वैदिक शब्दों का क्षेत्रीय स्वरूप

अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)-

१. शब्द और संस्था- (क) वेद संस्था-ब्रह्मा ने आरम्भ में कर्मों के अनुसार सब के नाम दिये तथा वेद-शब्दों के आधार पर अलग-अलग संस्थायें बनाईं-
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे॥ (मनुस्मृति १/२१)
नाम-कर्म के आधार पर शब्दों के ४ स्रोत हैं-नाम, आख्यात (परिभाषा), उपसर्ग, निपात (प्रचलन)-
इतीमानि चत्वारि पदजातान्यनुक्रान्तानि। नामाख्याते चोपसर्ग-निपाताश्च (निरुक्त १/१२)
संस्थायें सात हैं जिन्हें आज की भाषा में इस प्रकार लिखा जा सकता है-(१) आध्यात्मिक, (२) आधिदैविक। ये दोनों (३) आधिभौतिक विश्व तथा शब्दों के प्रतिरूप हैं। आधिभौतिक के भेद हैं-(३) लिपि, (४) भाषा, (५) विज्ञान का विषय, (६) भौगोलिक स्थिति, तथा (७) व्यवसाय।
यास्सप्त संस्था या एवैतास्सप्त होत्राः प्राचीर्वषट् कुर्वन्ति ता एव ताः। (जैमिनीय ब्राह्मण उपनिषद् १/२१/४)
छन्दांसि वाऽअस्य सप्त धाम प्रियाणि । सप्त योनीरिति चितिरेतदाह । (शतपथ ब्राह्मण ९/२/३/४४, यजु १७/७९)
अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च (तत्त्व समास ७)
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्म उच्यते। भूतभावोद्भव करो विसर्गः कर्म संज्ञितः॥३॥ (गीता, अध्याय, ८)
(ख) लिपि संस्था-लिपि को दर्श-वाक् कहा गया है। वाक् के ३ रूप गुहा (मस्तिष्क) में अव्यक्त हैं-इनके ३ चरण होने से यह गो (ग तृतीय व्यञ्जन) है। इसमें पूर्ण विचार होने से यह गौरी वाक् है। बाहर लेखन या शब्द रूप में व्यक्त होने पर अपने अज्ञान या भाषा की सीमा के कारण कुछ भाग लुप्त हो जाता है, अतः इसे तम कहते हैं। गो और तम का सम्बन्ध दिखाने वाला शास्त्र गौतम का न्याय दर्शन है। इसका न्यायालय में अधिक प्रयोग होता है जहां गो को तम और तम को गो (सफेद को काला, काला को सफेद) करते हैं। विश्व को समग्र देखने के ६ प्रकार हैं, जिनको ६ दर्शन कहते हैं। ६ दर्शन के अनुरूप ६ दर्श वाक् (लिपि) हैं। प्रत्येक दर्शन में जितने तत्त्व हैं, उसके अनुरूप लिपि में उतने ही अक्षर होंगें। विश्व की व्याख्या ५ से १० आयामों में हो सकती है। कम से कम ५ आयाम यान्त्रिक विश्व की व्याख्या के लिये जरूरी हैं क्योंकि भौतिक विज्ञान में माप की मूल ५ इकाइयां हैं। बाकी ५ आयाम चेतना के ५ स्तर हैं। अतः ५ लिपियां इस प्रकार हैं-
(१) ५ आयाम- सांख्य के ५ x ५ = २५ तत्त्व। २५ अक्षरों की रोमन लिपि, एक्स (x = extra) अतिरिक्त अक्षर। अवकहड़ा चक्र (ज्योतिष में राशि नाम) में भी ५ स्वर और २० व्यञ्जन वर्ण हैं। इसका प्रयोग वर्ष गणना में भी है।
(२) ६ आयाम-शैव दर्शन के ६ x ६ =३६ तत्त्व। ३६ अक्षरों की हिब्रू, लैटिन, रूसी लिपि। अवकहडा के अतिरिक्त अक्षर, गुरुमुखी (३५ अक्षर + ॐ), तमिल (ब्राह्मी का संक्षिप्त रूप)।
(३) ७ आयाम- ७ x ७ = ४९ मरुत्। इन्द्र और शब्द आचार्य मरुत् द्वारा ७ x ७ = ४९ अक्षर की देवनागरी लिपि। पूर्व भाग के लोकपाल इन्द्र से उत्तर पश्चिम के लोकपाल मरुत् के क्षेत्रों में प्रचलित (असम से पाकिस्तान तक)।
(४) ८ आयाम-८ x ८ = ६४ कला, ६४ (या ६३ अक्षर की ब्राह्मी लिपि)-इसमें देवनागरी के अतिरिक्त प्लुत स्वर तथा अयोगवाह (किसी वर्ग में नहीं) अक्षर हैं। इस परम्परा में तेलुगू तथा कन्नड़ हैं।
(५) ९ आयाम-इसके अनुरूप (८+९)२ = २८९ अक्षर तथा चिह्न हैं जो वेद के वैज्ञानिक विषयों के लिये आवश्यक हैं। इसमें ३६ x ३ = १०८ स्वर, ३६ x ५ = १८० व्यञ्जन तथा एक अविभाज्य ॐ हैं।
(१०) साहस्री वाक्- यह व्योम (त्रिविष्टप् = तिब्बत) से परे है। चीन तथा जापान में लिपि सहस्राक्षरा है। भारत में इसका प्रयोग साधना आदि के लिये है।
गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षति एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्॥
(ऋक् १/१६४/४१, अथर्व ९/१०/२१, १३/१/४१, तैत्तिरीय ब्राह्मण २/४/६/११) = गौरी वाक् अविभाजित सलिल है जो वाक् के तरंगों से खण्डित होती है। इन खण्डों की माप (मिमाय = माप कर) १, २, ४, ९ और १००० भागों में है।
(ग) लोकपाल संस्था-लोकपाल संस्था-भारत के केन्द्रीय भाग से ८ दिशाओं के स्वामी ८ दिक्पाल कहे गये हैं-
इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत्। कुबेर ईशः पतयः पूर्वादीनां दिशाः क्रमात्॥ (अमरकोष,१/३/२)
= पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी क्रमशः हैं-पूर्व-इन्द्र, पूर्व दक्षिण-अग्नि, दक्षिण-यम, दक्षिण पश्चिम-निर्ऋति, पश्चिम-वरुण, पश्चिम उत्तर-मरुत्, उत्तर-कुबेर, उत्तर पूर्व-ईश (शिव) ।
