं का ज्ञान होता है। वेद ईश्वरीय ज्ञान है। वेदों का ज्ञान शाश्वत्‌ सार्वदैशिक सर्वाकालिक एवं मानवमात्र के लिए सामन रूप से कलयाणकारी है। ईश्वरीय ज्ञान होने के कारण वेद-ज्ञान मूल है। वेद नित्य हैं। प्रलय हो जाने पर भी वे ईश्वर के ज्ञान में रहते हैं।वेद, वैदिक धर्म की आत्मा है। ऐसा सभी हिन्दू धर्म शास्त्र मानते हैं। वेद स्वतः प्रमाण हैं अन्य हिन्दू धर्मशास्त्र जैसे ब्राह्मणग्रंथ, आरण्यक, उपनिषदें, स्मृतियां, पुराण, आगम-निगम, रामायण-महाभारत वेदानुकूल होने पर ही प्रामाणिक हैं, अन्यथा नहीं। वेद-निरुक्त हिन्दुओं को मान्य नहीं हैं।

चारों वेदों के चार प्रमुख विषय हैं- ऋग्वेद का मुखय विषय ज्ञान, यजुर्वेद का कर्म, सामवेद का उपासना, और अथर्व का विषय विज्ञान है। वेदों में मनुष्य को लगातार अधिकतम सर्वांगीण विकास करने की प्रेरणा दी गई है। वेद सम्पूर्ण ज्ञान के मूलमंत्र हैं। वेदों में मूलरूप से सभी विद्याऐं हैं। वेद सत्य विद्याओं का पुस्तक होने के कारण प्रत्येक वैदिक धर्मों को वेदों का पढ़ना-पढ़ाना अनिर्वा है। इसीलिए हिन्दुओं के सभी संस्कार एवं कर्मकाण्ड वेकल वेदमंत्रों ख,ारा किए जाते हैं। वेद हिन्दू धर्म का आधार और आस्था के केन्द्र हैं। इसीलिए कहा गया है ‘वेदोह्णखिलो धर्म मूलम्‌’ (मनु. २ः ६) ‘नास्ति वेदात्परं शास्त्रां’ यानी ‘वेद से बढ़कर अन्य कोई शास्त्र नहीं है’ (म.भा. अनु प. १०५.६५)। वेदों में मानव इतिहास नहीं है। परन्तु सभी नाम वेदों से लिए गए हैं।

संक्षेप में मेंहिन्दुओं के धर्म, दर्शन, संस्कृति, आचार संहिता एवं नैतिक मूल्यों का मूल आधार वेद ही हैं। इसीलिए ब्रिटिश शासकों ने भी हिन्दुओं को ईसाईयत में धर्मान्तरित करने और भारत में अपना स्थायी राज्य स्थापित करने के उद्‌देश्य से ऋग्वेद व अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों को विकृत करने के लिए मैक्समूलर को अनुबंधित किया।

मैक्समूलर ने भी मानाः

”मैं मानता हूँ कि वास्तव में भारत के प्राचीन वैदिक साहित्य, भाषा, धर्म और कर्मकाण्ड पर किसी तरह का कोई बाहरी प्रभाव नहीं है…. यह काव्य और धर्म पूर्णतया भारतीय है। इसी लिए वैदिक साहित्य मनुस्मृति महाभारत औरपुराणों में, सभी जगह धर्म के विषय में वेदों को सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक ग्रन्थ  कहा गया है।”

(वही, पृ. १२८)

मैक्समूलर वेदाध्ययन को अनेक कारणों से महत्वपूर्ण और अनिवार्य मानता है। वह लिखता हैः”आर्य लोगों, यहाँ तक कि मनुष्यमात्र के विकास के अध्ययन के लिए विश्व में वेदों के समान अन्य कोई महत्वपूर्ण नहीं है। मैं यह भी मानता हूँ कि कोई व्यक्ति स्वयं अपने, अपने अपूर्वजों, अपने इतिहास अथवा अपने बौद्धिक विकास के बारे में जानने के जिज्ञासा रखता है,उसके लिए वैदिक साहित्य का अध्ययन न केवल अपरिहार्य है और बल्कि उदार दृष्टि से अध्ययन के लिए यह बैबीलोनियाई अथवा परसियन राजाओं, यहाँ तक कि बाइबिल के जुडाह और इज़राइल के इतिहास और उन राजाओं के कारनामें जानने से भी अधिक महत्वपूर्ण है।”

