शक्ति के १० रूप-विजया दशमी

श्री अरुण उपाध्याय(धर्म शास्त्र विशेषज्ञ)
यह शक्ति की पूजा है। विश्व का मूल स्रोत एक ही है पर वह निर्माण के लिये २ रूपों में बंट जाता है, चेतन तत्त्व पुरुष है, पदार्थ रूप श्री या शक्ति है। शक्ति माता है अतः पदार्थ को मातृ (matter) कहते हैं। सभी राष्ट्रीय पर्वों की तरह यह पूरे समाज के लिये है पर क्षत्रियों के लिये मुख्य है, जो समाज का क्षत से त्राण करते हैं-
क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः शब्दस्य अर्थः भुवनेषु रूढः। (रघुवंश, २/५३)
वेद में १० आयाम के विश्व का वर्णन है अतः दश, दशा, दिशा-ये समान शब्द हैं। १० आयाम कई प्रकार से हैं-
(१) ५ तन्मात्रा = भौतिक विज्ञान में माप की ५ मूल इकाइयां। इनके सीमित और अनन्त रूप ५-५ प्रकार के हैं।
(२) आकाश के ३ आयाम, पदार्थ, काल, चेतना या चिति, ऋषि (रस्सी-दो पदार्थों में सम्बन्ध), वृत्र या नाग (गोल आवरण), रन्ध्र (घनत्व में कमी-बेशी, आनन्द या रस।
(३) ३ गुणों (सत्व, रज, तम) के १० प्रकार के समन्वय-क, ख, ग,कख, खक, कग, गक, खग, गख, कखग।
(ख) महाविद्या-१० आयाम की तरह १० महा-विद्या हैं, जो ५ जोड़े हैं-
(१) काली-काला रंग, तारा-श्वेत।
(२) त्रिपुरा के २ रूप-सुन्दरी, भैरवी (शान्त, उग्र)।
(३) कमला-विष्णु-पत्नी, स्थायी सम्पत्ति, युवती, सुन्दर, रोहिणी नक्षत्र, इन्द्र-लक्ष्मी-कुबेर
धूमावती-विधवा, चञ्चल-दुष्ट, वृद्धा, कुरूप, ज्येष्ठा नक्षत्र, वरुण-अलक्ष्मी-यम।
(४) भुवनेश्वरी भुवन का निर्माण करती है, छिन्नमस्ता काटती है।
(५) मातङ्गी वाणी को निकालती है, बगलामुखी (वल्गा = लगाम) रोकती है।
१० महाविद्या के आयाम हैं-
(१) तारा-शून्य विन्दु, इसकी दिशा रेखा रूप में प्रथम आयाम।
(२) भैरवी-उग्र रूप-सतह रूप में दूसरा आयाम।
(३) त्रिपुरा-३ आयाम।
(४) भुवनेश्वरी-भुवन का निर्माण-४ मुख के ब्रह्मा की तरह।
(५) काली-काल रूप में ५वां आयाम। परिवर्तन का आभास काल है।
(६) कमला-विष्णु चेतना रूप में ६ठा आयाम, उनकी पत्नी।
(७) बगलामुखी-वल्गा, रस्सी, एक रोकता है, दूसरा जोड़ता है।
(८) मातङ्गी=हाथी, वृत्र घेरकर कता है, हाथी को रोकना (वारण) कठिन है।
(९) छिन्नमस्ता-काटना रन्ध्र बनाता है।
(१०) धूमावती-१०वां आयाम अस्पष्ट है, धूम जैसा।
विश्व के रचना स्तरों के अनुसार इनके रूप हैं-
(१) काली-पूर्ण विश्व, जिसमें १ खर्व ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं।
(२) तारा-ब्रह्माण्ड के तारा।
(३) त्रिपुरा (षोड़शी)-सूर्य के तेज से यज्ञ हो रहा है, यह १६ कला का पुरुष है, क्रिया षोड़शी है।
(४) भुवनेश्वरी-क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड) तथा रोदसी (सौर मण्डल) के बीच में सूर्य।
(५) छिन्नमस्ता-सूर्य से निकला तेज।
(६) भैरवी-निर्माण में लगी शक्ति।
(७) धूमावती-बिखरी शक्ति जिसका प्रयोग नहीं हुआ।
(८) बगलामुखी-पृथ्वी द्वारा रोकी या शोषित शक्ति।
(९) मातङ्गी-सूर्य के विपरीत दिशा में पृथ्वी का रात्रि भाग।
(१०) कमला-पृथ्वी पर की सृष्टि।
आध्यात्मिक रूप-शरीर के चक्रों में इनका स्थान है-
(१) काली-यह मूलाधार में सोयी हुई कुण्डलिनी शक्ति है।
(२) तारा-स्वाधिष्ठान चक्र का समुद्र और चन्द्रमा है। पश्यन्ती वाक् के रूप में यह तारा है। इसका देवता राकिनी है जो तारक मन्त्र रं (राम) है।