(घ) अर्थ वृद्धि-भौतिक शब्दों के अर्थ के आधिदैविक (आकाश में), आध्यात्मिक (शरीर के भीतर) तथा विज्जान के लिये अर्थ विस्तार को वृद्धि कहा गया है-
अहं भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयौ मतौ।ज्ञान वैराग्यनामानौ कालयोगेन जर्जरौ॥४५॥
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता। क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥४८॥
तत्र घोर कलेर्योगात् पाखण्डैः खण्डिताङ्गका। दुर्बलाहं चिरं जाता पुत्राभ्यां सह मन्दताम्॥४९॥
वृन्दावनं पुनः प्राप्य नवीनेव सुरूपिणी। जाताहं युवती सम्यक् श्रेष्ठरूपा तु साम्प्रतम्॥५०॥
(पद्म पुराण, उत्तर खण्ड- श्रीमद् भागवत माहात्म्य, भक्ति-नारद समागम नाम प्रथमोऽध्यायः)
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा श्रुति आदि ५ प्रकार से वेद ज्ञान मिलता है, अतः वेद को श्रुति कहते हैं। श्रुति का ग्रहण कर्ण से होता है, अतः जहां इसकी वृद्धि हुयी वह कर्णाटक है। आज भी वहीं वेद अध्ययन सबसे अधिक हो रहा है। जहां तक फैला वह महाराष्ट्र (महर् = महल, परिवेश)। अप् से आकाश में सृष्टि हुयी, अतः वेद सृष्टि जहां हुयी वह द्रविड़ (द्रव = जल) है। दक्षिण में उत्पत्ति और प्रसार हुआ। बाद में भगवान् कृष्ण के अवतार के समय उत्तर भारत में प्रचार हुआ। प्रथम परम्परा २९१०० ई.पू. में स्वायम्भुव मनु या ब्रह्मा से शुरु हुयी, इसे ब्रह्म सम्प्रदाय कहते हैं। द्वितीय परम्परा १३९०० ई.पू. में वैवस्वत मनु से शुरु हुयी, यह आदित्य सम्प्रदाय है। ज्योतिष में इन मतों को पितामह और सूर्य सिद्धान्त कहते हैं।
२. भोजपुरी के विशिष्ट शब्द-
(क) हिरण्यगर्भ और काशी-आकाश में हिरण्यगर्भ (तेज पुञ्ज) से सृष्टि आरम्भ हुई। पहले ५ महाभूत हुये, उनसे जीवन का विकास हुआ। इसका प्रतीक रूप में कलश रखा जाता है जिसमें ५ महाभूत (क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर) हैं तथा जीवन आरम्भ रूप में आम का पल्लव रखते हैं। हिरण्य का अर्थ सोना भी है, उसके प्रतीक रूप में सोने के बदले ताम्बे का पैसा डालते हैं, जब यह मन्त्र पढ़ा जाता है-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋक् १०/१२१/१, वाजसनेयी यजुर्वेद १३/४, २३/१, अथर्व ४/२/७)
पृथ्वी पर सभ्यता का केन्द्र भारत था, तथा देवासुर संग्राम काल में भारत की राजधानी काशी थी (दिवोदास के समय)। काशृ दीप्तौ-पाणिनीय धातुपाठ १/४३०, ४/५१)-अतः हिरण्य = तेज के स्वरूप इस नगर का नाम काशी हुआ। परिधि से जो बाहर निकला, वह प्रकाश है। इसकी पूर्वी सीमा पर जो नदी है, वह हिरण्यबाहु (शोण = सोन) है। यहां समवर्तत पहले हुआ, अतः वर्तते (बाटे) का प्रयोग यहीं होता है। बाकी भारत में अस्ति का प्रयोग होता है। काशी से पश्चिम में-अस्ति से आहे, है हुआ। पूर्व में अछि हुआ। अंग्रेजी में अस्ति से इस्त = इज (Though ist, He is) हुआ। महाभूतों के स्वामी भूतनाथ का केन्द्रीय आम्नाय भी काशी ही है।
(ख) भोजपुरी-वैदिक राज्य सिद्धान्त में ७ तत्त्व थे-भूमि, प्रजा, राजा, मन्त्री (शासन)। इन ४ आधुनिक तत्त्वों के अतिरिक्त ३ तत्त्व थे-कोष, दुर्ग, पुरोहित (शासन के नियम)। राजा का अर्थ सम्प्रभुता है, जिसे आधुनिक सिद्धान्तों में पूर्ण मानते हैं। वेद में इसके ८ स्तर मानते हैं (ऐतरेय ब्राह्मण, ३७/२), जिनमें अपने क्षेत्र के पालन करने वाले को भोज कहते हैं। ८ स्तर हैं-राजा-भोज, महाभोज, सम्राट् – चक्रवर्त्ती, सार्वभौम, स्वराट्-इन्द्र, महेन्द्र, विराट्-ब्रह्मा, विष्णु। राजकीय केन्द्र काशी के राजा जैसे दिवोदास भोज थे, और इस क्षेत्र की भाषा भोजपुरी है। नक्शा बनाने के लिये भारत का केन्द्र उज्जैन था जहा का देशान्तर पूरे विश्व के लिये शून्य अंश मानते थे। अतः यहां के परमार राजाओं विक्रमादित्य से मिहिरभोज तक (८२ ई.पू. से ११९२ ई.) सभी को भोज ही कहते थे। रघुवंश के सर्ग (५, ७) में विदर्भ राजकुमारी इन्दुमती को हमेशा भोजवंशी ही कहा गया है-भोजेन दूतो रघवे विसृष्टः (५/३९) विदर्भाधिपराजधानीम् (५/४०), सौराज्य रम्यानपरो विदर्भान् (५/६०), स्वयंवरं साधुममंस्त भोज्या (७/१३), तत्रार्चितो भोजपतेः पुरोधा (७/२०), तमुद्वहन्तं पथि भोजकन्यां (७/३५)। विदर्भ क्षेत्र के यदुवंशी भी भोज कहे जाते थे, यहां की राजकुमारी रुक्मिणी से भगवान् कृष्ण का विवाह होने पर उसके भाई रुक्मी ने युद्ध किया और पराजित होने पर भोजकट नगर बसा कर उसमें रहने लगा। अन्धक (आन्ध्र), भोज (विदर्भ), सात्वत (गुजरात, राजस्थान) कुक्कुर (पश्चिमोत्तर सीमा, खोखर), वृष्णि (उत्तर प्रदेश) के ५ गणों का राजा होने के कारण मथुरा के राजा कंस को भी भोजराज कहा गया है। भागवत पुराण, स्कन्ध १०, अध्याय १-
