यजुर्वेद का प्रथम मन्त्र

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-

शुक्ल तथा कृष्ण यजुर्वेद की प्रायः सभी शाखाओं के आरम्भ में एक ही मन्त्र है, जिसके प्रायः १० प्रकार के अर्थ है। इनमें ५ प्रकार के अर्थ केवल स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा आर्यसमाज के विद्वानों के हैं। आर्यसमाज के अर्ध-शिक्षित लोग स्वामी दयानन्द से थोड़ा भी भिन्न मत या शब्द देखते ही उसको दयानन्द का विरोधी, आर्यसमाज का शत्रु, पतित, पाखण्डी, पुराणों की पोपलीला आदि कहने लगते हैं। हर व्याख्याकार ने अपने तात्कालिक समाज के अनुसार व्याख्या की है, वे स्वयं भी भिन्न अवसरों पर अन्य शब्दों का प्रयोग करते। वेदमन्त्रों के आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक अर्थ होते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् ने ५ प्रकार के अर्थ कहे हैं। सभी अर्थों के बाद भी प्रथम मन्त्र की पूर्ण व्याख्या नहीं हुयी है। इसमें सभी प्रकार के यज्ञों का सारांश होना चाहिए क्योंकि यजुर्वेद यज्ञ सम्बन्धी वेद अंश है।
(१) सायण व्याख्या (तैत्तिरीय संहिता)-ॐ इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑, वा॒य॑वः स्थोपा॒यवः॑ स्थ दे॒वो॑ वः॑ सवि॒ता॑ प्रा॑र्प॑यतु॒ श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒, आप्या॑यध्वमघ्निया दे॒वभा॒गमूर्जस्वतीः॒ पय॑स्वतीः, प्र॒जाव॑तीरनमी॒वा अ॑य॒क्ष्मा मा वः॑ स्ते॒न ई॑शत॒ माऽघशँ॑सः रु॒द्रस्य॑ हेतिः परि॑ वो वृणक्तु, ध्रु॒वा॑ अ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीः यज॑मानस्य प॒शून् पा॑हि (तैत्तिरीय संहिता,१/१)
प्रायः ऐसा ही पाठ अन्य कृष्ण यजुर्वेद शाखाओं का है-
ॐ इ॒षे त्वो॑र्जे॑ त्वा॑ वाय॑वस्स्थोपाय॑वस्स्थ देवो॑ वस्सवि॒ता॑ प्रा॑र्प॑यतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। आ॑प्यायध्वमघ्न्या॒ देवभागं॑ प्रजा॑वतीरनमीवा॑ अ॑य॒क्ष्माः। मा॑ वस्स्तेन॑ ई॑शत मा॑घ॑शँ॑सः प॑रि वो रुद्र॑स्य हेतिर्वृणक्तु। ध्रुवा॑ अस्मि॑न् गो॑पतौ स्यात बह्वी॑र्य॑जमानस्य पशू॑न् पाहि यजमानस्य पशुपा असि। (काठक संहिता १/१)
ॐ इ॒षे॑ त्वा॒ सुभू॒ता॑य, वा॒य॑व स्थ, दे॒वो॑ वः॑ सवि॒ता॑ प्रा॑र्प॑यतु श्रे॑ष्ठतमाय क॑र्मणा॒, आ॑प्या॑यध्वमघ्न्या॒ दे॒वे॑भ्या॒ इ॑न्द्राय भा॒गं॑, मा॑ व॑ स्तेन ई॑शत॒ मा॑घशँ॑सो ध्रु॒वा॑ अ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्य॑जमा॑नस्य प॒शू॑न् पाहि (मैत्रायणी संहिता,१/१)
सायण अर्थ- आपस्तम्ब, बौधायन श्रौत सूत्रों तथा अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर इस का अर्थ कहा है कि पलास के दण्ड को सीधा तथा चिकना करके गाय दुहते समय बछड़े को छड़ी द्वारा गाय से दूर करते हैं। उससे प्रजा का पालन, पशु आदि धन की वृद्धि, रोगनाश होता है तथा उस धन में इन्द्र को भाग मिलता है। इसकी विस्तृत व्याख्या की है।
(२) उव्वट महीधर भाष्य-मन्त्र-
ॐ इ॒षे त्वो॑र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु आप्या॑यध्व मघ्न्या॒ इन्द्रा॑य भा॒गं प्र॒जाव॑तीरनमी॒वा अ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्तेन ई॑षत माघशँ॑सो ध्रुवा अ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यजमा॑नस्य प॒शून्पा॑हि (वा. यजु १/१)
