विष्णु तत्त्व

श्री अरुण उपाध्याय (धर्मज्ञ)
ऋग्वेद में ६ सम्पूर्ण सूक्त विष्णु के हैं तथा अन्य कई में उल्लेख है- (ऋक्, १/२२/१६-२१, १/१५४, १/१५५, १/१५६, ७/९७, ७/१००)
महाभारत (५/७०/३), विष्णु पुराण, ३/१/४५) आदि के अनुसार जो पूरे विश्व में व्याप्त है वह विष्णु है।
१. ब्रह्म का विष्णु रूप-एकमूर्तिस्त्रयो देवाः, ब्रह्मविष्णु महेश्वराः। त्रयाणामंतरं नास्ति गुणभेदाः प्रकीर्तिताः॥
(स्कन्द पुराण ५अवन्ती खण्ड, रेवा खण्ड १४६/११६, पद्म पुराण, २ भूमि खण्ड ७१/२१)
गायत्री मन्त्र के ३ पाद ब्रह्म के ३ रूप वर्णन करते हैं-
प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुर्वरेण्यम्।
द्वितीय पाद क्रिया रूप विष्णु-भर्गो देवस्य धीमहि।
तृतीय पाद ज्ञान रूप शिव-धियो यो नः प्रचोदयात्।
२. गायत्री मन्त्र में विष्णु के ३ रूप-
प्रथम पाद सृष्टि के लिए सङ्कल्प या ईक्षा-स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति (ऐतरेय उपनिषद्, १/१, ३) स ईक्षां चक्रे (प्रश्नोपनिषद् (६/३)
द्वितीय पाद-क्रिया रूप-संसार में जितनी क्रिया हो रही है वह विष्णु रूप है। उसमें उपयोगी या निर्माण क्रिया यज्ञ है, अतः इसे भी विष्णु कहा गया है। यज्ञो वै विष्णुः (शतपथ ब्राह्मण १३/१/८/८)। यज्ञ के विभिन्न क्रम हैं-आरम्भ के लिये पदार्थों का संग्रह ब्रह्मा है, उसमें परिवर्तन और क्रिया विष्णु है, अन्त में बचा हुआ पदार्थ शिव है। उच्छेषणभागो वै रुद्रः (तैत्तिरीय ब्राह्मण १/७/८/५)
तृतीय पाद-चेतन रूप-सभी जीवों की चेतना विष्णु है। इसका प्रतीक अश्वत्थ है जिसके पत्ते स्वतन्त्र रूप से हिलते हैं। यदि विभिन्न जीवों की चेतना एक दूसरे को प्रभावित करने लगे तो कोई अपना काम नहीं कर पायेगा।
अश्वत्थरूपो भगवान् विष्णुरेव न संशयः। रुद्ररूपो वटस्तद्वत् पलाशो ब्रह्मरूपधृक्॥ (पद्मपुराण, उत्तर खण्ड ११५/२२)
यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते चाधिविश्वे। तस्येदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद॥ (ऋक् १/१६४/२२)
३. विश्व पुरुष-सम्पूर्ण विश्व एक चेतन रूप में पुरुष कहा जाता है। इसी की प्रतिमा व्यक्ति पुरुष है।त्रिदण्डी स्वामी विष्वक्सेनाचार्य ने पुरुष सूक्त की टीका में पद्म पुराण के श्लोक उद्धृत किये हैं जो वर्तमान मुद्रित पद्म पुराण में नहीं मिलते हैं-
पुं संज्ञे तु शरीरेऽस्मिन् शयनात् पुरुषो हरिः। शकारस्य षकारोऽयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते॥
यद्वा पुरे शरीरेऽस्मिन्नास्ते स पुरुषो हरिः। यदि वा पुरवासीति पुरुषः प्रोच्यते हरिः॥
यदि वा पूर्वमेवासमिहेति पुरुषं विदुः। यदि वा बहुदानाद्वै विष्णु पुरुष उच्यते॥
पूर्णत्वात् पुरुषो विष्णुः पुराणत्वाच्च शार्ङ्गिणः। पुराण भजनाच्चापि विष्णुः पुरुष ईयते।
यद्वा पुरुष शब्दोऽयं रूढ्या वक्ति जनार्दनम्।
पण्डित मधुसूदन ओझा ने भी यही वर्णन अपने ब्रह्म सिद्धान्त (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, १९६३) के अध्याय ११ के श्लोक १७२-१७४ में किया है-
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षु रुष्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते॥
धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥
स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्ययं ब्रह्मपुरे ततोऽसि॥
अर्थात् पुरुष शब्द की वैदिक निरुक्तियां-
(१) पुरुधा + स्यति = सर्वप्रथम है तथा सृष्टि क्रिया में लिप्त है। षो धातु का अर्थ है व्यवसाय करना। इसमें वि तथा अव् उपसर्ग लगने से स्यति होता है। यह पुरुष या पूरुष भी कहा जात है।
(२) पुरुधा + स्यति = पुरुष-अर्थात् वह स्वयं कई रूपों का हो जाता है।
(३) पुरा + रुष्यति = पुरुष। रुष = मारना, नष्ट करना, क्रोध करना। अनन्त रस को सीमा के भितर रकना इसको मारना है। सृष्टि इसी प्रक्रिया से होती है।
