रावण वध क्या और क्यों?

रावण वध क्या और क्यों?

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से युद्ध करने के लिए लंकापति रावण आश्विन मास की अमावस्या को रणभूमि में आया । –वल्मीकिरामायण–युद्धकाण्ड,92/66, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को देवराज इन्द्र ने अपने सारथि मातलि को रथ लेकर श्रीराम की सहायता हेतु भेजा । इधर अमावस्या की रात्रि को ही राघव पर अनुग्रह करने के लिए ब्रह्मा जी द्वारा प्रेषित रणचण्डी भगवती महाकाली दशरथनन्दन के समीप लंका में पहुंच गयीं । रामरावणयुद्ध प्रतिपदा से अष्टमी की रात तक निरन्तर चला । नवमी को मध्याह्न के आस पास रावण का वध हुआ —
“नवम्यां रावणं ततः । रामेण घातयामास महामाया जगन्मयी”।। — कालिकापुराण ;क्योंकि उसके वध के समय सूर्य स्थिर प्रभा वाले थे–वा0रा0108/32,
यह भीषण युद्ध प्रतिपदा से चला तो मध्य में दिन या रात कभी भी क्षणमात्र के लिए भी इसका विराम नही हुआ —

नैव रात्रिं न दिवसं न मुहूर्तं न च क्षणम् ।
रामरावणयोर्युद्धं विराममुपगच्छति ।।
–वा0रा0यद्धकाण्ड–107/66
इन आठ रातों तक सभी देवों से सुपूजित होकर भगवती चण्डी लंका में ही रहीं ।—–
“तावत्तु अष्टरात्राणि सर्वैर्देवैः सुपूजिता” ।
दशमी को रावण का दाहसंस्कार अनुज विभीषण द्वारा किया गया । इसी उपलक्ष में हम सब आज इस पर्व को बड़े हर्षोल्लास से रावण का पुतला बनाकर उसे जलाकर मनाते हैं । अयोध्या में इस पर्व को अन्य शहरों की अपेक्षा बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । जगह -जगह रामलीला का मञ्चन यहां देखने लायक होता है ।
यहां जिस रावण की चर्चा हुई है वह लंकावासी था । उसने मांसाहारी राक्षसों को वैदिक सनातन हिन्दू धर्म के विध्वंस हेतु इस देश में नियुक्त कर रखा था और उन सबको लंका से ही सैन्यबल तथा विस्फोटक सामग्रियों की उपलब्धि कराता रहता था । नासिक-पञ्चवटी तथा बक्सर जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में उनकी छावनियां थीं ।ऐसे अनेक रावणों के देश आज भी हमारे भारत के प्रति यह कुकृत्य कर रहे हैं । इन सबका सफाया रघुकुलभूषण श्रीराम की भांति हमें स्वयं उनकी ही सीमा में घुसकर करना होगा ।

किन्तु आज हमें लंकावासी इन रावणों के साथ ही देशवासी सहस्रों रावणों का सफाया करना है । जो धर्मविरोधियों को तुष्ट करते हुए देश को लूटकर विदेशों में पैसा जमा कर रहे हैं । महिलाओं का अपमान कर रहे हैं और हमारे इतिहास को विकृत कर उसे पाठ्यक्रम में रखवाकर बच्चों को सत्-मार्ग से हटा रहे हैं और जिन्हे हमारे उपासना स्थल से बढ़कर शौचालय अधिक प्रिय है ।

हम उसी भारत देश के हैं जहां का एक अधम पक्षी गीध भी महिलाओं की गरिमा को समझता था । जिसने एक नारी को विदेशी आक्रान्ता रावण से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया । आज उसी देश के नेता नारियों के साथ जो व्यवहार कर रहे है उसे देखकर हम इन्हें किस श्रेणी में रखें ?

अध्यात्म की दृष्टि से रावण का स्वरूप

रावण मोह = अविवेक का प्रतीक है । रावयति =असत् प्रलापान् कारयति इति रावणः –जो अपने देह में अहंबुद्धि और गेहादि में ममता की स्थापना करके जीव से “मैं मोटा हूं ,धनी हूं,यह घर मेरा है–इत्यादि अनेक प्रकार के मिथ्या प्रलाप करवाता है उस मोह का ही नाम रावण है । अहंकार ही इसका भाई कुम्भकर्ण है। काम–मेघनाद, लोभ -अतिकाय,मत्सर ही महोदर,क्रोधरूपी देवान्तक,द्वेष दुर्मुख,दम्भ खर,कपट अकम्पन ये सब इस मोह रावण के सहायक हैं ।

हे रघुनन्दन ! आप ज्ञानरूपी दशरथ तथा भक्तिरूपिणी कौशल्या के द्वारा प्रकट होकर सपरिवार इस मोह रूपी रावण का विध्वंस करके हम जीवों का संसारसागर से उद्धार करें ।

रावण के १० शिर और २०भुजा का रहस्य

अथर्ववेद में रावण के १० शिर २० भुजा का वर्णन है —

ब्राह्मणो जज्ञे दशशीर्षो दशास्यः | सःप्रथमःसोमं पपौ स चकारारसं विषम् !! -–4/6/1.