करपात्री जी ने प्रायः १०० पृष्ठों में इसकी व्याख्या की है। सामान्य मन्त्रार्थ यह दिया है-
हे शाखे! धान्य की उत्पत्ति के लिए मैं तुम्हें काटता हूँ, और वृष्टि रूपी रस के लिए तुम्हें एक सी बनाता हूँ (ऊंचा नीचापन छील छाल कर ठीक करता हूँ), हे वत्सो! तुम अपनी माताओं से दूर हो जाओ। हे गौओं! प्रेरक और प्रकाशमान परमेश्वर तुम्हें यज्ञ कर्मोपयोगी बनाने के लिए विपुल तृण युक्त वन में जाने की प्रेरणा दे। हे अवध्य गौओ! इन्द्र के उद्देश्य से तुम अपना दूध बढ़ाओ। चोर तथा हिंसक व्याघ्र आदि पशु तुम्हें मारने में समर्थ न हों। तुम विपुल सन्तति से युक्त बनो, एवं सामान्य व्याधि रहित और प्रबल रोग से भी मुक्त रहो। इस यजमान के घर दीर्घकाल तक बनी रहो। हे शाखे! तुम यजमान के पशुओं की रक्षा कर।
(३) दयानन्द भाष्य-
हे मनुष्य लोगो ! जो (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाला सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (देवः) सब सुखों के देने और सब विद्या के प्रसिद्ध करनेवाला परमात्मा है, सो (वः) तुम हम और अपने मित्रों के जो (वायवः) सब क्रियाओं के सिद्ध करानेहारे स्पर्श गुणवाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियाँ (स्थ) हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्युत्तम (कर्मणे) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिये (प्रार्पयतु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे। हम लोग (इषे) अन्न आदि उत्तम-उत्तम पदार्थों और विज्ञान की इच्छा और (ऊर्जे) पराक्रम अर्थात् उत्तम रस की प्राप्ति के लिये (भागम्) सेवा करने योग्य धन और ज्ञान के भरे हुए (त्वा) उक्त गुणवाले और (त्वा) श्रेष्ठ पराक्रमादि गुणों के देने हारे आपका सब प्रकार से आश्रय करते हैं। हे मित्र लोगो ! तुम भी ऐसे होकर (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त हो तथा हम भी हों। हे भगवन् जगदीश्वर ! हम लोगों के (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये (प्रजावतीः) जिनके बहुत सन्तान हैं तथा जो (अनमीवाः) व्याधि और (अयक्ष्माः) जिनमें राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं हैं, वे (अघ्न्याः) जो-जो गौ आदि पशु वा उन्नति करने योग्य हैं, जो कभी हिंसा करने योग्य नहीं, जो इन्द्रियाँ वा पृथिवी आदि लोक हैं, उन को सदैव (प्रार्पयतु) नियत कीजिये। हे जगदीश्वर ! आपकी कृपा से हम लोगों में से दुःख देने के लिये कोई (अघशंसः) पापी वा (स्तेनः) चोर डाकू (मा ईशत) मत उत्पन्न हो तथा आप इस (यजमानस्य) परमेश्वर और सर्वोपकार धर्म के सेवन करनेवाले मनुष्य के (पशून्) गौ, घोड़े और हाथी आदि तथा लक्ष्मी और प्रजा की (पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये, जिससे इन पदार्थों के हरने को पूर्वोक्त कोई दुष्ट मनुष्य समर्थ (मा) न हो, (अस्मिन्) इस धार्मिक (गोपतौ) पृथिवी आदि पदार्थों की रक्षा चाहनेवाले सज्जन मनुष्य के समीप (बह्वीः) बहुत से उक्त पदार्थ (ध्रुवाः) निश्चल सुख के हेतु (स्यात) हों। इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ-ब्राह्मण में की है, उसका ठिकाना पूर्व संस्कृत-भाष्य में लिख दिया और आगे भी ऐसा ही ठिकाना लिखा जायगा, जिसको देखना हो, वह उस ठिकाने से देख लेवे ॥१॥