(इंडिया, वही पृ. १०२-१०३)

अतः मैक्समूलर आर्य जाति ही नहीं, बल्कि मानव इतिहास को जानने के लिए वेदों के अध्ययन को परमावश्यक मानता है। इसलिए हिन्दुओं के आचार-विचार, रीति-रिवाज संस्कार व संस्कृति जानने के लिए वेदों का अध्ययन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। वेद देववाणी है। अतः उसके सत्यार्थ को समझने के लिए प्राचीन यास्क की नैरुक्तीय वेद भाष्य शैली को अपनाना चाहिए जिसका कि उन्नीसवीं सदी में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पुररुद्धार किया है।

मैक्समूलर की दृष्टि में वेद का स्थान

एक कट्‌टर ईसाई होने के कारण मैक्समूलर वेदों को बाइबिल से निचली श्रेणी का मानता है। कैथोलिक कौमनवेल्थ को दिए गए एक साक्षात्कार में यह पूछे जाने पर कि विश्व में कौन-सा ग्रंथ सर्वोत्तम है, तो उसने कहाः”इसमें कोई सन्देह नहीं कि यद्यपि, किसी भी अन्य ‘पवित्र पुस्तक’ की अपेक्षा (ईसाईयों के धर्म ग्रंथ) ओल्ड अैर न्यू अैस्टामेंट में नैतिक शिक्षऐं प्रमुखता से विद्यमान हैं। उसने यह भी कहा यह भले ही किसी को पक्षपातपूर्ण लगे लेकिन सभी दृष्टियों से मैं कहता हूँ कि न्यू टेस्टामेंट (सर्वोत्तम ) है। इसके बाद, मैं कुरान को कहूँगा जो कि अपनी नैतिक शिक्षाओं में न्यू टेस्टामेंट के नवीन संस्करण के लगभग समीप है। उसके बाद… मेरे विचार से ओल्ड टेस्टामेंट (यहूदियों का धर्मग्रंथ), दी सदर्न बुद्धिस्ट त्रिपिटिका, (बौद्धों का धर्मग्रं्रथ) वेद और अवेस्ता (पारसियों का ग्रंथ) है”।

(जी. प., ख. 2, पृ. 322-323)

अतः मैक्समूलर ईसाईयों के धर्मग्रंथ बाइबिल को सबसे श्रेष्ठ और वेदको कुरान से निचले और अवेस्ता से उत्तम श्रेणी का मानता है। इससे अधिक हठधर्मी व पक्षपात और क्या हो सकता है? सत्ताईस पुस्तकों एवं अनेक लेखकों द्वारा लिखी गई, हजारों विरोधाभासों से पूर्ण, ५ वोटों की अधिकता से चुनी गई, और्थिक कौंसिल में ३९७ ईसवी में स्वीकृत- न्यू टेस्टामेंट, भला प्रेरणादायक व सत्य ज्ञान से ओत-प्रोत वेद से उत्तम कैसे हो सकती है? न्यू अैस्टामेंट के वर्तमान स्वरूप को तो १५४६ में वैधता प्रदान की गई।

(एल. गार्डनर, ब्लड ऑफ दी होली ग्रेल, पृ. ५०)

क्या मैक्समूलर बाइबिल सम्बन्धी उपरोक्त तथ्यों से अनजातना था या उसने जानबूझकर वेदों को निम्न स्तर का कहा?

