वर्ण−मातृका−वृत

विनय झा

जापान के गोकोकुजी (तोक्यो) में पाँचवी शती की सिद्धं लिपि में वर्णमाला का छायाचित्र संलग्न है,जो पूर्वी नागरी लिपि से मेल खाती थी । जापान के शवाधान स्थल पर तान्त्रिक प्रक्रिया के साथ भारतीय वर्णमाला का विशिष्ट प्रयोग होता था,किन्तु भारतीय क्षैतिज लेखन की तरह नहीं बल्कि आधुनिक जापानी की उर्ध्वाकार पद्धति में — अर्थात् जापानी लिपि भारतीय से ही बनी किन्तु चीनी प्रभाव सहित । भारतीय प्रभाव का कोई तथाकथित ‘विद्वान’ उल्लेख भी नहीं करता!छायाचित्र के बाँयी ओर सिद्धं लिपि की पूरी वर्णमाला है ।

१६ =
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ
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३३ =
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(क्ष त्र ज्ञ)
भारतीय लिपियों की वर्णमाला का वैदिक काल से ही देवी−देवताओं के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता था,शक्तिस्वरूपा स्वरों के षोडश वर्ण मातृकाओं के वृत में तैंतीस प्रकार के देवताओं के प्रतीक व्यञ्जन विशिष्ट ज्यामितीय आकृति में सँयोजे जाते थे । क्ष त्र ज्ञ मिलाकर कुल ५४ वर्ण,ॐ तथा अव्यक्त को मिलाकर, जिनके दक्षिणमार्गी और वाममार्गी उच्चारणों से १०८ मूल धातु बने ऐन्द्र व्याकरण में जिनसे संस्कृत के दो सहस्र धातु बने । एक दर्शक “ज्ञ” तथा ५३ दृश्य “अक्ष” से ऋग्वैदिक अक्षक्रिया की वैदिक तन्त्र का सम्बन्ध था जिसका जूये में दुरुपयोग भी होता था किन्तु उसकी वेद में निन्दा है ।

श्रीराम ने रावणवध से पहले शिवलिङ्ग का पूजन किया । उस लिङ्ग को वर्णमातृकावृत पर स्थापित करके लिङ्ग पर रामगायत्री मन्त्र — यह था कर्णाट चालुक्य क्षत्रियों का रामेश्वरं−कुलदेवता । कर्णाट चालुक्य क्षत्रियों की एक शाखा ने १०९७ ई⋅ से १३२६ ई⋅ तक मिथिला और उसके चार सौ वर्ष पश्चात तक काठमाण्डू तक राज किया । जनकपुर से सटे भारतीय जिले का नाम है मधुबनी जहाँ हटाँर ग्राम में यही शिवलिङ्ग वर्णमातृकावृत पर स्थापित आज तक पूर्णतया सुरक्षित है — मिथिलाक्षर में जो पूर्वी नागरी लिपि से ही विकसित हुई ।

देव के नगर काशी में जो नागरी विकसित हुई उसके पूर्वी नागरी रूप से जापान में आजतक प्रयुक्त सिद्धं लिपि और मिथिलाक्षर,बांग्ला एवं असमिया बनी,तथा पश्चिमी नागरी से गुजरात−महाराष्ट्र और कश्मीर आदि तक की लिपियाँ जिनमें सर्वप्रमुख है देवनागरी । प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ “ललितविस्तर” के दसवें अध्याय “लिपिशाला-संदर्शन-परिवर्तो” में ६४ लिपियों का वर्णन है जिन्हें एक वैदिक गुरुकुल में ब्राह्मण “उपाध्याय” शिक्षक ने युवा सिद्धार्थ को सिखाया (सिद्धार्थ ने वैदिक पाठशाला में ब्रह्मचारी बटुक बनकर उपाध्याय ब्राह्मण से वैदिक शिक्षा प्राप्त की,स्वशाखा पढ़ाने वाले शिक्षक को “उपाध्याय” कहते हैं जिसका अपभ्रंश हुआ प्राकृत में उपाझा और बाद में ओझा तथा झा ।) ।