(५) पुरु + रुष्यते = यह पुरों को अपने भीतर घेरता है, अतह् यह पुर + रुष = पुरुष हुआ।
(६) पुरा + औषत् = यह पने भीतर माया का आवरण नष्ट करता है।
(७) पुरे + वसति = पुरुष (व का उ हो जाता है), अर्थात् वह पुर में निवास करता है। यह सबसे प्रचलित निरुक्ति है।
(८) पुर दृश्य जगत् है, तथा रस भी (विश्व का मूल समरूप पदार्थ) है। यह ब्रह्म का पुर या स्थन है। चेतना का निवास दहर है। यह विन्दु मात्र या विस्तृत आकाश भी हो सकता है।
गीता में भी भगवान् की स्तुति में अर्जुन ने कहा है – त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानः॥ (११/३८)
४. विष्णु और जगन्नाथ-दुर्गा सप्तशती, अध्याय १ में सुप्त रूप को विष्णु तथा जाग्रत रूप को जगन्नाथ कहा गया है।
योगनिद्रा यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवी कृते॥६६॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
योगनिद्रा निकलने पर जाग्रत जगन्नाथ हो गये-
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघुः॥८६॥
निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
सुप्त का अर्थ है, विश्व की यथा स्थिति। जाग्रत का अर्थ है, चेतना, जो चिति या व्यवस्था कर सके। इसी द्वारा उपयोगी क्रिया होती है, जीवन चलता है।
५. दारु ब्रह्म-जगन्नाथ को ६ प्रकार से दारु ब्रह्म कहा गया है-स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल खण्ड, अध्याय ४-
देवासुर मनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। तिरश्चामपि भो विप्रास्तस्मिन्दारुमये हरौ॥७१।
सर्वात्मभूते वसति चित्तं सर्वसुखावहे। उपजीवन्त्यस्य सुखं यस्याऽनन्य स्वरूपिणः॥७२॥
ब्रह्मणः श्रुतिवागाहेत्येदत्राऽनुभूयते। द्यति संसार दुःखानि ददाति सुखमव्ययम्॥७३॥
तस्माद्दारुमयं ब्रह्म वेदान्तेषु प्रगीयते। नहि काष्ठमयी मोक्षं ददाति प्रतिमा क्वचित्॥७४॥
(१) अश्वत्थ रूप-सृष्टि, स्थिति, विकास तथा निर्माण के प्रकार रूप में विष्णु अश्वत्थ हैं। इसका मूल ऊपर कहा जाता है, हर स्तर पर निर्माण का प्रकार शाखा हैं, जो नीचे की तरफ हैं। इसके पत्ते व्यक्ति रूप पिण्ड या जीव हैं जो नष्ट होते रहते हैं पर निर्माण का क्रम रूपी अश्वत्थ स्थायी है।
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्। (गीता १५/१)
ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन एतद्वै तत्॥ (कठोपनिषद्, २/३/१)
(२) व्यक्ति का कर्म चक्र-सङ्कल्प से कर्म होता है, उसके फल से सन्तोष या निराशा होती है और अगले कर्म की योजना बनने लगती है। इच्छित फल मिलने तक यह चक्र चलता रहता है और नहीं पूर्ण हुआ तो अगला जन्म इस उद्देश्य से होता है। जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति के लिए इस कर्म बन्धन रूपी वृक्ष को काटना पड़ता है।
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्व पवित्रो वाजिनीव स्मृतमसि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्। (तैत्तिरीय उपनिषद् १/१०)
वासना वशतः प्राणस्पन्दस्तेन च वासना। क्रियते चित्तबीजस्य तेन बीजाङ्कुरक्रमः॥२६॥
द्वे बीजे चित्तवृक्षस्य प्राणस्पन्दनवासने। एकस्मिँश्च तयोः क्षीणे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः॥२७॥
द्वे बीजे चित्त वृक्षस्य वृत्तिव्रतति धारिणः। एक प्राण परिस्पन्दो द्वितीयं दृढ़भावना॥४८॥ (मुक्तिकोपनिषद्, अध्याय २)
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुण प्रवृद्धा विषय प्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनु सन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके॥२॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढ़मूलमसङ्ग शस्त्रेण दृढ़ेन छित्वा॥३॥ (गीता, अध्याय १५)
