वर्ण व्यवस्था

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी (डी.लिट्. संस्कृत)

भारत में वर्ण-व्यवस्था के उद्गम तथा वैशिष्ट्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन से सम्बन्ध रखनेवाले प्रायश: ग्रन्थों में जातियों, उपजातियों, व उनकी परम्परा सम्बन्धी विभिन्नताओं को लिखा गया है। वर्ण व्यवस्था की सभी सम्भावित दिशाओं में व्याख्या आवश्यक है। भारतीय जाति व्यवस्था जो कि व्यवस्थित समाज की संकल्पना का एक आदर्श एवं उच्च मानक है वह विश्व में समाजशास्त्र, राजनीतिविज्ञान, प्रशासन, इतिहास आदि सभी विषय के विद्यार्थियों के लिये अत्यन्त ही जिज्ञासा का विषय रहा है। यही वर्ण व्यवस्था का उपविभाजन जातिगत व्यवस्था में हुआ है। गीता के शब्द वसुदेवसर्वमिति स महात्मा अर्थात् जो सभी में भगवदृष्टि भाव से रहता है वही महात्मा है इस प्रकार दायित्व का बोध ही वर्णव्यवस्था में निहित है। यही कारण रहा है कि विश्व में कई सभ्यताओं का समय के साथ उदय एवं पतन हुआ। इसके विपरीत भारतीय सभ्यता का विकास कभी समाप्त नहीं हुआ। अतः वर्णव्यवस्था एक श्रेष्ठ व्यवस्था है जिसमें कहीं भी एक मनुष्य को दूसरे के प्रति असमानता के भाव का स्थान नहीं है। यदि किसी स्थान पर मनुष्य -मनुष्य में उच्च व निम्न का भाव उत्पन्न होता है तो वह समाज की व्यवस्था को विकृत कर देता है।
भारत में स्थापित सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था की इस सर्वश्रेष्ठ विधा पर पाश्चात्यों के कई अभिमत प्रकट होते रहे। इनमें सिडनी लो ने अपनी पुस्तक ‘विजन आव इण्डिया’ में जाति-व्यवस्था के गुणों का वर्णन अत्यन्त तर्कपूर्ण रीति से किया है। इसी क्रम में एब्बे डुबोय ने भी आज से दो शताब्दी पूर्व इस सन्दर्भ में प्रशंसापरक लेखन किया था। मेरिडिथ ने भी अपने ग्रन्थ ‘यूरोप एण्ड एशिया’ में इस व्यवस्था का स्तुति परक वर्णन किया है। कई पाश्चात्यों के मन में जो भारत के प्रति वैमनस्य था उन्होंने पाश्चात्य जगत् के अतिरक्तरंजित दास प्रथा को अनदेखा करके भारतीय वर्णव्यवस्था की द्वेष पूर्ण आलोचना की जिनमें मेन, शेरिंग आदि प्रमुख हैं। इनके ग्रन्थ भारतीय वर्ण व्यवस्था का नहीं वरन् प्राचीन रोम के दास प्रथा एवं दासों के साथ होने वाले अमानवीय अत्याचारों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुतीकरण मात्र है। निश्चित ही पोकोके की ‘इण्डिया इन ग्रीस’ से स्पष्टतः प्रमाणित होता है कि भारत से ही गई आर्यों की एक शाखा ने पाश्चात्य जगत् में मानवीय सभ्यता का बीजारोपण किया, किन्तु वहाँ यह व्यवस्था अपना स्वरूप खो बैठी तथा सभ्यताओं के उद्भव एवं पराभव का क्रम चल पड़ा। इसके विपरीत भारत में यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही।

