“विश्व कर्म प्रकाश” के अनुसार वास्तु पुरुष उत्पत्ति और विमर्श

यह शास्त्र पराशरऋषिने बृहद्रथको कहा और बृहद्रथने विश्वकर्माको कहा और वह विश्वकर्मा जगतके कल्याणके लिये अनेक भेदोंसे युक्त वास्तुशास्त्रको कहा ॥४॥

विश्वकर्मा कहते हैं कि, जगतके कल्याणकी कामनासे वास्तुशास्त्रको कहता हू ॥५॥

पहिले त्रेतायुगके बीचमें एक महाभूत व्यवस्थित हुआ ( उठा ) उसने अपने शरीरसे संपूर्ण भुवनको शयन करा दिया ॥६॥

उस आश्चर्यको देखकर भय करके सहित इन्द्राआदि देवता आश्चर्यको प्राप्त हुए और भयभीत हूए ब्रम्हाकी शरण गये ॥७॥

उनकी इस प्रकार स्तुति की  कि, हे भूतभावन ! अर्थात भूतोंके पैदा करनेवाले हे भूतोंके ईश्वर! बडा भय प्राप्त हुआ! हे लोकपितामह! हम सब कहां जाय ॥८॥

उनके प्रति ब्रह्मा ने कहा  कि, हे देवताओ ! भय मत करो, इस महाबली भूतके संग विरोध मतकरो, किन्तु इसको अधोमुख कर तुम शंकासे रहित हो जाओगे ॥९॥

उसके अनंतर क्रोधसे दु:खी हुए उन देवताओंने उस महाबली महाभूत को पकडकर अधोमुख गिरा दिया और उसीके ऊपर वे देवता बैठ गये ॥१०॥

उस वास्तुपुरुषको समर्थ ब्रह्मा ने भाद्रपदके कृष्ण्पक्षकी तृतीयामें रचा था ॥११॥

शनिवारके दिन और कृत्तिकाके दिन उसका जन्म हुआ. उस दिन व्यतीपात योग था और विष्टि करण था ॥१२॥

भद्राओंके मध्यमें और कुलिकयोग मे उसका जन्म हुआ और महान शब्द करता हुआ वह वास्तुपुरुष ब्रह्माके समीप गया ॥१३॥

और बोला कि, हे प्रभो ! यह चराचर जगत आपने  रचा हैं और विना अपराधके ये देवता मुझे अत्यन्त पीडा देते हैं ॥१४॥

प्रसन्न होकर  जगतके पितामह ब्रह्मा ने  उसको यह वर दिया  कि, ग्राम, नगर, दुर्ग ( किला ) पत्तन ( शहर ) इनमें ॥१५॥

और प्रसाद ( महल ), प्याऊ और जलाशय ( तालाब ), उद्यान ( बाग ) इनमें जो मनुष्य मोहसे हे वास्तु । वास्तुपुरुष तुझे न पूजे ॥१६॥

वह दरिद्रता और मृत्युको प्राप्त होता है और उसको पदपद ( बातबात ) पर विघ्न होता हैं और वास्तुपूजाको नहीं करता हुआ मनुष्य तेरा भोजन होता है ॥१७॥

यह कहकर ब्रह्म ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मा शीघ्र अन्तर्धान हो गए . इससे मनुष्य गृहके आरंभमें और प्रवेशमें वास्तुकी पूजा करे ॥१८॥

और द्वारके बनानेमें और तीन प्रकारके प्रवेशमें और प्रतिवर्ष यज्ञादिमें और पुत्रके जन्ममें ॥१९॥

यज्ञोपवीत, विवाह और महोत्सवमें और जीर्णके उद्वार विशेषकर शल्यके न्यासमें अर्थात टूटे फ़ूटके जोडनेमें वास्तु पूजन परम आवश्यक है ।।20।।

 

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी ( प्रबंध संपादक )

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