(३) समुद्र में तैरते काष्ठ-जल जैसे समरूप पदार्थ से सृष्टि का आरम्भ ५ पर्वों में हुआ। प्रथम रस था, इसमें तरङ्ग होने से सरिर् या सलिल हुआ, उसमें ब्रह्माण्ड रूप द्रप्स (drops) तैर रहे हैं। ब्रह्माण्ड का फैला हुआ पदार्थ अप् है। उसमें शब्द या तरङ्ग होने से वह अम्भ हुआ। अम्भ में ताराओं का निर्माण हुआ, जो इसमें विन्दु (द्रप्स) रूप तैर रहे हैं। उनमें से एक तारा सूर्य है जिसके क्षेत्र का जल जैसा पदार्थ मर है (अकृतक या मर्त्य विश्व)। इसे धारण करने वाला सूर्य मरीचि है। इसके भीतर चन्द्र मण्डल में ताप-शीत का उपयुक्त समन्वय है, जिसमें जीवन चल सकता है। यह पावक(अग्नि के निकट का) सोम है। इसके बाहर बृहस्पति सोम, सौर मण्डल के बाहर ब्रह्मणस्पति सोम है। पृथ्वी पर जल रूप समुद्र में भी काष्ठ या जीव तैर रहे हैं।
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनुद्याम्। (ऋक्,१०/१७/११, अथर्व, १८/४/२८, वाज. यजु. १३/५, तैत्तिरीय सं. ३/१/८/३, ४/२/८/२, मैत्रायणी संहिता, २/५/१०, ४/८/९, काण्व सं. १३/९, १६/१५,३५/८, शतपथ ब्रा. ७/४/१/२०)
इन तैरते पिण्डों को मत्स्य, मण्डूक, ग्राह आदि भी कहा है जो अलग अलग स्तर के पिण्ड हैं।
समुद्राय शिशुमारान् आलभते पर्जन्याय मण्डूकान् अद्भ्यो मत्स्यान् मित्राय कुलीपयान् वरुणाय नाक्रान्॥ (वाज. यजु, २४/२१)।पुरोळा इत्तुर्वशो यक्षुरासीद्रा ये मत्स्यासो निशिता अपीव॥ (ऋक्, ७१/८/६)
यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद् २/७)
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञानं सरिरस्य मध्ये। (वा॰ यजुर्वेद १३/४२)
समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा, सरिराय त्वा वाताय स्वाहा । (वा॰ यजुर्वेद ३८/७)
इमे वै लोकाः सरिरम् । (शतपथ ब्राह्मण ७/५/२/३४, ८/६/३/२१)
द्यौर्वाऽअपां सदनं दिवि ह्यापः सन्नाः। (शतपथ ब्राह्मण ७/५/२/५६)
आापो वा अम्बयः । (कौषीतकि ब्राह्मणउपनिषद् १२/२)
अयं वै लोकोऽम्भांसि (तैत्तिरीय ब्राह्मण३/८/१८/१)
स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद् १/१/२)
अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाःसर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण,१४/२/२/३)
सोमस्य धारा पवते (ऋक्, ९/८०/१)
अयम् विश्वानि तिष्थति पुनानः भुवना उपरि। सोमः देवः न सूर्य्यः। (ऋक्, ९/५४/३)
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः।(ऋक्, ९/८३/१)
इसके आधिभौतिक रूप की कथा हुई कि भगवान् कृष्ण के निधन पर उनका दाह संस्कार हुआ और बचा हुआ भाग समुद्र में छोड़ दिया गया। वह तैरते हुए पुरीतट पर आया जिससे जगन्नाथ का दारु विग्रह बना। पर जगन्नाथ की दारु मूर्त्ति भी बहुत पहले से थी। यह आधिदैविक तत्त्व को समझाने के लिए कथा रूप है। इसका वर्णन सारलादास ने ओड़िया महाभारत में किया था। उसी काल में सायण ने इस प्रकार का भाष्य किया है। उस समय यह किसी उप-पुराण में उपलब्ध रहा होगा।
अदो यद्दारुः प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम्।
तदारभस्व दुर्हणो येन गच्छ परस्तरम्॥ (ऋक् , शाकल्य शाखा १०/१५५/३)
सायण भाष्य-जगन्नाथ की अपौरुषेय दारु मूर्ति (उत्कल भूमि के) समुद्र तट पर है। इस अविनाशी दारु की पूजा करने से भवसागर के पार हो सकते हैं (जैसे काठ की नाव से नदी पार करते हैं)।
यद्दार्वमानुष सिन्धोस्तीरे तीर्णं प्रदृश्यते। तदालभाय परं पदं प्राप्नोति दुर्लभम्। (ऋक्, वाष्कल शाखा ८/८/१३/३)
(४) विश्व निर्माण की सामग्री और आधार-
किं स्विद् वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तत् यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥
(ऋक् १०/८१/४, तैत्तिरीय ब्राह्मण २/८/९/१५, तैत्तिरीय संहिता ४/६/२/१२)
वह कौन सा वन तथा वृक्ष था जिसे काट कर पृथ्वी और आकाश बने। मनीषियों ने मन में सोचा कि किसने इस विश्व को बनाया तथा धारण किया?