श्लाघ्नीय गुणः शूरैर्भवान्भोजयशस्करः॥३७॥ उग्रसेनं च पितरं यदु-भोजान्धकाधिपम्॥६९॥
स्कन्ध ११, अध्याय ३०-दाशार्ह-वृष्ण्य-न्धक-भोज-सात्वता मध्वर्बुदा-माथु-रशूरसेनाः॥
विसर्जनाः कुकुराः कुन्तयश्च मिथस्ततस्तेऽश्चविसृज्यसौ हृदम्॥१८॥
भागवत पुराण, स्कन्ध १०-वैदर्भीं भीष्मकसुतां श्रियो मात्रां स्वयंवरे (५२/१६)
राजासीद्भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्। तस्य पन्चाभवन्पुत्राः कन्यैका च वरानना॥ (५२/२१)
रुक्म्यग्रजो रुक्मरथो रुक्मबाहुरनन्तरः। रुक्मकेशो रुक्ममाली रुक्मिण्येषा स्वसा सती॥ (५२/२२)
स्मरन्विरूपकरणं वितथात्ममनोरथः। चक्रे भोजकटं नाम निवासाय महत्पुरम्॥५४/५१)
प्रथम भोज क्षेत्र काशी क्षेत्र की ही भाषा को भोजपुरी कहते हैं। यहां के राजा दिवोदास और उसके पुत्र सुदास थे-
इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः। विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्रतिरन्तआयुः॥ (ऋक्, ३/५३/७) = ये भोज कई प्रकार का उत्पादन (विरूपा आंगिरस) करते हैं, ये देवपुत्र (दिवोदास) असुरों को जीतने वाले हैं। इन्होंने विश्वामित्र के हजारों यज्ञों के लिये प्रचुर सम्पत्ति दी।
महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः। विश्वामित्रो यदवहत्सुदासमपियायत कुशिकेभिरिन्द्रः॥९॥
= महान् देवजूत (देव काम में जुता हुआ, दिवोदास) तथा उनके सहायक विश्वामित्र ने सिन्धु तथा अर्णव तक लोगों को गठित किया तथा काशिराज सुदास के यज्ञ में गये। कौशिकों के कार्य से इन्द्र प्रसन्न हुए।
नभो जामम्रुर्नन्यर्थमीयुर्नरिष्यन्ति न व्यथन्ते ह भोजाः। इदं यद्विश्वं भुवनं स्वश्चैतत्सर्वं दक्षिणैभ्योददाति॥ (ऋक् १०/१०७/८)
= भोज न मरते हैं, न दरिद्र होते हैं। न रुसते हैं, न दुखी होते हैं। वे पूरे विश्व को दक्षिणा तथा सुख देते हैं।
भोजाजिग्युः सुरभिं योनिमग्रे भोजा जिग्युर्वध्वंया सुवासाः। भोजाजिग्युरन्तः पेयं सुराया भोजाजिग्युर्ये अहूताः प्रयन्ति॥९॥
= भोज ही पहले दूध घी देने वाली सुरभि पाते हैं, सुन्दर वस्त्रों वाली वधू पाते हैं। वे सुरा तथा पेय पाते हैं। जो बिना कारण आक्रमण करते हैं, उनको जीत लेते हैं।
भोजायाश्वं संमृजन्त्याशुं भोजायास्तेकन्या शुम्भमाना।भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म परिष्कृतं देवमानेव चित्रम्॥१०॥
= भोज तेज गति वाले घोड़े उत्पन्न करते हैं, उनकी कन्यायें सुशोभित रहती हैं। भोजों का निवास पुष्करिणी के समान निर्मल तथा देव-मानजैसा सज्जित होता है।
भोजमश्वाः सुष्ठु-वाहो वहन्ति सुवृद्रथो वर्तते दक्षिणायाः। भोजं देवासो ऽवता भरेषु भोजः शत्रून्त्समनीकेषु जेता॥११॥ = भोजों के अश्व सवारी के लिये उत्तम हैं। उनका रथ युद्ध के लिये उत्तम है। भोज भरण से तथा युद्ध जीत कर देवों की रक्षा करते हैं।
यही काशी क्षेत्र भोज की पुष्करिणी थी तथा यहां वर्तते का प्रयोग था। यहां खाने-पीने तथा सभी वस्तुओं की सुविधा थी। यह ज्ञान तथा शक्ति का केन्द्र था तथा देवों की रक्षा करता था।
महादेव के वृषभ से यज्ञ होता है। उस के अन्न से जो क्षेत्र पूर्ण हो, उसे भोजपुरी कहते हैं-
देवानां माने (निर्माणे) प्रथमा अतिष्ठन्कृन्तत्रा (अन्तरिक्ष, विकर्तन = मेघ) देषामुत्तराउदायन्।
त्रयस्तपन्ति (त्रिशूल) पृथिवीमनूपा (निर्जलपृथिवी) द्वा (वायु + आदित्य) वृवूकं वहतः पुरीषम् (जल, अन्न से पूर्ण)। (ऋग्वेद १०/२७/३०) = यह वाराणसी (त्रिशूल पर स्थित) देवों की प्रथम पुरी है जहां वर्षा, जल, अन्न भरा है। पुरी का अर्थ है जल, अन्न से भरा (निरुक्त २/२२)
(ग) भोजपुरी के अन्य वैदिक शब्द-(१) अघाइल-भोजन से अति तृप्त-रामकथा जे सुनत अघाहीं। रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं। (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड ५२/१)
केवलाघो भवति केवलादी। (ऋग्वेद १०/११७/६) = केवल खाने वाला केवल अघाता है।
अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात्। (मनु स्मृति ३/११८) = जो केवल अपने लिये भोग करता है वह केवल अघ का ही भोग करता है।
(२) बहोर-बहुल (अधिक) कृष्ण पक्ष की बहुला तिथि में चन्द्र सूर्य के निकट लौटने लगता है। अतः बहोर का अर्थ है वापस लौटना। उठि बहोरि कीन्हेसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभञ्जन जाया। (रामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड) गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥ (बालकाण्ड १२/४)