(३) त्रिपुर सुन्दरी-यह सहस्रार में १६ कला के चन्द्र जैसा विहार करती है। वहां सुधा-सिन्धु है (भौतिक रूप में मस्तिष्क का द्रव)।
(४) भुवनेश्वरी-बीज मन्त्र ह्रीं है जिसका अर्थ हृदय है। यह हृदय के अनाहत चक्र के नीचे चिन्तामणि पीठ पर विराजमान है, इसके सभी रूप भुवनेश्वर में हैं, अतः इस नगर का यह नाम है-
सुधा-सिन्धोर्मध्ये सुर-विटप-वाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपो-पवन-वति चिन्तामणि गृहे।
शिवाकारे मञ्चे परम शिव पर्यङ्क निलयां, भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्द लहरीम्॥ (सौन्दर्य लहरी, ८)
सुधा-सिन्धु = बिन्दुसागर। मणिद्वीप-उसके निकट लिङ्गराज। नीप (वट वृक्ष) का उपवन-मूल = बरगढ़, तना -यज्ञाम्र = जगामरा, मुण्ड = बरमुण्डा, द्रुम से द्रुम = दुमदुमा। चिन्तामणि गृह = चिन्तामणीश्वर। शिव रूपी मञ्च = मञ्चेश्वर। परमशिव = लिङ्गराज।
(५) त्रिपुरा भैरवी-मूलाधार में कुण्डलिनी का जाग्रत रूप।
(६) छिन्नमस्ता-आज्ञा चक्र में ३ नाड़ियों का मिलन-इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना।
(७) धूमावती-मूलाधार के धूम्र रूप स्वयम्भू लिङ्ग को घेरे हुये।
(८) बगलामुखी-कण्ठ में वाणी तथा प्राण का नियन्त्रण-जालन्धर बन्ध द्वारा।
(९) मातङ्गी-यह कण्ठ के ऊपरी भाग में है, जहां से वाणी निकलती है।
(१०) कमला-यह नाभि का मणिपूर चक्र है जिसे मणि-पद्म कहते हैं।
(ग) नवरात्रि- नवम आयाम रन्ध्र या कमी है जिसके कारण नयी सृष्टि होती है, अतः नव का अर्थ नया, ९-दोनों है-नवो नवो भवति जायमानो ऽह्ना केतुरूपं मामेत्यग्रम्। (ऋक् १०/८५/१९)
सृष्टि का स्रोत अव्यक्त है, उसे मिलाकर सृष्टि के १० स्तर हैं , जिनक् दश-होता, दशाह, दश-रात्रि आदि कहा गया है-
यज्ञो वै दश होता। (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/१/६)
विराट् वा एषा समृद्धा, यद् दशाहानि। (ताण्ड्य महाब्राह्मण ४/८/६)
विराट् वै यज्ञः। …दशाक्षरा वै विराट् । (शतपथ ब्राह्मण १/१/१/२२, २/३/१/१८, ४/४/५/१९)
विराट् एक छन्द है जिसके प्रति पाद में १० अक्षर हैं। पुरुष (मनुष्य या विश्व) का कर्त्ता रूप भी अक्षर है, जो १० प्रकार से कार्य करता है-
अन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/६/१)
अथ यद् दशरात्रमुपयन्ति। विश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण १२/१/३/१७ )
प्राणा वै दशवीराः। (यजु १९/४८, शतपथ ब्राह्मण १२/८/१/२२)
वर्ष के ३६० दिनों में ४० नवरात्र होंगे। अतः यज्ञ के वेद यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं, तथा ४० ग्रह हैं (ग्रह = जो ग्रहण करे)-
यद् गृह्णाति तस्माद् ग्रहः। (शतपथ ब्राह्मण १०/१/१/५)
षट् त्रिंशाश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम्।
यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वर्त्तयन्ति। (ऋक् १०/११४/६)
४० नवरात्रके लिये महाभारत में युद्ध के बाद ४० दिन का शोक बनाया गया था, जो आज भी इस्लाम में चल रहा है। आजकल वर्ष में चन्द्रमा की १३ परिक्रमा के लिये १३ दिन का शोक मनाते हैं। ४० नवरात्रों में ४ मुख्य हैं-
(१) दैव नवरात्र-उत्तरायण के आरम्भ में जो प्रायः २२ दिसम्बर को होता है। भीष्म ने इसी दिन देह त्याग किया था। वे ५८ दिन शर-शय्या पर थे-युद्ध के ८ दिन बाकी थे, ४० दिन का शोक, ५ दिन राज्याभिषेक, ५ दिन उपदेश।