वेदों का रचना काल : हिन्दू धर्म की मान्यता है कि ईश्वर ने वेदों की रचना सृष्टि यानी प्राणी मात्र आदि की रचना के साथ की और वैदिक काल गणना के आधार पर आज (२००९ सदी तक) वेदों की रचना हुए एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ दस (१,९६,०८,५३,११०) वर्ष  हो गए हैं। आधुनिक विज्ञान भी मानव रचना को लगभग इतना ही मानता है। हिन्दुओं के कर्मफल सिद्धान्त की वैधानिकता इसी बात पर आधारित है कि मनुष्य को उसके कर्मों और उसे फल व दण्ड को मनुष्यके जनम के साथ ही उसे बता दिया जाए। अतः परमात्मा ने मनुष्य की सृष्टि के साथ ही उसके लिए वेद के रूप में अपेक्षित ज्ञान का प्रकाश किया। अतः वेद आदि सृष्टि काल से हैं।

इस सत्य को मानते हुए मैक्समूलर लिखता है किः

‘यदि धरती और प्रकाश का रचयिता कोई परमेश्वर है तो उसके लिए यह अन्यायपूर्ण होगा कि वह मोजिज से पूर्व उत्पन्न लाखों पुखें को अपने ज्ञान से वंचित रखे। तर्क और धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन दोनों घोषित करते हैं कि परमेश्वर सृष्टि के आदि में ही अपना ज्ञान मनुष्यों को देता है।”

(साइंस और रिलीजन)

हिन्दू धर्म के लिए गौरव की बात है कि वेद भी इस बात की पुष्टि करते हैं:

ऋतञ्‌च सत्यञ्‌चाभिद्धतपसोह्णध्यजायत्‌ (ऋ. १०.१९०.१) यानी ”परमात्मा ने अपने ज्ञान बल से, ऋत और सत्य के नाम से, सम्पूर्ण विधि-विधान का निर्माण किया।” इसी की पुष्टि में महाभारत में वेद व्यासलिखते हैं:-

अनादि निधना नित्या वागुत्सृृष्टा स्वयम्भुवा।

आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवत्त्यः(शां. प. २३२ः २४)

यानी ”सृष्टि के आदि में स्वयम्भू परमात्मा से ऐसी दिव्य वाणी (वेद) का प्रादुर्भाव हुआ जो नित्य और जिससे संसार की प्रवृत्तियाँ-, (गतिविधियाँ, कर्मादि) चले। मनु स्मृति के अनुसार ”सब पदार्थों के नाम, भिन्न-भिन्न कर्म और व्यवस्थाऐं, सृष्टि के प्रारम्भ में, वेदों के शब्दों से ही बनाई गई है।”

(१ः२१)

अतः वेदों का रचनाकाल सृष्टि के आदि से हैं। वेदों के रचनाकाल के संबंध में मैक्समूलर अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ एन्शिएन्ट संस्कृत लिटरेचर’ (१८५९) में लिखता है कि ”वैदिक कविता का प्रारम्भिक काल १२०० से १००० ई. पू. तक के रूप में माना जा सकता है।” उसी का अनुसरण करते हुए अधिकांश पाश्चात्य लेखकों ने वेदों का रचनाकाल २००० ई.पू. तक माना हैः

(१) डब्लू डी व्हिटनी- १२०० ई.पू. (ओरियंटल एण्ड लिंग्विस्ट स्टडीज, १८७२)

(२) एल. वोन श्रोडर- २००० ई.पू. (इन्डियन लिटरेचर एण्ड कल्चर)

परन्तु जैकोबी ने ४५०० वर्ष ई.पू. माना (उबेर डास आफ्टर डस ऋग्वेद) तथा दीनानाथ चुनैट ने वेदों की रचना को तीन लाख वर्ष पुराना माना (वेद काल निर्णय)।

