वैदिक पितृ समीक्षा / आधुनिक विज्ञान

वैदिक पितृ समीक्षा / आधुनिक विज्ञान

डॉ।दिलीप कुमार नाथाणी (धर्म शास्त्र विशेषज्ञ)
पितृ विषय पर बहुत ही वाद—विवाद करते हुये  धर्मद्रोहियों ने पितरों से सम्बन्धित वेद वचनों को भी मिथ्या करने का कुत्सित प्रयास किया है। दुर्भाग्य है कि ऐसा कुत्सित कार्य किसी म्लेच्छ धर्मावलम्बियों ने नहीं वरन् स्वयं को वेदोपासक कहने वाले हमारे ही अन्तद्रोहियों का कुकर्म रहा है। प्रयास रहेगा कि पितरों से सम्बन्धित वैदिक परम्परा को प्रमाणिक रूप से रखते हुये उसके वैदिक विज्ञान को समझाऊँ । इसके लिये परम श्रद्धेय महामहोपाध्याय वेद वाचस्पति श्री मधुसूदन ओझा जी के द्वारा निरूपित वैदिक व्याख्या पद्धति का अनुसरण करते हुये उन्हीं के लेखन को सरलीकृत करके आप पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।

वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्सामयजुरेव च।। गीता 9.17

मैं इस जगत् का पिता हूँ। माता, धाता और पितामह भी मैं ही हूँ। जो सबसे पावन ज्ञेय (ब्रह्म) है ओमकार, ऋक्, साम और यजुष् भी में हूँ। यदि हमें हमारे पितरों के स्वरूप को जानना है तो मूल सत्ता के स्वरूप को जानना पड़ेगा तथा ऋषि एवं मनु के स्वरूप को भी  जानना पड़ेगा। इस विषय का वेद में सविस्तार प्रतिपादन भी किया गया है। वेद का उद्घोष यही है कि आत्मा से मन, प्राण, इन्द्रियाँ एवं उनके विषयरूप में दिखाई देने वाले तीनों लोक उत्पन्न होते हैं, अतएव उस सच्चित्सुखस्वरूप आत्मा को जानने से उसमें से बने हुये विभिन्न आभूषणों का ज्ञान हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टि के मूल आधार सच्चिदानंद आत्मा को जानने से सारी सृष्टि का ज्ञान हो सकता है। उसी परम सत्ता से ही सभी का आविर्भाव हुआ है मुण्डकोपनिषत् में कहा है—

गता: कला: पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु।

भूतानि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकी भवन्ति।। मुण्डकोपनिषत् 3.2.7

 

आदिपुरुष का सोलह कलाओं वाला शरीर अत्यन्त सूक्ष्म होता है। यहाँ सूक्ष्म से तात्पर्य परिमाण या आकार में छोटा होना नहीं है सूक्ष्म से तात्पर्य है कि जो अत्यन्त अगम्य हो। उस सोलह कला परिपूर्ण आदिपुरुष से यह आदि पुरुष आनन्द एवं विज्ञानात्मक है। इससे प्रथम  तीन धाराएँ निकलती हैं, आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ।  प्रथम धारा आधिदैविक धारा है जिसमें आनन्द तथा विज्ञान के स्थिति से आगे निकल कर प्राणनामक कला दिखाई देती है।

 

यह प्राणात्मक ऊर्जा ही ऋषि व देवता के सूक्ष्म भावों में प्रकट होती है। यह क्रम सतत् चलते हुये आकाश के गुण वाक् रूप में तथा आकाशादि पांच महाभूतों व उनकी सूक्ष्म तन्मात्रा के रूप परिणत होती है उसे आधिभौतिक धारा कहा गया है। एवं इस आधिभौतिक धारा का बाह्यभ्यन्तर विस्तार