(४) जयदेव शर्मा (आर्यसमाज)-हे परमेश्वर!(इषे) अन्न, उत्तम वृष्टि आदि पदार्थों की प्राप्ति और (ऊर्जे) सर्वोत्तम पुष्टिकारक रस प्राप्त करने के लिए (त्वा त्वा) तेरी उपासना करते हैं। हे प्राण और प्राणि गण! तुम (वायव स्थ) सब वायु रूप हो, वायु द्वारा प्राण धारण करते हो। (वः) तुम सबका (सविता) उत्पादक परमेश्वर ही (देव) वह परम देव, सब सुखों और पदार्थों का प्रकाशक और प्रदान करने व्ला है। वह तुमको (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ, सबसे उत्तम (कर्म्मणे) कर्म निःश्रेयस प्राप्ति के लिए (प्र अर्पयतु) पहुंचावे, प्रेरित करे। और हे (अघ्न्या) कभी न मारने योग्य, इन्द्रियस्थ प्राण गण, एवं यज्ञ योग्य गौओ! और पृथ्वी आदि लोको! आप सब (आप्यायध्वम्) खूब परिपुष्ट होवो। तुम (इन्द्राय) ऐश्वर्यवान् पुरुष या राजा के लिए (भागं) भजन करने योग्य या प्राप्त करने योग्य भाग हो। तुम (प्रजावतीः) प्रजा, वत्स, पुत्र आदि सहित, (अनमीवाः) रोग रहित, (अयक्ष्माः) राजयक्ष्मा से रहित रहो। (वः) तुम पर (स्तेनः) चोर डाकू आदि दुष्ट पुरुष (मा ईशत) स्वामित्व प्राप्त न करे। (अघशंसः) पाप की चर्चा करने वाला, दूसरों को पाप, हिंसा आदि करने की प्रेरणा देने वाला नीच पुरुष भी (वः मा ईशत) तुम पर स्वामी नहीं रहे। हे गौवो! तुम (गोपतौ) गौ अर्थात् गौओं और भूमियों के पालक राजा और रक्षक पुरुष के अधीन (ध्रुवाः) स्थिर रूप से (बह्वी) बहुत संख्या में (स्यात) बनी रहो। हे विद्वान् पुरुष! तू भी (यजमानस्य) यज्ञ करने हारे, दान देने वाले आत्मा, और यज्ञकर्त्ता श्रेष्ठ पुरुष के (पशून् पाहि) पशुओं की पालना कर (शतपथ ब्राह्मण, १/७/१/१-७)
Flow of energy from Sun has been called Işā, it is central axis of all life, so it is called Iṣā-daṇḍa (axle rod) of ratha of sun. Its measure is given in Bhāgavata purāṇa, part 5 as 6000 yojana (1 yojana = sun diameter). In human body, it is spinal cord which links brain with body. Sun in space is life, its image is digestive system around maṇipūra-chakra which feeds the body. Here, cow is called Aghnyā, i.e. not to be killed. In general, ‘go’ means sun-rays, any place (e.g. earth) where yajña is done, yajña itself, and human organs. Thus, all as cycle of production are to be maintained and only its remains are to be consumed as taught in Gītā (3/10-16). If we maintain chain of yajña starting with human body and organs, family and Indra (king, space radiation) we will be bestowed with Prajā, will remain free of any infection and decay. We will not take due of others. ‘Gha’-the fourth letter indicates 4 Puruşārtha (aims of human life). Not following the path is