राहुकाल का ज्योतिष और धर्म  शास्त्रीय विवेचन

राहुकाल का ज्योतिष और धर्म  शास्त्रीय विवेचन

ज्योतिष शास्त्र में हर दिन को एक अधिपति दिया गया है। जैसे- रविवार का सूर्य, सोमवार का चंद्र, मंगलवार का मंगल, बुधवार का बुध, बृहस्पतिवार का गुरु, शुक्रवार का शुक्र व शनिवार का शनि। इसी प्रकार दिन के खंडों को भी आठ भागों में विभाजित कर उनको अलग-अलग अधिष्ठाता दिये गये हैं। इन्हीं में से एक खंड का अधिष्ठाता राहु होता है। इसी खंड को राहुकाल की संज्ञा दी गई है। राहुकाल में किये गये काम या तो पूर्ण ही नहीं होते या निष्फल हो जाते हैं। इसीलिए राहुकाल में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि इस समय में किये गये कार्यों में अनिष्ट होने की संभावना रहती है। लेकिन मुख्यतः ऐसा माना जाता है कि राहुकाल में कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ नहीं करना चाहिए और यदि कार्य का प्रारंभ राहुकाल के शुरु होने से पहले ही हो चुका है तो इसे करते रहना चाहिए क्योंकि राहुकाल को केवल किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ करने के लिए अशुभ माना गया है ना कि कार्य को पूर्ण करने के लिए। राहुकाल में घर से बाहर निकलना भी अशुभ माना गया है लेकिन यदि आप किसी कार्य विशेष के लिए राहुकाल प्रारंभ होने से पूर्व ही निकल चुके हैं तो आपको राहुकाल के समय अपनी यात्रा स्थगित करने की आवश्यकता नहीं है। राहुकाल का विशेष प्रचलन दक्षिण-भारत में है और इसे वहां राहुकालम् के नाम से जाना जाता है। यह भारत में अब काफी प्रचलित होने लगा है एवं इसे मुहूर् के अंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। राहु को नैसर्गिक अशुभ कारक ग्रह माना गया है, गोचर में राहु के प्रभाव में जो समय होता है उस समय राहु से संबंधित कार्य किये जायें तो उनमें सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है। इस समय राहु की शांति के लिए यज्ञ किये जा सकते हैं। इस अवधि में शुभ ग्रहों के लिए यज्ञ और उनसे संबंधित कार्य को करने में राहु बाधक होता है शुभ ग्रहों की पूजा व यज्ञ इस अवधि में करने पर परिणाम अपूर्ण प्राप्त होता है। अतः किसी कार्य को शुरु करने से पहले राहुकाल का विचार कर लिया जाए तो परिणाम में अनुकूलता की संभावना अधिक रहती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस समय शुरु किया गया कोई भी शुभ कार्य या खरीदी-बिक्री को शुभ नहीं माना जाता। राहुकाल में शुरु किये गये किसी भी शुभ कार्य में हमेशा कोई न कोई विघ्न आता है, अगर इस समय में कोई भी व्यापार प्रारंभ किया गया हो तो वह घाटे में आकर बंद हो जाता है। इस काल में खरीदा गया कोई भी वाहन, मकान, जेवरात, अन्य कोई भी वस्तु शुभ फलकारी नहीं होती। सभी लोग, विशेष रूप से दक्षिण भारत के लोग राहुकाल को अत्यधिक महत्व देते हैं। राहुकाल में विवाह, सगाई, धार्मिक कार्य, गृह प्रवेश, शेयर, सोना, घर खरीदना अथवा किसी नये व्यवसाय का शुभारंभ करना, ये सभी शुभ कार्य राहुकाल में पूर्ण रूपेण वर्जित माने जाते हैं। राहुकाल का विचार किसी नये कार्य का सूत्रपात करने हेतु नहीं किया जाता है, परंतु जो कार्य पहले से
प्रारंभ किये जा चुके हैं वे जारी रखे जा सकते हैं।

राहुकाल गणना: राहुकाल गणना के लिए दिनमान को आठ बराबर भागों में बांट लिया जाता है। यदि सूर्योदय
को सामान्यतः प्रातः 6 बजे मान लिया जाये और सूर्यास्त को 6 बजे सायं तो दिनमान 12 घंटों का होता है। इसे आठ से विभाजित करने पर एक खंड डेढ़ घंटे का होता है। प्रथम खंड में राहुकाल कभी भी नहीं होता। सोमवार का द्वितीय खंड राहुकाल होता है, इसी प्रकार शनिवार को तृतीय खंड, शुक्रवार को चतुर्थ, बुधवार को पंचम खंड, गुरुवार को छठा खंड मंगलवार को सप्तम खंड और रविवार को अष्टम खंड राहुकाल का होता है। निम्न तालिका में वार अनुसार राहुकाल का लगभग समय दिया गया है। राहुकाल केवल दिन में ही माना गया है। लेकिन कुछविद्वान रात्रिकाल के लिए भी इसकी गणना करते हैं। रात्रि में वही खंड राहुकाल होता है जो दिन में होता है। यदि सोमवार को 07:30 से 9 बजे तक राहुकाल होता है तो रात्रि में भी सायं 07:30 से 9 बजे तक राहुकाल होगा। आगे दी गई तालिका की गणना केवल आसानी के लिए दी गई है। सूक्ष्म गणना में सूर्योदय व
सूर्यास्त का सही समय लेना चाहिए और उसके अनुसार दिनमान व राहुकाल की गणना करनी चाहिए। चूंकि सूर्योदय व सूर्यास्त प्रतिदिन बदलते रहते हैं
अतः राहुकाल का समय भी प्रतिदिन बदलता रहता है। इसी प्रकार सूर्योदय व सूर्यास्त स्थान के अक्षांश, रेखांश के अनुसार भी बदलते रहते हैं। अतः राहुकाल स्थान व दिनांक दोनों के अनुरूप बदलता रहता है। उदाहरण के लिए यदि दिल्ली में 1 अप्रैल 2013, सोमवार को सूर्योदय व सूर्यास्त लें।