ही आध्यात्मिक धारा कही गयी है।  इस प्रक्रिया के अनुसार असंख्य विराट् पिण्ड उत्पन्न होते हैं जिन्हें प्राणी शरीर कहा गया है। इन शरीर में जो रहता है वह चैतन्य है उसे ईश्वर या जीव कहा गया है। इस प्रकार जितने भी ब्रह्माण्ड अथवा प्राणियों के शरीर रूप उत्पन्न होते हैं उन सबमें अव्यय, अक्षर एवं क्षर की कुल सोलह कलाएँ होती हैं।

 

लोक भेद की दृष्टि से पितर तीन प्रकार के कहे गये हैं पर पितर, मध्यम  पितर, एवं अवर पितर।  इनमें पर पितर ही दिव्य पितर होते हैं। मध्यम पितर को ऋतुपितर भी कहा जाता है एवं अवर पितर ही प्रेत पितर हैं।

 

पुन: इन तीनों की ही मूल प्रकृति में भेद होता है। इसीलिये इन्हें क्रमश: आग्नेयपितर, याम्य पितर एवं सौम्यपितर के नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रधान कारण है कि पितर नामक प्राणात्मक ऊर्जा के तीन सहयोगी देवता हैं— अग्नि, यम तथा सोम।

 

वस्तुत: यहाँ इस सम्पूर्ण आलेख में जिन जिन देवता, पितर व ऋषि शब्दों का उल्लेख है वह एक प्रकार की ऊर्जा है जब सृष्टि की उत्पत्ति होती है तो एक व्यवस्थित क्रम से उसका विकास प्रारम्भ होता है। उस क्रम में कई प्रकार की ऊर्जाओं का अपना अपना योगदान होता है। विभिन्न प्रकार के योगदान रूप क्रिया के आधार पर ही उन्हें ऋषि, देवता, पितर आदि से सम्बोधित किया गया है। परन्तु इनके मूल में भेद नहीं है जैसे एक ही विद्युत् हीटर में भी काम करती है और फ्रिज में काम करती है। उसी प्रकार एक ही परात्पर

विज्ञानानन्द से उत्पन्न ये ऊर्जाएँ विभिन्न रूप धारण करती हैं।

 

इस प्रकार ये जो सृष्टि विकास का क्रम बताया है उसमें सर्वप्रथम ऋषि की उत्पत्ति हुई उन्हीं प्राणात्मक ऊर्जा स्वरूप ऋषियों से ही आगे का विकास क्रम प्रारम्भ हुआ है। ऋषियों की उत्पत्ति को लेकर शतपथ ब्राह्मण में कहा है—

 

असद्वा इदमग्र असीत् तदाहु: किं तदसदासीदिति ऋषयो वा तेऽग्रेऽसदासीत्। तदाहु: के ते ऋषय: इति। प्राण वा ऋषय:। अर्थात् उत्पन्न होने से पहले यह जगत् अव्यक्त था। ये ऋषि ही अव्यक्त भाव से सृष्टि की उत्त्ति्पू से पूर्व भी विद्यमान थे। ये ऋषि कौन थे? प्राण ही ऋषि थे।

 

जब सृष्टि का स्वरूप ही नहीं था। तो हम किसका वर्णन करें इसलिये उस अवस्था का अव्यक्तावस्था कहा है। और हमारी वर्तमान की अवस्था व्यक्तावस्था है। इस प्रकार सर्व प्रथम प्राणात्मक ऋषियों द्वारा ही सृष्टि में अन्य प्राणात्मक ऊर्जाएँ उत्पन्न हुईं। मनु महाराज कहते हैं—

 

ऋषिभ्य: पितरो जाता: पितृभ्यो देवमानवा:।

 

देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वश:।। (मनस्मृति 3.201)

 

कहते है कि ऋषियों से पितर उत्पन्न हुये, पितरों से देव तथा मानव हुये। देवों से चराचर सम्पूर्ण जगत् अव्यक्त से व्यक्त होने के आनुपूर्वी क्रम से प्रकट हुआ।

 

हमारा शरीर इन ऋषिप्राण, पितरप्राण एवं देवप्राण रूपी विभिन्न प्रकार की ऊजाओं का मिलाजुला एक पिण्ड है। तथा मरीचि आदि जो सप्तर्षि हैं वे हमारे भीतर विद्यमान हैं। तथा विभिन्न् गुणों को धारण किये हुये हैं। जैसे प्रकाशन,विकसन, संघटन, प्रसरण, उत्क्षेपण संयोजनादि। इन सभी गुणों के ही कारण हमारे शरीर में विभिन्न क्रियाकलाप सम्पादित होते हैं। उन्हें इन ऋषियों के रूप में जो ऊर्जा हमारे शरीर में है वही पूर्ण करती है।

 

इन ऋषि आदि प्राणों से हमारा शरीर बना है। इन शरीर के निर्माण करने वाले सबसे पहले व आधारभूत तत्त्वों को सहांसि कहा जाता है। इस प्रकार देवादि विभिन्न ऊर्जाओं का संक्षिप्त वर्णन करके हम पितृ तत्व प्रकाश डालते हैं । लोक में पितरों के विभाजन पर कई प्रकार से विवरण होता है उसमें एक विभाजन तीन प्रकार से कहा है । जो पूर्व में वर्णित है । इस सम्पूर्ण जगत् में दो प्रधान भाव हैं अग्नि व सोम यानि उष्णता व ठण्डक । इसमें अग्नि का कार्य है प्रसार करना एवं सोम का कार्य है सिकोड़ना। प्रसरण व संकुचन इन दो  अवस्थाओं से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सतत् गतिशील है। जब पूर्व में कहा है कि सर्वप्रथम ऋषिप्राण उत्पन्न हुआ एवं उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत् में विस्तार सम्भव हुआ तो ये अग्नि व सोम भी ऋषि का ही स्वरूप हैं तो अंगिरस नामक ऋषि प्राणात्मक ऊर्जा अग्नि है एवं भृगु नामक ऋषि प्राणात्मक ऊर्जा ही सोम है। यानि जहाँ ऊष्णता है वहाँ अंगिरस ऋषि विद्यमान हैं तथा जहाँ ठण्डक है वहाँ भृगुऋषि प्राण विद्यमान है। अग्नि जब जल के साथ संहत होता है तो पृथ्वी का निर्माण होता है। इसके लिये प्रशांत महासागर के निकट ज्वालामुखियों से निकलते हुये लावे का समुद्र में गिरना एवं उनसे नये नये द्वीपों की रचना वैदिक विज्ञान के अग्निसोमाभ्यां जगत् को प्रत्यक्ष एवं आदर्श उदाहरण है। इसी प्रकार जब वायु  वायु  के साथ संहत होता है तो अंतरिक्ष बनता है। संहत होने का तात्पर्य है दो तत्त्वों का ऐसा मिलन का बनने वाले नये तत्व में पूर्व के तत्वों का स्वरूप दृष्टिगोचर ही नहीं हों।

 

अंगिरा अग्नि तेजरूप है भृगु सोम उसका स्वभाव स्नेह है यानि रसात्मक तो जो तृतीय पदार्थ न तेज रूप है न स्नेह रूप वह यम है। यह यम जो कि अग्नि व सोम की मध्यवस्था है और इन दोनों के मध्य नियमन करता है। इन तीनों अंगिरा,भृगु व यम का स्वरूप पित्रात्मक है। भृगु पर पितर है, यम मध्यम पितृ है तथा यम प्रेत पितृ अवर नाम से जाने जाते हैं। इनमें ये दोनों सोम और अग्नि  सम्पूर्ण भुवन में व्याप्त है। हम इन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखते है। अंगिरसात्मक प्राणात्मक ऋषि के स्वरूप है—सूर्य, विद्युत्, एवं भौतिक अग्नि तथा भृगु तरल जल, एवं घनीभूत हिम (बर्फ) ये इन अंगिरा व भृगु ऋषि रूप प्राणात्मक ऊर्जा का स्थूल स्वरूप है जो हमें दिखाई देता है। किन्तु इससे भिन्न जो इनको सूक्ष्म रूप है वह हमें दिखाई नहीं देता।