(३) जनि-जनि प्रादुर्भावे। जननी = माता स्त्रीलिंग है। मा = माता या निषेध (नहीं)। इसी प्रकार जनी का अर्थ स्त्री और निषेध दोनों अर्थ में भोजपुरी में हैं-अब जनि कोउ भाखै भट मानी। वीर विहीन मही मैं जानी॥ (बालकाण्ड) इसका अन्य अर्थ मा के समान निषेध भी है- यमो ह जातो यमो जनित्वं, जारः कनीनां पतिर्जनीनाम्। (ऋक् १/६६/४) यहां यम का अर्थ है बान्धना या मना करना। उसके साथ जनि का अर्थ भी मना करना है। पति के साथ जनी का अर्थ स्त्री है।
(४) अनस-संकुचित स्थान या गाड़ी में बहुत समय तक बैठने पर उद्वेग या कष्ट। रथ और अनस-दोनों का अर्थ यास्क ने रथ ही किया है। पर दोनों का एक ही अर्थ था तो दोनों शब्दों के प्रयोग की जरूरत नहीं थी। आ तेकारो शृणवामावचांसि यायाथ दूरादनसारथेन (ऋग्वेद, ३/३३/१०)
(५) बैखरा-अधिक बोलना, वाक् का चतुर्थ पद वैखरी है जो मुंह से बाहर निकलता है।
(६) हाही, हाबुर-अधिक भूख = हाही। भोजन के लिये बेचैन-हाबुर। अन्न को देख कर आश्चर्य के लिये वेद में हावु का प्रयोग है। अंग्रेजी में भी हाउ (how) का अर्थ आश्चर्य है-हा३वु हा३वु हा३वु। अहमन्नम् अहमन्नम् अहमन्नम्। अहमन्नादो३ ऽहमन्नादो३ ऽहमन्नादः॥ (तैत्तिरीय उपनिषद्, ३/१०)
(७) लील-निगलना-निगलने वाली ७ जिह्वा। मन की प्रवृत्ति भी अग्नि की जिह्वा हैं। निकलने तथा निगलने को मिला कर १४ (मनवः) जिद्वा हैं-काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता सा च सुधूम्रवर्णा।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः॥ (मुण्डकोपनिषद् १/२/४)
अग्नि-जिह्वा मनवः (मनु = १४)-(ऋक् १/८९/७)-शान्ति-पाठ
(८) उधिया, ऊफर-यह किसी को मरने का शाप देने के लिये कहते हैं। श्राद्ध में जब प्रेत के लिये पिण्ड दिया जाता है तब अन्य प्रेतों से अनुरोध किया जाता है कि नीचे (भूमि) के पितर दूर हट जायें (उदीरतां = उधिया) तथा हवा के पितर और ऊपर चले जायें (उत्परासः = ऊफर)-
उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पिताः सोम्यासः। असुं य ईयुरवृकः ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥ (ऋक् १०/१५/१)
(९) अझुरा, सझुरा-क्लिष्ट-सरल। जब धागा उलझ जाता है, उसका छोर नहीं मिलता, उसे अझुरा कहते हैं। जब व्यवस्थित होता है, वह सझुरा है।
सृण्येव जर्भरी तुर्फरी तूनैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका। उदन्य जेव जेमना मदेरू तामेजराय्वजरं मरायु॥६॥
पज्रेव चर्चरं जारं मरायु क्षद्मेवार्थेषु तर्तरीथ उग्रा। ऋभूनापत् खरमज्रा। खरज्रुर्वायुर्न पर्फरत् क्षयद्रयीणाम्॥७॥
घर्मेव मधु जठरे सनेरू भगेविता तुर्फरी फारिवारम्। पतरेव चर्चरा
चन्द्र-निर्णिक् मन ऋङ्गा मनन्यान जग्मी॥८॥ (ऋक् १०/१०६)
यहां कई शब्दों के अर्थ अभी तक स्पष्ट नहीं हैं, क्योंकि इनका लौकिक संस्कृत में कहीं प्रयोग नहीं है। सृण्या इव = जंजीर द्वारा जैसे, जर्भरी = हाथी (फारसी में जबर् = शक्तिशाली) बान्धा जाता है, उसी प्रकार तुर्फरी (शत्रु, तोड़-फोड़ करने वाला) या पर्फरी (ओठ में फेफरी, कई जगह फटा हुआ) नियन्त्रित होता है। उदन्यजा का अर्थ उदक् = जल में उत्पन्न किया जाता है, यह जल के अतिरिक्त अन्य से उत्पन्न होना चाहिये। उसके समान जेमना = जय + मना = जय चाहने वाला, मदेरू = मद-मस्त, बलवान् हों। जरायु (जन्म का स्रोत) से मरायु (मरण के बाद की गति) तक अजर (क्षय रहित) हों। पज्रा = पंजरा (भोजपुरी में निकट), पंजा के पकड़ में। चर्चरं = चचड़ा, नदी या नाले को पार करने वाला बांस आदि का पुल। जारं = जरायु के साथ। मरायु = मरण के बाद का सूत्र। क्षद्म इव = दम-खम जैसा, चर्चरी जैसा प्रभावी। तर्तरीथ = तर्तर = जल्दी जल्दी, बंगला में ताड़ा-ताड़ी। ऋभू = अधिक भूख। नापत् = नहीं हो। खरमज्रा = तेजी से सझुराये या समाधान हो। खरज्रुर्वायुर्न पर्फरत् = खराई (भूखप्यास) तथा हवा से फेफरी नहीं पड़े। घर्म इव = घाम जैसा, सूर्य किरण के शोषण से उत्पन्न ताप। मधु जठरे सनेरू = उसी प्रकार जठर में मधु शक्ति दे। भगे = धन, अविता = रक्षक। तुर्फरी फारिवारम् = तोड़-फोड़वाले को फाड़ दे। पतरेव चचरा चन्द्र-निर्णिक् = पतरा (कागज का पृष्ठ, पंचांग) जैसा चचरा (लकड़ी का पुल) होता है, उसी से चन्द्र (तिथि) का निर्णय होता है, या पतरा जैसा समतल पुल चन्द्र जैसा आह्लादक है। मनऋंगा, मनन्या = मनई, मनुष्य।
अधिकांश शब्द भोजपुरी में ही प्रयुक्त हैं। अन्य उदाहरण-
सजूर्नावं स्व यश संसचायोः। (ऋक् १०/१०५/९) = सझुराइल नाव में यश संचता है।
(१०) बुरबक, बोका, भकुआ, भकोल, बकलोल-बोका शब्द वृक का अपभ्रंश है। प्रचलित अर्थ में-वृकः (वृक = पकड़ना + अच्) भेडिया, सियार आदि, जठराग्नि । बोका = सदा खाता रहता है। वेद में इसका नक्षत्र अर्थ में प्रयोग है। वह स्थिर रहता है, उसमें चन्द्रमा गति करता है, जो मन का स्वामी है-चन्द्रमा मनसो जातः (पुरुष सूक्त, ८)। बुद्धि में नक्षत्र जैसी कोई गति नहीं होने से वह मूर्ख है, अतः वृक (बोका) = नक्षत्र या मूर्ख। चन्द्र प्रकाश का या मन की गति का कारण है। वैदिक सूक्त में यास्क ने इसका अर्थ चन्द्रमा किया है, पर यह चन्द्रमा का मार्ग है जो नक्षत्रों का समूह है-