इसका उत्तर तैत्तिरीय ब्राह्मण में है-ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीत् यतो द्यावा पृथिवी निष्टतक्षुः।
मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/८/९/१६)
ब्रह्म ही वह वृक्ष और वन था जिसे काट कर विश्व बना। मनीषियों ने मन में निर्णय किया कि ब्रह्म ने ही इसे बनाया तथा धारण किया।
अन्यत्र भी-किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।
यतो भूमि जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन् मह्ना विश्वचक्षाः॥ (ऋक् १०/८१/२, तैत्तिरीय संहिता ४/६/२/११)
गीता में भी विश्व का निर्माण सामग्री, निर्माता, उपभोग कर्ता, आधार, परिणाम आदि सभी को ब्रह्म कहा है। इस श्लोक को प्रायः भोजन के पूर्व पढ़ा जाता है-
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतं। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥ (गीता, ४/२४)
(५) सदा बढ़ने वाला-ब्रह्म का एक अर्थ है, सदा बढ़ने वाला, जो इसके ३ मूल धातुओं का अर्थ है-(क) बृहि (बृंह) बृद्धौ शब्दे च (१/४८८, ४८९), (ख) भृञ् भरणे (१/६३९) (ग) भृञ् धारणपोषणयोः (३/५)। वृद्धि तथा पोषण गुण वृक्ष में भी है। वह जीवन पर्यन्त बढ़ता है तथा चर जीवों का पोषण करता है।
सदा बढ़ने का गुण पुरुष सूक्त में कहा है-यदन्नेनातिरोहति। (अन्न या स्थूल रूप से क्रमशः उठता है)
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः।
वृक्षं पक्वं फलमङ्कीव धूनुहीन्द्र संपारणं वसु (ऋक्, ३/४५/४)
पके फल वाला वृक्ष अंकी से हिलाने पर जैसे फल देता है, उसी प्रकार इन्द्र फल दे।
(६) निरपेक्ष द्रष्टा-ब्रह्म का एककर्त्ता रूप है जिसे क (कर्त्ता, करतार) कहा गया है। दूसरा निरपेक्ष द्रष्टा कहा गया है जिसे निर्विशेष ब्रह्म कहते हैं।
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्, यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद् ३/९)
= जिससे न कोई बड़ा है, न सूक्ष्म है, न अधिक है, वह वृक्ष जैसा आकाश में स्तब्ध होकर पूरे विश्व को देखता है।
मनुष्य शरीर में भी एक भाग कर्म में लिप्त है, दूसरा केवल द्रष्टा है, जिनको जीव (Eve) तथा आत्मा (Adam) कहते हैं- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
६. विष्णु के विक्रम-इसके लिये कई शब्दों का प्रयोग है।
यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे यैषामियं विक्रान्तिरिदमेव प्रथमेन पदेन पस्पाराथेदमन्तरिक्षं द्वितीयमेन दिवमुत्तमेन। (शतपथ ब्राह्मण १/९/३/९)
इमे वै लोका विष्णोर्विक्रमणं विक्रान्तं विष्णोः क्रान्तम्। (शतपथ ब्राह्मण ५/४/२/६)
स (विष्णुः) इमाँल्लोकान्विचक्रमेऽथो वेदानथो वाचम् (ऐतरेय ब्राह्मण ६/१५)
एतद्वै देवा विष्णुर्भूत्वेमाँल्लोकानक्रमन्त यद्विष्णुर्भूत्वा क्रमन्त तस्माद् विष्णुक्रमाः। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/२/१०)
तद्वाऽहोरात्रेऽएव विष्णुक्रमा भवन्ति। (शतपथ ब्राह्मण ६/७/४/१०)
अथर्व वेद (८/१०) के ६‍ खण्डों में विराट् (दृश्य जगत् के विभिन्न रूप) का वर्णन है। इसमें विक्रान्त (विभाजन), उद् अक्राम (उत्क्रान्त-बाहर निकलना) न्यक्रामत् (परिणत होना) शब्दों के प्रयोग हैं। जैसे-
(१०/१)-विराड् वा इदमग्र आसीत् (पुरुष सूक्त, वाजसनेयि ३१/५- ततो विराड् अजायत, विराजो अधिपूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः। अथर्व १९/६/९)-विराड् अग्रे समभवत्—-)
स उदक्रामत् सा गार्हपत्ये न्यक्रामत्॥२॥
विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः (ऋक् १/१५४/१, अथर्व ७/२६/१, वाज.सं. ५/१८, तैत्तिरीय सं. १/२/१३/३, काण्व सं. २/१०, मैत्रायणी सं. १/२९/१९/९)
शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋक् १/९०/९) उरुक्रमः ककुहो यस्य पूर्वीर्न मर्धन्ति युवतयो जनित्रीः (ऋक् ३/५४/१४) स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत् (५/८७/४) विश्वेत्ता विष्णुराभरद् उरुक्रमः त्वेषितः। सतं महिषान् क्षीरपाकमोदनं एमृषम्॥ (८/७७/१०) उरुक्रमस्य स हि बन्धुरित्था विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः॥ (ऋक् १/१५४/५) इयं मनीषा बृहन्तोरुक्रमा तवसा वर्धयन्ती। (ऋक् ७/९९/६)
(१०/२)-स उदक्रामत् सा अन्तरिक्षे चतुर्धा विक्रान्ता अतिष्ठत्॥१॥