agha =sin. We should not deviate from Puruşārtha which is taught by Charaka by maintaining healthy life. Then man and society will run steadily and wealth will increase. On earth surface, agriculture is base for all other yajña. So, the rod of plough (Hala) is called Īşā or Harīşa (hal+īşa). That is put to start any worship whip is a model of all yajña. It is also called yūpa-dāru (wood for central axle). If that axle is kept moving for efficient agriculture (agri =first of culture), we remain healthy, wealthy and do not need other’s wealth. इष गतौ(४/१९)-जाना।
इष आभीक्ष्ण्ये (९/५६)-बार बार करना।
इषु इच्छायाम्(६/६१)-इच्छा करना, चाहना।
ईष गतिहिंसादानेषु (१/४०६)-जाना, मारना या दुःख देना, देखना।
ईष उञ्छे(१/४६१)-एक एक दाना उठाना, बीनना।
इष्-१. इच्छा करना-इच्छामि संवर्धितमाज्ञया ते(कुमारसम्भव, ३/३), २. चुनना, ३. पाने की चेष्टा करना-भूतिमिच्छता, ४. राजी होना, स्वीकार करना, ५. आशा करना या मांगना-देवेषु यज्ञे भागमीषिरे(शतपथ ब्राह्मण, १/६/१), ६. मानना, स्वीकार करना, ७. मांगना, प्रार्थना करना, ८. प्रस्ताव मानना, ९. उपयोगी बनाने की चेष्टा करना, १०. मन्तव्य देना। कर्मवाच्य-१. इच्छित या पसन्द होना, २. प्रार्थित होना, ३. नियम होना-हस्तच्छेदनमिष्यते(मनुस्मृति, ८/३२२), त्रिरात्रं दशरात्रं वा शावमाशौचमिष्यते (याज्ञवल्क्य स्मृति, ३/१८), ४. स्वीकृत होना-जम्भो दन्तेऽपि चेष्यते(त्रिकाण्डशेष, २/४), चलना, चलाना-केनेषितं पतति प्रेषितं मनः(केनोपनिषद् १/१), येनेषिता वागसवश्चरन्ति (भागवत पुराण २/२८/३५), २. फेंकना, उड़ाना, ३, ऊंचा शब्द करना, ४. छिड़कना, ५. भाग निकलना, उड़ना, ६. पीटना, निन्दा करना-न वेद खं गा चपरिश्रमेषितः (भागवत १२/९/१६), ७. बाध्य करना, ८. करने का अभ्यास-इष्णाति वैष्णवो व्रतम्।
इष्-तेज गति, २. इच्छा करना, ३. अन्न, भोजन-वनस्पतीनोषधीश्च ससर्जोर्जमिषं विभुः(भागवत ६/४/८), ४. मुक्ति-नम ऊर्ज इषे त्रष्याः पतये यज्ञरेतसे(भागवत ४/२४/२८), ५. शक्ति, बल, उत्साह, ६. सुखद, ७. सम्पत्ति, प्रभुता, ८. इच्छा, ९. आकाश का जल।
इषः-शक्तिशाली, २. आश्विन मास-ध्वनिमिषेऽनिमिषेक्षणमग्रतः(शिशुपाल वध, ६/४९)
ईष्-१. भाग निकलना,२. खिसकना, ३. दाना चुनना, ४. देखना, ५. देना, ६. आक्रमण या मारना।
ईषः-आश्विन मास, २. शिव का एक गण।
ईषा, हलीषा या हलेषा-हल के जुए तथा फाल को जोड़ने वाला दण्ड।
ईषा-हल का दण्ड या चक्र का धुरा-ईषा चक्रादिसंनिधाने चेदक्षमानयेत्युच्यते तदा यानाक्षमधिकृत्य ब्रूते इति गम्यते।
(यजुर्वेद १२/१०९) प्रजा वा इषः (शतपथ ब्राह्मण, १/७/३/१४, ४/१/२/१५)
(ऋग्वेद, ७/६६/९) अयं वै लोक इषमिति। (ऐतरेय ब्राह्मण, ६/७)
अन्नं वा इषम्। (कौषीतकि ब्राह्मण, २८/५)
इष-ऊर्ज-एतावेव शारदौ (मासौ) स यच्छरद्युग्रं स ओषधयः पच्यन्ते तेनो हैताविषश्चोर्जश्च। (शतपथ ब्राह्मण, ४/३/१/१७)
अयं वै वायुर्मातरिश्वा योऽयं पवते। (शतपथ ब्राह्मण, ६/४/३/४)
अथ यद्दक्षिणतो वाति। मातरिश्वैव भूत्वा दक्षिणतो वाति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, २/३/९/५)