मैक्समूलर ने जहाँ १८५९ में, वेदों का रचनाकाल १२०० ई.पू. माना वहीं १८९० में अपनी पुस्तक  ‘Physical Religion’   पृष्ठ, १८ पर कहाः   ”हम (वेदों के आर्विभाव) की कोई अन्तिम सीमा निर्धारित कर सकने की आशा नहीं रख सकते हैं। वैदिक सूक्त १००० ई.पू. या १५००, २००० या ३००० ई.पू. में, संसार की कोई शक्ति नहीं जो कि इसकी तिथि निश्चित कर सके।”

इसी का समर्थन करते हुए बिंटरनिट्‌ज़ ने अपनी पुस्तक  ‘The Age of the veda’ (pp 10-11) में कहा अर्थात्‌ ”हमें कोई निश्चित संखया देने से बचना होगा जबकि यह विषय ही ऐसा है जिसमें कोई निश्चित तिथि देने की सम्भावना नहीं है।”

इसी प्रकार ”रिलीजन ऑफ दी वेदाज” का लेखक मौरिस ब्लूमफील्ड लिखताहैः

”कुछ भी हो हमें इस प्रकार की अनुदारता के धोखे में नहीं आना चाहिए जे अपनी आत्मा को केवल सन्तुष्ट कर लेती है कि १५००, १२०००, १००० ई.पू. को मानने के लिए की अपेक्षा २००० ई.पू. के अधिक अच्छे प्रमाण हैं- ”एक बार फिर यदि स्पष्टवादिता से कहना हो तो हम कहेंगे कि हम नहीं जानते।”

( पृ. 19)

हिन्दू धर्म की परम्परगत मान्यता है कि मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए मूल ज्ञान की आवश्यकता होती है। अदि मूल ज्ञान को मनुष्य नहीं बना सकता है। उसे केवल संसार का सृष्टिकर्ता सर्वज्ञ परमेश्वर ही दे सकता है। मनुष्य मूल ज्ञान को विकसित, सुस्पष्ट एवं व्यावहारयोग्य बना सकता है। किसी भी ज्ञान के ईश्वरीय होने के लिए यह आवश्यकहै ि कवह ज्ञान मानव सृष्टि के आदि में दिय गया हो। वह मानव इतिहास, राजा-रानियों की कहानियों, राजनैतिक युद्धों आदि के वर्णनों से मुक्त हो, न कि जैसा हम इतिहास, रामायण, महाभारत, बाइबिल व कुरान में देखते हैं। वह ज्ञान, सत्य, तर्कसंगत, विवेकपूर्ण, विकासोन्मुख, मानव कल्याणकारी, सबके लिए एक समान, सर्वहितकारी एवं पक्षपात रहित हो। वह ज्ञान जातिभेद, लिंगभेद, वर्गभेद, भाषाभेद से मुक्त हो। वह ज्ञान सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सर्व-समान, एवं मत, पंथ और सम्प्रदायों के पक्षपातों से मुक्त हो। वह वैज्ञानिक, सृष्टि नियमों के अनुकूल और विरोधाभासों से मुक्त हो। वह ज्ञान पूर्णतया समता, ममता और मानवतावादी हो।

हिन्दुओं के लिए यह गौरव की बात है कि विश्व धर्मगं्रथों में से केवल उनके धर्मग्रंथ वेदों में ही ये सभी लक्षण विद्यमान हैं। मनुष्यकृत कोई धर्म जैसे- ईसाईयत, इस्लाम आदि इन लक्षणों की पूर्ति नहीं कर सकता है। इसीलिए वेद ईश्वरीय ज्ञान है। ऐसा स्वयं वेदों से भी सुस्पष्ट हैः

(१) ‘अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्‌। वदन्तीर्यत्र गच्छन्ति तदाहु ब्राह्मणं महत्‌’॥

(अथर्व. १०.०८.३३)

”उस कारण रहित परमात्मा ने अपार कृपा करके सृष्टि केआदि में मनुष्य के लिए ब्राह्म ज्ञान का उपदेश दिया जिससे हमें यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है”

(२) ‘तस्माद्य ज्ञात्सर्ववहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे, । छन्दांसि जिज्ञरे तस्माद्य जुस्तस्मादजायत’॥