अरुणो मासकृद् वृकः पथायन्त ददर्श हि। (ऋक् १/१०५/१८, निरुक्त ५/२१)
यहां यास्क ने वृक का अर्थ विवृत या विकृत-ज्योतिष्क = कम ज्योति वाला किया है। चन्द्र सूर्य की तुलना में कम ज्योति वाला है, पर रात्रि में वही मुख्य प्रकाशक है, तथा उसे प्रकाशवान् अर्थ में ही चन्द्र कहते हैं तथा यहां अरुण (रोचन या प्रकाश करने वाला) कहा गया है। चन्द्र गति के कारण मास होता है। यह गति नक्षत्र-पथ में होती है।
वृक का ही बड़ा रूप विवृक (बुरबक) है जिसका मूल है-विवृक्ण = विवृक्त = विशेष रूप से बुद्धिहीन-
स्कन्धांसी वकुलिशेन विवृक्णाहिः शयत उपपृक् पृथिव्याः। (ऋक् १/३२/५, मैत्रायणी सं. ४/१२/३, निरुक्त ६/१७) = जैसे कुलिश (वज्र) द्वारा वृक्ष छिन्न-भिन्न हो जाता है। वृक्ष स्वयं जड़ है, वज्र द्वारा वह और भी नष्ट हो जाता है, जैसे बुरबक।
नक्षत्रों का समूह भी मूर्ख का सूचक है, क्योंकि यह जड़ या अपने स्थान पर स्थिर हैं-
तैत्तिरीय ब्राह्मण (२/७/१८/३)-न वा इमानि क्षत्राण्यभूवन् इति। तत्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वम्।
अशिक्षित ज्योतिषी को नक्षत्र-सूची या भ-सूची (भ = नक्षत्र) कहा गया है-बृहत्संहिता (२/३२)-
अविदित्यै वयः शास्त्रं दैवज्ञत्वं प्रपद्यते। स पङ्क्ति-दूषकः पापो ज्ञेयो नक्षत्र-सूचकः॥
(११) भीरी, जवरे-दोनों का अर्थ है साथ या निकट। जैसे ब्रीहि (धान्य< या यव (जौ) के दाने एक साथ रहते हैं। अतः निकट के इलाकों को जवार कहते हैं। विट् (समाज, वैश्य) वै यवः, राष्ट्रं यवः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण३/९/७/२) यवं वृकेणाश्विना वयन्ता। (ऋक् १/११७/२१, निरुक्त ६/२) इमं यवमष्टा योगैः (अथर्व ६/९१/१) इसी प्रकार व्रीहि का अर्थ धान्य तथा निकट (भीरी) दोनों होता है- स (मेधो देवैः) अनुगतो व्रीहिरभवत्। (ऐतरेय ब्राह्मण २/८) देवाः (तं) मेधम् खनन्त इवान्वी पुस्तमन्वविन्दन्ता विमौ व्रीहि-यवौ। (शतपथ ब्राह्मण १/२/३/७) (१२) रवा, अनेरिया-जिस मनुष्य में यज्ञ रूपी वृषभ रव करता है, वह सक्रिय तथा उत्पादन में सक्षम है, अतः सम्मान के लिये काशी में रवा कहते हैं। इसके उलटा जो बेकार है, कुछ नहीं कर सकता वह अन+रवा = अनेरिया है। त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक् ४/५८/३) ३. ओड़िया के वैदिक शब्द-अरब से वियतनाम तक तथा सेतु से हिमाचल तक ९ खण्डों के भारतवर्ष का यह केन्द्र स्थान होने से यहां जगन्नाथ का स्थान है। ओड़िया का उच्चारण संस्कृत के निकटतम है। यहां हर अक्षर पर संस्कृत जैसा समान बल दिया जाता है। पश्चिम में अन्तिम अक्षर हलन्त जैसा कहा जाता है। पूर्व में प्रथम अकार का ओ जैसा उच्चारण होता है, जैसे कलकत्ता का कोलकाता होगया है। थाइलैण्ड के राजा भूमिबल अतुल्यतेज को भूमिबोल ओदुल्यतेज कहते हैं। कम्बोडिया के पूर्व राजा नरोत्तम सिंहानक को नोरोतोम् सिंहानुक कहते थे। उत्तर में ऋ का उच्चारण रु जैसा तथा दक्षिण में रु जैसा होता है। ओड़िया में र जैसे उच्चारण के भी अपभ्रंश हैं-अमृत से हिन्दी में अमरुद, ओड़िया या हिन्दी में अमिय, ऋषि से रस्सी, रूस, गृह से घर आदि उदाहरण हैं। ओड़िशा में पूर्व के लोकपाल इन्द्र, जगन्नाथ, समुद्र तट सम्बन्धी तथा इन्द्र के सेनापति कार्त्तिकेय सम्बन्धी शब्द हैं। (क) कार्त्तिकेय-तैत्तिरीय ब्राह्मण (३/१/४/१-९) में कार्त्तिकेय की माता के ६ नाम हैं जो कृत्तिका नक्षत्र के तारों के भी नाम हैं। इनमें पहले नाम अम्बा को मिला कर ७ होते हैं, पर १ तारा धूमिल होते होते लुप्त हो गया अतः ६ ही तारा हैं। ये नाम अलग अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं, अतः ये सेना के मुख्यालय रूप में शक्ति केन्द्र लगते हैं क्योंकि कार्त्तिकेय देवों के सेनानी थे। ६ माता हैं-१. दुला-ओड़िशा तथा बंगाल, कोणार्क निकट दुला देवी का मन्दिर है। दुलाल = दुला का लाल कार्त्तिकेय। २. वर्षयन्ती-असम, बहुत वर्षा का क्षेत्र। ३. चुपुणीका-पंजाब के चोपड़ा। ४. मेघयन्ती-बिना वर्षा के उतंक मेघ। राजस्थान, गुजरात में मेघानी, मेघवाल उपाधि। ५. अभ्रयन्ती-महाराष्ट्र, आन्ध्र (अभ्यंकर), ६. नितत्नि-तमिलनाडु, कर्नाटक। कार्त्तिकेय काल १५८०० ई.पू. के कई पर्व आज भी प्रचलित हैं। उस युग में ऋतु चक्र ८.