प्राणो मातरिश्वा। (ऐतरेय ब्राह्मण, २/३८)
अन्तरिक्षं वै मातरिश्वनो धर्मः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/२/३/२) (५) सातवलेकर भाष्य (आर्यसमाज)-(त्वा इषे) सबको उत्पन्न करने वाला देव सविता देव तुजे अन्न प्राप्ति के लिए प्रेरित करे। (त्वा ऊर्जे) सबको उत्पन्न करने वाला देव तुझे बल प्राप्ति के लिए प्रेरित करे। (वायवः स्थ) हे मनुष्यो! तुम प्राण हो। (सविता देवः वः श्रेष्ठतमाय कर्मणे प्रार्पयतु) सबका सृजन करनेहारा देव तुम सबको श्रेष्ठतम कर्म के लिए प्रेरित करे। (आप्यायध्वम्) हे मनुष्यो! बढ़ते जाओ। (अघ्न्याः) तुम सभी प्रजा वध करने के लिए अयोग्य हो। (इन्द्राय भागं) तुम इन्द्र के लिए अपना भाग बढ़ाकर दो। (प्रजावतीः) तुम सन्तानयुक्त, (अनमीवाः) रोगमुक्त, (अयक्ष्माः) और क्षयरोगरहित होओ। (स्तेनः वः मा ईशत) चोर तुम्हारा प्रभु न हो, (अघशंसः मा) पापी तुम्हारा स्वामी न बने, (अस्मिन् गोपतौ ध्रुवा स्यात) इस भूपति के निकट रहो। (बह्वीः स्यात) अधिक संख्या में प्रजा संपन्न होओ। (यजमानस्य पशून् पाहि) यज्ञ करने वाले के पशुओं की रक्षा करो।
(६) हरिशरण भाष्य (आर्यसमाज)-
जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि मैं त्वा = आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ, इषे = प्रेरणा प्राप्त करने के लिए (इष प्रेरणे), — त्वा ऊर्जे = आपसे शक्ति और उत्साह के लिए। (आप प्रेरणा दें, उस कार्य के लिए शक्ति और उत्साह दें)।
प्रेरणा दे कर प्रभु उपासक जीव को कहते हैं-
१. वायवः स्थ= (वा = गतौ) तुम गतिशील हो, अकर्मण्य मत बनो। —
२. सविता देवः वः श्रेष्ठतमाय कर्मणो प्रार्पयतु = ऐसी अनुकूलता पैदा करो कि विद्वान् श्रेष्ठ कर्म में प्रेरित करें।
३. आप्यायध्वम् = इस प्रकार तुम प्रतिदिन बढ़ो। (श्रेष्ठ कर्म के लिए चेष्टा कर)–
४. अघ्न्याः (अ + हन् + य) = तुम हिंसा न करनेवालों में उत्तम बनो। (प्रत्येक काम निर्माण या हित के लिए हो, द्वंस या नाश के लिए नहीं)।
५. इन्द्राय भागम् = प्रभु के लिए सेवनीय अंशों को ही अपनाओ। प्रेय के बदले श्रेय को अपनाओ। इस मार्ग से-
६. प्रजावतीः = उत्तम सन्तान वाले बनो। —
७. अनमीवाः रोग मुक्त रहो। (इन्द्राय भागम् पर ध्यान देने से या भक्ति से मनुष्य स्वस्थ रहता है)।
८. अयक्ष्माः = यक्ष्मा के राजरोग से बचो।
९. मा वः स्तेनः ईशत= स्तेन तुम्हारा ईश न बने। (बिना श्रम के धन की इच्छा स्तेन है, जिससे दूर रहना है।
१०. मा अघशंसः (ईसत) = अघ या पाप की प्रशंसा करने वाला तुम्हें प्रभावित न करे।
११. ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात् = इस गोपति में तुम ध्रुव हो कर रहो। गौ = इन्द्रिय, या वेदवाणी =दोनों का रक्षक प्रभु गोपति है। इसमें ध्रुव निष्ठा रहनी चाहिए।
१२. बह्वीः = बहुत होना। केवल आत्मकेन्द्रित नहीं, अन्य के लिए भीविचार करना।
१३. यजमानस्य = यज्ञ को चलाने वाले प्रभु के पशून् (काम क्रोध पशुओं को) पाहि = सुरक्षित रखो (नियन्त्रण में रखो)।
समन्वय-