ऋग्वेद (५/३४/६)-वित्वत्क्षणः समृतौ (सं + ऋतौ= ठीक मार्ग पर) चक्रमासजो (चक्र को ठीक से चलाने वाला)।
क्रमु पाद विक्षेपे (धातुपाठ १/३१९)-१. आक्रमते, क्रम्यते-निर्भयता से जाना, रक्षण करना, बढ़ना। २. आक्रम-उगना, उदित होना। ३. उपक्रम-आरम्भ करना। ४. विक्रम-पद गिनते जाना। ५. व्याक्रम-अतिक्रमण करना, आज्ञा भङ्ग करना। ६. अतिक्रम-बाहर जाना। ७. आक्रम-जय पाना, अधिक होना। ८. उत्क्रम-अतिक्रमन करना, आज्ञा भंग करना। ९. उपक्रम-निकल जाना। १०. निष्क्रम-आगे जाना। ११. पराक्रम-वीरता दिखाना, अन्य को पार करना। १२. प्रक्रम-निकल जाना, समीप आना। १३. परिक्रम-घूमना, चक्कर लगाना। १४. विक्रम-जीतना, ऊपर जाना। १५. संक्रम-स्थानान्तर करना, अन्य जगह जाना।
विष्णु के बहुत से क्रमों की सूची अथर्ववेद (१०/५) में है।
अथर्व वेद (१०/५/५)-ऋषि २५-३५-कौशिक, देवता (२५-३५)-विष्णुक्रम
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा पृथिवी संशितोऽग्नि तेजाः।
पृथिवीमनु वि क्रमेऽहं पृथिव्यास्तं निर्भजामो योऽस्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः।
स मा जीवीत्तं प्राणो जहातु॥२५॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहान्तरिक्ष संशितो वायुतेजाः। अन्तरिक्षमनु वि क्रमे ऽहमन्तरिक्षात् निर्भजामो—॥२६॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः। दिवमनु वि क्रमेऽहं दिवस्तं—॥२७॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः। दिशोऽनु विक्रमेऽहं दिग्भ्यस्तं —॥२८॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः। आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं –॥२९॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः। ऋचोऽनु वि क्रमेऽहमृभ्यस्तं —॥३०॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा यज्ञसंशितो ब्रह्मतेजाः। यज्ञमनु वि क्रमेऽहं यज्ञास्तं —॥३१॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहौषधीसंशितः सोमतेजाः। ओषधीरनु वि क्रमेऽहमोषधीभ्यस्तं —॥३२॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहाऽप्सुसंशितो वरुणतेजाः। अपोऽनु वि क्रमे ऽहमद्भ्यस्तं —॥३३॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा कृषिसंशितो वरुणतेजाः। कृषिमनु वि क्रमेऽहं कृष्यास्तं —॥३४॥
विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नहा प्राणसंशितः पुरुषतेजाः। प्राणमनु वि क्रमेऽहं प्राणात् तं निर्भजामो योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः।
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु॥३५॥
कुछ अन्य क्रम-(१) त्रिविक्रम-३ प्रकार के प्रभाव क्षेत्र या साम (विष्णु सहस्रनाम में त्रिसामा कहा है)। ताप, तेज, प्रकाश या अग्नि-वायु-रवि (अथर्व ५/१०/२७)
मनुष्य रूप विष्णु वामन द्वारा बलि के प्रति राजनीति के ३ नियमों का प्रयोग। राजनीति के ४ अंग हैं-साम, दाम, दण्ड भेद। यदि बल हो तो दण्ड दिया जा सकता है। बल नही है तो अन्य ३ नियम होंगें जिनको छल (त्रिविक्रम = तिकड़म) कहते हैं-साम, दाम, भेद। मनस्तेज (अथर्व ५/१०/२८)
(२) उरुक्रम-इसका अर्थ सामान्यतः त्रिविक्रम करते हैं। उरु = बड़ा। शरीर में सबसे बड़ी हड्डी जंघा को भी उरु कहते है। विस्तृत होने के कारण पृथ्वी को उर्वी (स्त्रीलिङ्ग रूप) कहते हैं। क्रम = डिजाइन, विशेष क्रम में स्थापित करना। सबसे बड़ा निर्माण नगर का होता है, अतः नगर को दक्षिण भारत में उरु या उर कहते हैं, जैसे चित्तूर, बंगलोर, तंजाउर। मनुष्य विष्णु ने शिल्पशास्त्र के अनुसार सबसे पहले नगरों का निर्माण किया अतः उनको उरुक्रम कहा गया। बाद में राजा वरुण ने भी उरु बनाये, अतः इराक का सबसे पुराना नगर उर है जहां की उर्वशी थी।
उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग् वेद १/९०/१)
(४) यज्ञ के ३ सवन-प्रातः, माधन्दिन और सायं। (अथर्व १०/५/३१)
(५) दिशा के ३ विक्रम-३ आयामी आकाश में गति या घूर्णन (चक्रम) (अथर्व ५/१०/२८)
(६) औषधि या सोम (अथर्व ५/१०/३२)-रेतः, यश, श्रद्धा।
रेतो वै सोमः (कौषीतकि ब्राह्मण उप. १३/७, शतपथ ब्राह्मण १/९/२/९, तैत्तिरीय ब्राह्मण २/७/४/२ आदि)
यशो वै सोमः (शतपथ ब्राह्मण ४/२/४/९)
(ऋक् १०/७२/१०)-यशो वै सोमो राजा (ऐतरेय ब्राह्मण १/१३)