भारतीय धर्मशास्त्रों में विहित वर्ण व्यवस्था में जो अधिकांशतः विरोध का भाव दिखाई देता है। वह ऊँच-नीच से है अतः इस आधार पर वर्णव्यवस्था की आलोचना भी की गई है। अतः दोष उन कारणों में निहित है जिनके कारण ऊँच-नीच को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ न कि वर्णव्यवस्था। क्योंकि वर्णव्यवस्था प्रत्येक वर्ण अथवा वर्ग को समाज के प्रति दिया गये दायित्व कर्त्तव्य है। ऐसे में कोई व्यक्ति यदि अपने आत्मिक द्वेषादि दोषों के कारण इस व्यवस्था को विकृत करे तथा मानव-मानव के मध्य ऊँच-नीच, स्पृश्यास्पृश्य को महत्त्व दे तो यह उस व्यक्ति का दोष है न कि सत्य सनातन परम्परा का। पुरुषसूक्त चारों वेदों में प्राप्त होता है। साथ ही चारों वेदों में चारों वर्णों की स्थापना का सामाजिक स्वरूप भी स्वतः चित्रित हो जाता है। हरिवंश पुराण में कई स्थानों पर हमें स्पष्ट दिखाई देता है कि एक ही व्यक्ति की सन्तानों ने विभिन्न वर्णों को धारण किया एवं उनकी प्रजा से पृथ्वी पर विकास हुआ। अतः वर्ण व्यवस्था के प्रारम्भिक काल में केवल जन्म से ही वर्णत्व का विधान नहीं था। उसे हम देवयुग कहते हैं।
तैत्तिरीय ब्राह्मण के एक मन्त्र का विवरण में सायणाचार्य के भाष्य को देखने पर ज्ञात होता है कि यज्ञ में शूद्र को भी बैठने का विधान है तथा वह ही यजमान के सम्पूर्ण क्लेषों व दुःखों को समाप्त कर देता है। अतः यहाँ सायणीय भाष्य सहित दर्शनीय है। यहाँ पूरा मन्त्र एवं सायण भाष्य का अनुवाद दिया जा रहा है-देवासुराः संयत्ता आसन्। त आदित्ये व्यायच्छन्त। तं देवाः समजयन् ब्राह्मणश्च शूद्रश्च चर्मकर्ते व्यायच्छेते। दैव्यो वै वर्णों ब्राह्मणः। असुर्यः शूद्रः। इमेऽरात्सुरिमे सुभूतमक्रन्नित्यन्यतरो ब्रूयात्। इम उद्वासीकारिण इमे दुर्भूतमक्रन्नित्यन्यतरः। यदेवैशाँ सुकृतं या राद्धिः। तदन्यतरोऽभिश्रीणाति। यदेवैशां दुश्कृतं या राद्धिः। तदन्यतरोपहन्ति। ब्राह्मणः संजयति। अमुमेवाऽऽदित्यं भ्रातृव्यस्य संविन्दन्ते।।
इस मन्त्र में एक प्रकार के यज्ञ विशेष में यजमान का कार्य एवं इष्ट के साधन हेतु ब्राह्मण देवासुर संग्राम के संघर्ष रूप एक रूपक (नाटक) की व्यवस्था करता है। अतः यज्ञवेदि के मध्य परन्तु यज्ञवेदि में प्रज्वलित अग्नि से बाहर एक आर्द्र चर्म खण्ड को रखकर उसके चारो ओर परिमण्डलाकार से ब्राह्मण एवं शूद्र बैठकर परस्पर कलह (करने का नाटक) करते हैं। जिसमें ब्राह्मण, देवता एवं शूद्र असुर का रूप (नाटक करते) हैं। इसमें ब्राह्मण इमेऽरात्सुरिति इस मन्त्र का पाठ करते हैं जिसका भाव है कि इस सत्र में यजमान समृद्धि को प्राप्त होते हैं इस प्रकार इन्होंने शुभ कर्म किया। इसके उपरान्त शूद्र मन्त्रान्तर प्रकट करते हैं जिसका अर्थ है कि इन यजमान ने जो कर्म के बहाने से धनहानि की है वह तो दु:व्यापार है (क्योंकि असुरों की दृष्टि में यज्ञ एक अशुभ कर्म है) अतः ऐसा होने पर यजमान जो परलोक में कल्याण तथा इहलोक के लिये समृद्धि प्राप्त करना चाहता है वह ब्राह्मण ही इस कार्य का सम्पादन करे। तथा इस यज्ञ में जो इस यजमान ने दुष्कृत कर्म किया है उसके कारण शूद्र उसके जीवन में जो असमृद्धि, दरिद्रता आदि है उसका नाश करे।। यहाँ इस मन्त्र में न केवल यज्ञ में शूद्र की उपस्थिति को बताया है अपितु शूद्र की उपस्थिति से ही यजमान के समग्र अनिष्ट का नाश सम्भव भी बताया है। ऐसे में शूद्र की स्थिति प्रारम्भ से ही थी एवं वह समाज के आवश्यक अंग के रूप में थी।