हर व्याख्या ठीक है, किन्तु कई विन्दुओं पर अन्य से भिन्न है। सर्वांगीण व्याख्या के लिए वाजसनेयी संहिता के अन्तिम अध्याय ईशावास्योपनिषद् तथा वेद के एक प्रस्थान गीता की सहायता लेनी पड़ेगी। गीता में अधिकांश तत्त्वों की सटीक परिभाषा है जिससे विषय समझने में भूल नहीं होती। सभी शब्दों के अर्थ की पुनरुक्ति नहीं की जा रही है।
(१) आधिभौतिक अर्थ- इषा = इष्ट पदार्थ। इष्ट पदार्थ का उत्पादन ही यज्ञ का उद्देश्य है-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविध्यष्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ (गीता, ३/१०)
यज्ञ के लिए ऊर्जा तथा गति चाहिए। अप् के विस्तार में पदार्थों की वायु द्वारा गति तथा आन्तरिक ऊर्जा के कारण नया निर्माण होता है। यह माता जैसा निर्माण करता है, अतः इसे मातरिश्वा कहते हैं। (तस्मि॑न्न॒पो मा॑त॒रिश्वा॑ दधाति, ईशावास्योपनिषद्, ४)
मुख्य यज्ञ कृषि है, उसके लिए खेत को ईषा या हलीषा से जोतते हैं। किसी भी यज्ञ में हलीष को स्तम्भ की तरह खड़ा करते हैं। यह ध्रुव जैसा स्थिर है, इसी केन्द्र से अन्य सभी यज्ञ चल रहे हैं।
इसे अथर्व वेद में सुफाला कहा है। फाल से भूमि जोतने पर कृषि या अन्य भूमि से उत्पाद होते हैं, उनको सीता कहते हैं। इस सीता में राजा रूपी इन्द्र का भाग है, इस अर्थ में कहा है कि इन्द्र सीता को (उसके अंश को) ग्रहण करें। इससे इन्द्र विपत्तियों से रक्षा करने में समर्थ होगा और यज्ञ बिना बाधा के चलता रहेगा।
अथर्व (३/१७)-इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरमुत्तरां समाम्॥४॥
शुनं सुफाला वितुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनुयन्तु वाहान्।
शुनासीरा (इन्द्र) हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै॥५॥
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भवः॥८॥
यज्ञ का मूल अर्थ कृषि है अतः कहा है कि यज्ञ से पर्जन्य (परिस्थिति, Infrastructure) होता है और उससे अन्न। जो कुछ भी दृश्य या अदृश्य उत्पादन है (goods and services) उसे अन्न कहते हैं। सभी प्रकार के अन्न, धन और सम्पत्ति मिलने से मनुष्य स्वस्थ, सम्पन्न रहेगा उसकी प्रजा (सन्तान, आश्रित) बढ़ते रहेंगे।
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः।
यज्ञाद् भवन्ति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः॥१४॥
कर्मं ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम्।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५॥ (गीता, अध्याय, ३)
यज्ञ का चक्र चलने से ही मानव सभ्यता चल सकती है। अतः यज्ञ चक्र से बचा हुआ अन्न ही भोग करना चाहिये जिससे यज्ञ चलता है। यज्ञ से ही हमारा जीवन चल रहा है, अतः यह श्रेष्ठतम कर्म है।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६॥ (गीता, अध्याय, ३)
यज्ञ नहीं करना अघ है। घ = ४ पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)। ये सभी यज्ञ से मिलते हैं। घ के लिए यज्ञ नहीं करना अघ है। यही भाव यजुर्वेद के अघशंस शब्द में है। गीता के कई स्थानों पर है-
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। (३/९)
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्व किल्बिषैः। (३/१२)
