शङ्कराचार्य जन्म का तथ्यात्मक विश्लेष्ण

-चित्सुखाचार्य का बृहत् शंकर दिग्विजय-

तिष्ये (कलौ) प्रयात्यनल-शेवधि-बाण-नेत्रे (२५९३) ऽब्दे नन्दने दिनमणावुदगध्वभजि।

राधे (वैशाखे) ऽदितेरुडु (पुनर्वसु नक्षत्रे) विनिर्गत मङ्ग (धनु) लग्नेऽस्याहूतवान् शिवगुरुः (पिता) स च शङ्करेति॥

जन्म स्थान-केरल के पूर्णा नदी तट पर, १००४०’ उत्तर, ७६० पूर्व।

यह गणना स्वामी कन्नुपिल्लै के २००० वर्ष के पञ्चाङ्ग अनुसार है। वह १ ईस्वी से शुरू होता है। उस पद्धति से ५१० वर्ष पूर्व की गणना है।

४-४-५०९ ई.पू. मंगलवार, २२५२ बजे, प्राणपद लग्न के अनुसार।

सौर वर्ष का आरम्भ ९.५३४८ मार्च ५०९ ई.पू. (९ मार्च उज्जैन मध्य सूर्योदय ६ बजे के ०.५३४८ दिन बाद), वैशाख शुक्ल १ का आरम्भ मार्च २०.७६२३४ को।

वैशाख शुक्ल पञ्चमी ३-४-५०९ ई.पू. ०९३४ बजे से, ४-४-५०९ ई.पू. ११३२ तक।

पुनर्वसु नक्षत्र ४-४-५०९ ई.पू. ०१३९ से ५-४-५०९, ०४०६ तक।

अहर्गण-सृष्टि ७,१४,४०,३२,४३,९६३ (रविवार=१), जुलियन १-१-४७१३ से (मंगलवार =१) १५,३५,६०५, कलि (गुरुवार =१)-९,४७,१४७।

४-४-५०९ ई.पू. को कालटी में सूर्योदय ६-२७-३७ बजे भारतीय समय।

२२५२ बजे-लग्न ८-२१०-२४’, प्राणपद लग्न ८-२१०-२३’ , दशम भाव ५-२६०-४३’।

अयनांश = -१००५८’९”, सूर्य सिद्धान्त से = -१६०५०’।

ग्रह    मध्य(अंश)       स्पष्ट      मन्दोच्च

सूर्य    २३.६२       २५.३८      —

चन्द्र     —-          ९०.६८       —

मंगल  २७०.४८    ३०५.१९  १३०.०२

बुध     १२८.६३    ४४.३४     २२०.३९

गुरु     २४४.५३    २४७.४५    १७१.१८

शुक्र   १७८.५१     ६७.५३       ७९.७८

शनि   ३४६.४१    ३४३.२२      २३६.६२

राहु    ३१.४७         —-           —-

एक फेसबुक लेख से संकलित निम्नलिखित विवरण।

“विमर्श”  नामक पुस्तक से आचार्य के चरित्र का तिथि निर्णय   (गुरुवंश पुराण)

(इस पुस्तक की मात्राएं तथा अक्षर अधिकतर जीर्ण थे। इसमें विश्वरूपाश्रम पर्यंत प्राचीन आचार्यो की परम्परा के अंतर्गत इस पत्रिका को नवीन रूप देकर प्रकाशित किया गया है।) (निम्नलिखित सभी वर्ष युधिष्ठिर संवत है )

युधिष्ठिर संवत २६३१ वैशाख शुक्ल पंचमी——- श्री शंकराचार्य जी का अवतार।

२६३९ चैत्र शुक्ल नवमी—- उपनयन।

२६३९ कार्तिक शुक्ल एकादशी— सन्यास।२६४० फाल्गुन शुक्ल द्वितीय से—- श्री गोविंद भगवत्पादचार्य जी द्वारा उपदेश । (बद्रिकाश्रम में)

२६४६ ज्येष्ठ कृष्ण पूर्णिमा तक—–  ब्रह्मसूत्र, गीता तथा ईशावास्योपनिषद से लेकर छोन्दोग्योपनिषद, बृहदारण्यकोपनिषद, सनत्सुजातीयदर्शन, विष्णुसहस्रनाम, ललिता त्रिशती आदि पर भाष्य रचना की। वहीं पर व्यास जी का दर्शन तथा उनसे शास्त्रार्थ। भरत खण्ड की यात्रा तथा पद्मपादाचार्य जी की प्राप्ति, बद्रीनारायण की प्रतिष्ठा तथा ज्योतिर्मठ का निर्माण।

२६४७ मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीय—-  मण्डन मिश्र के साथ सरस्वती की मध्यस्थता में शास्त्रार्थ।

२६४७ कार्तिक शुक्ल अष्टमी—   भगवान वेदव्यास जी से वाराणसी में शास्त्रार्थ तथा सनन्दन की शरणागति।

