रोहिंग्या......... अब हमारे अपने हैं ?

रोहिंग्या……… अब हमारे अपने हैं ?

किसी को याद है कि ढाई साल पहले प्रशांतभूषण की याचिका पर रोहिंग्या घुसपैठियों को निकले जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई थी…. मजे की बात यह है कि केंद्र ने भी केस में आगे की कार्यवाही के लिए कोई ज़ोर नहीं दिया… बाद में रोहिंज्ञाओं का एक प्रतिनिधि सुप्रीम कोर्ट अपनी यह याचिका लेकर पहुंच गया कि उन्हें जीवन की मूलभूत सुविधायें उपलब्ध कराई जाएं… कोर्ट तो जैसे ऐसी ही याचिका की सुनवाई के लिए तैयार बैठा था… केंद्र को फौरन निर्देश दिए कि रोहिंज्ञाओं को साफ पानी, बिजली और रहने की व्यवस्था तुरन्त करे ! सो केंद्र ने भी देर न की… देश के चारों कोनों और सभी राज्यों में रोहिंग्या मौज से रहने लगे…
देश के नौजवान खाली पड़े रहते हैं… मगर रोहिंज्ञाओं के परिवारों के 12 साल तक बच्चे काम मे लग गए… बेशक ऑफिशियल संख्या 40-90000 तक हो,लेकिन देश मे अब 4-5 लाख रोहिंग्या मौजूद है… और घुसपैठ जारी है… इन कैम्पों में हज़ारों नए बच्चे पैदा हो चुके हैं .. जम्मू इत्यादि में भटिन्दी और आस पास के क्षेत्रों में 25 -40 हज़ार रोहिंग्या बस चुके हैं… बर्मा बाजार बन चुका है… बैंक अकाउंट हैं… वोटरकार्ड बन चुके हैं… रोहिंज्ञाओं ने छोटे- बड़े काम लायक वाहन हांसिल कर लिए हैं !
आश्चर्य यह है 6टा साल शुरू होने के बाद भारत सरकार रोहिंज्ञाओं पर इतनी नरम क्यों है ? क्या सरकार ने डिसाइड कर लिया है कि पचड़े और पंगे वाले किसी काम मे हाथ नहीं डालेगी ! मूलतः देश के दुश्मनों, आतंकी कनेक्शन वाले एक घुसपैठिए समुदाय को देश से निकालने में न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही नहीं चाहिए था ! वहीं न्यायिक आदेश को यह कहते हुए विलंबित किया जा सकता था कि घुसपैठियों को देश से निकालना, एक देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है अतः कोर्ट का यह अधिकार क्षेत्र है ही नहीं ! मगर यह हिम्मत… वही सरकार करेगी जो देश के सामरिक हितों के प्रति समर्पित हो… हर क्षेत्र में वोट बैंक पॉलिटिक्स के विचार से दूर हो !
खैर,रोहिंग्या अब हमारे घरों, दुकानों, रिक्शे वालों, दुकानदारों,कबाड़ियों,पानी सप्लाई करने वालों ,हाउसमेड इत्यादि के रूप में सर्वत्र प्रवेश पा चुके हैं… पूरी उम्मीद है कि अभी हुए लोकसभा चुनावों में हज़ारों रोहिंज्ञाओं ने वोटिंग में भी हिस्सा लिया हो !
बहरहाल 2022 तक देश मे बुलेट ट्रेन होगी, भारतीय चंद्रमा पर उतर चुके होंगे…. बुलेट ट्रेन में सहयात्रियों के रूप में कोई रोहिंग्या व्यापारी मिल जाय तो आप आश्चर्य न करें… क्योकि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनो यही चाहते हैं…
साभार :- पवन सक्सेना

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