शान्ति पाठ महात्म्य

श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ)- १. वेद के ४ स्तर- १. संहिता (ऋषियों के मन्त्र का संग्रह), ब्राह्मण (व्याख्या), आरण्यक (प्रयोग), उपनिषद् (स्थिर सिद्धान्त- निषाद = बैठना)। इसमें अन्य भागों में केवल आदि में शान्ति पाठ होता है। उपनिषद् मे आदि और अन्त दोनों में शान्ति पाठ होता है। इसका कारण है कि सिद्धान्त स्थिर करने के पहले मन शान्त होना चाहिये। सिद्धान्त का बाद में हर स्थिति में प्रयोग होता है, अतः उसके भी विधिवत् लाभदायक प्रयोग के लिये मन शान्त होना चाहिये।
२. मांगलिक शब्द- हर मन्त्र के पहले ॐ का उच्चारण किया जाता है-
मनु स्मृति (२/७४)-ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा। स्रवत्यमोङ्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्च विशीर्यति॥
ॐ और अथ इन दो शब्दों का ब्रह्मा ने सबसे पहले उच्चारण किया था अतः इनको माङ्गलिक कहा जाता है-
ॐ कारश्चाथ शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान् माङ्गलिकावुभौ॥ (नारद पुराण, ५१/१०)
३. शान्ति पाठ के भेद- हर वेद के लिये अलग-अलग शान्ति पाठ हैं। ४ वेदों में यजुर्वेद २ प्रकार का है- शुक्ल और कृष्ण। अतः कुल ५ प्रकार के शान्ति पाठ हैं जो इन वेदों के उपनिषदों के लिये प्रयुक्त होते हैं।
महावाक्य रत्नावली में शान्ति पाठ का क्रम संक्षेप में है-
वाक्पूर्णसहनाप्यायन् भद्रं कर्णेभिरेव च। पञ्च शान्तीः पठित्वादौ पठेद्वाक्यान्यनन्तरम्॥
इसका मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार स्पष्टीकरण है-
ऋग्यजुः सामाथर्वाख्य वेदेषु द्विविधो मतः। यजुर्वेदः शुक्ल कृष्ण विभेदेनात एव च॥१॥
शान्तयः पञ्चधा प्रोक्ता वेदानुक्रमणेन वै। वाङ्मेमनसि शान्त्यैव त्वैतरेयं प्रपठ्यते॥२॥
ईशं पूर्णमदेनैव बृहदारण्यकं तथा। सहनाविति शान्त्या च तैत्तिरीयं कठं च वै॥३॥
आप्यायन्त्विति शान्त्यैव केनच्छान्दोग्य संज्ञके। भद्रं कर्णेति मन्त्रेण प्रश्न-माण्डूक्य-मुण्डकम्॥४॥
इति क्रमेण प्रत्युपनिषद् आदावन्ते च शान्तिं पठेत्।
इन के अनुसार वेदानुसार उपनिषदों के शान्ति पाठ हैं-
ऋग्वेद शान्ति पाठ-
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रात् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शुक्ल यजुर्वेदीय शान्ति पाठ-
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
कृष्ण यजुर्वेदीय शान्ति पाठ-
ॐ सहनाववतु॥ सह नौ भुनक्तु॥ सह वीर्यं करवावहै॥ तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
सामवेदीय शान्ति पाठ-
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्-प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अथर्ववेदीय शान्ति पाठ-
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्ये माक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैः स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देव हितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
४. वेद विभाजन-मूल एक ही वेद था जिसे ब्रह्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को पढ़ाया था। बाद में इसका परा (एकत्व) तथा अपरा (वर्गीकरण-विज्ञान) में विभाजन हुआ। अपरा से ४ वेद और ६ अङ्ग हुए।