वर्ण-

मानव मानव है, मनु का औरस अपत्य व आत्मभाव है, जिसके गर्भ में सम्पूर्ण प्रकृतिमण्डल समाविष्ट है। अतएव केवल गृहस्थभाव से भी इसकी आत्ममहिमा सर्वात्मना शान्त नहीं होती। यही भूमाकामना बनती है- समाजरूप महान् परिवार का बीज, जिसका क्रमश: ब्रह्म-क्षत्र-विट्-पौष्ण इन चार ही भावों में विकास हुआ है। यह चातुर्वर्ण्य ही भारतीय समाज की मूल प्रतिष्ठा है। ऐसा बारम्बार धर्मशास्त्रों में स्मृतियों में वर्णित हुआ है। ब्राह्मण मानव समाज का भूतात्मा है, क्षत्रिय मानव समाज की बुद्धि है, वेश्य मानव समाज का मन है, शूद्र मानव समाज का शरीर है। चारों वर्णों का स्व-स्व-वर्णधर्मों में उत्तरदायित्वपूर्वक प्रतिष्ठित रहते हुये रागद्वेषशून्यतापूर्वक चारों को सम् रूप से, समन्वय रूप से ,समंजनरूप से एक दूसरे के पूरक बने रहना ही भारतीय समाजव्यवस्था का सम्पूर्ण इतिहास व रहस्य है। मानव में जो पारिवारिक व्यवस्थारूप सूक्ष्म समाज में जो स्थान कुलवृद्ध का है, वही इस विशाल समाज में ब्राह्मण का स्थान है। जो स्थान परिवार में समर्थ युवापुत्र का है, वही स्थान समाज में क्षत्रिय का है। जो स्थान वहाँ नारीवर्ग का है, वही स्थान समाज में वेश्य का है। एवं जो स्थान किसी भी परिवार में भोले भाले बालवृन्द का है वही स्थान समाज मे शूद्रवर्ग का है।