(२) पितर नवरात्र-दक्षिणायन आरम्भ-प्रायः २३ जून को।
(३) वासन्तिक नवरात्र-उत्तरायण में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।
(४) शारदीय नवरात्र-दक्षिणायन मार्ग में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।-ये दोनों मानुष नवरात्र हैं।
सभी नवरात्र इन समयों के चान्द्र मास के शुक्ल पक्ष में होते हैं-पौष, आषाढ़, चैत्र, आश्विन। आश्विन मास का नवरात्र सबसे अच्छा मानते हैं क्योंकि यह देवों की अर्द्ध-रात्रि है। रात्रि की शान्ति में ही सृष्टि होती है। मनुष्य का भी भोजन और कर्म दिन में होता है, पर शरीर का विकास रात्रि में सोते समय ही होता है।
शरत् काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। (दुर्गा सप्तशती १२/१२)
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा (१ तिथि) के एक दिन पहले आश्विन अमावास्या को महालया होता है, जो विश्व के अव्यक्त स्वरूप का प्रतीक है और इस दिन पितरों की पूजा होती है। उसके बाद नवरात्रि के ९ दिन सृष्टि के ९ सर्गों के प्रतीक हैं। ७वें दिन चन्द्रमा मूल नक्षत्र में रहता है, जो ब्रह्माण्ड (galaxy) का केन्द्र है और इस दिन महाकाली की पूजा होती है। अगले नक्षत्र आषाढ़ के २ भाग हैं-पूर्व, उत्तर। इन दिनों महा-लक्ष्मी, महा-सरस्वती की पूजा होती है।
दुर्गा पूजा में दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है, जो मार्कण्डेय पुराण का अंश है।
(घ) २ दुर्बलता-राजा सुरथ ने मन्त्री-शत्रु के राजनीतिक षड्यन्त्र से राज्य खोया। समाधि वैश्य ने परिवार के षड्यन्त्र से सम्पत्ति खोयी।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः। कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः। विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥ (दुर्गा सप्तशती, १)
इन समस्याओं के साथ वे सुमेधा ऋषि के पास गये, जिन्होंने मिथिला के धनुष यज्ञ के बाद महेन्द्र पर्वत पर परषुराम को भी दीक्षा दी थी। उनका उपदेश ३ विशाल खण्डों में त्रिपुरा-रहस्य है। सुमेधा ऋषि को ही बौद्ध ग्रन्थों में सुमेधा बुद्ध कहा गया है, जिनका स्थान ओड़िशा में बौध जिला है। १० महाविद्या को बौद्ध १० प्रज्ञा-पारमिता कहते हैं।
अपनी दुर्बलता दूर करने के लिये आन्तरिक तथा बाहरी शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है जिसके लिये समाज में एकता होनी चाहिये। विश्व तथा एकत्व की प्रतीक दुर्गा हैं। देवी तथा उनके आयुधों का निर्माण ही देवों की सम्मिलित शक्ति से हुआ। युद्ध में शुम्भ ने जब आक्षेप कियाकि तुम दूसरों के सहारे क्यों लड़ रही हो तो देवी ने कहा कि उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है तथा सभी शक्तियां पुनः उनके शरीर में ही समा गयीं।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः। निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्। ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्त दिगन्तरम्॥१२॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥ (सप्तशती, अध्याय २)
बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह्। अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी॥३॥ देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥५॥ (अध्याय १०)

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