उन ६४ लिपियों में “देवलिपि” का भी उल्लेख है किन्तु उसके उदाहरण उपलब्ध नहीं है अथवा अंग्रेजों ने दबा दिये । देवलिपि को ही बाद में देवनागरी कहा गया ऐसी सम्भावना कुछ विद्वान व्यक्त करते हैं किन्तु यूरोपवालों को ब्राह्मी के अलावा कुछ नहीं सूझता है । शेर्रेर और शाउब जैसे दुष्ट यूरोपियनों ने तो देवलिपि को काल्पनिक कह दिया,हालाँकि बौद्ध ग्रन्थों को ये लोग प्रामाणिक कहते हैं!आज भी भारतीय छात्रों को यही बतलाया जाता है कि बुद्ध के काल में केवल ब्राह्मी लिपि का भारत में प्रचलन था,और पश्चिमी सीमा पर खरोष्ठी लिपि का । युवा सिद्धार्थ ने वैदिक गुरुकुल में जो ६४ लिपियाँ सीखीं उनकी सूची प्रस्तुत है —
Brahmi
Kharosthi
Pushkarasari
Anga-lipi
Vanga-lipi
Magadha-lipi
Mangalya-lipi
Anguliya-lipi
Sakara-lipi
Brahmava-lipi
Parushya-lipi
Dravida-lipi
Kirata-lipi
Dakshinya-lipi
Ugra-lipi
Samkhya-lipi
Anuloma-lipi
Avamurdha-lipi
Darada-lipi
Khasya-lipi
Cina-lipi
Luna-lipi
Huna-lipi
Madhyaksaravistara-lipi
Puspa-lipi
Deva-lipi
Naga-lipi
Yaksa-lipi
Gandhava-lipi
Kinnara-lipi
Mhoragalipi
Asura-lipi
Garuda-lipi
Mrgacakra-lipi
Vayasaruta-lipi
Bhaumadevi-lipi
Antariksadeva-lipi
Uttarakurudvipa-lipi
Aparagaudana-lipi
Purvavideha-lipi
Utksepa-lipi
Niksepavarta-lipi
Viksepa-lipi
Praksepa-lipi
Sagara-lipi
Vajra-lipi
Lekhapratilekha-lipi
Anudruta-lipi
Sastravarta-lipi
Gananavarta-lipi
Utksepavarta-lipi
Niksepavarta-lipi
Padalikhita-lipi
Dviruttarapadasandhi-lipi
Yavaddasottarapadasandhi-lipi
Madhyaharini-lipi
Sarvarutasamgrahanilipi
Vidyanulomavimisritalipi
Rsitapastaptarocamanalipi
Dharanipreksinilipi
Gaganapreksinilipi
Sarvausadhinisyandalipi
Sarvasarasamgrahinilipi
Sarvabhutarutagrahanilipi
यह है “ललितविस्तर” का सम्पूर्ण दशम अध्याय जिसका पाठ १९५८ ई⋅ में दरभंगा के विद्वान प⋅ ल⋅ वैद्य जी ने तैयार किया था जो सर्वमान्य प्रामाणिक पाठ है —
( ❀ चिह्न की दो रेखाओं के भीतर ६४ लिपियों की सूची है)

(अमरीका की रोजमीड,कैलिफोर्निया में स्थित “यूनिवर्सिटी अॅव द वेस्ट” ने वैद्य जी के इसी पाठ का रोमन लिप्यान्तर हेतु प्रयोग किया था ।)

(इस ग्रन्थ के अनेक अंश गौतम बुद्ध के लगभग समकालीन या कुछ ही बाद के हैं किन्तु कई अंश बाद के हैं जिनमें महायान दर्शन को ठूँसा गया,परन्तु प्रस्तुत अंश मौलिक और प्राचीन है क्योंकि इसमें किसी दर्शन को ठूँसने का प्रयास नहीं है,पूरे ग्रन्थ का अन्तिम संस्कृत पाठ तीसरी शती का माना जाता है,कुषाण काल के अन्तिम चरण का समकालीन ।)