ब्रह्मा देवानां प्रथमं सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्या प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥१॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा ऽथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्म-विद्याम्। स भरद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भरद्वाजो ऽङ्गिरसे परावराम्॥२॥ (मुण्डकोपनिषद्, १/१/१,२ )। द्वे विद्ये वेदितव्ये- … परा चैव, अपरा च। तत्र अपरा ऋग्वेदो, यजुर्वेदः, सामवेदो ऽथर्ववेदः, शिक्षा, कल्पो, व्याकरणं, निरुक्तं, छन्दो, ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते। (मुण्डकोपनिषद्, १/१/४,५)
विभाजन के बाद अविभाज्य अंश ब्रह्म रूप अथर्ववेद में रह गया-
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। (गीता, १३/१६)
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्। (गीता, १८/२०)
अतः त्रयी का अर्थ १ मूल + ३ शाखा = ४ वेद होता है। इसका प्रतीक पलास दण्ड है जिससे ३ पत्ते निकलते हैं। यह वेद निर्माता ब्रह्मा के प्रतीक रूप में वेदारम्भ संस्कार (यज्ञोपवीत) में प्रयुक्त होता है।
ब्रह्म वै पलाशः। (शतपथ ब्राह्मण, १/३/३/१९, ५/२/४/१८, ६/६/३/७)
ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशम् (पर्णम्) (शतपथ ब्राह्मण, २/६/२/८)
तेजो वै ब्रह्मवर्चसं वनस्पतीनां पलाशः। (ऐतरेय ब्राह्मण, २/१)
यस्मिन् वृक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते यमः। अत्रा नो विश्यतिः पिता पुराणां अनुवेनति॥ (ऋक्, १०/१३५/१)
ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ। पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हति धर्मतः॥ (मनु स्मृति, २/४५)
बिल्व (बेल) तथा पलाश दोनों में ३ पत्ते होते हैं।
त्रयी विभाजन का आधार है, ऋक् = मूर्ति, यजु = गति, साम = महिमा या प्रभाव, अथर्व = अविभक्त ब्रह्म। इसी को मनु स्मृति आदि में अग्नि (सघन ताप या पदार्थ), वायु (गति) तथा रवि (तेज) भी कहा गया है।
ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत्।
सर्वं तेजं सामरूप्यं ह शश्वत्, सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम्॥ (तैत्तिरीय ब्राह्मण,३/१२/८/१)
अग्नि वायु रविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञ सिद्ध्यर्थमृग्यजुः साम लक्षणम्॥(मनु स्मृति,१/२३)
गति २ प्रकार की है- शुक्ल और कृष्ण। शुक्ल गति प्रकाश युक्त अर्थात् दीखती है। कृष्ण गति अन्धकार युक्त अर्थात् भीतर छिपी हुयी है। शुक्ल गति ३ प्रकार की है- निकट आना, दूर जाना, सम दूरी पर रहना (वृत्ताकार कक्षा)। वस्तु का आन्तरिक प्रसारण या संकोच मिला कर ५ गति कही गयी है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। — धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। (गीता, ८/२४-२५)
उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि। (वैशेषिक सूत्र,१/१/७)
शरीर या किसी पिण्ड के भीतर की गति दीखता नहीं है। वह कृष्ण गति १७ प्रकार की है, इस अर्थ में प्रजापति या पुरुष को १७ प्रकार का कहा गया है। समाज (विट् = समाज, वैश्य) भी १७ प्रकार है। विट् सप्तदशः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण १८/१०/९) विशः सप्तदशः (ऐतरेय ब्राह्मण, ८/४)
सप्तदशो वै पुरुषो दश प्राणाश्चत्वार्यङ्गान्यात्मा पञ्चदशो ग्रीवाः षोडश्च्यः शिरः सप्तदशम्। (शतपथ ब्राह्मण, ६/२/२/९)
राष्ट्रं सप्तदशः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/८/८/५)
सर्व्वः सप्तदशो भवति। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १७/९/४)