पहले १० शिर और १० मुख वाला ब्राह्मण उत्पन्न हुआ पहले उसने सोम रस का पान किया फिर अपने आसुरी कृत्यों से उसे अरस बना दिया !वि का अर्थ एकाक्षर कोष के अनुसार पक्षी तथा ष का अर्थ श्रेष्ठ है अर्थात उसने पक्षिराज जटायु को प्राणहीन बना दिया !
रावण की उत्पत्ति के समय उसके १० शिर और २० भुजाएं थीं —

“जनयामास बीभत्सं रक्षोरूपं सुदारुणम् !दशग्रीवं —विंशतिभुजम्” —वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड 9/28-29 . पिता विश्रवा ने उसके दश शिर देखकर ही उसका

नाम दशग्रीव रख दिया –

“दशग्रीवः प्रसूतोयं दशग्रीवो भविष्यति” —9/33.

जानकी जी का हरण करने के पूर्व उन्हे भयभीत करने के लिये इसने अपने 10 शिर 20 भुजा वाला रूप दिखलाया था —-

“दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः”–अरण्यकांड ४९/८.

रावण का अत्याचार

रावण वरदान के बल से तीनो लोकों को व्यथित तो करता ही था सबसे बड़ी बात थी की वह स्त्रियों का अपहरण करता था —उत्सादयति लोकान्स्त्रीन्

“स्त्रियश्चाप्युपकर्षति” —बालकाण्ड ७/६ .

वह जिस भी स्त्री को रूपवती देखता उसके बन्धु बांधवों को मारकर उसे ले आता था चाहे वह पुत्रवती ही क्यों न हो .इसीलिए सती नारियों ने उसे शाप दिया कि इस दुर्बुद्धि का विनाश स्त्री के कारण ही होगा .अपनी बहन सूर्पणखा के पति का वध इसने स्वयं अपने ही हाथों किया था .देखें वा० रा० उत्तरकांड सर्ग २४ .

जानकी जी के प्रति दुर्व्यवहार

रावण ने सीता जी का हरण करने के पश्चात उन्हें अपने अन्तःपुर में ले जाकर भवनों को दिखाया तरह तरह के प्रलोभन दिया कि तुम मेरी पत्नी बन जावो . किन्तु उन्होंने जब अस्वीकार कर दिया तब उन्हें अशोकवाटिका भेजता है –देखें अरण्य कांड -५५-५६ सर्ग

हनुमान जी द्वारा रावण का मानमर्दन

हनुमान जी लंका कि अधिष्ठात्री देवी लंकिनी को सुर लोक पहुंचाकर जानकी जी के ऊपर किये जा रहे राक्षसियो का जब अत्याचार देखे तो बड़े दुखी हुए इसीलिए उन्होंने रावण को शिक्षा देने के लिए वाटिका के रक्षको को काल के गाल में पहुंचाकर वाटिका का विद्ध्वंस चैत्य प्रासाद का नाश और रावण के भेजे हुए ८०००० किंकर नामक राक्षसों को मृत्यु के घाट उतार दिया फिर रावण ने उन्हें पुनः पकड़ने के लिए क्रमशः प्रहस्त पुत्र जम्बुमाली मंत्रियों के ७ पुत्रों तथा ५ सेनापतियों को भेजा .जिनका भीषण संहार पवनपुत्र ने कर दिया |

तत्पश्चात रावण के प्रियपुत्र अक्षकुमार को भी रणभूमि में मार गिराए . पूंछ में आग लगाये जाने पर पुनः घोर राक्षसों का वध करते हुए हनुमानजी ने लंका नगरी को इस प्रकार जलाया कि उसका कोई भूभाग नहीं बचा . केवल विभीषण के घर और जानकी जी के निवास स्थान को छोड़कर .और अंत में राम रावण युद्ध में कई दिनों के बाद श्रीराम ने एक भयंकर बाण से रावण के ह्रदय को विदीर्ण कर डाला !इस प्रकार एक अत्याचारी अपने पाप के कारण सम्पूर्ण राक्षस वंश के विद्ध्वंस का कारण बना .इस प्रकार एक आतताई का अंत हुआ .इसे कई जगह संसार को रुलाने वाला और डाकू भी कहा गया है — रावणो लोक रावणः. दश्यवो रावणादयः . ऐसे महा अत्याचारी राक्षस से देश रक्षा की प्रार्थना करने से यही सिद्ध होता कि ऐसे लोग या तो रावण के स्वरुप एवम् कार्यों से परिचित नहीं हैं या उनका कपोल कल्पित रावण कोई दूसरा ही है |

 

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध संपादक )

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