इति हि भिक्षवः संवृद्धः कुमारः / तदा माङ्गल्यशतसहस्रैः लिपिशालामुपनीयते स्म दशभिर्दारकसहस्रैः परिवृतः पुरस्कृतः, दशभिश्च रथसहस्रैः खादनीयभोजनीयस्वादनीयपरिपूर्णैर्हिरण्यसुवर्णपरिपूर्णैश्च / येन कपिलवस्तुनि महानगरे वीथिचत्वररथ्यान्तरापणमुखेष्वभ्यवकीर्यते स्म अभिविश्राम्यन्ते / अष्टाभिश्च तूर्यशतसहस्रैः प्रघुष्यमाणैर्महता च पुष्पवर्षेणाभिप्रवर्षता वितर्दिनिर्यूहतोरणगवाक्षहर्म्यकूटागारप्रासादतलेषु कन्याशतसहस्राणि सर्वालंकारभूषिताः स्थिता अभूवन् / बोधिसत्त्वं प्रेक्षमाणाः कुसुमानि च क्षिपन्ति स्म / अष्टौ च मरुत्कन्यासहस्राणि विगलितालंकाराभरणालंकृतानि रत्नभद्रंकरेण गृहीतानि मार्गं शोधयन्त्यो बोधिसत्त्वस्य पुरतो गच्छन्ति स्म / देवनागयक्षगन्धर्वासुरगरुडकिन्नरमहोरगाश्चार्धकायिका गगनतलात्पुष्पपट्टदामान्यभिप्रलम्बयन्ति स्म / सर्वे च शाक्यगणाः शुद्धोदनं राजानं पुरस्कृत्य बोधिसत्त्वस्य पुरतो गच्छन्ति स्म / अनेनैवंरूपेण व्यूहेन बोधिसत्त्वो लिपिशालामुपनीयते स्म //

समनन्तरप्रवेशितश्च बोधिसत्त्वो लिपिशालाम् / अथ विश्वामित्रो नाम दारकाचार्यो बोधिसत्त्वस्य श्रियं तेजश्चासहमानो धरणितले निविष्टो ऽधोमुखः प्रपतति स्म / तं तथा प्रपतितं दृष्ट्वा शुभाङ्गो नाम तुषितकायिको देवपुत्रो दक्षिणेन करतलेन परिगृह्योत्थापयति स्म / उत्थाप्य च गगनतलस्थो राजानं शुद्धोदनं तं च महान्तं जनकायं गाथाभिरभ्यभाषत् –

शास्त्राणि यानि प्रचलन्ति मनुष्यलोके संख्या लिपिश्च गणनापि च धातुतन्त्रम् /
ये शिल्पयोग पृथु लौकिक अप्रमेयाः तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः // लल्_१०।१ //
किं तू जनस्य अनुवर्तनतां करोति लिपिशालमागतु सुशिक्षितु शिष्यणार्थम् /
परिपाचनार्थ बहुदारक अग्रयाने अन्यांश्च सत्त्वनयुतानमृते विनेतुम् // लल्_१०।२ //
लोकोत्तरेषु चतुसत्यपथे विधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशलो यथ संभवन्ति /
यथ चानिरोधक्षयु संस्थितु शीतिभावः तस्मिन्विधिज्ञ किमथो लिपिशास्त्रमात्रे // लल्_१०।३ //
नेतस्य आचरिय उत्तरि वा त्रिलोके सर्वेषु देवमनुजेष्वयमेव जेष्ठः /

नामापि तेष लिपिनां न हि वित्थ यूयं यत्रेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः // लल्_१०।४ //
सो चित्तधार जगतां विविधा विचित्रा एकक्षणेन अयु जानति शुद्धसत्त्वः /
अदृश्यरूपरहितस्य गतिं च वेत्ति किं वा पुनो ऽथ लिपिनो ऽक्षरदृश्यरूपाम् // लल्_१०।५ //