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। (४/३१)
गीता अध्याय ८ में ब्रह्म, कर्म, यज्ञ का वर्णन है। जो कुछ दृश्य या अदृश्य है, वह ब्रह्म है। सृष्टि तथा उसकी गति या क्रिया कर्म है, जो ब्रह्म का अंश है। इस कर्म का भी वह अंश यज्ञ है जिससे इष का उत्पादन हो रहा हैं। प्रथम पूर्ण (ब्रह्म) से तृतीय पूर्ण (यज्ञ) घटाने से अन्य अनन्त प्रकार के कर्म बचते हैं, जो पूर्ण है।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
(ईशावास्योपनिषद्, शान्ति पाठ)
ईश (या ईशा, ईश का व्यापक रूप) का वासस्थान रूप विश्व है। इसका चेतन तथा गतिशील रूप जगत् है। गतिशील जगत् में चक्रीय क्रम से यज्ञ को जगत्यां जगत् कहा है। इस जगत्यां-जगत् चक्र या यज्ञ से बचा भाग का उपभोग करने से सभ्यता चलती रहेगी।
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध कस्यस्विद्धनम्॥ (ईशावास्योपनिषद्, १)
(२) आधिदैविक अर्थ-पूर्ण विश्व सृष्टि रूप में भी व्याख्या हो सकती है, पर सौरमण्डल के लिए यह अधिक स्पष्ट है।
पूर्ण विश्व में सृष्टि का जो क्रम है, वह उलटा या विपरीत वृक्ष है। अव्यक्त से अर्द्धनारीश्वर (पदार्थ-ऊर्जा), उससे ब्रह्माण्डों का समूह रूप अनन्त विश्व, उससे हमारा ब्रह्माण्ड, उससे सौरमण्डल, उससे ग्रहकक्षा के भीतर सम भाग (कम उष्ण या शीत) चान्द्रमण्डल तथा उसके केन्द्र में पृथ्वी ग्रह -ये ७ क्रम (प्रथम २ अव्यक्त) यह वृक्ष का तना या इषा है। हर स्तर पर निर्माण के भेद उसकी शाखा हैं। यह शाखा रूप पशु हैं (भिन्न भिन्न पदार्थ)। इनमें जिनसे निर्माण हो सकता है वे मेध्य पशु हैं, जिनको ५ पशुओं के नाम दिए गये हैं।
सौर मण्डल का यज्ञ संवत्सर यज्ञ कहा जाता है। सूर्य से १ वर्ष में प्रकाश जहां तक जाता है वह भी सम्वत्सर है। यह सूर्य की वाक् (प्रभाव क्षेत्र) है, इसके ६ भाग वषट्-कार (वाक् वै षट्) हैं। पृथ्वी को मापदण्ड मानकर इनकी त्रिज्या अहर्गण में मापी जाती है। क अहर्गण = पृथ्वी त्रिज्या x २(क-३)। ३, ९, १५, २१, २७, ३३ अहर्गण त्रिज्या के क्षेत्र ६ भाग हैं। इन क्षेत्रों में सूर्य के तेज से निर्माण होता है अतः यह सम्वत्सर भी यज्ञ है। सूर्य तेज की तीव्रता और गुणों के आधार पर उसके ५ भेद किये गये हैं जिनको ५ पशुओं का नाम दिया गया है-(१) अश्व = चलाने वाली शक्ति, (२) गौ-निर्माण का स्थान, गति तथा पदार्थ, (३) अवि (भेड़)-किरण की रैखिक गति, (४) अज (अव्यय पुरुष, निर्माण क्रम), (५) वैश्वानर-विश्व रूप में नर, चेतन शक्ति। वर्ष के विभिन्न भागों में किये गये कार्य पशु-बन्ध हैं। ऋतु अनुसार कार्य सूर्य की संक्रान्ति से आरम्भ होते हैं। ) सौरमण्डल में सौर वायु का प्रवाह ईषा है। विष्णु पुराण (२/८/३) में सूर्य के ईषा दण्ड का विस्तार (परिधि) १८००० योजन है। अतः इसकी त्रिज्या ३,००० योजन है। सौरमण्डल के लिए सूर्य का व्यास योजन है। वहां से ३००० व्यास दूर यूरेनस कक्षा है जहां तक सौर वायु जाती है। इस सौर वायु से सविता देव क्रतु या यज्ञ करते हैं। क्रतु की सीमा पर ६०,००० बालखिल्य हैं। सूर्य तेज से ही पृथ्वी पर जीव सृष्टि, उसका पालन तथा रोगनाश हो रहा है।