 

जो आग्नेय प्राण हैं वे देव कहलाते हैं व जो सौम्य प्राण है वे ही पितर कहे गये हैं। और इन दोनों  देव प्राणों व पितर प्राणों के मिलने से ही सृष्टि में दिखाई देने वाली प्रत्येक वस्तु (पिण्ड) का निर्माण होता है। अब देवताओं की भी जीवों की उत्पत्ति में भागीदारी होने ऊपर उन्हें भी  पितर कहा गया है। प्राणीमात्र के शरीरों में आरम्भक तत्त्व है सोम तत्त्व अत: सौम्य प्राण के सर्वत्र व्यापक सूक्ष्म अंशों का पितर कहा जाता है। यहाँ हम पुन: प्रारम्भिक क्रम को समझा दे कि ब्रह्मरूप ऋषिप्राणों से एवं देव रूप देव प्राणों से तथा पितृ—प्राणों से बने शरीर में यह जीव जन्म ग्रहण करता है।

 

प्रकृति निर्धारित भारतीय संवत्सर विज्ञान के अनुसार प्रत्येक संवत्सर में छ:  मास तक सूर्य विषुवद् वृत्त के उत्तर की ओर रहता है। तथा शेष छ: मास सूर्य विषुवत् रेखा के दक्षिण की ओर होता है।

 

पृथ्वी पर हम सूर्य की दो प्रकार की गतियाँ देखते हैं एक पूर्व से पश्चिम की ओर तथा दूसरी उत्तरायन से दक्षिणायन व दक्षिणायन से उत्तरायन होना। सूर्य की इन गतियों का ऋतुओं के उत्पत्ति एवं नियमित परिवर्तन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पूर्व में अग्नि व सोम के परस्पर आदान प्रदान द्वारा सृष्टिक्रम के सतत् चलने का उल्लेख किया है।

 

पुन: इसकेा संक्षेप में समझा जाय तो अग्नि व सोम दो प्राणात्मक अवस्थाएँ परस्पर बंधी हुई हैं जब सोम अग्नि में लगातार आहुत होता रहता है तो उससे अग्नि की वृद्धि होती है। और पूरे सोम को मानो समाप्त ही कर देता है। तब सोम की आहुति बन्द होने से धीरे धीरे अग्नि का प्रभाव कम होने लगता है तो जो अग्नि है वह अपने केन्द्र की ओर सिकुड़ने लगती है एवं परिधि की ओर सोम का जमाव पुन: प्रारम्भ होने लगता है। । इस प्रकार बढ़ते बढ़ते सोम का विस्तार अग्नि के केन्द्र तक हो जाता है। वहाँ ताप को प्राप्त कर पुन: सोम की आहुति अग्नि में होने लगती है। एवं पुन: अग्नि का स्वरूप प्रज्वलित होने लगता है। इस प्रकार ये एक प्रकार का चक्र है जो नित्य चलता रहता है।

 

इस प्रकार सोमतत्व अग्नितत्व को समाप्त करने लगती है। अर्थात् अत्यधिक सोमाहुति से समाप्त प्राय: सोम के कारण अग्नि का विस्तार संकुचन में परिवर्तित होने लगता है वहाँ से शरद् ऋतु का प्रारम्भ होता है। इस ऋतु के प्रारम्भ में पितृपक्ष माना जाता है। तथा पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध भोजनादि किया कराया जाता है।

 