श्रद्धस्य सोम्येति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं (छान्दोग्य उपनिषद् ६/१२/३)
(७) कृषि रूप (अथर्व ५/१०/३४)-यज्ञ, पर्जन्य, अन्न। पर्जन्य वरुण तत्त्व है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥(गीता ३/१४)
७. नारायण-विश्व निर्माण के ५ पर्व पुरुष के ५ रूप हैं, जिनको नर कहते हैं-स्वयम्भू मण्डल (१०० अरब ब्रह्माण्ड), परमेष्ठी मण्डल (हमारा ब्रह्माण्ड जिसमें १०० अरब तारा हैं), सौर मण्डल (सूर्य का गुरुत्व और प्रकाश क्षेत्र, चान्द्र मण्डल (चन्द्र कक्षा का गोल, भूमण्डल (पृथ्वी ग्रह)। सभी के निर्माण का स्रोत जल जैसा समरूप फैला हुआ पदार्थ है जिसके विभिन्न रूप हैं-रस, सरिर्, अप्, अम्भ, मर, अर्णव, सोम, जल। इन सृष्टियों सेपुरुष अलग नहीं है, इनमें घुसा हुआ है जिसे शिपिविष्ट, अन्तर्यामी आदि कहा गया है-तत् सृष्ट्वा तदेव अनुप्राविशत् ( तैत्तिरीय उपनिषद्, २/६/३)। हर स्तर पर नर ने अप् की सृष्टि की जिनके रूप नार हुए (नर से उत्पन्न)। उनमें भी नर छिपा हुआ है, अतः उसे नारायण कहते हैं।
आपो नारा इति प्रोक्ता, आपो वै नरसूनवः।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणं स्मृतम्॥
(मनुस्मृति, १/१०, विष्णु पुराण, १/४/६, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, अग्नि पुराण, १७/७, गरुड पुराण, ३/२४/५३, ब्रह्म पुराण, १/१/३९, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२/६/६२, वराह पुराण, २/२६, वायु पुराण, ७/६४)
पद्म पुराण (६/२२६) अध्याय में इसकी कई प्रकार से निरुक्ति दी गयी है-
अथ नारायण पदं वक्ष्यामि गिरजे शुभे। नारा इत्यात्मनां संघास्तेषां गतिरसौ पुमान्॥५०॥
त एव चायनं तस्य तस्मान्नारायणः स्मृतः। सर्वं हि चिदचिद् वस्तु श्रूयते दृश्यते जगत्॥५१॥
योऽसौ व्याप्य स्थितो नित्यं स वै नारायणः स्मृतः। नाराश्चेति सर्व पुंसां समूहाः परिकीर्तिताः॥५२॥
गतिरालंबनं तेषां तस्मान्नारयणः स्मृतः। नराज्जातानि तत्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः॥५३॥
तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणस्स्मृतः। कल्पांतेऽपि जगत् कृत्स्नं ग्रसित्वा येन धार्यते॥५४॥
पुनः संसृज्यते येन स वै नारायणः स्मृतः। चराचरं जगत् कृत्स्नं नार इत्यभिधीयते॥५५॥
तस्य वा संगतिर्येन तेन नारायणः स्मृतः। नारो नराणां संघातः तस्यासावयनं गतिः॥५६॥
तेनासौ मुनिभिर्नित्यं नारायण इतीरितः। प्रभवन्ति यतो लोका महाब्धौ पृथु फेनवत्॥५७॥
पुनर्यस्मात् प्रलीयन्ते तस्मान्नारायणः स्मृतः। यो वै नित्य पदे नित्यो नित्य मुक्तैक भोगवान्॥५८॥
८. गरुड़ वाहन-इसे वेद में सुपर्ण कहा है, जो ब्रह्म का ही स्वरूप है।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ (ऋक्, १/१६४/४६, अथर्व, ९/१०/२८)
ऋषि (रस्सी) खींचने वाले बल हैं।
ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
इनके मिलन के कारण गति गरुत्मान् है। दोनों के ७ भाग हैं। गरुत्मान् के ७ भाग पक्षी (सुपर्ण) के ७ अंगों के रूप में कहे जाते हैं। सुपर्ण के ४ ऋषि केन्द्र में हैं, जो ४ प्रकार के आकर्षण बल हैं-गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्-चुम्बकीय (आकर्षण और विकर्षण), नाभिकीय आकर्षण, क्षीण नाभिकीय बल (क्वाण्टम मेकानिक्स के अनुसार)। इस सुपर्ण के २ पक्ष समरूपता हैं, अर्थात् मूल रूप और दर्पण में दीखते रूप जैसा। निर्माण का स्रोत सिर है तथा परिणति पुच्छ है।
त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त। स एतान् सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन्-यदूर्ध्वं नाभेस्तौ द्वौ समौब्जन्, यदवाङ् नाभेस्तौ द्वौ। पक्षः पुरुषः, पक्षः पुरुषः। प्रतिष्ठैक आसीत्। अथ या एतेषां पुरुषाणां श्रीः, यो रस आसीत्-तमूर्ध्व समुदौहन्। तदस्य शिरोऽभवत्। स एवं पुरुषः प्रजापतिरभवत्। स यः सः पुरुषः-प्रजापतिरभवत्, अयमेव सः, योऽयमग्निश्चीयते (काय रूपेण-शरीर रूपेण-मूर्त्तिपिण्ड रूपेण-भूत पिण्ड रूपेण)। स वै सप्तपुरुषो भवति। सप्त पुरुषो ह्ययं, पुरुषः-यच्चत्वार आत्मा, त्रयः पशुपुच्छानि। (शतपथ ब्राह्मण ६/१/१/२-६)
ऋषि के कई रूप हैं-एकर्षि (पूषा), त्र्यर्षि (३ युग्म, १+३ = ४ ऋषि भी), सप्तर्षि (३ युग्मों का अलग अलग होना)