इत्युक्त्वा स देवपुत्रो बोधिसत्त्वं दिव्यैः कुसुमैरभ्यर्च्य तत्रैवान्तर्दधे / तत्र धात्र्यश्च चेटीवर्गाश्च स्थापिता अभूवन् / परिशेषाः शाक्याः शुद्धोदनप्रमुखाः प्रक्रामन्तः //

अथ बोधिसत्त्व उरगसारचन्दनमयं लिपिफलकमादाय दिव्यार्षसुवर्णतिरकं समन्तान्मणिरत्नप्रत्युप्तं विश्वामित्रमाचार्यमेवमाह – कतमां मे भो उपाध्याय लिपिं शिक्षापयसि /

ब्राह्मीखरोष्टीपुष्करसारिं अङ्गलिपिं वङ्गलिपिं मगधलिपिं मङ्गल्यलिपिं अङ्गुलीयलिपिं शकारिलिपिं ब्रह्मवलिलिपिं पारुष्यलिपिं द्राविडलिपिं किरातलिपिं दाक्षिण्यलिपिं उग्रलिपिं संख्यालिपिं अनुलोमलिपिं अवमूर्धलिपिं दरदलिपिं खाष्यलिपिं चीनलिपिं लूनलिपिं हूणलिपिं मध्याक्षरविस्तरलिपिं पुष्पलिपिं देवलिपिं नागलिपिं यक्षलिपिं गन्धर्वलिपिं किन्नरलिपिं महोरगलिपिं असुरलिपिं गरुडलिपिं मृगचक्रलिपिं वायसरुतलिपिं भौमदेवलिपिं अन्तरीक्षदेवलिपिं उत्तरकुरुद्वीपलिपिं अपरगोडानीलिपिं पूर्वविदेहलिपिं उत्क्षेपलिपिं निक्षेपलिपिं विक्षेपलिपिं प्रक्षेपलिपिं सागरलिपिं वज्रलिपिं लेखप्रतिलेखलिपिं अनुद्रुतलिपिं शास्त्रावर्तां गणनावर्तलिपिं उत्क्षेपावर्तलिपिं निक्षेपावर्तलिपिं पादलिखितलिपिं द्विरुत्तरपदसंधिलिपिं यावद्दशोत्तरपदसंधिलिपिं मध्याहारिणीलिपिं सर्वरुतसंग्रहणीलिपिं विद्यानुलोमाविमिश्रितलिपिं ऋषितपस्तप्तां रोचमानां धरणीप्रेक्षिणीलिपिं गगनप्रेक्षिणीलिपिं सर्वौषधिनिष्यन्दां सर्वसारसंग्रहणीं सर्वभूतरुतग्रहणीम्

/ आसां भो उपाध्याय चतुष्षष्टीलिपीनां कतमां त्वं शिष्यापयिष्यसि?

अथ विश्वामित्रो दारकाचार्यो विस्मितः प्रहसितवदनो निहतमानमददर्प इमां गाथामभाषत –

आश्चर्यं शुद्धसत्त्वस्य लोके लोकानुवर्तिनो /
शिक्षितः सर्वशास्त्रेषु लिपिशालामुपागतः // लल्_१०।६ //
येषामहं नामधेयं लिपीनां न प्रजानमि /
तत्रैष शिक्षितः सन्तो लिपिशालामुपागतः // लल्_१०।७ //
वक्त्रं चास्य न पश्यामि मूर्धानं तस्य नैव च /
शिष्ययिष्ये कथं ह्येनं लिपिप्रज्ञाय पारगम् // लल्_१०।८ //

देवदेवो ह्यतिदेवः सर्वदेवोत्तमो विभुः /
असमश्च विशिष्टश्च लोकेष्वप्रतिपुद्गलः // लल्_१०।९ //
अस्यैव त्वनुभावेन प्रज्ञोपाये विशेषतः /
शिक्षितं शिष्ययिष्यामि सर्वलोकपरायणम् // लल्_१०।१० //

