वास्तु पूजन की आवश्यकता और प्रसंग‬‬

वज्र ( बिजली ) और अग्निसे दूषित में और भग्न ( फ़ूटा ) में सर्प और जिस घरमें  उल्लू  बसते हों और जिस घर में सात दिन तक कौआ का वास हो ॥

और जिसमें रात्रि में मृग वसे अथवा गो बिलाव ये अत्यन्त शब्द करैं और जिसमें हाथी घोडे आदि अत्यन्त शब्द करें और जो घर स्त्रियों के युध्द से अत्यन्त दूषित हो ॥

जिस घरमें कबूतरों के घर हों मधूकादिनिलय अर्थात मोहोर बैठती हो और इस प्रकारके अनेक जो उत्पात हैं उनसे दूषित घरके होने पर वास्तु शान्ति को करैं ॥

इसके अनन्तर भूमि के लक्षण का वर्णन करते हैं। इसके अनन्तर जगत के कल्याण की कामना से भूमिको वर्णन करता हूँ कि, ब्राम्हण आदिवर्णों के घरोंकी क्रम से श्वेत रक्त पीत और कृष्णवर्ण की भूमि होती है ॥

सुंदर जिसमें गन्ध हो ऎसी श्वेतभूमि ब्राम्हणी और रुधिरके समान जिसमें गन्ध हो ऐसी भूमि क्षत्रिया, शहद के समान जिसमें गंध हो ऎसी भूमि वैश्य और मदिरा के समान जिसमें गंध हो ऎसी भूमि शूद्रा होती है ॥

जो भूमि मधूर हो वह ब्राह्मणी और जो कषैली हो वह क्षत्रिया और जो अम्ल ( खट्टी ) हो वह वैश्या और जो तिक्त         ( चरपरी ) होती है वह शूद्रा कही है ॥

जो भूमि चौकोर हो जिसका हाथी के समान आकार हो और जिसका सिंह बैल घोडा हाथी मे समान रुप हो और गोल भद्रपीठ स्थान की भूमि त्रिशूल और शिवलिंग के तुल्य हो ॥

और प्रासाद की ध्वजा और कुंभ आदि जिसमें हों ऎसी भूमि देवताओं कों भी दुर्ल्लभ हैं जो भूमि त्रिकोण हो और जिसका शकट ( गाडा ) के समीन आकार हो और जो सूप और बीजने के तुल्य हो ॥

और जो मूरज ( मृदंग ) बाज के तुल्य हो और सांप मेंढक के तुल्य जिसका रुप हो और जो गर्दभ और अजगर के समान हो और बगला और चिपिटके समान जिसका रुप हो ॥

और मुद्रर उल्लू काक इनकी जो तुल्य हो, सूकर उष्ट्र बकरी इनकी जो तुल्य हो, धनुष परशु ( कुल्हाड ) इनकी समान जिसका रुप हो ॥

और कृकलास ( गिरगिट  ) और शव ( मुर्दा ) जिसका इनके समान रुप हो और दु:खसे गमन करने योग्य हो इतने प्रकारकी भूमि को वर्ज दे । जो भूमि मनोरम हो उसकी यत्न से परीक्षा करे ॥

और जो पर्वतके अग्रभाग से मिली हो और जिसमें गढे और छिद्र हों जो और सूप के समान हो, जिसकी कान्ति लकुट ( दण्ड ) के समानहो और जिस भूमिका निन्दित रुप हो ॥

और जो भुमि मूसलके समान और महाघोर हो और जो भल्ल भल्लूक ( रीछ ) से युक्त हो और जिसका मध्य में विकट रुप हो ॥

और जो कुत्ता गीदड के समान हो और जो रुखी और दांतों से युक्त हो और चैत्य श्मशान वाँमी और जंबूक का स्थान इनसे रहित हो ॥

और चतुष्पथ ( चौराहा ) महावृक्ष और देव मंत्री ( भूत आदि ) इनका जिसमें निवास हो और जो नगर से दूर हो और जो गढों में युक्त हो ऐसी भूमि को त्याग दे ॥

इति भूमिलक्षणम

इसके अनन्तर फ़लोंका वर्णन करते है – जिस भूमिमें अपने वर्णकी गंध होय और जिसका सुंदर रुपहो वह भूमि धन धान्य और सुखके देनेवाली होती है और इससे विपरीत हो तो फ़ल भी विपरीत होता है इससे भूमिकी परीक्षा करनी चाहिए ॥४०॥

मनीष खुराना ( ज्योतिषाचार्य )

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