सूर्याेदय 6;12, सूर्यास्त 18:37 दिनमान = 18:37 – 6:12 = 12:25 घंटे खंड = 12:25/8 = 1:33 मिनट प्रथम खंड 6:12 से 7:45, द्वितीय खंड 7:45 से 9:18 तक, चूंकि सोमवार को द्वितीय खंड राहुकाल का होता है अतः स्पष्ट राहुकाल प्रातः 7:45 से 9:18तक हुआ। रात्रि में भी राहुकाल 19:45 से 21:18 तक होगा।

कुछ विद्वानों का मानना है कि राहुकाल के लिए अर्द्ध बिंब का सूर्योदय व सूर्यास्त का समय लेना चाहिए न कि बिंब स्पर्श होने का। दूसरे ऐसा भी मानना है कि सूर्योदय आदि के लिए दर्शित सूर्योदय काल नहीं लेना चाहिए बल्कि ज्यामितीय सूर्योदय काल लेना चाहिए जिसमें कि परावर्तन और ऊंचाई आदि की शुद्धि नहीं की गई हो। इनका ऐसा मानना है कि ज्यामितीय सूर्योदय सूर्य दर्शन के बाद में होता है। लेकिन परावर्तन के कारण सूर्य कुछ मिनट पूर्व ही दिखने लगता है। ज्योतिषीय गणनाओं में हमें दर्शन काल न लेकर, ग्रहों के मध्य से रेखा खींचकर गणना करनी चाहिए। राहुकाल का कुछ दिनों पर ज्यादा प्रभाव होता है, जैसे- शनिवार को इसका प्रभाव सर्वाधिक माना गया है। क्योंकि शनिवार को इसका काल लगभग 9:00 से 10:30 बजे तक होता है और यही समय होता है एक आम आदमी का अपने व्यवसाय पर जाने या कार्य शुरु करने का। अतः इस दिन राहुकाल का विशेष ध्यान रखना लाभकारी रहता है। मंगलवार, शुक्रवार व रविवार को भी राहुकाल विशेष प्रभावशाली माना गया है।

 राहुकाल को याद करने की सरल विधि: कौन से दिन राहुकाल किस खंड में पड़ता है जानने के के लिए इस सरल वाक्य को याद कर लें- उदाहरण के लिए – यदि आप मंगलवार का राहुकाल जानना चाहते हैं तो ऊपर तालिका के अनुसार सातवां खंड राहुकाल होगा। राहुकाल के समय की गणना करने के लिए एक और वाक्य की सहायता ले सकते हैं:- जिस वार की राहुकाल की गणना करनी हो उस वार का शब्द ले लें। जैसे- यदि गुरुवार को राहुकाल की गणना करनी है तो उसका शब्द । है यह अंग्रेजी वर्णमाला का प्रथम अक्षर है तो 1 में इसका आधा अर्थात् ) जोड़कर समय प्राप्त हुआ 1:30 बजे। यही राहुकाल का गुरुवार को प्रारंभिक काल हुआ। इसी प्रकार शनिवार का शब्द है इसमें वर्णमाला का छठा अक्षर है। 6 में 6/2 जोड़ने से प्राप्त हुआ 9:00। अतः  शनिवार को 9 बजे राहुकाल प्रारंभ होगा। यहां एक बात स्पष्ट कर देना चाहेंगे कि राहुकाल चैघड़िया, होरा, गुलिक काल व मांदी काल से पूर्ण भिन्न है। राहुकाल व चैघड़िया की गणना पूर्णतः एक समान है। लेकिन मंगलवार को शुभ चैघड़िया के काल में, राहुकाल माना गया है एवं गुरुवार को अमृत चैघड़िया काल में राहुकाल होता है। अतः चैघड़िया का उपयोग करने वाले लोगों के लिए जो काल श्रेष्ठ माना गया है, वही काल राहुकाल की दृष्टि से वर्जित है। इसी प्रकार होरा भी राहुकाल से भिन्न है। होरा में ग्रहां की होरा होती है लेकिन राहु-केतु की कोई होरा नहीं होती है।

राजीव कुमार पाण्डेय ( ज्योतिषाचार्य )

Mysticpowernews

मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

Mysticpowernews has 574 posts and counting. See all posts by Mysticpowernews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *