शाकाहारी अथवा मांसाहारी भोजन की आध्यात्मिक शुद्धता

हम अपने लेख में सत्त्व, रज एवं तम, ब्रह्मांड के इन तीन सूक्ष्म घटकों की व्याख्या में बता रहे हैं कि ब्रह्मांड की निर्मिति में सूक्ष्मस्तर पर ये तीनों घटक कैसे अंतरभूत हैं । सूक्ष्मस्तर पर भोजन भी इसके लिए अपवाद नहीं है । इसका निर्माण भी सूक्ष्मस्तर पर सत्त्व, रज एवं तम घटकों से हुआ है । खाद्य पदार्थ किस प्रकार का है शाकाहारी अथवा मांसाहारी, यह इन सूक्ष्म तत्त्वों के अनुपातसे निश्चित होता है । सत्त्व शुद्धता एवं ज्ञान के लिए जान जाता है, तम जडता एवं अज्ञान का द्योतक है । ऐसी कोई वस्तु जिसमें सत्त्व घटक अधिक होता है, वह हमारी आध्यात्मिक यात्रा में सहायक होता है तथा तम घटक जहां पर प्रभावी होता है वहां हमारी आध्यात्मिक साधना में व्यवधान उत्पन्न होते हैं ।

आध्यात्मिक अनुसंधान में  शाकाहार तथा मांसाहार के सूक्ष्म अवलोकन से निम्न परिणाम प्राप्त हुए । कृपया ध्यान दें : प्रस्तुत आंकडे भिन्न खाद्य प्रवर्गों के अवलोकन के औसत पर आधारित हैं । मत्स्य को निरामिष भोजन की श्रेणी में समाहित किया है एवं इसमें मांस की अपेक्षा तम अत्यल्प परिमाण में होता है । एक ही श्रेणी के खाद्यों में आपस में थोडी बहुत भिन्नता होती है, उदाहरण; सामिष श्रेणी में बकरे या मुर्गी के मांस में सत्त्व, रज एवं तम के आधार पर थोडा अंतर होता है । बकरे की हत्या करते समय उसे जो कष्ट होता है, उसके कारण बकरे के मांस में मृत्योपरांत तमाधिक्य हो जाता है एवं प्राणी में क्रोध एवं प्रतिशोध के विचार पेड-पौधों की अपेक्षा अधिक तीव्र होते हैं; क्योंकी वनस्पति में मन एवं बुद्धि का स्तर अल्पविकसित अवस्था में होता है । मांस में तमाधिक्य का यह एक प्रमुख कारण है ।

आपको बता दें  कि शाकाहारी भोजन में सूक्ष्म सत्त्व गुण का अपेक्षाकृत आधिक्य होता  है । सामिष भोजन में तमाधिक्य होने के कारण मांसाहारी भोजन खाने की कृति भी तामसी है । फल में सात्त्विकता का आधिक्य होने के कारण भगवान को इसका नैवेद्यार्पण किया जाता है मांस निर्माणियों में प्राणियों से किए जाने वाले व्यवहार का मांस पर परिणाम

प्राणियों की कत्ल से पहले किया जाने वाला व्यवहार

अखिल विश्व की मांस निर्माणियों में प्राय: प्राणियों को एक लाभदायी वस्तु की तरह उपयोगी समझा जाता है । प्राणि-खेती में इस वृत्ति ने प्राणियों के प्रति निर्दयता को संस्थानिक बना दिया है, जिसके कारण वृहत्स्तर पर पर्यावरण का विनाश, स्रोतों का ह्रास, प्राणियों एवं मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है । अधोसंलग्न चलचित् रमें प्राणी-खेती अभयारण्य में प्राणियों पर होने वाली क्रूरता को चित्रित किया है ।आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में प्राणियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करना एवं कत्ल करना एक पाप है । क्या कत्लखाने में वध करने की पद्धति का मांस पर आध्यात्मिक प्रभाव पडता है ? कुछ प्रथाओं एवं धर्मों में एक विशिष्ट पद्धति से वध किये हुए प्राणि का मांस भक्षण करने की मान्यता है, अन्यथा उस समाज में मांस नहीं खाया जाता । कत्लखानों में प्राणियों को विद्युत झटका देकर अथवा पिस्तौल से आधातकर अविचल करने की सामान्य परंपरा है । ऐसा करने से प्राणी वध करने के पहले चेतनाहीन हो जाते हैं, तदोपरांत उन्हें खींचकर प्रक्रिया यंत्रणा तक लाकर उनकी करोटिड शिरा एवं जुगलर मुख्य रक्तवाहिनी को एक चाकू की सहायता से काटा जाता है । इससे तीव्र रक्तस्राव होने के फलस्वरूप प्राणी रक्तहीनता से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । कुछ समुदायों में तो यह आवश्यक होता है कि प्राणी को कत्ल करने के पहले उसकी मुख्य रक्तवाहिना को प्राणी को चेतनाहीन किए बिना ही काटा जाए जिससे तीव्र रक्तस्राव से प्राणी की मृत्यु हो तथा ऐसा ही मांस भक्षण की अनुज्ञा उनकी परंपरा देती है । रक्तस्राव से प्राणी की मृत्य होने की प्रक्रिया का काल दो मिनिट तक हो सकता है । प्राणियों के अधिकार को संरक्षित करने वाले गुट इस तरीके का विरोध करते हैं; क्योंकी उनके अनुसार यह निर्दयता पूर्ण है और प्राणी को इससे अतिवेदना होती है । किंतु इन समुदायों के प्रवक्ता उल्टे तर्क देते हैं कि वेदना के स्तर में कोई अंतर नहीं है । उनका पक्का मत है कि मुख्य रक्तवाहिनीयों के काटने से मस्तिष्क में एकाएक रक्तस्राव होता है, जिससे रक्तचाप के घटने से मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति नहीं होती तथा प्राणी को वेदना की अनुभूति होने का समय ही नहीं मिलता ।

(संदभ : BBC.com 2003) हमने जब इस विषय में आध्यात्मिक अनुसंधान किया तो पाया कि : जब किसी प्राणी को मारा जाता है तब उसे उतनी ही वेदना होती है जितनी किसी मनुष्य को मारने से होती है । यह सच है कि प्राणी के मस्तिष्क और प्रज्ञा के विकास के आधार पर वेदना के अनुभव होने में कुछ अंतर हो सकता है ।

प्राणी का जीवन ज्यादातर भोजन एवं काम प्राप्ति तक ही सीमित होता है; किंतु मानवी जीवन के अनेक पहलू होते हैं जिससे उसका लगाव होता है, जिसके कारण उसके वेदना की अनुभूति बहुत अधिक होती है ।जब उपरोक्त उल्लेखित समुदायों की प्रथानुरूप कत्ल किया जाता है, तब प्राणी की वेदना में प्रबल वृद्धि होती है । जब प्राणी को धीरे धीरे उसके अंग काट-काटकर मारा जाता है तब यदि १ से १०० तक के परिमाण पैमाने पर,वेदना १०० एकक है तो;प्राणी द्वारा अनुभव की गई वेदना ३० एकक होगी जब उसे सामान्य पद्धति से कत्लखाने में कत्ल किया जाता है.प्राणी द्वारा अनुभव की गई वेदना ५० एकक होगी जब उसे उपरोक्त समुदायों की प्रथानुसार कत्ल किया जाता है ।फलस्वरूप वेदना में वृद्धि होने के कारण, सूक्ष्म तमतत्त्व की मांस में वृद्धि होती चली जाती है । ऐसा इसलिए भी होता है; क्योंकी प्राणीको, उपरोक्त समुदाय के लोग जिस पद्धति से उसे मारते हैं उससे क्रोध भी आता है ।

ऐसा विरोधाभास है कि ये समुदाय प्राणियों की कत्ल, उनके धर्म की मान्यता है ऐसा समझकर जिस पद्धति से करते है, वास्तव में वैसा करनेसे मांस की आध्यात्मिक अशुद्धि बढती चली जाती है और वे तम की अधिक मात्रा का सेवन करते हैं । अधोलिखित आध्यात्मिक सूक्ष्म परीक्षण के अवलोकन से यह तथ्य इंगित होता है । हत्या के भिन्न प्रकार से मांस के सूक्ष्म घटकों में परिवर्तनउपरोक्त निरीक्षणों से हम देख सकते हैं कि तम तत्त्व मे वृद्धि होंने के साथ-साथ सत्त्व तत्त्व में न्यूनता आती है । क्या पेड-पौधे भी मृत्यु के समय वेदना का अनुभव करते हैं ? हां ! पेड-पौधे भी मृत्य के समय या जब उन्हें काटा जाता है तब वेदना का अनुभव करते हैं; किंतु वेदना का संज्ञान प्राणियोंकी अपेक्षा कम होता है । ऐसा इसलिए है; क्योंकि वनस्पति में मस्तिष्क एवं प्रज्ञा अल्पविकसित अवस्था में होती है; किंतु जब फल या शाक पूर्ण पकी अवस्था में तोडे जाते है या पेड से गिरते है, तब वेदना अपेक्षाकृत कम होती है ।

मांस पकाने की कृति मांस को भूनने की तीन परंपरागत पद्धतियां हैं, हल्का, मध्यम तथा पूर्ण भुना । हल्का भुना मांस कच्चे मांस के करीब होता है । यह बाहर से तो भुना होता; किंतु अंदर से कच्चा लाल होता है । दूसरी ओर मांस जिसे पूर्ण भुना कहते हैं, वह बाहर से तो काला होता है तथा अंदर से भूरा एवं पका हुआ । ऐसे व्यक्ति जिन्हें हल्का भुना मांस पसंद है उनका फायदा लेकर भूत (भूत, प्रेत, शैतान जैसी ऋणात्मक शक्तियां आदि) उनका आधिपत्य ले सकतीं हैं। ऐसा इसलिए है; क्योंकि कच्चा मांस ही अनिष्ट ऋणात्मक शक्तियों की पहली पसंद है । मांस के ऐसे टुकडे जो पूर्ण भुने होते हैं उनमें अपेक्षाकृत हल्के या मध्यम भुने मांस से सूक्ष्म तमघटक कम मात्रामें होते हैं । बढे हुए तम तत्त्व के आधिक्य का प्रभाव कितने कालतक ठहरता है ? जब तमाधिक्य से युक्त भोजन नियमित तौर पर ग्रहण किया जाता, तब शरीर को तम तत्त्व के आधिक्य का भार उठाना पडता है । तम तत्त्व के आधिक्य से व्यक्ति पर अनेक ऋणात्मक प्रभाव पडते हैं । इस तम तत्त्व का विघटन उसी समय हो सकता है, जब व्यक्ति ऐसी आध्यात्मिक साधना करे जो आध्यात्मके छह:मूल सिद्धांतोपर आधारित हो । किंतु प्राय:सभी लोग आध्यात्मिक साधना नहीं करते, तम तत्त्वका अंश व्यक्ति के शरीर, मन एवं प्रज्ञा में स्थिर हो जाता है । किसी औसत आध्यात्मिक स्तर के व्यक्ति को मांस भक्षण को छोडकर शाकाहारी होना हो तो उसे संपूर्ण तम तत्त्व जो उसमें स्थिर हो गया है उस पर नियंत्रण प्राप्त कर उसके ऋणात्मक प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए करीब-करीब ३० वर्ष समय लगेगा क्योंकि उसने तम युक्त मांसाहारी आहार लिया है । तमांश युक्त आहार लेने के कारण, उसके ऋणात्मक प्रभावों से मुक्त होने के लिए, ऐसे व्यक्ति को भी जो ६ मूल आध्यात्मिक सिद्धांतो पर आधारित साधना करता है उसे औसतन ५ वर्षों का कालावधि लगेगा । यह स्थिति उस परिस्थिति में होगी जब वह मांसाहारी भोजन का पूर्ण त्याग कर, प्रतिदिन (६ मूल सिद्धांतो पर आधारित) ४ से ५ घंटे आध्यात्मिक साधना करे । यदि वह तमांश युक्त मांसाहारी भोजन का त्याग शनै:शनै: करता है, तो उसे ऋणात्मक प्रभावों से मुक्त होने में १० वर्ष तक लग सकते हैं ।

अब प्रश्न है कि  क्या मनुष्य के भेदक दांत (canine teeth) मांस खाने के लिए बने हैं ? भेदक दांत (canine teeth) का कार्य भोजन को फाडकर खाने में होता है । मांसाहार  भोजन के पुरस्करता जोर देकर कहते हैं कि ईश्वर ने भेदक दांत मांसाहार भोजन के लिए दिए हैं । यह योग्य तर्क नहीं है । यह ऐसा ही है कि, चूंकि हमारे पास नाखून हैं, इसलिए हम अन्य लोंगों को जानवरों जैसे खरोंचें । मनुष्य के पास भेदक दांत हैं मात्र इसीलिए वह मांसाहार भोजन करे, ऐसा नहीं है । आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में मानव जन्म ही ईश्वरानुभूति के लिए प्राप्त होता है । मानव व प्राणियों में मूल अंतर यही है कि, केवल मानव के पास ही विकसित मस्तिष्क एवं प्रज्ञा है, जिसे सात्त्विक कृतियों के माध्यम से सद्मार्ग की ओर अग्रसर कर ईश्वर प्राप्ति की जा सकती है ।

इस प्रकार लोगो को आध्यात्मिक आधार पर संसूचित किया जाता है कि वे मांसाहारी प्राणियों से प्रेरित होकर मांसाहार भोजन न लें ।प्याज और लसुन खाने का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य कुछ समुदाय प्याज और लहसुन से दूर रहते हैं । इस विषय में आध्यत्मिक परिप्रेक्ष्य क्या है ?  प्याज और लहसुन में रज तत्त्व का परिमाण अधिक है । आयुर्विज्ञान के अनुसार, भोजन में प्याज और लहसुन क्षुधावर्धक माने जाते हैं, क्योंकि वे भूख को बढाते हैं । प्याज एवं लहसुन को खाने से होने वाली रज तत्त्व की वृद्धि को ४ से ५ घंटे की मध्यम या १० से १२ घंटे की तीव्र आध्यात्मिक साधना से नियंत्रित किया जा सकता है ।  दूध, दही एवं चीज का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य जब गाय का दूध ग्रहण किया जाता है, तब व्यक्ति में सत्त्व तत्त्व की वृद्धि होती है । सभी प्रकार के दूधों में गाय का दूध सर्वाधिक सात्त्विक होता है ।दही तथा मट्ठा दूध की अपेक्षा कम सात्त्विक होते हैं ।जब दूध से अन्य खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं, (विशेषत: दूध को फाडकर बनाए हुए पदार्थ) तब उसकी सात्त्विकता कम होने लगती है और सूक्ष्म तमतत्त्व की वृद्धि होने लगती है ।