(यजु. ३.१७)

”हे मनुष्यों! उस पूर्ण अत्यन्त पूजनीय, जिसके लिए सब लोग समस्त पदार्थ समर्पण करते हैं, उसी परमात्मा से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद उत्पनन हुए।”

(३) यास्मादृचो, प्रपातक्षन्‌ यजुर्यस्माद न्याकान्‌,। सामानि यस्य लोमा न्यथर्वाह्णद्धगरसो मुखम्‌॥

(अथर्व. १०.७.२०)

”जो सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वर हैं उसी से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद उत्पन्न हुए। उसी को तुम वेद का कर्त्ता मानो।”

वेदों के इन्हीं लक्षणों के कारण वेदों के प्रकाण्ड विद्वान्‌ महर्षि दयानन्द ने कहा ”सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनका आदि मूल परमेश्वर है। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।” स्वामी विवेकानन्द ने भी ज्ञान को शाश्वत माना हैः

”वेद ईश्वर की वाणी है। ये ईश्वरी ज्ञान की अभिव्यक्ति है क्योंकि ईश्वर शावत्‌ है। इसलिए वेद ज्ञान भी शाश्वत्‌ हैं।

(स्वामी विवेकानन्द ग्रंथमाला, खं. २, पृ. २३९)

अतः चारों वेदों में जो आदि ज्ञान है, उसका रचनाकार परमेश्वर ही है।

मंत्र दृष्टा ऋषि

वेद के वर्तमान संस्करणों में प्रत्येक वेद मंत्र या मंत्र समूहों के चार विशेष लक्षण दिए गए हैं- ऋषि, देवता, स्वर और छन्द। यहाँ मंत्र के ऋषि का भाव है- मंत्र के रहस्य को सुस्पष्ट करने वाला, देवता-मंत्र का मुखय विषय व केन्द्र बिन्दु, स्वर-उच्चारण विधि और छन्द-उसी गद्य-पद्य में रचना विशेष है। परन्तु मैक्समूलर आदि लेखकों ने वेद मंत्रों के साथ लिखे विश्वामित्र, अंगिरा, भारद्वाज आदि ऋषि को उस मंत्र विशेष का रचनाकार मानाः, (p. 134),   जो कि वैदिक परम्परा के पूर्णतया विपरीत है। वैदिक परम्परा के अनुसार मंत्र का ऋषि उस मंख का रचनाकार नहीं बल्कि उस मंत्र के रहस्य का साक्षात्कार एवं व्याखया करने वाला और उसका प्रथम दृटा है ‘ऋषयो मंत्र दृष्टारः’ (निरुक्त. २ : ११) अर्थात्‌यास्काचार्य कहता है ”जिस-जिस मंत्र का दर्शन जिस-जिस ऋषि ने सर्वप्रथम किया और वह सत्य-मंत्रार्ाि उसने दूसरों को पढ़ाया। इस इतिहास की सुरक्षा के लिए आज तक मंत्र के साथ इस मंत्रार्थ दृष्टा ऋषि का नाम स्मरणार्थ् लिखा जाता है।”

(निरुक्त : १ : २०)

इसीलिए तैत्तरीय संहिता, ऐतेरय ब्राह्मण, काण्व संहिता, शतपथ ब्राह्मण एवं सर्वानुक्रमणी में मंत्रों के दृष्टाओं को ही ऋषि नाम से सम्बोधित किया गया है तथा अनेक प्रमाण दिए हैं। अतः मंत्रों के साथ लिखे ऋषि का नाम उस मंत्र का लेखक नहीं, परनतु उसका सत्यार्थ दृष्टा एवं प्रथम प्रचारक है। ऐसी ही वैदिक परम्परा है। मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों का मंत्र के ऋषि को उस मंत्र का रचनाकार कहना एक भ्रम और अवैदिक परम्परा है।

 ( लेखक आचार्य जय माणिक्य शास्त्री )

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