पूषन् एकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह (ईशावास्योपनिषद्, १६)।
अत्रि, भृगु, अङ्गिरा-अर्चिर्षि भृगुः सम्बभूव, अङ्गारेष्वङ्गिराः सम्बभूव। अथ यदङ्गारा अवशान्ताः पुनरुद्दीप्यन्त, तद् बृहस्पतिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण ३/३४)
३ युग्म-इमामेव गोतम-भरद्वाजौ। अयमेव गोतमः, अयं भारद्वाजः । इमामेव विश्वामित्र-जमदग्नी। अयमेव विश्वामित्रः, अयं जमदग्निः। इमामेव वसिष्ठ-कश्यपौ। अयमेव वसिष्ठः, अयं कश्यपः। वागेवात्रिः। वाचा ह्यन्नमद्यते। अत्तिर्ह वै नामैतद्यत्रिरिति। सर्वस्यात्ता भवति, सर्वमस्यान्नं भवति, य एवं वेद। (शतपथ ब्राह्मण १४/५/२/६, बृहदारण्यक उपनिषद् २/२/४)
३ युग्मों के अलग अलग रूप शतपथ ब्राह्मण (८/१/१/३-९) में हैं।
इसी प्रकार एक, २ तथा ३ सुपर्ण भी हैं।
एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे ।
तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं, माता रेऴ्हि स उ रेऴ्हि मातरम् ॥ (ऋग् वेद १०/११४/४)
सूर्य रूपी विष्णु का वाहन गरुड़ पूरे सौर मण्डल तथा उससे बाहर फैला हुआ है।
सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रञ्चक्षुर्बृहद्रथन्तरे पक्षौ।
स्तोम ऽआत्मा छन्दांस्यङ्गानि यजूँषि नाम।
साम ते तनूर्वामदेव्यँयज्ञायज्ञियम्पुच्छन्धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवङ्गच्छ स्व पत॥। (वाज. यजु, १२/४)
दो सुपर्ण-द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्यो अभिचाकषीति॥
(मुण्डक उप. ३/१/१, श्वेताश्वतर उप. ४/६, ऋक् १/१६४/२०, अथर्व ९/९/२०)
तीन सुपर्ण-ये गायत्री मन्त्र के ३ पादों की तरह हैं। प्रथम पाद में सृष्टि होती है, जो ७ अंगों वाले गरुड़ के विभिन्न स्तरों द्वारा होता है। द्वितीय पाद में युग्म सुपर्णों द्वारा सृष्टि क्रिया चलती है, वह पालनकर्ता विष्णु का वाहन हुआ। तृतीय पाद आकाश की सृष्टि तथा उसकी क्रियाओं का मनुष्य पर प्रभाव है। यह प्रभाव पहले मन पर होता है जिसे वेद में धीयोग कहा गया है। मन से बाकी शरीर नियन्त्रित होता है। यह त्रिसुपर्ण है, जिसका मेधा जनन के लिये प्रयोग होता है। मेधा के ३ स्तर हैं-मन, बुद्धि तथा उसका स्थान चित्त आकाश। इसका विस्तृत वर्णन कठिन है क्योंकि बुद्धि तथा शिक्षण का स्वरूप स्पष्ट नहीं है। वेद में आंख, कान तथा मन का समन्वय ही मनोजवित्व कहा है।
अक्षण्वन्तःकर्णवन्तःसखायो मनोजवेष्व समा बभूवुः।
आदध्नास उपकक्षास उत्वेह्रदा इव स्नात्वा उत्वे ददृशे॥ (ऋग्वेद १०/७१/७)
हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद्ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः।
अत्राह त्वं विजहुर्वेद्याभिरोह ब्रह्माणो विचरन्तु त्वे॥ (ऋग्वेद १०/७१/८)
इस साधना का क्रम है-व्यवसित (एकाग्र) बुद्धि द्वारा मन को हृदय में आधान कर जप द्वारा अभ्यास होता है। उसके बाद छन्द रूपी गरुड़ पर नारायण उसे मुक्त करते हैं।
श्री शुक उवाच-एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि। जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्।१।
गजेन्द्र उवाच-ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादि बीजाय परेशायाभि धीमहि।२। (भागवत पुराण ८/३)
छन्दोमयेन गरुड़ेन समुह्यमानश्चक्रायुधोभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः (३१)
छन्द रूपी गरुड़ को वयः छन्द या मूर्धा वयः छन्द कहा गया है (वाजसनेयि संहिता, १५/४-५)।
गरुड़ का प्रभाव क्षेत्र तथा उससे प्राप्त बुद्धि वाक् सुपर्णी है-सुपर्णी (माया) वागेव सुपर्णी। (शतपथ ब्राह्मण, ३/६/२/२)
त्रिसुपर्ण सूक्त, तैत्तिरीय आरण्यक (१०/३८-४०) अर्थात् महानारायण उपनिषद् (१६/३-५) में हैं। ऋग्वेद (१०/११४/३-५) के ३ मन्त्रों को त्रिसुपर्ण सूक्त कहते हैं। ऋक् (९/८६/३७) में भी ३ सुपर्णों का उल्लेख है। ९. नित्य अवतार-आकाश में विष्णु के ५ नित्य अवतार हैं-
(१) मत्स्य या विराट्-आकाश में मत्स्य या द्रप्स (विन्दु) की तरह १०० अरब ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं। हमारे ब्रह्माण्ड में भी १०० अरब तारा तैर रहे हैं। (५/३ में सन्दर्भ) प्रत्येक का अधिष्ठान विराट् है (पुरुष सूक्त)।
तस्माद् विराड् अजायत विराजोऽअधि पूरुषः।
स जातो ऽ अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥ (वाज, सं ३१/५)