मानव पर भोजन का प्रभाव शारीरिक स्तर पर मांसाहारी भोजन चूंकि उसमें तमतत्त्व अधिक होता है, उसे ग्रहण करने से हमें अनेकों व्याधियां हो सकती हैं। मानसिक स्तर पर मांसाहारी भोजन में तमतत्त्व की अधिकता होने के कारण मानव मन में अनेक अभिलाषाऐं एवं अन्य तामसिक विचार जैसे लैंगिक विचार, लोभ, क्रोध आदि उत्पन्न होते हैं।  आध्यात्मिक स्तर पर शाकाहारी भोजन में सत्त्व तत्त्व अधिक मात्रा में होने के कारण वह आध्यात्मिक साधना के लिए पोषक होता है। उदा. मनोज का आध्यात्मिक स्तर आज ३० प्रतिशत है । साधना के ६ मूल सिद्धांतों के आधारपर उसने प्रतिदिन ४-५ घंटे साधना करने से शुरूवात की, यदि वह शाकाहारी भोजन लेना पसंद करता तो सभी कारक समान होते हुए भी आज उसका आध्यात्मिक स्तर ४० प्रतिशत होता, जो कि मांसाहारी भोजन लेने की अपेक्षा २० वर्ष शीघ्र  होता । ईश्वर प्राप्ति करने के लिए हमें तीन सूक्ष्म तत्त्वों को समझना होगा । अत:आध्यात्मिक साधना करके हमें अपनी प्राथमिकताओं के के पार जाना होगा; क्योंकि वे ३ सूक्ष्म तत्त्वों से मिलकर बनें हैं । ९० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरतक यह सभी बातों में लागू है; परंतु इस स्तरके बाद साधक जो ग्रहण करता है, उसमें इन तीन सूक्ष्म तत्त्वों के अनुपात से कोई फरक नही पडता । वह व्यक्ति जो अधिक तमप्रधान मांसाहारी भोजन करता है, उस पर भूतों (राक्षस, शैतान, ऋणात्मक शक्तियां आदि) से बाधित होने की संभावना अधिक होती है । सभी बातें समान होते हुए भी व्यक्ति जो मांस खाता है, उसको शाकाहारी व्यक्ति की अपेक्षा, भूतों द्वारा बाधित होने की संभावना २० प्रतिशत अधिक होती है । इसका कारण यह है कि मांस का भोजन आसुरी शक्तियों को प्रिय होता है । जो साधक अपनी साधना समझकर समाज में आध्यात्म का प्रचार व प्रसार करते हैं, मासांहार करनेके पश्चात् उनके बाधित होने की संभावना अधिक होती है । ऐसा इसलिए होता है कि उच्चस्तर के भूत आदि उनके शरीर में बढे हुए तम सूक्ष्म तत्त्व का लाभ उठाकर उन्हें कष्ट देते हैं । क्या मासांहारी भोजन करने से हमें पाप लगता है ? इसका उत्तर है हां, जब हम किसी प्राणी या पौधेको मार डालते हैं, तो हमें पाप लगता है और किसी फेक्टरी, फार्म या कत्लखाने में प्राणियों पर होने वाले अत्याचार व हत्या द्वारा निर्मित पाप के हम भागीदार होते हैं, जब हम उनका मांस खाते हैं । लोग जो मांसाहार करते हैं, वे इस पाप के उतने भागीदार नहीं होते जितने उन्हें मारने वाले व अत्याचार करने वाले होते हैं । जो लोग किसी मांस निर्माण मे कार्य करते हैं वे ७०% पाप के भागी होते हैं, जब कि वे लोग जो मांस भक्षण करते हैं उन्हें ३०% पाप लगता है । अनेक स्थितियों में जो लोग कत्लखानों में कार्यरत होते हैं, वे भूतों द्वारा बाधित होते हैं एवं प्राणियों की ओर उनके संवेदनाहीन प्रवृत्ति का यही मुख्य कारण होता है । श्रमिक भूतों द्वारा बाधित हो जाते हैं क्योंकि उनके कार्य भूत, प्रेत, शैतान आदि ऋणात्मक शक्तियों की प्राथमिकताओं के अनुरूप होते हैं । पेढ-पौधों की हत्याका पाप प्राणियों की हत्या करने से लगने वाले पाप की अपेक्षा बहुत कम होता है क्योंकि बुद्धि एवं मस्तिष्क अल्पविकसित होने के कारण वनस्पतियों में संवेदना अल्प होती है । फिर भी यदि हम मध्यम से तीव्र आध्यात्मिक साधना करते हैं (आध्यात्मिक साधना के छ: मूल सिद्धांतो के अनुसार) तो हम इस पाप को अपनी साधना के बल पर निष्प्रभ कर सकते हैं; परंतु करीब -करीब सभी लोग यथार्थ साधना साधना नहीं करते, इसलिए उनके पाप निष्प्रभ नहीं होते । वनस्पतियों की हत्या से संचित पाप फिर भी मानवी हत्या से उत्पन्न पापा से बहुत कम होते हैं । इसका कारण यह है कि मानव में ईश्वर प्राप्ति की सुप्त शक्ति विद्यमान है एवं उनकी हत्या कर हम अपना वह अवसर खो देते हैं । सभी पशुओं में गाय सबसे अधिक सात्त्विक होती है एवं किसी प्राणी की हत्यासे संचित पाप की अपेक्षा गोहत्या का पाप सबसे अधिक होता है । गोहत्या जघन्न पाप माना जाता है । जब कोई व्यक्ति ६०% के आध्यात्मिक पर पहुंच जाता है, तब इससे बहुत कम फरक पडता है कि उसका आहार सामिष है या निरामिष है । ऐसा इसलिए है, कि आध्यात्मिक उन्नति के परिप्रेक्ष्य में भावपूर्ण नामस्मरण करने की उसकी अनन्य उपलब्धि के समक्ष, उसका आहार कैसा है यह घटक गौण हो जाता है ।

