वेद की अपौरुषेयता

वेद की अपौरुषेयता

वेद को ३ अर्थों में अपौरुषेय कहा है-

(१) अतीन्द्रिय ज्ञान-सामान्यतः ५ ज्ञानेन्द्रियों से ५ प्राणों के माध्यम से ज्ञान होता है। अन्य २ असत् प्राणों से अतीन्द्रिय ज्ञान होता है। इनको परोरजा तथा ऋषि कहा गया है। सृष्टि का मूल ऋषि प्राण है जो सभी चेतना से परे होने के कारण असत् है। ऊपर (स्रोत) से नीचे (शिष्य) तक ज्ञान का प्रवाह परोरजा प्राण द्वारा है, यह परोऽवरीय कहा है (पर से अवर)-

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् (मुण्डकोपनिषद् २/१/८),

पञ्च प्राणोर्मिं पञ्च बुद्ध्यादि मूलाम्। (श्वेताश्वतर उपनिषद्१/५)

परोरजसेऽसावदोम् (बृहदारण्यक ५/१४/७), परोरजा य एष तपति (भ्रुह. ५/१४/३)

परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति, य एतदेवं विद्वान् (छान्दोग्य उपनिषद् १/९/२)

असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति । ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)

 

(२) कई ऋषियों का समन्वय- वेद मन्त्रों का दर्शन मनुष्य ऋषियों द्वारा हुआ। किन्तु कई हजार वर्षों तक विभिन्न देशों के ऋषियों द्वारा मन्त्र का दर्शन होने से उनका समन्वय अपौरुषेय है।

ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात् कृतकर्माण ऋषयो बभूवुः। (निरुक्त १/२०)

तद्वा ऋषयः प्रति बुबुधिरे य उतर्हि ऋषय आसुः (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/१४)

नमो ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रविद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यो। मा मामृषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहु (दु) र्दैवी वाचमुद्यासम्॥ (वरदापूर्वतापिनी उपनिषद्, तैत्तिरीय आरण्यक, ४/१/१, मैत्रायणी संहिता ४/९/२)

ऋषे मन्त्रकृतां स्तोत्रैः कश्यपोद्वर्धयत् गिरः। सोऽयं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥ (ऋक् ९/११४/२)

आप्तोपदेशः शब्दः। (न्याय सूत्र १/१/७)

 

(३) तीन विश्वों का समन्वय-विश्व के ३ स्तरों का समन्वय जो विज्ञान के प्रयोगों द्वारा सम्भव नहीं है-आधिदैविक (आकाश की सृष्टि), आधिभौतिक (पृथ्वी पर), आध्यात्मिक (मनुष्य शरीर के भीतर)। इनका एक दूसरे की प्रतिमा रूप दर्शन परोरजा या ऋषि प्राण से सम्भव है।

स ऐक्षत प्रजापतिः (स्वयम्भूः) इमं वा आत्मनः प्रतिमामसृक्षि। आत्मनो ह्येतं प्रतिमामसृजत। ता वा एताः प्रजापतेरधि देवता असृज्यन्त-(१) अग्निः (तद् गर्भितो भूपिण्डश्च), (२) इन्द्रः (तद् गर्भितः सूर्यश्च), सोमः (तद् गर्भितः चन्द्रश्च), (४) परमेष्ठी प्राजापत्यः (स्वायम्भुवः)-शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१२-१३)

पुरुषोऽयं लोक सम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुः आत्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके॥ (चरक संहिता, शारीरस्थानम् ५/२),

अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च (तत्त्व समास ७)

किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्म उच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः॥३॥

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषस्याधिदैवतम्। (गीता, अध्याय ८)

 

अरुण उपाध्याय 

सामाजिक चिन्तक एवं धर्म शास्त्र विशेषज्ञ 

 

 

 

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