उससे बड़ा होने के कारण इसे पुरुष नहीं पूरुष कहते हैं। प्रत्येक विदु का आधार उसके चारों तरफ के पिण्डों का आकर्षण तथा इसकी अपनी गति है, जो बहुत बड़ा है।
(२) यज्ञ अवतार-विष्णु को यज्ञ कहा गया है। गीता (३/१०, १०) के अनुसार यज्ञ वह कर्म है जिससे चक्र में उपयोगी वस्तु का निर्माण होता है। सृष्टि निर्माण के ९ सर्ग कहे गये हैं (मूल अव्यक्त को मिला कर १० होते हैं)। प्रत्येक सर्ग का निर्माण चक्र का समय ९ प्रकार की काल-माप है-ब्राह्म, प्राजापत्य, बार्हस्पत्य, दिव्य, पैत्र, सौर, नाक्षत्र, चान्द्र, सावन (सूर्य सिद्धान्त, १४/१)। मनुष्य के यज्ञ भी इन्हीं काल चक्रों में होते हैं-दिन, मास, वर्ष। निर्माण के लिये फैला पदार्थ जल है, निर्मित पदार्थ जो सीमा बद्ध है, भूमि है। बीच का पदार्थ मेघ (जल+वायु मिश्रण) या वराह (जल + स्थल का जीव) है। अतः ९ सर्गों के लिए ९ मेघ होंगे।
(३) वराह अवतार-आकाश में इसके ५ रूप हैं। ३ धामों के ३ अन्तरिक्षों में मूल पदार्थ दीखता है जिससे आदि हुआ, अतः इनको आदित्य कहते हैं। स्वायम्भुव, परमेष्ठी, सौर मण्डलों के आदित्य क्रमशः अर्यमा, वरुण, मित्र हैं-
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
वराह के ५ स्तर हैं-(१) आदि वराह-विश्व का मूल रूप अर्यमा। (२) यज्ञ वराह-ब्रह्माण्ड का निर्माण-अवस्था। निर्माण विनाश का क्रम यज्ञ अवतार है। (३) श्वेत वराह-सौर मण्डल में सूर्य निर्माण के बाद प्रकाश की उत्पत्ति हुयी अतः यह श्वेत वराह हुआ। (४) जिस क्षेत्र के पदार्थ के घनीभूत होने से पृथ्वी बनी वह भू वराह है, इसका आकार पृथ्वी से प्रायः १००० गुणा है (वायु पुराण ६/१२ के अनुसार यह सूर्य से १०० योजन ऊंचा और १० योजन मोटा है। पृथ्वी सूर्य व्यास की इकाई में १०८-१०९ योजन दूर है अतः यहां योजन का अर्थ सूर्य व्यास है। पृथ्वी का आकार १/१०८ योजन होगा अतः यह वराह का १/११०० भाग होगा। (५) पृथ्वी का आवरण रूप वायुमण्डल ही एमूष वराह है।
ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामृषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम्।
श्येनो गृधानां स्वधितिर्वनानां सोमः पवित्रमत्येति रेभन्॥ (ऋग्वेद ९/९६/६)
स यः कूर्मः असौ स आदित्यः । (शतपथ ब्राह्मण ६/५/१/६)
तां पृथिवीं (परमेष्ठी) संक्लिश्याप्सु प्राविध्यत् तस्यै यः पराङ् रसोऽत्यक्षरत्-स कूर्मोऽभवत् । (शतपथ ब्राह्मण ६/१/१/१२)
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति ।
महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन् (ऋक् ९/९७/७)
स प्रजापति-वै वराहो रूपं कृत्वा उपन्यमज्जत् । (तैत्तिरीय ब्राह्मण १/१/३/६)
अग्नो ह वै देवा घृतकुम्भं प्रवेशयांचक्रुस्ततो वराहः सम्बभूव । तस्माद् वराहो मेदुरो घृताद्धि सम्भूतः । तस्माद् वराहे गावः संजानते । (शतपथ ब्राह्मण ५/४/३/१९)
तां प्रादेशमात्रीं (१० अंगुल) पृथिवीं-एमूष इति वराह उज्जघान । सोऽस्याः पृथिव्याः पतिः प्रजापतिः । (शतपथ ब्राह्मण १४/१/२/११)
(४) कूर्म-ब्रह्माण्ड का आधार कूर्म कहा जाता है, क्योंकि यह काम करता है। यह ब्रह्माण्ड का १० गुणा है। इसमें केवल किरणें हैं अतः ब्रह्मवैवर्त्त प्राण प्रकृति खण्ड अध्याय ३ में इसे गोलोक और ब्रह्माण्ड को महाविष्णु रूप विराट् बालक कहा गया है।
स यत् कूर्मो नाम-एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसृजत-अकरोत्-तत् । यदकरोत्-तस्मात् कूर्मः। कश्यपो वै कूर्मः । तस्मादाहुः-सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः-इति । (शतपथ ब्राह्मण ७/५/१/५)
मानेन तस्य कूर्मस्य कथयामि प्रयत्नतः ।
शङ्कोः शत सहस्राणि (१ पर १८ शून्य) योजनानि वपुः स्थितम् ॥ (नरपति जयचर्या, स्वरोदय, कूर्मचक्र)
ब्रह्माण्ड का आकार परार्द्ध (१ पर १७ शून्य) योजन कहा है-ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ (कठोपनिषद् १/३/१)
(५) वामन-सौर मण्डल में सूर्य का पिण्ड ही वामन है। सूर्य को मापदण्ड या योजन मानने पर इसके रथ (शरीर = सौर मण्डल) का विस्तार १ कोटि ५७ लाख योजन कहा गया है। ठोस ग्रहों का क्षेत्र मंगल कक्षा तक दधि-वामन कहा है, यह भागवत पुराण में दधि समुद्र का आकार है।

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