आध्यात्म विज्ञान के सिद्धांतानुसार जब हम इन दो गणकों की तुलना एक पैमाने पर, किसी ६०% आध्यात्मिक स्तर के साधक के विषय में करते हैं: शाकाहारी आहार लेने से व्यक्ति में सूक्ष्म सत्त्व तत्त्वकी वृद्धि ०.०००१% होती है ।जब कि यदि कोई भावयुक्त नामस्मरण करता है, तब उसकी सात्त्विकता में ५% की वृद्धि होती है । वास्तव में जैसे जैसे किसी व्यक्ति का आध्यात्मिक स्तर ऊंचा होता जाता है, उसकी सात्त्विकता प्रभावी होने लगती है । उसके साथ-साथ ऐसे व्यक्ति सामिष खाद्य पदार्थ के तमांश से विमुख होजाते हैं । जिसके फलस्वरूप उच्च आध्यात्मिक स्तर के लोग सामान्यतया शाकाहारी होते हैं एवं सामिष भोजन करते समय वे व्यथा का अनुभव करते हैं । ४. मांसाहारी भोजन के संबंध में क्या करें व क्या न करें यदि कोई मांस खाना नहीं छोड सकता तो यह संसूचित किया जाता है कि वह कम से कम अधोलिखित काल में उससे दूर रहे; सूर्योदय व सूर्यास्त के समय, ग्रहणकाल में, रात्रि के समय तथा पौर्णिमा व अमावास्या के दो दिन पहले व दो दिनों उपरांत । ऐसे समय भूत अधिक कृतिशील होते हैं तथा वातावरण में बढे हुए रज-तम का लाभ ले सकते हैं । (यद्यपि सूर्योदयकाल को सात्त्विक समझा जाता है, तदापि हमने सूर्योदय को भी सम्मिलित किया है, कारण उस समय अंधकार का कुछ प्रभाव होने के कारण तम की प्रबलता होती है ।) जो साधना के प्रति गंभीर हैं, उनके लिए शाकाहारी खान-पान अधिक उपयुक्त है ।

डॉ. दीनदयाल मणि त्रिपाठी 

प्रबन्ध सम्पादक 

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