सभी निर्माण स्थान गौ या लोक हैं-अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/५/२/१७)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण, २/२/१/२१)
गावो लोकास्तारयन्ति क्षरन्त्यो गावश्चान्नं संजयन्ति लोके। यस्तं जानन् न गवां हार्द्दमेति स वै गन्ता निरयं पापचेताः॥
(महाभारत, अनुशासन पर्व, ७१/५२ नाचिकेत-यमराज-सम्वाद)
(३) आध्यात्मिक अर्थ-मनुष्य शरीर में मेरुदण्ड ही ईषादण्ड है। इसकी सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण वायु के आरोहण से मुक्ति होती है। इसे शतौदना गौ का दान कहा है।
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहम्, स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथम्, सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि (विहरसे)-सौन्दर्य-लहरी, ९
कई प्रकार के आध्यात्मिक यज्ञ हैं-प्राणायाम यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, दैव यज्ञ, प्राण यज्ञ आदि।
प्राण यज्ञ के भौतिक स्वरूप का वर्णन दिया जाता है।यह प्राण का अपान में तथा अपान का प्राण में हवन है तथा नियत आहार द्वारा प्राण का प्राण में हवन है-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणः॥
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति। (गीता ४/२९-३०)
शरीर में भोजन का ग्रहण प्राण का ग्रहण है, जिसका अपान में हवन होता है। काम में उसका खर्च होना अपान का प्राण में हवन है। अन्न के पाचन से आरम्भ कर ७ स्तरों पर प्राण का उत्थान प्राण-यज्ञ है। बृहदारण्यक उपनिषद् (१/५/१) के अनुसार हम ७ प्रकार का अन्न लेते हैं-(१) मन या ज्ञान, (२) प्राण, (३) पृथिवी (ठोस पदार्थ), (४) जल, (५) तेज, (६) वायु (श्वास), (७) आकाश। वैशेषिक दर्शन में ९ द्रव्य हैं इनमें काल और आत्मा को भी गिना गया है।
छान्दोग्य उपनिषद् (६/५/१) में कहा गया है कि अन्न का ३ भाग में पाचन होता है-ठोस पदार्थ मल रूप में निकल जाता है, मध्यम का उपयोग शरीर को पुष्ट करने में होता है तथा सूक्ष्म भाग मन हो जाता है-अन्नमशितं त्रेधा विधीयते, तस्य यः स्थविष्टो धातुस्तत्पुरीषं भवति, यो मध्यस्तन्मांसं, योऽणिष्टस्तन्मनः।(छान्दोग्य ६/५/१)।
आयुर्वेद के अनुसार स्थूल भोजन ७ स्तरों में पचता है-
(१) रस (द्रव)-शरीर की पुष्टि। इसका मल भोजन का अवशेष है जो शरीर से बाहर निकलता है।
(२) असृक् (द्रव में ठोस कण)-रक्त। यह जीवन देता है (वाजीकरण या शक्ति)। इसका मल पित्त है।
(३) मांस-इसमें मांसपेशी तथा चर्म भी है। यह शरीर का लेपन करता है (आवरण, भरना)। इसका मल कान के मल आदि हैं।
(४) मेद (चर्बी, वसा) शरीर की क्रिया को चिकना करती है (स्नेहन)। इसका मल स्वेद (पसीना) है।
(५) अस्थि (हड्डी)-यह शरीर का ढांचा है, धारण करता है। इसका मल नख और केश हैं।
(६) मज्जा-हड्डी के भीतर का भीतरी भाग, मस्तिष्क, सुषुम्ना तन्त्र। यह भरता है (पूरण)। इसका मल ग्रन्थियों का स्राव है।
(७) शुक्र (रज, वीर्य= स्त्री पुरुष के प्रजनन के लिये रस)-इससे सन्तान जन्म होता है। इसका रस है ओज (तेज)। ओज की साधना करनेवाला ओझा है।

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