वर्णोत्पत्ति का आधार

वर्णव्यवस्था का स्वरूप हमें वेदों से ही प्राप्त होता है वेदों में इस सामाजिक दायित्व के रूप में ही प्रस्तुत किया है न कि ऊँच-नीच के भाव से, वर्ण व्यवस्था में समाज की दृष्टि से चारों वर्ण समाज के चार स्तम्भ हैं बृहदारण्यकोपनिषद् में वर्णों की उत्पत्ति विषयक एक इतिहास प्राप्त होता है। इसे इतिहास कहने का औचित्य है कि इसमें देव विभूतियों की उत्पत्ति वर्णाधारित है एवं तथैव उनका प्रभाव प्रत्येक मनुष्य पर भी है। इसीलिये सृष्टि उत्पत्ति का क्रम पूर्व में घटित होने से इतिहास का ही विषय हो सकता है। बृहदारण्यकोपनिषद् का वाक्य है- ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेक ँ् सन्न व्यभवत्। तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्यन्यो यमो मृत्युरीषा न इति। तस्मात्क्षत्रापरं नास्ति तस्माद् ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एवं तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म। तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं य उ एन ँ् हिनस्ति स्वा ँ् स योनिमृच्छति स पापीयान्भवति यथा श्रेया ँ्स ँ्हि ँ्सित्वा।। आरम्भ में ब्रह्म एक ही था। अकेले होने के कारण वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने अतिषयता से क्षत्र इस प्रशस्त रूप की रचना की। अर्थात् देवताओं में क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सेाम, रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशा नादि हैं उन्हें उत्पन्न किया। अतः क्षत्रिय से उत्कृष्ट कोई नहीं है। इसी से राजसूययज्ञ में ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रिय की उपासना करता है, वह क्षत्रिय में ही अपने यश को स्थापित करता है। यह जो ब्रह्म है, क्षत्रिय की योनि है। इसलिये यद्यपि राजा उत्कृष्ठता को प्राप्त होता है। तो भी राजसूय के अन्त में वह ब्राह्मण का ही आश्रय लेता है। अतः जो क्षत्रिय इस की हिंसा करता है तो वह पाप का भागी होता है। आरम्भ में यह ब्रह्म ही था ब्राह्मणजाति का अभिमान होने के कारण वह ब्रह्म कहा जाता है। उस समय यह क्षत्रियादि समुदाय भी ब्रह्म से अभिन्न अर्थात् एकरूप ही था। इस प्रकार समझा जाय तो सभी वर्ण एक अग्नि में समाहित थे। यहाँ ब्रह्म दो वर्णों के होते हुये भी सृष्टि का व्यापार करने में असमर्थ है इसीलिये उसने तृतीय वर्ण की उत्पत्ति की थी। इसी प्रकार वेश्य वर्ण की उत्पत्ति पर कहा है- स नैव व्यभवत्स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति । वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने वेश्य जाति की रचना की। जो ये वसु,रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणश: कहे जाते हैं, उन्हें उत्पन्न किया। वह ब्रह्म धनोपार्जन करनेवाले का अभाव होने के कारण कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने कर्म के साधनभूत धन का उपार्जन करने के लिये वेश्य जाति को रचा। वेश्य प्रायः गण के रूप में मिलकर धनोपार्जन करते हैं। इसी क्रम में शूद्रोत्पत्ति पर कहा है- स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं वै पूषेय ँ्हीद ँ् सर्वं पुष्य ति यदिदं किंच।। (वेश्य के उत्पन्न होने के बाद भी) वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्रवर्ण की रचना की पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथ्वी ही पूषा है; क्योंकि यह जो कुछ है, यही इसका पोषण करती है। सेवक का अभाव होने के कारण फिर भी वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसने शौद्रवर्ण की सृष्टि की। शूद्र ही षौद्र है। शूद्रवर्ण कौन है तो जो पोषण करता है, वही पूषा देवता या शूद्र है। अतः सर्वप्रथम हमारा पोषण पृथ्वी करती है। अतः प्रथमतः पृथ्वी ही पूषा है। क्योंकि पृथ्वी के लिये श्रुति कहती है कि यह जो कुछ है उसका सभी का पेाषण यह पृथ्वी ही करती है। अत: पृथ्वी ही शूद्र है क्योंकि यह सभी का पेाषण करती है। इससे स्पष्ट हो गया कि शूद्र वह है जो पेाषण करे न कि निम्न। इस प्रकार चार वर्णों की उत्पत्ति के उपरान्त भी वह विभूतियुक्त कार्य करने में असमर्थ हुआ तो उसने धर्म की स्थापना की-स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत्क्षस्य क्षत्रं यद्धर्मसतस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान्बलीया ँ् समाष ँ् सते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वैतत्तस्मात्सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्त ँ् सत्यं वदतीत्येतद्ध्योवैतदुभयं भवति।। तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करने में समर्थ नहीं हुआ। उसे श्रेयोरूप धर्म की अतिसृष्टि की। यह जो धर्म है, क्षत्रिय का भी नियन्ता है। अतः धर्म से उत्कृष्ट कुछ नहीं है। धर्म के द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान् को जीतने की इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है।
यहाँ समझने वाला तथ्य यह है कि ये सारे मंत्र हमारे समाज की रचना के सन्दर्भ में हैं। इसके आधार पर सामाजिक वर्गीकरण है यह वर्गीकरण ईश्वर प्रदत्त हैं अतः इसमें कहीं भी निम्नोच्च की भावना कदापि निहित नहीं है। ब्रह्म द्वारा कार्य करने की असमर्थता के कारण क्रमश: नवीन वर्णोत्पत्ति की गई। उद्देश्य केवल उस विभूतियुक्त बह्म के कार्यों का सम्पादन। इन चारों के उत्पादन के अनन्तर भी कार्य की सुचारुता केा बनाये रखने के लिये धर्म की अतिसृष्टि की गई। सृष्टि उत्पत्ति विषयक सन्दर्भों में सभी वर्णों का कार्य है कि वे ईश्वर द्वारा दिये गये महान् कार्य को करने के लिये हैं अतः आत्मकल्याण के लिये शास्त्रीय आदेशानुसार कार्य करें। एवं प्रत्येक वर्ण निम्नोच्च की भावना से परे द्वेश, मात्सर्य आदि दोषों से परे रहकर सामाजिक समरसता को पूर्ण करे।

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