५ मास आगे था। १. कार्त्तिकेय पंचांग में ही १९ वर्ष का युग था। प्रति युग में होने वाले जगन्नाथ का नव कलेवर १९ वर्ष में मनाया जाता है। २. कार्त्तिकेय के भौतिक माता-पिता का विवाह ज्येषठ शुक्ल षष्ठी को मनाते हैं। इस समय सबसे अधिक गर्मी होती है पर १५८०० ई.पू. की ऋतु के अनुसार इसे शीतल षष्ठी कहते हैं। ३. क्रौञ्च द्वीप पर विजय के बाद माघ शुक्ल सप्तमी को कोणार्क में रथ यात्रा हुयी थी जब वर्षा ऋतु और वर्ष का आरम्भ होता था। ४. अदिति युग में पुनर्वसु नक्षत्र से पुराना वर्ष समाप्त और नया आरम्भ होता था-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्तिपाठ-ऋग्वेद १/८९/१०, अथर्व ७/६/१, वाजसनेयि सं. २५/२३)। अतः पुनर्वसु नक्षत्र का देवता अदिति है। आज भी जगन्नाथ की रथ यात्रा और बहुला (वापसी) यात्रा में कम से कम एक तभी होता है जब सूर्य पुनर्वसु में हों (प्रायः ४-१९ जुलाई)। (ख) इन्द्र सम्बन्धी शब्द-(१) अलेख-इन्द्र ने देवनागरी लिपि का आरम्भ शब्द के आचार्य मरुत् की सहायता से किया, अतः उनको लेखर्षभ काह्ते हैं (तैत्तिरीय संहिता ६/४/७, मैत्रायणी संहिता ४/५/८, काण्व संहिता २७/२, कपिष्ठल संहिता ४२/३) तथा मार्कण्डेय पुराण का सूर्य-तनु-लेखन अध्याय। इन्द्र का क्षेत्र होने से अलेख नाम ओड़िशा में ही प्रचलित है। १४६४ इसा पूर्व में अशोक के कलिंग युद्ध के समय यहां के राजा का नाम अलेख-सुन्दर लिखा गया है (देहरादून के निकट कलसी का लेख)। (२) बुढ़ाराजा-स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा (वाजसनेयी यजुर्वेद, २५/१९)। इन्द्र की छावनी का स्थान सम्बलपुर में बुढ़ाराजा मन्दिर है। (३) अत्ताबिरा-वीरभोग्या वसुन्धरा के अर्थ में जिनलोगों को जागीर में जमीन दी जाती थी वे अत्ता (भोक्ता) तथा वीर हुये। वे राजा के दाहिने हाथ (मुख्य सहायक) रूप में दक्षिण भाग में रहते थे। आज भी सम्बलपुर के दक्षिण में अत्ताबिरा है तथा ओड़िशा में सभी जागीर भागों को वीर कहते हैं, जैसे वीरमहाराजपुर, वीर रामचन्द्रपुर आदि।अत्ता ह्येतमनु । अत्ता हि वीरः । तस्मा दाह ... दक्षिणार्धे (दक्षिण भागे) सादयति । (शतपथ ब्राह्मण ४/२/१/९)। अन्य भागों में बड़ा भाई ही सम्पत्ति का उत्तराधिकारी होता था, अतः बड़े भाई को वीर कहते हैं। दक्षिण में भोक्ता को अन्नाद कहते हैं, अतः अन्ना = बड़ा भाई। छोटे को कुछ नहीं मिलता, अतः वह तम्बि (स्तम्बिन् = ठूंठ) है। (४) आखण्डल-जो १ खण्ड का नियन्त्रण अक्रे वह खण्डायत तथा सभी खण्डों को मिलाकर स्वामी आखण्डल इन्द्र है। अतः ओड़िशा में क्षत्रिय को खण्डायत काह्ते हैं। सम्बलपुर के बुढ़ाराजा की तरह भद्रक में आखण्डल की शिव रूप में पूजा होती है। (५) शुनः इन्द्र-आकाश में जहां शून्य है वहां भी उर्जा तरंग रूप में इन्द्र है। पृथ्वी पर जिस सम्पत्ति का कोई मालिक नहीं होता (शून्य) वह राजा इन्द्र की होती है। इन्द्र की भू सम्पत्ति रूप में भुआसुनी की पूजा भुवनेश्वर में होती है। शस्त्र शक्ति छिन्नमस्ता को वज्र वैरोचनीये कहते हैं-उसकी पूजा सम्बलपुर में होती है। वामन द्वादशी के दिन वामन ने बलि से ३ लोकों का राज्य इन्द्र को दिया था। अतः इसी दिन से ओड़िशा के राजाओं का राजत्व काल गिनते हैं। पहला वामन द्वादशी शून्य होगा, उसके बाद १, २, ... आदि होंगें अतः इसे सुनिया पर्व कहते हैं। (६) गोजा-सूर्य से निकली किरण गो या इन्द्र है। उससे सृष्टि का वयन होता है। वयन करनेवाली कात्यायनी है, उसका स्रोत गोजा है जिसकी पूजा गोजा-बयानी रूप में होती है। एष (सूर्यः) वै गोजा (ऐतरेय ब्राह्मण ४/२०) गोजिता बाहू अमितक्रतुः सिमः कर्मन्कर्म्मञ्छतमूतिः खजङ्करः । अकल्प इन्द्रः प्रतिमानम् ओजसाथा जना वि ह्वयन्ते सिषासवः । (ऋक़् संहिता १/१०२/६) गोजा बयानी का क्षेत्र सूर्य क्षेत्र कोणार्क तथा भद्रक (आखण्डलमणि) के बीच केन्द्रापड़ा में है। प्रायः इसी अक्षांश पर गुजरात है। (७) घनघन-लगातार-इन्द्र पर जब अनेक सत्रु आक्रमण करते थे तो वह अकेले घनघन बाण मार कर उसे पराजित कर देते थे-इस अर्थ में ओड़िया में ही प्रयोग होता है। आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्। संक्रंदनोऽनिमिष एक वीरः शतं सेना अजयत साकमिन्द्रः॥ (ऋक् संहिता १०/१०३/१, सामवेद १८४९, अथर्व संहिता १९/१३/२, वाजसनेयी यजुर्वेद १७/३३, तैत्तिरीय संहिता ४/६/४/१, निरुक्त १/१५) (८) सजना,चुतिया, बलमा-ये सभी शब्द इन्द्र के लिये व्यवहार होते थे। असम में इन्द्र की तरह राजा को भी चुतिया कहते थे। यह अच्युत-च्युतः का अपभ्रंश है-इसका अर्थ है जो अभी तक अच्युत या अपराजित है, उसे भी पराजित कर सके। राजा, गुरु, पति आदि को नाम से नहीं पुकारते थे। जिस व्यक्ति (पति) को स-जना कह कर पुकारें वह सजना हुआ। जिस जनी को सः (वह) कह कर पुकारें, वह सजनी है। इन्द्र को बलम् भी कहते थे, जिससे बलमा हुआ है। यो विश्वस्य प्रतिमानं बभूव यो अच्युतच्युत स जनास इन्द्रः॥ (ऋग्वेद, २/१२/९) (ग) जगन्नाथ के शब्द-(१) भावग्रही- इसका प्रयोग भगवान् के लिये जगन्नाथ दास के भागवत में है, अतः यहा यह प्रचल्त नाम है। इसके कारण भाव शब्द का यहां क्रिया रूप में भी प्रयोग होता है। बाकी भारत में केवल संज्ञा रूप ही है। देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परम् भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ । ११। (गीता, अध्याय ३) नैतच्छठत्वं मम भावयेथा क्षुधातृषार्त्ता जननीं स्मरन्ति । (देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र ) (२) महाबाहु केवल जगन्नाथ के लिये ही व्यवहार होता है-महाबाहो बहुबाहूरुपादं (गीता,११/२३) (घ) समुद्र सम्बन्धी शब्द-(१) इरासमा-जिसके दोनों तरफ इरा (नदी, समुद्र) हो। महानदी डेल्टा में एक क्षेत्र है। इससे इरास्मस (Irasmus) हुआ है। (२) खूंटिया-जो जहाज तट पहुंचने पर उसे खूंटा से बान्ध कर स्थिर करे और सामान उतारे। महाराष्ट्र तथा पश्चिम अफ्रीका में इसे खुण्टे कहते हैं। (३) मुण्ड-मूल को ऊपर या मुण्ड (सिर) कहते हैं। जल स्रोत को अंग्रेजी में हेड (Head) कहते हैं। जहां तक महानदी की एक धारा है वह मुण्डली, जहां २ धारा अलग होती है वह बाइमुण्डी है। (४) याचक-यह ओड़िशा तथा महाराष्ट्र में नाविकों की उपाधि है। जहाज दो प्रकार से चलते थे-कुछ अपनी शक्ति से, कुछ हवा से। जो हवा से शक्ति की याचना करते हैं उनको याचक (अंग्रेजी में याच = yatch) कहते हैं। ४. अन्य क्षेत्र-(१) पूर्व भारत-असम, थाईलैण्ड में हाथी को वटूरी कहते हैं क्योंकि इन्द्र के हाथियों को वटूरी और ऐरावत को महावटूरि कहते थे। ऐरावत इरावती नदी के पूर्व भाग का था, वह श्वेत कहा गया है अतः आज भी थाइलैण्ड तथा लाओस के हाथियों को सफेद हाथी कहते हैं। इन्द्र को महान् अर्थ में बट् कहा गया है। इससे हिन्दी में बड़ा हुआ है। थाइलैण्ड की मुद्रा बट है। वहां के लिये बट्-महान् का अर्थ हुआ जिसके पास बहुत सम्पत्ति हो। कम्बोडिया का बड़ा मन्दिर भी बट् (अंकोरवट) है। महान्-बण् महाँ असि सूर्य बळादित्य महाँ असि। महस्ते महिमा पनस्यतेऽद्धा देव महाँ असि। (ऋग्वेद ८/१०१/११) इण्डोनेसिया में इन्द्र तथा गरुड़ के मन्दिर कहे गये हैं (रामायण, किष्किन्धा काण्ड, अध्याय ४०)। वहां का पश्चिमी द्वीप सुमात्रा है जो इन्द्र का नाम (सुत्रामा) है। (२) दक्षिण भारत-ऋवेद के प्रथम सूक्त में रात-दिन अर्थ में दोषा-वस्ता का प्रयोग है। इन शब्दों का उत्तर भारत में कहीं प्रयोग नहीं हुआ है। दोषा के पूर्व काल को प्रदोष कहते हैं। दोषा (रात्रि) का मुख्य भोजन दोसा है। वस्ता का प्रयोग तेलुगु में है। यह दिन करने वाले सूर्य या भगवान् के लिये भी प्रयुक्त होता है, जैसा एक पुराने फिल्मी गीत में था-रमैया वस्ता वैया--। सूर्य प्रकाश के कारण सौर मण्डल के क्षेत्रों को भी वस्तः कहा गया है जो सम्भवतः बस्ती (वसति) का मूल है। (ऋक् १०/१८९/३)। केवल दक्षिण भारत में ही नगर को उरु (उर) कहते हैं-जैसे नेल्लोर्, चित्तूर, बंगलूरु, मंगलूरु, तंजाउर आदि। उरु का मूल अर्थ बड़ा है। सबसे बड़ा डिजाईन नगर का होता है अतः नगर प्रारूप बनाने वाले विष्णु को उरुक्रमः कहा है। बाद में पश्चिम के राजा वरुण ने भी ऊरु नगर बनाया जो ईराक का सबसे पुराना नगर ऊर है। यहां की उर्वशी थी। उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग् वेद १/२४/८) शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग् वेद १/९०/१) पाक शब्द के दो अर्थ हैं-भोजन पकाना, ओड़िया तथा तेलुगु में दूसरा अर्थ भी है, भोजन पकाने के लिये नमक मसाला आदि मिलाने लो भी पकाना कहते हैं। अतः जहां समुद्र दो तरफ भूमि से मिलता है, वह पाक (तमिलनाडु-लंका के बीच) है। एक सुपर्ण ने समुद्र में प्रवेश किया तथा उसने भूमि का माता जैसा पालन किया। पालन अर्थ में रेळ्हि (रेड्डी) का प्रयोग है। तटीय भाग में सबसे अधिक खेती आन्ध्र में होती है अतः आन्ध्र तथा कर्णाटक में किसानों को रेड्डी खहते हैं। समुद्री सेनापति को भी सुपर्ण (सुवन्ना) नायक कहते थे। एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं भुवनं वि चष्टे । तं पाकेन मनसापश्यमन्तितस्तं, माता रेऴ्हि स उ रेऴ्हि मातरम् ॥ (ऋग् वेद १०/११४/४) (३) पश्चिम भारत-पश्चिम दिशा के राजा वरुण थे जिनको अप्पति कहते थे। अतः महाराष्ट्र में सम्मान के लिये अप्पा साहब (आप) कहते हैं। जिस मनुष्य में यज्ञ रूपी वृषभ रव करता है, वह सक्रिय तथा उत्पादन में सक्षम है, अतः सम्मान के लिये काशी में रवा कहते हैं। जो सम्पत्ति प्राप्त कर चुका है वह राव है जो दक्षिण में सम्मान सूचक उपाधि है। तमिल में राव को रावण कहते थे जैसे राम को रामन्, कृष्ण को कृष्णन्। वहीं से रावण पर आक्रमण हुआ था, अतः सम्मान के लिये वहां राव का प्रयोग बन्द हो गया, आन्ध्र, महाराष्ट्र, कर्णाटक और केरल में प्रचलित है-त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति, महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक् ४/५८/३) कृषि क्षेत्र में सबसे अधिक जल मिथिला में है (अधिक नदी तथा वर्षा से), वहां दर्भ (घास, धान गेहूं के पौधे भी) अधिक होने से दरभंगा है। वहां के राजा भी हल चलाते थे अतः उनको सीरध्वज कहते थे (सीर = हल में धातु की नोक, उससे जमीन में खाली स्थान या क्यारी शुनः = शून्य है)। भूमि से उत्पन्न सम्पत्ति सीता है जो भूमि पुत्री कही जाती थी। इसमें राजा का भाग होता है अतः सीता का अंश इन्द्र को देते थे- अथर्व (३/१७)- इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरमुत्तरां समाम्॥४॥ शुनं सुफाला वितुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनुयन्तु वाहान्। दरभंगा के विपरीत महाराष्ट्र के पूर्वी भाग में पश्चिम घाट के पर्वतों के कारण मेघ नहीं पहुंच पाते अतः वह विदर्भ है। भारत में वत्स का अर्थ मनुष्य तथा गौ के बच्चे भी हैं। विदर्भ में ये अधिक प्रिय (मृळा) हैं अतः बच्चे को मुला तथा बच्ची को मुली कहते हैं- क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि। गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे॥१॥ क्षेत्रस्य पते मधुमन्त मूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व। मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु॥२॥ (ऋक् ४/५७) तमिल में भी मुला = बच्चा, लेकिन अभद्र अर्थ में है। (४) भाषा सन्धि क्षेत्र-उत्तर पूर्व में काशि में शिव-यज्ञ सम्बन्धी शब्द हैं, मिथिला में कृषि (अथर्व वेद के दर्भ सूक्त तथा कृषिसूक्त) तथा शक्ति के शब्द हैं। मगध में विष्णु (विष्णुपद क्षेत्र गया) के शब्द हैं। इन भाषाओं का सन्धि स्थल हरिहर क्षेत्र है। पश्चिम ओड़िशा का नरसिंह क्षेत्र ओड़िया, छत्तीसगढ़ी, तेलुगु का समन्वय है। कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र ५ भाषाओं का केन्द्र है-केरल में हरिहर पुत्र अयप्पा (बाइबिल का इयापेन Eapen), महाराष्ट्र के गणेश, आन्ध्र का वराह, तमिलनाडु का सुब्रह्मण्य (कार्त्तिकेय), कर्णाटक का शारदा। अधोमुख त्रिकोण के रूप में भारत शक्ति त्रिकोण हैं जिसमें ५२ शक्तिपीठ हैं। पूर्व उत्तर कोना काली का, पश्चिमी भाग लक्ष्मी (कोल्हापुर के महालक्ष्मी से वैष्णो देवी तक) तथा दक्षिण में कर्णाटक सरस्वती (शारदा) क्षेत्र है। त्रिकोण की उत्तर में प्रतिमा रूप में कश्मीर में भी शारदा क्षेत्र है तथा कश्मीरी की लिपि को भी शारदा कहते थे। (५) खनिज क्षेत्र-छत्तीसगढ़ के कोरबा से झारखण्ड के घाटशिला तक मुख्य खनिज क्षेत्र है जहां असुरों ने खनन के लिये देवों से सहयोग किया था। अतः यहा असुर भाषा (जिसके शब्द ग्रीक में चले गये) तथा संस्कृत में खनिजों के शब्द हैं। मुण्डा-लोहा निकालने वाले। मुर (मुर्रम) = लौह खनिज का चूर्ण। खान को नक्शे पर चिह्नित करने वाले कर्कटा (कर्कट = कम्पास)। पत्थर या बालू में सोने के कण खोजना बालू के ढेर में चींटी द्वारा चीनी का कण खोजने जैसा है अतः इनको कण्डुलना (चींटी) कहते हैं। ग्रीक लेखकों को इससे भ्रम था कि भारत में चीटियां सोने की खुदाई करती हैं। ताम्बा का खनिज खालको-पाइराईट है, इनकी उपाधि खालको है। खान की दीवालों को कछुये की खोल की तरह सुरक्षित करने वाले को कच्छप या एक्का (कछुआ) कहते हैं। पारा खनन करने वले को हेम्ब्रम कहते हैं। सोने के कणों से सोना बनाने वाले ओराम हैं (ग्रीक में औरम = सोना)। खनिज की धुलाई करने वले मिन्ज (मीन = मछली) तथा खनिज शोधन करने वाले हंसदा।

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मिस्टिक पावर (dharmik news) एक प्रयास है धार्मिक पत्रकारिता(religious stories) में ,जिसे आगे अनेक लक्ष्य प्राप्त करने हैं सर्वप्रथम पत्रिका फिर वेब न्यूज़ और अगला लक्ष्य सेटेलाइट चैनेल ............जिसके द्वारा सनातन संस्कृति(hindu dharm,sanatan dharma) का प्रसार किया जा सके और देश विदेश के सभी विद्वानों को एक मंच दिए जा सके | राष्ट्रीय और धार्मिक समस्याओं(hindu facts,hindu mythology) का विश्लेषण और उपाय करने का एक समग्र प्रयास किया जा सके |

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