जिस प्रकार मानवीय दिवस में प्रात: मध्याह्न एवं सांय तीन संवन यानि कि विभाजन होते है। उसी प्रकार प्रत्येक ऋतु के भी तीन काल होते हैं प्रात:, मध्याह्न एवं सांय। जैसा कि पूर्व में कहा है कि सोमतत्व की आहुति से अग्नि प्रबल से प्रबलतर होने लगती है। वह अवस्था ग्रीष्म ऋतु की होती है, एवं एक समय के उपरान्त सोम की प्रबलता बढ़ने लगती है। इसे प्रकृति द्वारा किया जाने वाला यम होम कहा है— वसन्तोस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म: शरद्हवि:।। (ऋग्वेद10.90.14 )

 

इससे ऋतु भेद अनुभव में आते हैं

 

देवपितृ  तथा ऋतुपितृ मनुष्य शरीर के प्रारम्भिक घटक हैं। हमारे भौतिक रूप से दिखाई देने वाले शरीर में जीव नाम से जानी जाने वाली आत्मा और कूटस्थ अविकारी क्षेत्रज्ञ परमात्मा दोनो अद्वैत भाव से विद्यमान है किन्तु जब तक जीव संज्ञक आत्मा स्वयं को परमात्मा से भिन्न मानता है तब तक वह अभिन्न अस्तित्व बनाये रखता है।

 

परमात्मा में अभेद भाव होने पर भी जब तक आत्मा में स्वयं कर्तृत्व का भाव तब तक वह एक ही तत्व दो रूपों में विद्यमान है। इसमें जो परमात्मा है वह कहीं गति नहीं करता क्येां कि वह तो नित्य सर्वत्र है ऐसे में जब आत्मा स्वयं को अलग मानता है वह शरीर त्याग करने के बाद देह त्याग करता है वह ही गति करता है इसे ही प्रेत कहते हैं।

 

स्थूल शरीर छूट जाने पर व्यक्ति स्वयं को स्वप्नावस्था के समान एक अवस्था विशेषज्ञ में पाता है, तथा नया शरीर ग्रहण करने तक उसे गन्धर्व कहा जाता है। जिस ऋतु में मृत्यु होती है, उस ऋतु के प्राणों के सहारे वह सूक्ष्म अतिवाहिक शरीर से ऊपर की ओर यात्रा करता हुआ तेरह नक्षत्र मास के पश्चात् चन्द्रता को प्राप्त होता है—

ये वैके चास्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति इतो लोकात् प्रयन्तीति प्रेता उच्यन्ते। कौषीतकी उपनिषद् 1.2

शरीर त्याग के समय चन्द्र की स्थिति के अनुसार पृथ्वी के वायुमंडल से ऊर्ध्व की ओर जाते जाते चन्द्रमा को प्राप्त करने में इनको तेरह चन्द्रमास लगते हैं

 

व्यक्ति के पिता से प्रारम्भ कर दादा, परदादा, वृद्धदादा आदि सात पीढियों तक सपिण्ड कहे जाते हैं  ये मनुष्य पितृ गन्धर्व शरीर होते हैं। इनमें से जो अग्निलोक तक ही जा पाये हैं, उनको पृथ्वी से संबन्धित  आसक्ति रहने के कारण दु:ख का अनुभव होता है, इस कारण इन्हें अश्रुमुखा: कहते है। तथा जो इससे ऊर्ध्व  की ओर स्थित देवलोक में पहुँचने में समर्थ हो गये हैं, वे देवों के सहचारी होकर आनन्द में रहते हैं अत: इन्हें नान्दीमुखा: कहा जाता है। पुन: अपने पिता से लेकर सात पितरों तक सपिण्ड चौदह पूर्वजो तक सोदक एवं इक्कीस पूर्वजों तक सगोत्र कहे जाते हैं। मृत्यु के अनन्तर जिस स्थिति का अनुभव व्यक्ति को होता है, उसे कठोपनिषद् में साम्पराय कहा गया है।

 

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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