२६४८ चैत्र शुक्ल चतुर्थी—-  मण्डन की पराजय। ( तीन महीने सत्रह दिन तक शास्त्रार्थ चला)

२६४८ चैत्र शुक्ल षट— सरस्वती (उभय भारती)  का काम कला सम्बन्धी प्रश्न।

२६४८ चैत्र शुक्ल अष्टमी—-  आचार्य का परकाय प्रवेश।  (छह महीने बीस दिन परकाया में रहे)

२६४८ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी—   आचार्य का पुनः अपने शरीर में प्रवेश।

२४६८ कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा—   आकाश मार्ग से ब्रह्मलोक को जाती हुई सरस्वती को आचार्य ने चिंतामणि मन्त्र से द्वारका में आकर्षित किया।

२६४८ कार्तिक कृष्ण पंचमी—-  शारदा मन्दिर में शारदा की स्थापना।

२६४८ कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से—- द्वारका में शारदा मठ का निर्माण, बौद्धादिकों का पराजय ।

२६४८ माघ शुक्ल दशमी तक—  रुद्र मालाकार द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की यादवेंद्र मूर्ति की चांदी के मंदिर में प्रतिष्ठा, शंकर के शिद्धेश्वर मंदिर का निर्माण, भद्रकाली यंत्र का उद्धार।

२६४८ कार्तिक शुक्ल नवमी— श्रृंगेरी मठ का निर्माण आरम्भ।

२६४९ चैत्र शुक्ल नवमी— मण्डन मिश्र को सन्यास देकर सुरेश्वचार्य योगपट्ट दिया।

२६४९ मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी—-  सुधन्वा की दीक्षा

२६४९ मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी–  श्री सुरेश्वचार्य का द्वारका शारदा पीठ पर अभिषेक।

२६५० वैशाख शुक्ल तृतीया– — दिग्विजय यात्रा महोत्सव।

२६५३ श्रावण शुक्ल सप्तमी—   त्रोटकाचार्य का सन्यास

२६५४ आषाढ शुक्ल एकादशी—  हस्तामलकाचार्य का सन्यास।

२६५४ वैशाख शुक्ल दशमी—–  दिग्विजय यात्रा में ही पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथपुरी में गमन, जगन्नाथ भगवान की काष्ठ मूर्ति की स्थापना, गोवर्धन मठ का निर्माण तथा पद्मपादाचार्य का अभिषेक।

२६५५ भाद्रपद की अमावस्या से लेकर २६६२ पौष कृष्ण पूर्णिमा तक——  अविच्छिन्न गति से दिग्विजय यात्रा में बौद्घ आदि ११३२ मत-मतान्तरों के आचार्यो पर विजय तथा सुधन्वा आदि धार्मिक राजाओं द्वारा अनादिकालीन वर्णाश्रम धर्म व्यवस्थानुसार राज्य करना। भूलोक का उद्धार करते हुए कश्मीर मण्डल में शारदा भगवती के सर्वज्ञासन पर आसीन होकर शास्त्रार्थ करना।

२६६३ कार्तिक पूर्णिमा—-   देवताओं के प्रार्थना करने पर उसी शरीर से विमान पर बैठकर कैलाश गमन।

जन्म समय की गणना जगन्नाथ होरा (कम्प्यूटर गणना) द्वारा प्रायः वही समय आता है। धनु लग्न रात्रि १० बजे के बाद ही है अतः १० से साढ़े ११ बजे रात्रि में ही जन्म हुआ।

यह केवल गणना का प्रश्न नहीं है। यदि शंकराचार्य का जन्म ७८८ ईस्वी में होता तो उस समय सिन्ध पर मुस्लिम अधिकार हो चुका था तथा उसके प्रतिकार के लिये गोरखनाथ ने ४ पीठ स्थापित किये, लोकभाषा में एकता का प्रचार किया तथा बप्पा रावल-नागभट्ट प्रतिहार का संघ बनवाया। उस काल में मुस्लिम आक्रमण के विरोध के बदले बौद्ध दर्शन का विरोध सम्भव नहीं है। लोकभाषा में चर्चा के बदले संस्कृत शास्त्रार्थ और वह भी पश्चिम भारत के मुस्लिम प्रभाव क्षेत्र में सम्भव नहीं था। पर भारत के लोग दोनों बातें एक साथ रट कर परीक्षा पास करते हैं और शोध पत्र भी लिखते हैं। इतिहास सम्मान के विद्यार्थी इतिहास में पढ़ते हैं कि यह शंकराचार्य का काल था जो बौद्ध विरोध संस्कृत शास्त्रार्थ से कर रहे थे-जैसे कारगिल में पाकिस्तान आक्रमण के समय दलाईलामा से युद्ध किया जाये। वही छात्र हिन्दी साहित्य के इतिहास में पढ़ते हैं कि उस काल में नाथपन्थी साधुओं द्वारा हिन्दी तथा अन्य लोकभाषा साहित्य आरम्भ हुआ।

अरुण उपाध्याय 

सामाजिक चिन्तक एवं धर्म शास्त्र विशेषज्ञ 

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