इति हि भिक्षवो दश दारकसहस्राणि बोधिसत्त्वेन सार्धं लिपिं शिष्यन्ते स्म / तत्र बोधिसत्त्वाधिस्थानेन तेषां दारकाणां मातृकां वाचयतां यदा अकारं परिकीर्तयन्ति स्म, तदा अनित्यः सर्वसंस्कारशब्दो निश्चरति स्म / आकारे परिकीर्त्यमाने आत्मपरहितशब्दो निश्चरति स्म / इकारे इन्द्रियवैकल्यशब्दः / ईकारे ईतिबहुलं जगदिति / उकारे उपद्रवबहुलं जगदिति / ऊकारे ऊनसत्त्वं जगदिति / एकारे एषणासमुत्थानदोषशब्दः / ऐकारे ऐर्यापथः श्रेयानिति / ओकारे ओघोत्तरशब्दः / औकारे औपपादुकशब्दः / अंकारे अमोघोत्पत्तिशब्दः / अःकारे अस्तंगमनशब्दो निश्चरति स्म / ककारे कर्मविपाकावतारशब्दः / खकारे खसमसर्वधर्मशब्दः / गकारे गम्भीरधर्मप्रतीत्यसमुत्पादावतारशब्दः / घकारे घनपटलाविद्यामोहान्धकारविधमनशब्दः / ङकारे ऽङ्गविशुद्धिशब्दः / चकारे चतुरार्यसत्यशब्दः / छकारे छन्दरागप्रहाणशब्दः / जकारे जरामरणसमतिक्रमणशब्दः / झकारे झषध्वजबलनिग्रहणशब्दः / ञकारे ज्ञापनशब्दः / टकारे पटोपच्छेदनशब्दः / ठकारे ठपनीयप्रश्नशब्दः / डकारे डमरमारनिग्रहणशब्दः / ढकारे मीढविषया इति / णकारे रेणुक्लेशा इति / तकारे तथतासंभेदशब्दः / थकारे थामबलवेगवैशारद्यशब्दः / दकारे दानदमसंयमसौरभ्यशब्दः / धकारे धनमार्याणां सप्तविधमिति / नकारे नामरूपपरिज्ञाशब्दः / पकारे परमार्थशब्दः / फकारे फलप्राप्तिसाक्षात्क्रियाशब्दः / बकारे बन्धनमोक्षशब्दः / भकारे भवविभवशब्दः / मकारे मदमानोपशमनशब्दः / यकारे यथावद्धर्मप्रतिवेधशब्दः / रकारे रत्यरतिपरमार्थरतिशब्दः / लकारे लताछेदनशब्दः / वकारे वरयानशब्दः / शकारे शमथविपश्यनाशब्दः / षकारे षडायतननिग्रहणाभिज्ञज्ञानावाप्तिशब्दः / सकारे सर्वज्ञज्ञानाभिसंबोधनशब्दः / हकारे हतक्लेशविरागशब्दः / क्षकारे परिकीर्त्यमाने क्षणपर्यन्ताभिलाप्यसर्वधर्मशब्दो निश्चरति स्म //

इति हि भिक्षवस्तेषां दारकाणां मातृकां वाचयतां बोधिसत्त्वानुभावेनैव प्रमुखान्यसंख्येयानि धर्ममुखशतसहस्राणि निश्चरन्ति स्म //

तदानुपूर्वेण बोधिसत्त्वेन लिपिशालास्थितेन द्वात्रिंशद्दारकसहस्राणि परिपाचितान्यभूवन् / अनुत्तरायां सम्यक्संबोधौ चित्तान्युत्पादितानि द्वात्रिंशद्दारिकासहस्राणि / अयं हेतुरयं प्रत्ययो यच्छिक्षितो ऽपि बोधिसत्त्वो लिपिशालामुपागच्छति स्म //

// इति श्रीललितविस्तरे लिपिशालासंदर्शनपरिवर्तो नाम दशमो ऽध्यायः //

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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