सप्तदश एव स्तोमो भवति प्रतिष्ठायै प्रजात्यै। (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १२/६/१३)
तस्माऽएतस्मै सप्तदशाय प्रजापतये। एतत् सप्तदशमन्नं समस्कुर्वन्य एष सौम्योध्वरो ऽथ या अस्य ताः षोडश कला एते ते षोडशर्त्विजः (शतपथ ब्राह्मण, १०/४/१/१९)
अर्थात्, व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के अंगों का आन्तरिक समन्वय १७ प्रकार से है जो दीखता नहीं है। वह कृष्ण गति है। एक समतल को किसी चिह्न (टप्पा) द्वारा १७ प्रकार से भरा जा सकता है। इसे आधुनिक बीजगणित में समतल स्फटिक सिद्धान्त कहते हैं। (Modern algebra by Michael Artin, Prentice-Hall, page 172-174) ५ महाभूतों की शुक्ल गति ५ x ३ = १५ प्रकार की होगी आन्तरिक गति १७ x ५ = ८५ प्रकार की है। अतः शुक्ल यजुर्वेद की१५ शाखा तथा कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखा (१ अगति या यथा स्थिति मिलाकर) हैं। समतल चादर की तरह मेघ भी पृथ्वी सतह को ढंक कर रखता है, अतः ज्योतिष में १७ के लिये मेघ, घन आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
५. शान्ति पाठ विभाजन- (१) ऋग्वेद स्थूल शरीर या मूर्ति का वेद है। अतः स्थूल शरीर में मन, वाक् आदि प्रतिष्ठित हों यह कामना करते हैं। ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता—-
(२) यजुर्वेद- गति का वेद है। जिस गति से उपयोगी कर्म होता है, उसे यज्ञ कहते हैं। बाह्य यज्ञ ३ प्रकार के विश्व रूपों में देखते हैं- पूर्ण विश्व की स्थिति, पूर्ण विश्व गति रूप, पूरण विश्व निर्माण या यज्ञ रूप। ये तीनों अनन्त हैं। अतः हम कहते हैं कि पूर्ण विश्व से पूर्ण गति रूप निकाल देने पर भी निर्माण या परिवर्तन रूप यज्ञ बचा रहता है। ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं—-
(३) कृष्ण यजुर्वेद-यह समाज या देश की आन्तरिक रचना है। इसके लिये हमारी कामना है किस भी एक साथ रह कर एक दूसरे की सहायता करें। यज्ञों का उद्देश्य भी यही कहा है कि एक यज्ञ द्वारा दूसरा यज्ञ सम्पन्न हो तभी उन्नति की जा सकती है। ॐ सहनाववतु॥ सह नौ भुनक्तु—
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति। (गीता, ४/२५)
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष-सूक्त, यजुर्वेद, ३१/१६)
(४) साम वेद-यह बाहरी अदृश्य प्रभाव या महिमा है। उससे हमारे मन शरीर आप्यायित हों यह हमारी कामना है। ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि—–। यही गायत्री मन्त्र का तृतीय पाद भी है-धियो यो नः प्रचोदयात्।
(५) अथर्व वेद- यह सनातन ब्रह्म का स्वरूप है ,जो कभी बदलता नहीं है। थर्व = थरथराना, अथर्व = स्थिर, स्थायी। अतः हमारी कामना है कि हमारा शरीर स्थिर रहे, सब तरफ शान्ति हो, चारों दिशाओं में स्वस्ति हो। इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य, बृहस्पति-ये ४ दिशाओं के ४ नक्षत्रों के स्वामी हैं-ज्येष्ठा, रेवती, गोविन्द (विष्णु), पुष्य। इसका प्रतीक स्वस्तिक चिह्न है। अन्य प्रकार से ये ४ पुरुषार्थों के कारक हैं- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। इन्द्र राजा है, बृहस्पति गुरु, पूषा पोषण देने वाला तथा विष्णु पालन कर्त्ता। रक्षक राजा, ज्ञान दायक गुरु, पालन कर्त्ता विष्णु और पोषक पूषा कल्याण करें। अतः दोनों कहते हैं- स्थिरैरङ्गैः—, या स्वस्ति न इन्द्रो—।

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